आलोचना फ़ैसला नहीं देती, लेकिन कविता के कैनन का निर्माण करती है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आलोचक प्रथमतः और अंततः कविता का रसिक पाठक होता है और उसकी यह रसिकता आलोचना की काया में प्रगट होती है. बिना कविता का आस्वाद लिए, आलोचना नीरस होती है. उसका एक काम समय और समाज में कविता की जगह और समझ बनाना और बढ़ाना होता है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

जहां तक मैं जानता हूं, ऐसा कम ही होता है कि दिल्ल विश्वविद्यालय के कुछ महाविद्यालय मिलकर कोई बौद्धिक आयोजन करें. शायद ऐसे आयोजन खेलकूद, विज्ञान आदि के क्षेत्र में अधिक होते होंगे. बहरहाल, श्यामाप्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय, मिरांडा हाउस और श्‍याम लाल सांध्य महाविद्यालय ने मिलकर मिरांडा के सभागार में ‘हिंदी काव्य-आलोचना: तब और अब’ विषय पर दो दिनों की संगोष्ठी आयोजित की. उसमें हिंदी के कई आलोचकों, नंदकिशोर आचार्य, गोपेश्वर सिंह, रामेश्वर राय, सुधीश पचौरी, जयप्रकाश कर्दम, सुधा सिंह आदि ने भाग लिया. मुझे बीज वक्तव्य देने का अवसर मिला.

हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि हिंदी में कविता लगभग हज़ार बरस पुरानी है और आलोचना को बमुश्किल सौ बरस हो पाए हैं. उसकी आत्यन्तिक रूप से जो भी कमियां रहीं हों, हिंदी आलोचना भारतीय भाषाओं में विकसित आलोचना में ख़ासा ऊंचा स्थान रखती है. यह भी कि हिंदी में ही बहुत सारी श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण कविता आलोचना की अनुपस्थिति में लिखी गई है.

एक ऐसे समय में, जो कि दुर्भाग्य से हमारा समय है, जिसमें, जैसा कि रोलां बाख़्त ने दशकों पहले कहा था, कविता और साहित्य अपने आभूषणों की नहीं बल्कि अपनी त्वचा का बचाव करने पर विवश है, आलोचना का काम इस बचाव में शामिल होना है. आलोचना कविता की सहचर होती है और कविता में प्रवेश का रास्ता खोलने की कोशिश करती है. कविता में जो अनचिन्हा रह जाता है, उसे चीन्हने-चिन्हवाने का प्रयत्न करती है. आलोचक प्रथमतः और अंततः कविता का रसिक पाठक होता है और उसकी यह रसिकता आलोचना की काया में प्रगट होती है. बिना कविता का आस्वाद लिए, आलोचना नीरस होती है. उसका एक काम समय और समाज में कविता की जगह और समझ बनाना और बढ़ाना होता है.

आलोचना कविता को परंपरा से, सामाजिक-नैतिक आशयों से, ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ती है. वह विचार की विधा भी होती है. इसलिए वह कविता को विचार के व्यापक वितान से भी, एक तरह से, प्रतिकृत कराती है. उसका विचार तो कविता से निकलता है पर वह अन्यत्र उपलभ्य विचारों से उसे जोड़ पाती है. कवि और आलोचक दोनों के अपने पूर्वग्रह होते हैं: उनमें तनाव, अनुकूलता, द्वंद्व होते हैं. संसार, जीवन, आत्म और पर, भाषा आदि के सिलसिले में समझ, संवेदना, साहचर्य और सहानुभूति में बिरादरी और साझेदारी होती है.

आलोचना का काम फ़ैसला देना नहीं है लेकिन कविता के कैनन के निर्माण में उसकी भूमिका होती है, अक्सर निर्णायक. आलोचना के लिए सारी कविता, प्राचीन और आधुनिक, तत्काल होती है. एक ज़रूरी तथ्य यह है कि कविता संश्लेषण की और आलोचना विश्लेषण की विधा होती है और यह उनके बीच एक तरह का अस्तिमूलक अंतर्विरोध उपजाता है.

कई बार कविता को आलोचना की तरह पढ़ा जा सकता है, उदाहरण के लिए ‘कामायनी’ को जीवन की, मुक्तिबोध की कविता को आत्मा और सामाजिक सचाई की, धूमिल और साही को अपनी हिस्सेदारी की आलोचना के रूप में.

जो भी हो, शुरू से ही आलोचना का लक्ष्य साहित्य रहा है: तब भी था, अब भी है. पहले भी वैचारिक मतभेद होते थे लेकिन वे विचारधारात्मक शत्रुता में नहीं बदलते थे जैसे कि आज. तब भाषा और शिल्प का आलोचना में अधिक सक्रिय-सजग बोध था. कविता को उसके तथाकथित विचार में घटाकर उसकी जांच-परख करने की वृत्ति इतनी व्यापक नहीं थी जितनी कि अब हो गई है. कविता को कविता की तरह पढ़ने की आदत थी, उसे सामाजिक दस्तावेज़, नैतिक हस्तक्षेप, वैचारिक वक्तव्य में बदलने का वैसा उत्साह नहीं था जितना आज व्यापक-प्रबल है. कवियों द्वारा अपनी कविता में सक्रिय दृष्टि, संवेदना, अनुभूति आदि को आलोचनात्मक ढंग से समझाने का जतन था जो आज लगभग ग़ायब है.

आज युवा कवियों को तुरंत अनुमोदन, प्रशंसा चाहिए. लगता है आलोचना की उन्हें दरकार नहीं. लगभग सात दशकों में आलोचना के कई नए मुक़ाम खोजे गये, नई भाषा और पदावली विकसित हुईं, नई अवधारणाएं विन्यस्त की गयीं. लेकिन आज आलोचना में युवा पीढ़ियां, रचना की तरह, नए विचार, नई अवधारणाएं, नई विधियां बहुत कम खोज पा रही हैं. अधिकांश आलोचना उसी भाषा, वैचारिक वितान और शिल्प में लिखी जा रही है जो कम से कम चार दशक पुरानी हैं.

जिन कुछ लोगों ने आलोचना में नवाचार किया है, जैसे मदन सोनी, वागीश शुक्ल, आशुतोष भारद्वाज आदि, उनकी आलोचना की, अकादेमिक जगत और विचारधाराग्रस्त परिवेश ने लगातार अवहेलना की है. दुर्भाग्य से अब रचना और आलोचना दोनों ही इस मामले में समरस हैं कि दोनों स्मृतिवंचित, स्मृतिहीन होती जा रही हैं.

यह भी याद किया जा सकता है कि आलोचना पर विचार करते समय अक्सर इसका उल्लेख तक नहीं होता कि बहुत महत्वपूर्ण आलोचना स्वयं कवियों ने लिखी है जिनमें पंत, प्रसाद, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, जगदीश गुप्त, विजय देव नारायण साही, लक्ष्मीकान्त वर्मा, मलयज, नेमिचन्द्र जैन, रमेशचन्द्र शाह, विष्णु खरे, अरुण कमल आदि शामिल हैं. ऐसे अनेक पद, अवधारणाएं हैं, जो आज तक आलोचनात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा हैं, कवियों की आलोचना से निकले हैं: संप्रेषण, प्रयोग, पूर्वग्रह, आत्मदान, सभ्यता-समीक्षा, आत्मानुभूति, फैंटेसी, नितान्त समसामयिकता, खंड खंड सर्जनात्मकता, वागर्थ की अल्पता आदि.

यह भी याद रखना चाहिए कि ‘पल्लव’ की पंत-भूमिका, प्रसाद के ‘काव्यकला और अन्य निबंध’, ‘तार सप्तक-दूसरा सप्तक’ की अज्ञेय-भूमिकाएं, अज्ञेय का ‘आत्मनेपद’, ‘मुक्तिबोध की पुस्तक ‘कामायनी: एक पुनर्विचार’, साही की पुस्तक ‘जायसी’, मलयज की डायरियां, रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘निराला की साहित्य-साधना’, नेमिचन्द्र जैन की पुस्तक ‘अधूरे साक्षात्कार’ आदि हिंदी आलोचना के बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं और सभी कवियों ने लिखे हैं.

कवियों द्वारा लिखी गई आलोचना सिर्फ़ हिंदी की विशेषता नहीं है. अंग्रेज़ी आलोचना में तो कवियों की सक्रियता की मुख्यधारा की है: ड्राइडेन, पोप, मैथ्यू अर्नल्ड, टी एस ईलियट, डबल्यूएच ऑडेन, शीमस हीनी आदि. अमेरिकी आलोचना में भी एज़रा पाउण्ड, एलेन टेट, आरपी ब्लैकमर, जान क्राड रैन्सम, जान एशबरी आदि सभी बड़े आलोचक हैं तो कवि भी हैं. फ्रेंच में तो कला-आलोचना भी आधुनिक धारा एक बड़े कवि चार्ल्‍स बोदेलेयर ने शुरू की और बाद में अनेक प्रमुख फ्रेंच कवियों ने, जिनमें अपोलेनेयर, मलार्मे, आन्द्रे ब्रेतां, पाल एलुआर, लुई अरागां, ईव बोनफुआ शामिल हैं, फ्रेंच में श्रेष्ठ कलालोचना लिखी है.

हिंदी आलोचना ने, साहित्य के पड़ोस में सक्रिय ललित और प्रदर्शनकारी कलाओं पर ध्यान नहीं दिया है: यह तब भी ऐसा था, अब भी ऐसा है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)