रचनाकार का समय: ‘बचने ही चाहिए बच्चे, भले ही मारा जाए ईश्वर’

कवि, लेखक या एक्टिविस्ट को कभी भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि कहूं तो कवि या लेखक कहलाने का हक़ उन्हें ही मिलना चाहिए जो घने अंधेरे में भी रोशनी का क़तरा देख लेते हैं या महसूस कर लेते हैं. रचनाकार का समय में पढ़िए कवि भास्कर चौधुरी को.

भास्कर चौधुरी, उनकी पुस्तक 'बचने ही चाहिए बच्चे' का आवरण. (साभार: फेसबुक और न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन)

चारों ओर से जैसे युद्ध के सलेटी बादल टूट पड़े हैं. दुनिया भर के तमाम शासकों में तानाशाह बनने की होड़ मची है. हर वो शख़्स जो ताकतवर है, कमज़ोर को उखाड़ फेंकने या ख़त्म करने पर आमादा है. धनपतियों को संपत्ति की होड़ ने अंधा बना दिया है. वे रातों-रात लाखों ऊंचे-पूरे और हरे-भरे पेड़ों को काटकर जंगल के जंगल साफ कर रहे हैं. अमेजॉन और दुनिया के अन्य कई जंगलों में पहले तो जानबूझकर आग लगाई जाती है फिर बुझाने का ड्रामा किया जाता है. बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष ‘ग्लोबल वार्मिंग’ पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में धीर-गंभीर भाषण देते हैं, जंगल बचाने की बात करते हैं और अपने-अपने देशों में वापस लौटकर स्वयं के वर्चस्व की लड़ाई में जुट जाते हैं.

पर्यावरण का आवरण छिन्न-भिन्न हो चुका है. नदियां सिमट रही हैं, पहाड़ अपनी आभा खो रहे हैं, उपजाऊ ज़मीन बंजर होते जा रहे हैं, शहरों का विस्तार इस तरह हो रहा है कि बहुमंजिली इमारतों के बीच सूरज फंसा हुआ नज़र आता है और धूप केवल छतों पर पसरने की चीज मालूम पड़ती है; आदिवासी, पशु-पक्षी और फल-फूल कृत्रिमता की चकाचौंध के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.

हम जैसे बाहर और भीतर कलुषित हो चुके हैं. काल के गाल में जैसे आतुर हैं समाने को समूचा संसार… यही है इस समय का सच, ऐसा मुझे लगता है. तो क्या एक साहित्यिक रुझान के व्यक्ति (या कम-से-कम अपनी नज़र में कवि-लेखक) और एक जागरूक नागरिक के रूप में यही सब सोचता हुआ- उदास और हताश, निराशा के गर्त में ऊबचूभ डूबा हुआ, जम्हाई लेता हुआ ‘कुछ नहीं हो सकता अब’ कहकर हाथ झाड़ लेने वाले कई अन्य बुद्धिजीवियों की तरह हूं मैं भी…?

मेरा उत्तर है नहीं…. मैं ऐसा कतई नहीं सोचता. मेरा स्पष्ट मानना है कि कवि, लेखक या एक्टिविस्ट को कभी भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि कहूं तो कवि या लेखक कहलाने का हक़ उन्हें ही मिलना चाहिए जो घने अंधेरे में भी रोशनी का क़तरा देख लेते हैं या महसूस कर लेते हैं. इस सम्बन्ध में मुझे ब्रितानी कवि पीबी शैली की ये पंक्तियां महत्वपूर्ण लगती हैं – ‘If winter comes, can spring be far behind?’ (अगर सर्दी आती है, तो क्या वसंत बहुत दूर रह सकता है?)

भास्कर चौधुरी की पुस्तकें. (साभार: संबंधित प्रकाशन)

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब बाज़ार का हमला चारों दिशाओं से हो रहा है. अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं और ग़रीब और अधिक ग़रीब. एक तरफ दो जून के लिए रोटी की किल्लत है तो दूसरी तरफ लज़ीज़ व्यंजनों की बरसात हो रही है जिसे खाने वाले लोग मुट्ठी भर ही हैं. विभिन्न देशों के राजनेता शिक्षा, रोज़गार और स्वास्थ्य जैसे मसलों को सुलझाने के बजाय लोगों को जाति-धर्म, भाषा-बोली-रंग और तरह-तरह के अन्य भेदभावों में उलझाकर अपनी रोटी सेंकने या अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं. दुनिया की एक बड़ी आबादी किसी-न-किसी रूप में युद्ध की विभीषिका झेल रही है जिसका वीभत्स प्रभाव सबसे अधिक बच्चों और हमारी आने वाली नस्लों पर पड़ेगा यह तय है.

आदमी का आदमी पर से भरोसा उठ गया है. रिश्ते दरक रहे हैं. ‘मोबाइल’ और ‘एआई’ सतही तौर पर ज़िंदगी आसान बनाते दिखाई पड़ते हैं पर असल में ये हमसे हमारा कुछ बहुत ‘निजी’ छीन रहे हैं जिसे हम समझते हुए भी नासमझ बने हुए हैं. दूसरे शब्दों में कहें, तो हम तेजी से मानसिक ग़ुलामी की ओर बढ़ रहे हैं. हमारे चारों ओर एक ऐसा दुश्चक्र-सा बन गया है जिसके भीतर हम फंसे हुए हैं. ऐसे में एक कवि के रूप में मेरी चिंताएं भी यही हैं. उदाहरण के लिए कुछ पंक्तियां यहां रखना समीचीन होगा –

1

यह बैल बूढ़ा
उसने खुला छोड़ दिया
चरे या मरे उसे क्या

पिता भी बैल की तरह.

2

ज़मीन के बारे में
बहुत ऊंचाई से
उतरते हैं आप
और
उतरते ही बोलने लगते हैं
धाराप्रवाह
जमीन के बारे में.

3

अनाथालय
यहां
समय से होता है
सब कुछ
समय से सोना
समय से जागना
खाना, पढ़ना, खेलना समय से

यहां नहीं होता
बच्चों का रोना —
हंसना
समय से.

4

सोचता हूं
एक सीढ़ी लगा लूं
धरती से स्वर्ग तक ऊंची
और उतार लाऊं
ईश्वर को

ढाल बनाकर खड़ा कर दूं
उन बच्चों और उस बच्चे के बीच
जो ईश्वर और खुदा की लड़ाई में
चाकू लिए तैयार खड़े थे..

बचने ही चाहिए बच्चे
भले ही
मारा जाए ईश्वर
मुझे कोई गिला नहीं.

5

वे निगल गए नदी को साबुत
और अब उगल रहे हैं
पानी मिली राख
धरती के गालों पर मलने के लिए शायद
धरती के सौंदर्य का यही एक तरीका बच गया है.

6

तानाशाह
क्या
खाली रही
कभी
दुनिया
तानाशाहों से ?

क्या
दुनिया रही
कभी
तानाशाहों की ??

(भास्कर चौधुरी के कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं.)

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