विशाखापट्टनम: आंध्र प्रदेश के एक गांव में पिछले हफ्ते एक दलित समुदाय को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा. यह सब कुछ एक दलित इलेक्ट्रीशियन की मौत के बाद शुरू हुआ.
मानवाधिकार समूहों ने अधिकारियों की कड़ी आलोचना की है क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर बहिष्कार करने वालों के खिलाफ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कानूनी मामला दर्ज करने के बजाय जल्दबाजी में ‘शांति समिति’ बना दी.
यह घटना काकीनाडा जिले के मल्लम गांव में हुई, जो राज्य के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण के निर्वाचन क्षेत्र पिथापुरम में आता है.
क्या है पूरा मामला?
38 वर्षीय बिजली मिस्त्री पल्लापु सुरेश बाबू गांव के एससी कॉलोनी में रहते थे. 16 अप्रैल को वे मल्लम पेड्डा वीधी (मुख्य गली) के प्रभावशाली कापू जाति के एलीसेट्टी जेल्लाबाबू के घर बिजली का काम करने गए थे, जहां करंट लगने से उनकी मौत हो गई. वह अपने पीछे पत्नी और दो स्कूली बच्चों को छोड़ गए हैं.
सुरेश बाबू की मौत के बाद, उनके समुदाय के लोगों ने मकान मालिक जेल्लाबाबू से मुआवजे की मांग की. अगले दिन आपसी समझौते में 2.70 लाख रुपये की राशि तय हुई, लेकिन केवल 70,000 रुपये ही दिए गए. जेल्लाबाबू कापू जाति से हैं जो संख्या और राजनीति में प्रभावशाली मानी जाती है, लेकिन खुद अमीर नहीं हैं.
‘जब केवल 70,000 रुपये मुआवजे मिलने पर मामला गरम हो गया. पीड़ित का परिवार और दलित समुदाय के लोग गांव की आंबेडकर प्रतिमा के पास प्रदर्शन करते हुए न्याय की मांग करने लगे.’ मानवाधिकार फोरम (एचआरएफ) के महासचिव नामदी श्रीधर ने द वायर को बताया.
फिर दलितों का बहिष्कार क्यों?
नामदी श्रीधर बताती है, ‘हम मानते हैं कि दलितों द्वारा मुखर होकर न्याय मांगना ही उनके सामाजिक बहिष्कार की वजह बना.’
18 और 19 अप्रैल को कथित रूप से कापू समुदाय के सदस्यों ने एससी कॉलोनी के पूरे दलित समुदाय के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार लागू कर दिया. एचआरएफ की एक फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने 22 अप्रैल को दौरा किया और बताया कि दुकानदारों को दबाव डालकर दलितों को ज़रूरत का सामान बेचने से भी रोका गया. साथ ही ट्रांस्पोर्ट की सुविधा देने से भी इनकार कर दिया गया.
एक दलित महिला ने एक न्यूज़ चैनल से कहा, ‘हम कागज की प्लेट बनाने का काम करते हैं. लेकिन जब से हमारे मोहल्ले का युवक मरा है, उन्होंने कहा कि हम काम पर न आएं. हमने न्याय मांगा तो वे हमें इसी तरह सज़ा दे रहे हैं.’
एक बुजुर्ग दलित व्यक्ति चंद्रराव ने बताया, ‘हम सुबह 5 बजे चाय पीने कापू की होटल में गए थे. होटल वाले ने कहा कि हमारे बड़ों ने कहा है कि हम तुम्हें चाय या नाश्ता न दें, तुम जा सकते हो, फिर हम चुपचाप चले आए.’
अधिकारियों के रुख़ की आलोचना
स्थानीय अधिकारियों ने दोनों समुदायों के लोगों को मिलाकर ‘शांति समिति’ बनाई ताकि टकराव न हो. लेकिन कई लोगों ने इसकी आलोचना की और कहा कि यह सतही समझौते को कानूनी जवाबदेही से ऊपर रखता है.
श्रीधर ने कहा, ‘कानून-व्यवस्था बनाए रखना ज़रूरी है और एहतियात के तौर पर शांति समिति बनाना भी समझ में आता है. लेकिन पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए थी कि जिन्होंने सामाजिक बहिष्कार किया, उनके खिलाफ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत केस दर्ज किया जाता… इसके बजाय, अपराध को ढकने के लिए हड़बड़ी में शांति समिति बना दी गई.’
उन्होंने कहा कि बहिष्कार एक सज़ा की तरह था, ‘पीड़ित का परिवार जब आंबेडकर की प्रतिमा के पास प्रदर्शन करने लगा, तो कापू समुदाय को यह बात नागवार गुज़री. उन्हें लगा कि अगर दलित इस तरह खुलेआम न्याय मांगेंगे तो यह परंपरा बन जाएगी. इसलिए उन्होंने उन्हें ‘सबक सिखाने’ के लिए बहिष्कार किया.’
सामाजिक कार्यकर्ता थोता रामबाबू, जो फैक्ट-फाइंडिंग टीम का हिस्सा थे, ने कहा कि अधिकारियों ने ‘जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया यानी एफआईआर दर्ज करने की अनिवार्य कार्रवाई को टाल दिया.’ उन्होंने पूछा, ‘क्या एससी/एसटी समुदाय के व्यक्ति या समूह को आर्थिक या सामाजिक रूप से बहिष्कृत करना या धमकी देना इस अधिनियम के अंतर्गत नहीं आता?’
उन्होंने आगे कहा, ‘क्या मुआवज़े की घोषणा, माफी का इंतज़ाम, और शांति समिति का गठन अपराध को खत्म कर देता है? क्या इससे अपराध माफी के लायक हो जाता है? क्या इससे दलितों का हुआ अपमान मिट जाता है?’ उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की कार्यवाही ‘सिर्फ आरोपियों को बचाने के लिए’ की गई लगती है
भेदभाव का पुराना इतिहास
श्रीधर ने बताया कि दलितों ने गांव में लंबे समय से भेदभाव की शिकायत की है. द वायर से बातचीत में कहा, ‘आज भी दलितों को गांव में बाल कटवाने या शेविंग की सुविधा नहीं मिलती. उन्हें पिथापुरम या काकीनाडा जाना पड़ता है.’
इस गांव में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा का इतिहास रहा है. साल 2002 में सामाजिक कार्यकर्ता राजमणि ने एक घटना के बाद मल्लम में फैक्ट-फाइंडिंग की थी. उन्होंने बताया, ‘मल्लम में एससी/एसटी लोगों को पीटना, गाली देना, कोई नई बात नहीं है. 14 अप्रैल, 2022 को जब दलितों ने आंबेडकर जयंती मनाई, तब उन्हें गालियां दी गईं. जब एक दलित युवक ने समारोह की फोटो इंस्टाग्राम पर पोस्ट की, तो कापू युवक कारेडला तरुण ने गालियों वाले कमेंट किए.’
बुज़ुर्गों के हस्तक्षेप के बाद तरुण ने 18 अप्रैल को आंबेडकर प्रतिमा पर ‘पालाभिषेकम’ (दूध चढ़ाना) किया. इस पर कथित तौर पर नाराज़गी फैल गई.
कुछ हफ्ते बाद 29 अप्रैल को गांव के ओनुमुलम्मा जातरा (त्योहार) के दौरान हिंसा हुई. राजमणि ने बताया, ‘पांच एससी युवक जातरा देखने गए. वहां पहुंचते ही कापू युवकों ने चिल्लाया, ‘तुम यहां क्यों आए?’ और एससी युवक डाटला अर्जुन को तब तक पीटा जब तक खून बहने नहीं लगा.’
आरोप है कि उसी रात कापू युवकों की भीड़ ने दलित कॉलोनी (माला पेटा) पर हमला किया. राजमणि बताती हैं, ‘वे महिलाओं को गाली दे रहे थे, उनके ब्लाउज फाड़ रहे थे. जब एक दलित शिक्षक कडिटी कृष्णाराव ने विरोध किया, तो उन्हें घसीटकर ले जाया गया और बुरी तरह मारा गया. वह खून लथपथ होकर बेहोश हो गए. फिर परिवार के अन्य सदस्यों को भी पीटा गया.’
राजमणि ने कहा कि घायल लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन तत्कालीन वाईएसआर कांग्रेस पार्टी सरकार के दौरान पुलिस ने केवल ‘नाममात्र की एफआईआर’ दर्ज की.
‘वह केस अब तक लंबित है, और अब उन्होंने एक और सामाजिक बहिष्कार लागू कर दिया है. आखिर कब तक वे इस तरह की बदले की जातीय हिंसा करते रहेंगे?’ राजमणि ने कापू नेता व मौजूदा उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण से जवाबदेही की मांग की है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
