कभी लगता है कि लिखना एक यात्रा है, वक़्त के रेगिस्तान में पसरे रास्ते पर, जिस पर मरीचिकायें हैं और ज़िंदगी की तलाश में बेचैनियां. अपने समय को याद करने पर तमाम लोग, तमाम बातें याद आती हैं, वे भी जिन पर लिखना था और जो अब तक लिखा नहीं. लेखक के समय का यह एक पक्ष है -यात्रा और यादें. पर उसका समय एकरैखीय नहीं है, वह अतीत से भविष्य तक पसरा है, अपनी तमाम शाखाओं और प्रशाखाओं में. उसका समय, मौजूदा समय के विपरीत चलता है. वह धारा के विपरीत अपना काम करता चलता है.
ग़ालिब ने जो कहा है कि ‘नुक्ता चीं है ग़म-ए-दिल’, तो यह कुछ ऐसा ही है जो दुनिया के बेढबपने से, उसकी एब्सर्डिटी से टकराता है, उससे नाख़ुश रहता है, नाराज़ रहता है. बुद्ध ने सही कहा था कि ‘संसार दुखमय है’ और आप किसी मुस्कुराने वाले, ख़ुशमिज़ाज आदमी से भी पूछो, अगर वह बता पाये तो उसके पास कष्टों से भरी अनगिनत बातें हैं. जातिवाद, सांप्रदायिकता, युद्ध, नफ़रतें, पूंजी और भौतिकतावाद, स्त्रियों के प्रश्न…तमाम दिक्कतें हैं, तमाम परेशानियां और इन सबसे बनी यह दुनिया है. यही दुनिया लेखक की दुनिया है. लेखक का समय दुनिया का समय ही है.
लेखक का समय और दुनिया का समय एक दूसरे से अलग नहीं हैं. वह इसी समय से भिड़ता है, इसी के खि़लाफ़ लिखता है. जब कष्ट हों, तकलीफ़ें हों तो आप प्रकृति वर्णन कैसे करेंगे या केवल वैयक्तिक प्रेम की बात तक ख़ुद को कैसे सीमित रख पाएंगे. जो आज का समय है वह बहुत चुनौतीपूर्ण है. वह तेजी से बदल रहा है और मूल्यहीनता और संवेदनशीलता के तमाम नज़ारे, तमाम वाकये हमारे सामने हैं. यह समय लिखने का समय है, यक़ीनन.
कलम उठाने से पहले जो दुनिया थी उसमें भी भरपूर अध्ययन होता था. बचपन में पिता अंग्रेजी साहित्य की कविताओं को पढ़कर उनका मतलब बताते थे और हिंदी के तमाम साहित्य के अलावा चेखव, लु-शुन, पुरानी ग्रीक माइथोलॉजी, संस्कृत साहित्य तथा और भी तमाम के कुछ हिंदी अनुवाद थे, जिनमें से कई, कई-कई बार नई तरह से सामने आते रहे.
गांव और क़स्बे बदलते हुए बचपन बीता और अब भी यह सब जारी ही है यानी बार-बार घर बदलना. जब घर बदलता है तो दुनिया बदलती है, पर लोगों के दुख-सुख एक से ही रहते हैं. भले यह लगता हो कि जगह बदलने के बाद नई जगह पर नई तरह की बातें मिलेंगी, कुछ ऐसा बदलाव होगा जो तमाम चीज़ों को बदल देगा, पर ऐसा होता नहीं है. दृश्य के बदल जाने से, लोगों की ज़बान बदल जाने से एक बार को लग सकता है कि बहुत कुछ बदल गया, पर लोगों की इच्छाएं, उनकी अपनी दुनिया के हालात और भी बहुत कुछ जो धीरे-धीरे आपके सामने खुलता है, वह वैसा ही होता है जैसा वह किसी और जगह होता है.
मुझे लगता है कि लेखक के समय का एक पक्ष यह भी है कि वह न तो अलग-अलग इलाक़ों को अलग-अलग देख पाता है और न ही उनको बांटकर देखने की उसकी फ़ितरत होती है.
कुछ चीज़ों के अपनी तरह के मतलब हो सकते हैं, जैसे मेरे लिए अतीत का मतलब सिर्फ़ उतना ही नहीं है जो आपने देखा-भोगा. दुनिया का इतिहास भी अतीत है, भले उसे आप पढ़कर जानते हैं. आज के दौर में जब इतिहास की मनगढ़ंत और बेबुनियाद व्याख्यायें बढ़ रही हैं और तक़रीबन स्थापित होती जा रही हैं तो उसके सही परसेप्शन को सामने लाना भी ज़रूरी है. आप बहुत पुराने अतीत को जान नहीं सकते. कोई टाइम मशीन तो है नहीं. न ही इतिहास यह दावा करता है कि वह अतीत का सच बता रहा है. यह एक परसेप्शन है जो कुछ सबूतों पर, कुछ ऐसी चीज़ों पर जो हमारी चेतना की पकड़ में हैं उसके आधार पर तय होता है.
कुछ रचनाकार दोस्त कहते हैं कि कहानियों और उपन्यास में इतिहास का इतना प्रवेश क्यों कराते हो, तो इसकी वजह यही है कि अतीत की ग़लत व्याख्याओं के रास्ते समाज को ग़लत रास्ते पर ले जाने की कोशिशों के ख़िलाफ़ आप खड़े होते हैं. बदलते समय में लिखने का तरीक़ा भी एक तरह का नहीं हो सकता. नये तरीक़े अपनाने की ज़रूरत लगती है. कहानी और उपन्यास लिखता हूं तो वही रास्ता दिखता है.
हमारा समय इतना उहापोह से भरा है, इतना ऑब्सक्योर्ड है कि दुनिया से एक तरह से कटकर अपने काम में लगे रहना अच्छा लगता है. पर मैं जानता हूं कि यह कोई घमण्ड या ख़ुद को अलग मानने जैसा नहीं है, दरअसल लेखक को अपना एकांत चाहिए और फिर यह न तो कोई शिकायत है और न ही कोई बहाना.
एक कवि कह गया है –द ब्लिस ऑफ सॉलिट्यूड– तो इसे ब्लिस भर तो न कहूंगा, खाली ब्लिस मान लेना नाइंसाफ़ी होगी, पर अकेले हुए बिना मामला बनता नहीं. आप कह सकते हैं कि एक ऐसी सदिच्छा जिसमें अकेलापन चाहिए, अपने काम के लिए भी और इसलिए भी कि इससे, इसके मार्फत ही वे तमाम रास्ते खुलते हैं जिन पर आप चलना चाहते हैं. हम लोग नातों-रिश्तों से लेकर दुनिया के घोर अजनबी लोगों तक उनसे जुड़ने और समय बिताने की तलाश में रहते हैं, तांक-झांक और दूसरों की ज़िंदगी की तमाम छोटी-छोटी बातों में ख़ुद को उलझाये रखना पसंद करते हैं. यह एक तरह की ऐसी मध्यमवर्गीय उत्सुकता है, जिस पर आप शायद मुसकुरायें और इस अहसास पर खुश हों लें कि आप इससे बच गए.
शायद और भी लिखने वालों और कलाकारों को ऐसा महसूस होता हो. इस प्रवृत्ति से लिखने के बहुत निकट जो दूसरी कोई कला है, वह शायद चित्रकला है, वह भी उतनी ही एकांतिकता का काम है. साहित्य की दुनिया में होना भी आपको अकेला करता है. यह इसलिए भी ज़रूरी लगता है कि नौकरी और दुनियादारी का दबाव वैसे भी आपको बहुत कम समय देता है, ऐसे में एकांतिकता और भी क़ीमती चीज़ बन जाती है. यह इच्छा बनी रहती है कि कुछ लिखने-पढ़ने वाले लोगों के साथ संगत हो, बैठकी हो, पर लगता है शुक्र है कि यह भी बहुत कम मुमकिन हो पाता है.
पहली कहानी ‘नया ज्ञानोदय’ में साल 2003 में प्रकाशित हुई थी तबसे और उस समय से भी जब से लिखता रहा हूं तमाम तरह की बातें, तमाम तरह के क़िस्से हैं -निश्चय ही लेखकों और साथी रचनाकारों से जुड़े- और इन बातों और क़िस्सों से बहुत कुछ जानने-सीखने को भी मिला. हर बार ख़ुद को बदलने और फिर कुछ नया करने की इच्छा बनी रहती है. पता नहीं लिखने में आने वाले बदलाव को समय का बदलाव कह सकते हैं या नहीं, पर यह हुआ है कि कहानियों के बनिस्बत इधर उपन्यास लिखने का काम ज़्यादा हुआ. पहले उपन्यास ‘लौटती नहीं जो हँसी’ से लेकर अब तक कुल तीन उपन्यास लिखे हैं और चौथे पर काम चल रहा है. शायद उस विस्तार की तलाश रहती है जो तमाम उपकथाओं और कहने-सुनने की परंपरा के रूप में सामने आता रहता है और हमारे समय की तरह से ही जो एकरैखीय नहीं है.
कहानियों में कुछ छूटता हुआ लगता है. लगता है कुछ और भी था जिस तक पहुंचा जाना चाहिए था, पर एक विस्तार पर आकर कहानी ख़त्म होती ही है. अगर आप निर्मम एडिटर हैं, जो कि होना ज़रूरी है, तो तमाम उपकथाओं और वृत्तांतों को आप काटते-छांटते ही हैं, भले वे कहानी के विस्तार में मुकम्मल रूप से शामिल हों. उपन्यास इस मामले में थोड़ी ज़्यादा गुंजाइश देता है. समय एक तरह का दबाव भी पैदा करता है, लिखते रहने का दबाव, पर लगता है लेखक इस तरह के दबाव से मुक्त भी होता है, शायद सबके साथ होता हो कि बहुत-सी कहानियां और उपन्यास, लेखक के ज़ेहन में ही ख़त्म हो जाते हैं. लेखक का ज़ेहन रचना की जन्मस्थली भी है, उसका क़ब्रिस्तान भी.
सूचनाओं के इस दौर में कहानियों और उपन्यासों से क़िस्सागोई कम होती जा रही है और उसकी जगह ठंडी सूचनाओं का बिखराव भरता जा रहा है. यह निश्चय ही चिंतनीय है. सूचनाओं के मार्फत हक़ीक़त का एकदम नग्न रूप सामने आता है. समाज की ठंडी या हिंसक प्रतिक्रिया, दोनों सालती हैं. पर फिर भी उस समय तक ठहरना ज़रूरी है जब तक कि वह कहानी की शक्ल न ले ले. रचना को काटते-छांटते हुए भी ऐसा ज़रूर किया जाना चाहिए कि जो कुछ भी सिर्फ़ तथ्यों और जानकारी की शक्ल में हो, तो उससे मुक्त हो लिया जाए.

कथायें और उपकथायें स्वयं में भी एक तथ्य होते हैं, जानकारी होती हैं, पर अपने पूरे वजूद में, कहानी के परिणाम या उसकी बनक (बनावट) के बखान के रूप में, पर वे उसके ऐसे हिस्से के रूप में नहीं हैं जो घटित होने वाले क़िस्से या कही जा रही बातों के साथ-साथ आते जाते हों, भले उसका हिस्सा न भी हों. कहानी या उपन्यास को साफ़ पानी की तरह होना चाहिए जिसमें तलहटी भी दिख जाती हो, तलहटी का प्रकाश भी, जल-प्रवाह और पत्थर भी, पर उस पर ऊपरी परतों में बहते कचरे के मानिंद ये सूचनायें बहुत कुछ नष्ट भी करती ही हैं.
हमारे समय में भाषा और कथ्य दोनों की चुनौतियां हैं, अपनी तरह की. शायद हर समय रही होंगी, क्योंकि दुनिया कभी भी स्थिर नहीं रही है और बदलावों के बीच लेखक की असहमतियां, बेचैनियां, चिंतायें और नाराज़गी बनी रही है. मामला बस इतना है कि आज का समय बहुत तेजी में है और बदलावों के प्रति जितना आग्रही है, उतना ही उसके दर्द और परेशानियों में लिप्त भी और इस सबके बावजूद एक क़िस्म की ठंडी निर्मम बेपरवाही और निठुरता भी है. यह कहने में संकोच नहीं कि हमारे समय में बेहतर दुनिया का सपना एक विरल होता सपना है, एक ऐसा सपना जो इतना विरल है कि कभी-कभी ख़ुद ही अपने-आप में सवाल बन जाता है. ऐसे में लिखने की ज़रूरत भी एक वाजिब ज़रूरत हो गई है और चुप्पी एक तरह का अभिशाप. इसलिए भले यह फ़ितरतन हो तब भी यह एक ऐसा काम है जिसे हर हाल में किया ही जाना चाहिए.
(तरुण भटनागर कथाकार हैं.)
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