दुबई का कला-मेला अंतरराष्ट्रीय कलाजगत् में प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित है. उसमें भारत की कई गैलरी साल-दर-साल हिस्सा लेती रही हैं. विदेशी गैलरियां भी, दिल्ली और मुंबई के कलामेलाओं की तुलना में, अधिक संख्या में उसमें भाग लेती हैं. दुबई के एक बड़े होटल के परिसर में यह मेला लगता है और इस बार, उसके समापन से पहले हम उसे देख पाए. इधर-उधर कई भारतीय चित्रकारों जैसे शिल्पा गुप्त, वीर मुंशी, इरन्ना, विराज डोडिया, सुबोध गुप्त आदि की कला कृतियां भी नज़र आईं. माद्रीद, लिस्बन, न्यूयार्क, लंदन, बेरूत, मोरक्को आदि के स्टॉल लगे थे.
लगता यह है कि संसार की कला में व्यापक रूप से नवाचार का एक नया रीतिकाल चल रहा है. कुछ नया और कई बार शॉक करने वाला करने की धुन में बहुत से कलाकार ऐसा कर रहे हैं जो कई बार ध्यान तो खींचता है पर सार्थक नहीं प्रतीत होता. उसमें कौशल की जटिलता तो है पर दृष्टि की नहीं. कई कलाकृतियों का अतिपाठ करके ही उसमें कुछ सार्थकता खोजी-समझी जा सकती है. फिर भी, मध्यपूर्व के कई देशों में, पाकिस्तान में, अपनी विरासत को सहेजते हुए जो काम हो रहा है वह नया और सार्थक दोनों है.
यह प्रभाव भी पड़ा है कि कला में एक तरह का बड़बोलापन बढ़ रहा है. जो शाब्दिक दावे किए जा रहे हैं, उनका अधिकांश कलात्मक अभिव्यक्ति के स्तर पर पुष्ट या सत्यापित होता नहीं लगता.
संयोग से एक भारतीय गैलरी की सजग सहायिका ने हमें बताया कि जमील आर्ट सेंटर में गाज़ा के कुछ कलाकारों की मार्मिक कलाकृतियां प्रदर्शित की जा रही हैं और हमें वे भी देखना चाहिए. यह दुबई सरकार द्वारा बनाया गया एक अत्याधुनिक कलाकेंद्र है. उसका स्थापत्य सुंदर और परिष्कृत है. दोपहर को जब हम वहां पहुंचे तो दर्शक बहुत कम थे. पर विएतनाम और गाज़ा से आई कलाकृतियों की दो सुविचारित प्रदर्शनियां लगी थीं. प्रकाश-व्यवस्था इतनी सुघर कि सिर्फ़ कलाकृति पर ही प्रकाश पड़ता है, अगल-बगल नहीं.
दोनों ही प्रदर्शनियां अपने-अपने विशिष्ट संदर्भों से बताती हैं कि जैसे मनुष्य की अपने को बर्बाद करने, दूसरों को नष्ट और तबाह करने की क्षमता अपार है वैसे ही सारी बर्बादी और ख़राबी झेलते हुए वही मनुष्य कुछ बचा सकता है, कुछ रच सकता है, मृत्यु का कला से प्रतिरोध कर कुछ जीवन सहेज और संरक्षित कर सकता है. दोनों ही यह अहसास भी गहरा करती हैं कि असंभव लगती स्थिति में कला संभव है- जीवन नहीं बच पाता, पर कला बची रहती है. सिर्फ़ गवाही की तरह नहीं, बल्कि जिजीविषा की तरह भी.
गाज़ा पर हो रही बमबारी से अपनी ओर अपने परिवार की ज़िंदगी बचाकर भागे कलाकार मोहम्मद अल हाजरी बताते हैं कि उनकी बहनें, दोस्त आदि जो गाज़ा में ही फंसे हैं, कुशल-क्षेम पूछने पर कहते हैं, ‘हम ठीक हैं पर उम्मीद है कि मारे जाएंगे.’
बहुत सारे चित्र जो हाजरी और उनकी पत्नी दीना मतार के हैं, उनके घर के बमबारी में नष्ट हो जाने के बाद के मलबे से बीनकर बचाए गए चित्र हैं. काग़ज़ या कैनवास ने मिलने के कारण कई स्कूली कापियों में रेखांकन उकेरे गए हैं. इस दंपत्ति को गाज़ा से भागे एक बरस ही मुश्किल से हुआ है. हम उस वीथिका से निकले तो इस मार्मिक अहसास के साथ कि कला बचती है तो जीवन बचता है. उसके साथ इसका उलट भी सही है: जीवन बचता है तो कला भी बचती है.
दुबई में पहली शाम हम प्रोग्रेसिव आर्ट गैलरी की दुबई शाखा में आधुनिक भारतीय चित्रकारों की उस सुनियोजित प्रदर्शनी के शुभारम्भ पर गए. हुसैन, रज़ा, सूज़ा, रामकुमार, जहांगीर सबावाला, कृष्ण खन्ना, अकबर पदमसी, वीएस गायतोंडे, जगदीश स्वामीनाथन, तैयब मेहता, प्रभाकर बर्वे आदि अनेक कलाकारों की कई सुंदर और महत्वपूर्ण कृतियां एक साथ देखकर यह धारणा एक बार फिर से पुष्ट हुई कि ललित कला में हमारी आधुनिकता शुरू से ही बहुल है.
उसमें नवाचार कोई प्रयोगशील सनक नहीं, हालांकि सुविचारित स्वच्छंद प्रक्रिया है. यह भी उनकी जो कीर्ति और छबि व्यापक रूप से बनी हुई है वह पूरी तरह से अर्जित है. ये कलाकार सिर्फ़ लीक से हटकर कुछ नहीं कर रहे थे: उनकी विपथगामिता या नई राहों की खोज जिस कला में प्रतिफलित हुई वह सार्थक और सुंदर है: उसका कलात्मक सौन्दर्य स्थायी है. वे अधिकांश दिवंगत है. कुछ मन उदास भी हुआ कि मेरा यह सौभाग्य था कि उनमें से लगभग हरेक को मैं बरसों जानता-मिलता रहा हूं और उन्हें देख-सुनकर ही थोड़ा-बहुत कलाबोध बना.
‘आर्ट मैटर्स’ की सौ किस्तें
चित्रकार सैयद हैदर रज़ा के भारत आ बसने के बाद, 2012 में, रज़ा फाउंडेशन ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली के सहयोग से कलाओं, संस्कृति और साहित्य पर बौद्धिक संवाद की एक श्रृंखला शुरू की जिसकी 100वीं किस्त 17 अप्रैल 2025 को संपन्न हुई जिसमें एक ईरानी दार्शनिक ने एक भारतीय इतिहासकार से रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उन विचारों और अवधारणाओं पर चर्चा की जो आज भी अंतर्सांस्कृतिक संवाद के लिए प्रासंगिक हैं.
‘आर्ट मैटर्स’ की पहली किस्त 17 अप्रैल 2012 को रज़ा साहब की उपस्थिति में ‘संस्कृति और लोकतंत्र’ पर एकाग्र थी और उसमें आशीष नंदी, आलोक राय ने भाग लिया था.
तब से इस विचार-विनिमय की श्रृंखला में ‘ग़ायब हो रही आलोचना’, ‘बदलती भाषाएं’, ‘कलाएं और मीडिया’, ‘हमारे समय में शास्त्रीयता’, ‘हम और वे’, ‘सार्वजनिक संस्थान और कलाएं’, ‘संस्कृति और राजनीति’, ‘अमूर्तन’, ‘कला-आलोचना-बाज़ार’, ‘भारतीय सौंदर्य शास्त्र: भारतीय बहुलता’, ‘अतिरेक और अतिक्रमण का सौंदर्यशास्त्र’, ‘गान और मौन’, ‘नए संग्रहालय’, ‘कोरोना काल में कला’, ‘सांस्कृतिक अधःपतन’, ‘हिंसा और कलाएं’, सिनेमा और समय’, ‘सार्वजनिक कला’ आदि विषयों पर गंभीर बौद्धिक संवाद हुए हैं.
इनमें देश-विदेश के श्रेष्ठ विशेषज्ञों, कलाकारों, लेखकों, संगीतकारों, रंगकर्मियों, नृत्यकारों आदि ने शिरकत की है. इनमें सदानंद मेनन, कृष्ण खन्ना, शिवजी पणिक्कर, विवान सुंदरम, शुभा मुदगल, अदिति मंगलदास, सुरेश शर्मा, अनन्या वाजपेयी, किरण नादर, यशोधरा डालमिया, बीएन गोस्वामी, प्रबोध पारिख, गणेश देवी, अन्विता अव्बी, नीलम मानसिंह, दिलीप पड़गांवकर, केकी दारूवाला, अस्ताद देबू, शमसुर रहमान फ़ारूकी, अतुल डोडिया, रणबीर कालेका, कविता सिंह, नमन अहूजा, अरुंधति सुब्रमण्यन, पुरूषोत्तम अग्रवाल, मार्क टली, वन्दना शिवा, गोपाल गुरू, ओम थानवी, गीतांजलि श्री, गीति सेन, कैथरीन दाविद, सुनील कोठारी, अकील बिलग्रामी, मिठु सेन, के सचिदानंदन, राजेन्द्र टिक्कू, दयानीता सिंह, गुलाम मोहम्मद शेख़, एमके रैना आदि शामिल थे.
‘आर्ट मैटर्स’ में विभिन्न क्षेत्रों के कलाकारों से संवाद भी कराए गए. ललित कला से अर्पिता सिंह, कृष्ण खन्ना, गुलाम मोहम्मद शेख़, जोगेन चौधरी, सुबोध गुप्त, अमिताव दास, बालन नम्बियार, सुदर्शन शेट्टी, वी. रमेश, परमजीत सिंह; शास्त्रीय संगीत से शन्नो खुराना, शुभा मुदगल, राजन-साजन मिश्र, बहाउद्दीन डागर; शास्त्रीय नृत्य से अलारमेल वल्ली, मालविका सरुक्कई, सोनल मानसिंह, शर्मीला बिस्वास, शमा भाटे, माया राव आदि ने इन संवादों में भाग लिया.
दिल्ली आमतौर पर कोलकाता-चेन्नई-मुंबई की तुलना में अधिक बुद्धि-विरोधी मानी जाती है. उसी दिल्ली में इस आयोजन में औसतन 70-80 श्रोता आते रहे हैं. कला-संस्कृति पर इतनी लंबी सीरीज कहीं और नहीं चली है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
