कोई लेखक जिस भी कालखंड के भीतर होता है, उसके बारे में उसके पास किसी महान दार्शनिक अवधारणा का पवित्र जल हो, यह आवश्यक नहीं होता है. अधिक-से-अधिक इस प्रकार का दावा कर सकता है कि वह समय को इकहरी संरचना नहीं मानता और उसे बहुआयामी मान उसकी बहुस्तरीयता की खोज करता है. पर यह सत्य अवश्य है कि वह कई बार ऐसी बड़े लेखकीय प्रयत्न व कल्पनाएं कर सकता है जो उसे मानव-निर्मित समय से मुक्त कर सकती हैं. तब वह अतीत, वर्तमान तथा भविष्य आदि के आयामों का सफल रचनात्मक उपयोग करता है.
वह कुछ ऐसे मार्गचिह्न व विचारदृष्टि प्राप्त कर सकता है जिसके बल पर किसी हाशिये या कोने में खड़ा हो जाता है और वहीं से देशकाल, परिवेश तथा घटनाओं को तटस्थ होकर देखने तथा उनमें इच्छानुसार शामिल होने की आज़ादी चाहता है. यानी प्रायः रचनाकार प्रदत्त समय से भागना चाहता है. पर भागते-भागते अंत में उसे रुकना-ठिठकना ही होता है और समय के कंधे पर दोस्ताना हाथ रख उसके साथ समझौते करने पड़ते हैं. ठीक वैसे ही जैसे कोई डरपोक यात्री अंत में तेज भागते जहाज के डेकचेयर्स पर बैठ सफ़र का लुत्फ़ लेने लगता है. लेखक भी समय के प्रवाह में अपनी चेतना के प्रवाह को बुरी तरह उलझा हुआ महसूस कर लिखने बैठ जाता है ताकि समय और उसकी चेतना का जो द्वंद्व है, उसे कोई रचनात्मक प्रतिकृति प्रदान कर सके.
सच यह भी है कि उसमें यथार्थ को लेकर एक घोर निराशा का भाव होना आवश्यक है. अगर उसके मुंह में यथार्थ तथा उसकी नश्वरता का कड़वा स्वाद भरा हुआ है तो यह उसके लेखन के लिए अच्छा है. यह भी अच्छा ही है कि वह भीतर-ही-भीतर उस यथार्थ को लेकर आशातीत ऊब पाले तथा उसे पराजित करने का उपाय ढूंढे जिसने उसका व्यक्तिगत स्तर पर कुछ न बिगाड़ा हो. सड़क पर चलते बिगड़ैल सांड़ ने भले उसे न मारा हो, पर उससे लड़ने की इच्छा पालने में कुछ भी अनुचित नहीं. इस प्रकार लेखक का जब समय के साथ पलायन, द्वंद्व तथा उसके संहार आदि का रिश्ता बनता चला जाता है, तब उतनी ही तेजी से अपने समय का प्रतिनिधि लेखक भी बनने लगता है.
ठीक इसी अवस्था में वह खुद को ओछे किस्म का पैगंबर या मसीहा मानने से भी बचाने की कोशिश भी कर सकता है.
माना जाता है कि लेखक का सार्वजनिक काम शोरशराबे के साथ अपने पाठक को महानताओं की शरण में लाना है. लेकिन उसकी वास्तविक भूमिका इसके विपरीत ध्रुव के घने खौफ़नाक एकांत में स्थित हो सकती है. लेखक का काम अपने पाठकों व समाज को उसकी क्षुद्रताओं से परिचित कराने तथा उनके प्रति ईमानदार बनाने की भी हो सकती है.
अल्बेयर कामू का 1956 का अंतिम उपन्यास ‘द फाल’ एक आत्मकथात्मक उपन्यास है और उसका चरित्र क्लैमैंस एक स्थान पर कहता है-
‘मूल बात तो यह है कि अपने को हर चीज की छूट दो, चाहे यह भी हो कि समय-समय पर अपनी ही क्षुद्रताओं को जोर-जोर से घोषित करना पड़े.’
यानी एक रचनाकार के भीतर अजीबो-गरीब किस्म के दायित्व-बोध पलते हैं और वह उन्हीं के कारण अपने समाज के पाप, हिंसा, अन्याय, पागलपन, फरेब आदि की चीर-फाड़ में लगा सर्जन बनना चाहता है. वह समयचक्र में पलते प्रगति के दावों पर भरोसा इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि इन्हीं दावों की रेशमी चादर से कटु सचाइयों को ढंका जाता है. तब वह ‘द फाल’ के क्लैमेंस की तरह ही सोचता है कि ‘हम प्रगति तो कर रहे हैं, पर कुछ भी ठीक ढंग से नहीं बदल रहा है.’
यह जानी-पहचानी बात है कि आज रचनाकार के समय ने अपनी स्थिरता तथा शांति खो दी है. वह बेलगाम तकनीक और निरंकुश विकास द्वारा बेरहमी से तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है. घड़ियों और कैलेंडर के स्थूल समय और स्मृतियों-चेतना में दर्ज समय में इतनी बड़ी फांक शायद पहले कभी नहीं घटित हुई थी. अब इंसान के भीतर अनंत आशाएं हैं पर बढ़ती समस्याओं के आगे हताशाओं का अंबार भी कम नहीं. झूठ, मिथ्या सूचना-संचार, दंभपूर्ण उत्तर-सत्य, सामाजिक विभाजन व राजनीतिक पक्षपात के बढ़ते प्रसार ने आम इंसान को अचंभे में डाल रखा है.
हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा की घोर दमनात्मक कार्रवाइयां चरम पर हैं. हर तरफ़ केवल उन्हीं की उपस्थिति नज़र आती है. कला-सिनेमा-साहित्य किसी समाज के अवचेतन को व्यक्त कर उसे स्वस्थ बनाते हैं, पर उनकी भी प्रगति रुकने से अलग क़िस्म का सामाजिक विषाद पैदा हुआ है. गत सदी का नब्बे के दशक का समय राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को बदलने का समय था. तब उदारपंथ को विकृत कर कल्याणकारी राज्य, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता आदि के प्रति जो विरक्ति जगाई गई थी, वह अब फासिस्ट राज्य, नग्न पूंजीवाद और सांप्रदायिकता के प्रति आसक्ति को पैदा करने के समय तक हमें ले आई है.
इस राजनीतिक सत्य ने आज के लेखक के समय-बोध व समाज-बोध को अधिक जटिल ही नहीं बल्कि राजनीति व समाज के साथ निरंतर अधिक जुड़ा हुआ बनाया है. भिन्न-भिन्न क़िस्म की अस्मिताएं, कबीलाईपन, पहचान व संस्कृति के सच्चे-झूठे सवाल इतने हावी हैं कि स्वतंत्रता, सार्थकता और उद्देश्यपरकता जैसे शब्द इस दौर में बहुत तात्कालिक यथार्थ के संदर्भ में ही परिभाषित होना चाहते हैं. इसलिए रचनाकार के पास बदलते युग में नए संघर्ष, नए दायित्व-बोध और नए मोर्चे हैं जिनमें शामिल होकर ही वह समय को पहचान सकता है और उसकी अधीनता से टकरा सकता है.
आज के समय में जो भी सृजनशील जीवन अपनाना चाहता है, उसे एक विचित्र चुनौती का सामना करना पड़ता है. वह चुनौती यह है कि उसे उपभोग-व्याकुल समाज की नए जमाने की संवेदनहीनता से जूझना होता है. यह समाज लेखक की कृति व संवेदना को भी उपभोग-योग्य वस्तु में बदलते देखना चाहता है. टीवी चैनल अगर उसे मंच के ‘परफार्मर’ और ‘लफ़्फ़ाज़ी करने में कुशल कलाकार’ में बदलना चाहता है तो प्रकाशक भी उसे अपना चुस्त स्मार्ट मार्केटिंग एजेंट बनाना चाहते हैं. वह किसी भव्य महापुरुष का चोला पहनने वाला अर्धसनकी विदूषक बना दिया जाता है. इन वजहों से अब लेखक की त्रासदी, वेदना और व्यथा को बहुत बाज़ारू या राजनीतिक नज़रिये से ही समझा जाता है.
कई बार इससे घबराकर या निराश होकर रचनाकार भी या तो हृदय में उठने वाली सच्ची वेदना-संवेदना से दूर हो जाता है, या उसके नाटकीय एवं बिकाऊ रूपों को अपना लेता है.
साहित्य का इतिहास जानने वाले जानते हैं कि आधुनिकता ने नितांत निजी वेदना को साहित्य, कविता, कला में व्यक्त करने का सैद्धांतिक आधार तैयार किया था. निजी वेदना पर विश्वास समय की मांसल ताकत से जूझने का माध्यम था. पर आधुनिकता के निरंतर जारी सफर ने उच्चस्तर की अमूर्त व्यक्तिगत वेदना की अभिव्यक्ति को व्यक्तिगत स्वार्थ, लोभ तथा खोखले अहं की अभिव्यक्ति में बदल दिया. आधुनिकता के प्रवाह में सामान्य सार्वभौमिक व्यक्तिगत वेदना ने महान त्रासदी को पैदा किया और उनसे साहित्य का पाठक भी उदात्त सुख प्राप्त करता है.
लेखक का ‘मैं’ आसानी से समाज के ‘हम’ में बदल जाता था. पर लेखन में साधारण क़िस्म के स्वार्थ व अहं की अभिव्यक्ति साहित्य और पाठक दोनों की चेतना को अधोगामी बनाने का कार्य करती है. इस प्रकार जब आधुनिकता का पतन होने लगता है तो वह वेदना की अभिव्यक्ति को स्वार्थ-लोभ के भाव से दूषित करने वाले लेखकों को ही जन्म दे पाती है. इसलिए आज लेखक की विडंबना है कि वह पूरी तरह बाज़ार की शक्तियों पर आश्रित है और स्वार्थ-लोभ की अभिव्यक्ति को भी दिखावे के लिए किसी मानवीय आदर्श के चमकीले कागज़ पर लपेटे जाते देख रहा है. वह उम्र के किसी भी मुकाम पर लेखक हो जाने की गरिमा से वंचित है क्योंकि अब आर्थिक सफलता को ही गरिमा प्राप्त हो सकती है.

लेखक अगर सफलता से प्रेम करे तो लेखक नहीं बना रह पाता, लेकिन यदि सफलता को अस्वीकार कर दे तो वह लेखक भले बन जाए पर गरिमाच्युत रह जाता है. इस अर्थ में आज एक रचनाकार अधिक संशयालु हो उठा है. इसका प्रभाव उसकी कृतियों पर दिखता है जिनमें अधिकांश में वह किसी समूह-समुदाय के खेमे में खड़ा दिखता है ताकि अपने अंतःकरण को किसी बड़े नैतिकता-बोध से बचा सके, साथ ही बड़े पाखंडपूर्ण ढंग से किसी बड़े मिशन पर लगे लेखक के रूप में पहचाना जा सके. वह असुविधाजनक प्रश्नों के समक्ष मौन है, पर किन्हीं सुविधाप्रद दशाओं के बीच सत्य की अभिव्यक्ति का दंभ प्रकट कर रहा है.
कुल मिलाकर आज समूचे परिवेश में मौन व अभिव्यक्ति के बारे में गंभीर विचार कम बचे हैं. एक समय था जब ‘मौन’ और ‘अभिव्यक्ति’ दोनों के बारे में अच्छी बहसें हो सकती थीं.
‘मौन भी अभिव्यंजना है’ कहने वाले कवि के साथ ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे’ जैसे कवि का साहचर्य साहित्य को अर्थवान बनाता था. लोग समझ सकते थे कि मनुष्य अपने आध्यात्मिक मौन से केवल स्वयं को नहीं, बल्कि अन्य को शक्ति प्रदान कर सकता है. इसी प्रकार मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति से भी केवल स्वयं को नहीं अन्य को ही न्याय दिलाता है. यानी वह मौन व अभिव्यक्ति, दोनों से अन्य को संबल दे सकता है. पर मनुष्य का आध्यात्मिक मौन और उसकी प्रतिबद्धतावादी सामाजिक अभिव्यक्तियां तब निरर्थक हो जाते हैं जब वह इन दोनों ही शक्तियों का प्रयोग केवल निजी लाभ-लोभ के लिए करता है.
वह मौन और अभिव्यक्ति को दायित्वपूर्ण सामाजिक कर्म मानने के स्थान पर उन्हें कुत्सित कर्मों के लिए इस्तेमाल करता है. आज के समय के हर ईमानदार लेखक के सामने मौन तथा अभिव्यक्ति के बारे में इस प्रकार के संकट प्रधान हो उठे हैं और वह हृदय के हाहाकार के क्षणों में दार्शनिक अनाथपन से घिरा हुआ है.
लेकिन फिर भी आज के समय के भीतर स्मृतियों व परंपराओं का समय भी ध़ड़क रहा है. रचनाकार उस लंबी परंपरा का उत्तराधिकारी भी हो सकता है जिसमें किन्हीं प्रदत्त सामाजिक प्रवृत्तियों के प्रत्यक्ष कारागार में रहकर भी मनोगत भावों, रसदशा, फैंटेसी आदि को प्रकट करने का प्रयास होता रहा है. भक्तिकाल तक में देखा गया था कि इस्लामी-सूफी साधना तथा ईश्वरीय कथाओं आदि के भीतर रहकर भी तत्कालीन कवियों ने उच्चकोटि के रोमांस, प्रेम, मानवीय कोमलता आदि को व्यक्त करने में सफलता प्राप्त की थी. कम-से-कम दो बड़े कवि जायसी और सूर इसकी मिसाल रहे हैं.
आज लेखक को सबसे पहले स्वयं को यह विश्वास दिलाना है कि हमारे समाज का ढांचा जैसा भी हो, उसके वर्चस्वशाली विचार व संस्कृति कैसी भी हो, हर रचनाकार अंततः अपने लिए कल्पनाशील वैचारिकी तथा यूटोपिया की खोज कर सकता है. वह वैचारिक स्वराज का हठी योद्धा बना रह सकता है. सामाजिक दमन तथा सेंसरशिप के बीच से अपने लिए उस भावगत स्वतंत्रता का सतत अन्वेषक बन सकता है जो खंडित, बिखरे व अंतर्विरोधपूर्ण समय में भी समग्र यथार्थ का सृजनशील दृष्टा बनने में सहायक हो.
(वैभव सिंह आलोचक हैं.)
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