नंदा माई के बिल एटकिन, जिन्होंने हिमालय में पाया भारतीय दर्शन

हिमालय के अद्भुत गाथाकार बिल एटकिन का इस सप्ताह नब्बे की उम्र में निधन हो गया. वह पच्चीस की उम्र में स्कॉटलैंड से भारत आए थे, और फिर यहीं बस गए. उन्हें बड़े प्रेम से याद कर रहे हैं पत्रकार-लेखक हृदयेश जोशी, जिन्होंने एटकिन की एक प्रसिद्ध किताब का हिंदी अनुवाद भी किया है.

मसूरी के अपने घर में बिल एटकिन. (फोटो साभार: Wikimedia Commons/Winterline/CC BY-SA 3.0)

बिल एटकिन स्कॉटलैंड में पैदा हुए लेकिन उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भारत में बिताया. कोई पैंसठ साल पहले अपना देश छोड़कर जब वह दुनिया का भ्रमण करने निकले, वह किसी बस, ट्रेन या जहाज़ पर नहीं बल्कि अपने मनमौजी घुमक्कड़ स्वभाव और हौसले पर सवार थे. उस वक्त उनके पास केवल 50 पाउण्ड थे और वह पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर अपने देश वापस लौटना चाहते थे लेकिन जब बिल भारत पहुंचे तो यहीं के होकर रह गए.

कुछ साल पहले देहरादून की पब्लिक लाइब्रेरी में मैंने बिल एटकिन की किताब फुटलूज इन द हिमालय देखी और उसे पढ़ना शुरू किया. मैं बिल को कई सालों से व्यक्तिगत रूप से जानता था. उन्होंने वर्ष 2013 में हुई केदारनाथ आपदा पर पेंग्विन इंडिया से प्रकाशित मेरी किताब रेज ऑफ द रिवर, द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ केदारनाथ डिजास्टर की भूमिका लिखी थी. जब मैंने उनसे कहा कि मैं इसका अनुवाद करना चाहता हूं तो उन्होंने कहा कि जो भी मेरे लेखक का अनुवाद करने की हिम्मत करे उसे तो वीरता पुरस्कार मिलना चाहिए.

उनका मानना था कि दूसरे लेखकों के विपरीत उनका लिखा जटिल है, उनके वाक्य कठिन शब्दों से भरे और लंबे हैं. यह बात काफ़ी हद तक सच भी है लेकिन एटकिन के ‘गंभीर और जटिल’ लेखन में हास्य-बोध और प्रवाह की कमी नहीं है. आगे चलकर मैंने उनकी किताब का अनुवाद किया, और इस अनुवाद में एटकिन के गद्य का सरलीकरण नहीं किया बल्कि उनकी साहित्यिक लय और बौद्धिक शक्ति को हिंदी में उतारने की कोशिश की.

भारत से प्रेम का ज़िक्र एटकिन ने अपनी पुस्तक में कुछ यूं किया है:

जब मैंने 1959 में दुनिया का भ्रमण शुरू किया तो उस वक़्त मैं हिमालय के बारे में तकरीबन कुछ भी नहीं जानता था. एवरेस्ट शिखर पर ध्वज पताका फहराये तेनजिंग को देखकर मुझे दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रंखला का जादू उतना महसूस नहीं हुआ जितना मेरे भीतर का यह विश्वास पुष्ट हुआ कि हिमालय की ऊंचाई ही उसके बारे में सब कुछ नहीं बताती. साधना में लीन योगियों की कन्दराओं में मिलने वाली अंतर्दृष्टि की संभावना कहीं अधिक लुभावनी थी. महात्मा गांधी के धर्मशास्त्र पर जब मैंने एमए की थीसिस पूरी की तो एक पूर्वज्ञाता की तरह मेरे परीक्षक ने भारत में किसी का नाम और पता मुझे बताया. मेरे लिए तो दुनिया के पूर्वी छोर की ओर यह भ्रमण तुलनात्मक धर्म को समझने के लिए महज़ एक फील्ड ट्रिप ही था जो इस यात्रा के बाद ब्रिटेन में शिक्षण कार्य की मेरी योजना को कुछ सम्मान दिलाता. धरती की परिक्रमा की मैंने जो योजना बनाई उसका एक तिहाई हिस्सा भी मैं कभी तय नहीं कर पाया. मेरे मार्ग में आई बाधा कुछ और नहीं बल्कि हिमालय का सम्मोहन था.

बीते बुधवार (16 अप्रैल) की रात को बिल एटकिन नब्बे वर्ष की आयु में चल बसे. पच्चीस साल की उम्र में वह भले ही दुनिया की परिक्रमा करने निकले लेकिन भारत में ‘अटक जाने’ का उन्हें कभी अफसोस नहीं हुआ. उन्होंने कुछ ही वर्षों में इस देश की नागरिकता ही नहीं ली बल्कि भारतीय दर्शन और संस्कृति को भी आत्मसात किया. नंदादेवी से शबरीमाला तक यात्रा की और कई अखबारों और प्रकाशनों के लिए लिखा. उनके जीवन के आखिरी दिनों में मैं उनसे लगातार संवाद करता रहा. वह मुझे बड़े प्रेम से हिसालू जी कह कर पुकारा करते क्योंकि मेरे ई-मेल में हिसालू शब्द शामिल है जो एक पहाड़ी जंगली फल का नाम है. वह मुझे याद दिलाते थे कि साहित्य किसी भी भाषा में लिखा जाए, शब्द के साथ उसकी ध्वनि का बड़ा महत्व होता है.

बिल के साथ हृदयेश. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

वैसे तो एटकिन ने भारत की नदियों से लेकर रेलवे तंत्र और धर्म, साहित्य और इतिहास सभी पर लिखा है लेकिन हिमालय को लेकर उनकी दृष्टि यशप्राप्ति की दौड़ में शामिल पर्वतारोही जैसी नहीं है.

वह खुद कहते हैं कि हिमालय का महत्व उसकी उन्नत चोटियों से अधिक वहां मिलने वाले विराट अनुभवों में है. उन्हें बर्फ से ढकी निर्जीव चोटियों से अधिक कम ऊंचाई पर दिखने वाले कुदरती नज़ारे और यहां बसे पहाड़ी समाज की झलक लुभाती है. चोटियों पर विजय पाने की अंधी दौड़ और अपने देश का झंडा पर्वतों पर गाड़ने का पागलपन उन्हें निरर्थक लगता और वह अक्सर कहा कहते कि व्यवसायिक चमक ने पर्वतारोहण जैसे विशुद्ध मिशन को नैतिकताविहीन कर दिया.

हिमालय को निहारते हुए उन्होंने लिखा:

इन प्राकृतिक नज़ारों को देखकर मैं हमेशा खुद को याद दिलाता रहा हूं कि हम यहां सिर्फ मेहमान हैं, ईश्वर के अतिथि, इस ग्रह के यात्री, कोई मालिक नहीं. जब हम इस विराट ब्रह्मांड में अपनी तुच्छता को भूल जाते हैं तभी कुदरत पर विजय प्राप्त करने की कोशिश करने लगते हैं. पर्वतारोहण के आधुनिक नियम और विश्वास हमें दो  समूहों के बीच विरोधाभास साफ दिखाते हैं. पहले वो लोग जो संख्या में कम हैं और अपने प्रकृति प्रेम के कारण पर्वतों पर चढ़ते हैं और दूसरे वे लोग जो ख्याति और  धन को पाने की इच्छा में.

बिल और उनकी किताबें. (साभार: संबंधित प्रकाशन)

एटकिन ने अपना जीवन हिमालय की गोद में ही बिताया. वह पहले कौसानी के सरला देवी आश्रम रहे और फिर अल्मोड़ा के पास मिरतोला आश्रम में. बाद में वह मसूरी आकर बस गए लेकिन पूर्व से पश्चिम तक हिमालय की ऊंचाइयां नापते रहे, उसे निहारते रहे. उन्नत नंदादेवी चोटी से उन्हें इतना प्यार था कि वह उसे नंदा माई कहा करते थे. अपनी इसी पुस्तक के आखिरी अध्याय में पूर्व दिशा से नंदा देवी के दर्शनों का वर्णन करते हैं.

जोहार घाटी के ऊपरी हिस्से में भ्रमण किसी आकाशीय गोल्फकोर्स में घूमने जैसा है. बुर्फू के ऊपर विराट हिमशिखर दीखते हैं और सुबह जब सूरज की रोशनी पड़ती है तो उन पर जमी बर्फ की सतह शीशे की तरह चमकती है. यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि उस पर पैर रखने का अंजाम क्या होगा! बागिनी ग्लेशियर के ऊपर आपस में गुंथी सी दिखतीं त्रिशूली और हरदिओल की चोटियां किसी कलाकृति जैसा रास्ता तैयार करती हैं.

बिल एटकिन आज इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनका साहित्य एक साहसिक घमुक्कड़ का यात्रा वृत्तांत होने से कहीं अधिक है. वह हमें बार बार याद दिलाते हैं कि हिमालय की महानता उसके विराट स्वरूप में ही नहीं बल्कि उसकी गतिशीलता और अस्थिर स्वभाव में है. विकास की अंधी दौड़ में आज हम हिमालय को छलनी कर रहे हैं और इस संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र की चेतावनियों को अनदेखा कर रहे हैं. बिल के लेखन में यह बात बार-बार  उभरती है. अपने पूरे जीवन में हिमालय के भूगर्भीय रहस्य को उन्होंने जिस कौतूहल के साथ देखा शायद ये पंक्तियां उसका सार हैं.

प्रकृति के इस अद्भुत और मौलिक खेल को निर्निमेष निहारते हुए मुझे इस बात का बड़ा संतोष होता है कि इससे जुड़े सवालों को लेकर मैं चालीस साल तक इन पहाड़ों पर पैदल चला हूं. मैं समझ पाया हूं कि हिमालय की महानता जितनी बर्फ से ढकी चोटियों और नायाब जंगलों में दिखती है उतनी ही उसकी भूगर्भीय संरचना के मूल में छुपी है. निष्क्रिय स्थायित्व नहीं बल्कि परिवर्तन और गति उसके प्रमुख गुण हैं. हिमालय की व्याख्या उसके ऊर्ध्व विराट रूप से कहीं अधिक उसके विस्तृत स्वरूप यानी फैलाव में है. आई चिंग के शब्दों में – ‘पहाड़ के मूल में अग्नि है.’

(हृदयेश जोशी लेखक और पत्रकार हैं. उन्होंने बिल एटकिन की पुस्तक फुटलूज इन द हिमालय’ का अनुवाद किया है जो एटकिन का हिमालय’ नाम से प्रकाशित है.)