नई दिल्ली: सिंगापुर की एक अपीलीय अदालत ने मंगलवार (8 अप्रैल) को एक सरकारी रेलवे अनुबंध से संबंधित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के एक फ़ैसले को रद्द कर दिया. अदालत ने पाया कि इस फ़ैसले का क़रीब 50% हिस्सा किसी दूसरे मामले से हूबहू ‘कॉपी और पेस्ट’ किए गए थे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत के 40-पृष्ठ के फैसले में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि पूर्व सीजेआई मिश्रा की अध्यक्षता वाले मध्यस्थता फैसले के 451 पैराग्राफ में से लगभग आधे समान फैसले से कॉपी किए गए थे.
मालूम हो कि यह निर्णय भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आचरण पर केंद्रित था, जिन्होंने तीनों मध्यस्थता फैसलों की अध्यक्षता की थी. न्यायालय ने पाया कि जस्टिस मिश्रा के काम ने पक्षपात की भावना पैदा की और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है.
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि जस्टिस मिश्रा और दो अन्य सेवानिवृत्त भारतीय न्यायाधीशों वाला न्यायाधिकरण सभी पक्षों की दलीलों का स्वतंत्र रूप से आकलन करने में विफल रहा और उन्होंने अपने निर्णय के लिए पिछले फैसले पर बहुत अधिक भरोसा किया.
मालूम हो कि यह मामला भारत की डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और तीन कंपनियों के एक कंसोर्टियम के बीच एक रेलवे अनुबंध से जुड़ा था. अखबार के अनुसार, यह मध्यस्थता दिसंबर 2021 में शुरू हुई थी.
गौर करें कि अपील न्यायालय द्वारा निर्णय को रद्द करने और मध्यस्थों के नाम बताने का फैसला ऐसे मामलों में असामान्य है. इससे पहले सिंगापुर अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक न्यायालय (एसआईसीसी) ने पहले 2024 में निर्णय को रद्द कर दिया था, लेकिन इसमें शामिल लोगों के नाम नहीं बताए थे.
जस्टिस मिश्रा के संबंध में एसआईसीसी को अखबार द्वारा यह कहते हुए उद्धृत किया गया: ‘अफसोस के साथ, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वे काफी अनुभवी न्यायाधीश हैं लेकिन उनके मध्यस्थ के खिलाफ स्पष्ट पूर्वाग्रह का दावा अच्छी तरह से स्थापित है.’ एसआईसीसी ने कंसोर्टियम द्वारा जस्टिस मिश्रा पर समान मामलों की सामग्री को ‘फैसला करने से पहले के साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल’ किए जाने के आरोप को सही पाया.
मालूम हो कि सिंगापुर में सर्वोच्च न्यायालय अपील न्यायालय का नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश सुंदरेश मेनन करते हैं.
