श्रीनगर: सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) ने भारतीय सेना के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसके तहत ब्रिगेडियर पी. आचार्य को ‘गंभीर फटकार’ (severe displeasure) मिली थी. दिसंबर 2023 में जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में आतंकवादियों के घात लगाकर किए गए हमले के बाद पूछताछ के दौरान कथित तौर पर तीन नागरिकों की मौत हो गई थी. उस समय आचार्य राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) की एक बटालियन के कमांडिंग अधिकारी थे.
20 अगस्त को सुनाए गए अपने आदेश में एएफटी की चंडीगढ़ पीठ- जिसमें जस्टिस सुधीर मित्तल और लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह शामिल थे – ने कहा कि कमांडिंग अधिकारी के खिलाफ की गई कार्रवाई में न तो कोई गैर-कानूनी बात थी और न ही प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ. पीठ ने सेना के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया.
न्यायाधिकरण ने कहा कि संबंधित आरआर बटालियन के कमांडिंग अधिकारी ने एक कंपनी कमांडर को पूछताछ के दौरान ‘थोड़े सख्त’ तरीकों को अपनाने का निर्देश दिया था. पीठ ने यह भी पाया कि आचार्य ने खुद गुस्सा दिखाया, एक संदिग्ध के साथ मारपीट की और अपने अधीन काम करने वाले अधिकारियों द्वारा संयम बरते जाने को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कमांड और कंट्रोल का इस्तेमाल नहीं किया.
एएफटी ने कहा कि घात लगाकर किए गए हमले- जिसमें दो सैन्यकर्मियों की मौत और उनका सिर काट दिया जाना भी शामिल था- के बाद की परिस्थितियों से सैनिकों के मन में तीव्र भावनाएं पैदा की हुई, जिसे समझा जा सकता है.
पीठ ने कहा, ‘इस मामले जैसी स्थिति में उसके बाद के अभियानों में शामिल सैनिकों के सामने एक दुविधा थी. अपने साथियों को खोना और वह भी इतनी क्रूरता से, उनके खून को खौला देने और बदले की भावना पैदा करने के लिए काफी स्वाभाविक है. दूसरी ओर अनुशासन था, जो कठोर प्रशिक्षण के जरिए उनके भीतर स्थापित किया गया था और उनसे संयम बरतने और दोषियों का पता लगाने के लिए बनाई गई योजनाओं का पूरी तरह पालन करने की अपेक्षा करता था. युद्ध के दौरान भी भारतीय सैनिक अपने अनुशासन और जिनेवा कन्वेंशन के पालन के लिए जाने जाते हैं.’
हालांकि, न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि ऐसी भावनाएं सैन्य अनुशासन और नागरिकों के साथ मानवीय व्यवहार करने की कानूनी जिम्मेदारी पर हावी नहीं हो सकतीं.
पीठ ने कहा, ‘मानवीय भावनाओं और अनुशासन की जरूरतों के बीच टकराव, जो काफी हद तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून पर आधारित है, में मानवीय भावनाओं को पीछे हटना होगा.’
कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के बाद सेना ने की थी कार्रवाई
यह घटना 21 दिसंबर 2023 की है, जब जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में धत्यार मोड़ के पास आतंकवादियों ने सेना के एक काफिले पर घात लगाकर हमला किया था. इस हमले में सेना के चार जवान मारे गए और तीन अन्य घायल हुए. खबरों के मुताबिक, मारे गए दो जवानों के सिर काट दिए गए थे.
हमले के बाद सुरक्षा बलों ने आसपास के इलाकों में तलाशी और घेराबंदी अभियान शुरू किया. इनमें डेरा की गली, बफलियाज़ और टोपा पीर शामिल थे. इस दौरान कथित तौर पर पूछताछ के लिए दर्जनों नागरिकों को हिरासत में लिया गया.
ट्रिब्यूनल के समक्ष हुई कार्यवाही के मुताबिक, हिरासत में लिए गए तीन लोगों – सफीर अहमद, मोहम्मद शौकत और शबीर अहमद – की बाद में मौत हो गई. वे गुज्जर-बकरवाल समुदाय से थे और टोपा पीर के रहने वाले थे.
घटना के बाद सामने आए वीडियो में कथित तौर पर हिरासत में लिए गए लोगों को पीटे जाने और उनके साथ अन्य तरह की शारीरिक ज्यादती किए जाने के दृश्य दिखाई दिए. इन मौतों से स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया और जवाबदेही तय करने की मांग उठी.
16 कोर के मुख्यालय ने दिसंबर 2023 में 48 राष्ट्रीय राइफल्स के अधिकारक्षेत्र वाले इलाके में नागरिकों की मौत की परिस्थितियों की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इंक्वायरी शुरू की. 48 आरआर, 13 सेक्टर आरआर के अधीन थी, जिसकी कमान आचार्य के पास थी.
जांच के बाद अप्रैल 2024 में आचार्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया.
नोटिस में उन पर नागरिकों से पूछताछ के दौरान उचित कमांड और कंट्रोल न रख पाने, नागरिकों के खिलाफ शारीरिक बल का इस्तेमाल करने, ज़रूरत से ज़्यादा और गैर-कानूनी बल के इस्तेमाल को न रोक पाने और नागरिकों के साथ व्यवहार के बारे में अपने अधीन अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश न देने का आरोप लगाया गया.
उनके जवाब पर विचार करने के बाद नगरोटा स्थित 16 कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग ने जुलाई 2024 में आचार्य को दो साल के लिए सजा दी. इसके बाद आचार्य ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का रुख किया.
घात लगाकर किए गए हमले के बाद क्या हुआ?
न्यायाधिकरण के रिकॉर्ड के अनुसार, 48 राष्ट्रीय राइफल्स की कंपनी ऑपरेटिंग बेस (सीओबी) डेरा की गली, मस्तान धारा और बफलियाज़ में थीं. 21 दिसंबर को कंपनी कमांडर मेजर पंकज सिंह ने कार्यवाहक कमांडिंग अधिकारी मेजर राज कुमार से रात में फायरिंग करने की अनुमति मांगी. उनकी मांग को मंजूरी दे दी गई.
इसके बाद फायरिंग पार्टी डेरा की गली की ओर रवाना हुई. करीब दोपहर 3:37 बजे सूचना मिली कि बफलियाज़ की ओर लौट रहे वाहनों पर घात लगाकर हमला किया गया है. बटालियन कमांडर ने सेक्टर कमांडर को इसकी जानकारी दी और सैनिकों के साथ एक एंबुलेंस को घटनास्थल के लिए रवाना किया गया.
घात लगाकर किए गए हमले की जगह से मारे गए सैनिकों के शव बरामद किए गए. इसके बाद इलाके में तलाशी और घेराबंदी अभियान शुरू किया गया.
बाद में उसी रात सेक्टर कमांडर ने कमांडिंग अधिकारी को संदिग्धों की एक सूची भेजी. अगले दिन सुबह घेराबंदी हटाए जाने के बाद कई संदिग्धों को पूछताछ के लिए सीओबी मस्तान धारा ले जाया गया.
न्यायाधिकरण के समक्ष हुई कार्यवाही के अनुसार, इसके बाद हुई पूछताछ के दौरान ही तीन नागरिकों की मौत हुई.
ट्रिब्यूनल ने कमांडरों की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया
एएफटी ने आचार्य की इस दलील को खारिज कर दिया कि उनके खिलाफ की गई प्रशासनिक कार्रवाई कानूनी रूप से सही नहीं थी.
पीठ ने घात लगाकर किए गए हमले के बाद सैनिकों के सामने पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही जोर दिया कि सेना का अनुशासन यह मांग करता है कि बेहद उकसावे वाली परिस्थितियों में भी सैन्यकर्मी को कानून के दायरे में रहना चाहिए.
न्यायाधिकरण ने कहा कि सैनिकों ने बेहद क्रूर हमले में अपने साथियों को खोया था और ऐसी स्थिति में गुस्सा और बदले की भावना पैदा होना स्वाभाविक हो सकता है. लेकिन साथ ही उसने कहा कि सैन्य प्रशिक्षण और अनुशासन सैनिकों से संयम बरतने की अपेक्षा करता है.
पीठ ने यह भी कहा कि भारतीय सैनिक से युद्ध के दौरान भी अनुशासन बनाए रखने और सशस्त्र संघर्ष के लागू कानूनों का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है.
पीठ ने कहा, ‘मानवीय भावनाओं और अनुशासन की जरूरतों के बीच टकराव में – जो काफी हद तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून पर आधारित है – मानवीय भावनाओं को पीछे हटना होगा.’
आखिरकार उसने यह निष्कर्ष निकाला कि सेना के अधिकारियों ने ब्रिगेडियर के मामले में उचित प्रक्रिया का पालन किया था और न्यायिक हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं था
सरकार ने न्याय का वादा किया था
दिसंबर 2023 में हुई इन मौतों को लेकर जम्मू-कश्मीर- खासकर गुज्जर-बकरवाल समुदाय के बीच गंभीर चिंता पैदा हुई थी. सैन्य मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना से सेना और इस समुदाय के बीच दरार पैदा हुई. यह समुदाय पारंपरिक रूप से सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बलों की मदद करता रहा है और हमेशा भारत का समर्थन किया है.
तब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मृतकों के परिवारों से मुलाकात की थी और उन्हें भरोसा दिलाया था कि न्याय होगा. उन्होंने सुरक्षा बलों से सतर्क रहने, अनुशासन बनाए रखने और स्थानीय आबादी का विश्वास जीतने का भी आह्वान किया था.
सिंह ने परिवारों से कहा था, ‘जो लोग मारे गए हैं, उन्हें कोई वापस नहीं ला सकता. लेकिन न्याय जरूर होगा.’
मंत्रालय के एक बयान के मुताबिक, उन्होंने कहा था, ‘भारतीय सेना कोई साधारण सेना नहीं है. सैनिक हमारे रक्षक हैं. उनका कर्तव्य न केवल राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है, बल्कि लोगों का दिल जीतना भी है.’
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
