रचनाकार का समय: आत्महत्या की ओर अग्रसर हमारी सभ्यता

हमारी सभ्यता आत्महत्या के कगार पर खड़ी है. बेहिसाब हिंसक संघर्षों से लेकर ग्लोबल वार्मिंग हमारे समय के भीषण सत्य हैं. ऐसे में क्या हम रचनाकर अपनी कविता, कहानियों से इंसान को बदल सकते हैं? रचनाकार का समय स्तंभ में आज पढ़ें प्रख्यात उपन्यासकार अलका सरावगी को.

अलका सरावगी. (दाएं) (फोटो साभार: फेसबुक, आर्ट: Pete Linforth/Pixabay)

लेखक के समय की बात क्या करें? हम जिस समय में लिख रहे हैं, वह पृथ्वी के साढ़े चार अरब सालों में शायद पहला ऐसा समय है, जब मनुष्यता ख़ुद अपना संहार करने पर उतारू है- भस्मासुर की तरह, जिसने शिव के वरदान को आज़माते हुए अपने ही सिर पर अपना हाथ रख लिया और जलकर भस्म हो गया. तीसरे महायुद्ध और वह भी न्यूक्लियर- की संभावना दरवाज़े पर दस्तक दे रही है और कभी भी दरवाज़ा तोड़कर अंदर आ सकती है.

संसार में बड़े-बड़े युद्ध चल रहे हैं और उन्हें रोकने वाली कोई आवाज़ काम नहीं करती. ईमानदारी से आवाज़ दी जाती है क्या, इसमें भी संदेह है. फिलहाल दुनिया में छप्पन इंटरनेशनल मुक़ाम (zones) हैं जहां किसी-न किसी स्तर पर युद्ध चल रहा. बहुत से देशों को अपने हथियार बेचने हैं, बहुत से देशों को पेट्रोल ख़रीदना है, बहुत से देशों के कुछ-न-कुछ स्वार्थ जुड़े हुए हैं कि युद्ध चलता रहे. ऐसा लगता है कि हम आत्महत्या के कगार पर खड़ी हुए सभ्यता हैं. युद्ध में मारे जा रहे बच्चों-बूढ़ों-औरतों की तस्वीरें और उन पर लिखी कविताएं आती हैं. जाने क्यों उन्हें पढ़कर इतना दुख का सैलाब पैदा नहीं होता कि उन युद्धों के हथियारों को डुबो दे या उन्हें बेकार कर दे.

आत्महत्या? हां, हमारी सभ्यता की आत्महत्या के संकल्प का दूसरा बड़ा संकेत ग्लोबल वार्मिंग है. गूगल से ही पूछिये तो लाखों बाइट्स में ख़बरें मिलेंगी कि हवा-पानी में नैनो प्लास्टिक घुल गए हैं. ग्लेशियर के पिघलने से समुद्र प्रलय ला सकता है. ओज़ोन छतरी में छेद हो गया है, वग़ैरह वग़ैरह. लेकिन क्या फ़र्क पड़ रहा है किसी को?

रोज़ नए एयरपोर्ट बन रहे हैं. गाड़ियां रोज़ नई निकल रही हैं. मॉल में भरने के लिए सामान बनाए जा रहे हैं. चार-लेन वाली सड़कें आठ-लेन में तब्दील हो रही हैं. हम एक ऐसी विकसित सभ्यता हैं जो पृथ्वी का अंत करने के लिए जी-जान से लगी हुई हैं.

बेशक़ ये बड़े-बड़े दुख हैं जिनके बारे में लेखक और पाठक रोज़मर्रा के जीवन में न भी सोचे. छोटे-छोटे दुखों की तो कोई इंतिहा नहीं. आदमी और आदमी के बीच झगड़े रोज़ बढ़ रहे हैं; टॉक्सिक पुरुष, सत्ता का दंभ, स्त्रियों का बराबरी के लिए अंतहीन संघर्ष, कहीं जाति के झगड़े, कहीं धर्म, कहीं आदमी की चमड़ी के रंग के झगड़े. चाहें तो इसमें बेरोज़गारी और बढ़ती हुई हिंसा के अलावा साइबर क्राइम वग़ैरह जोड़ लें. पृथ्वी पर रेखाएं खींच हमने इसे देशों में बांटा. ईश्वर की खोज में इसे धर्मों में बांटा. हमने इतने बंटवारे किए कि इंसान इंसान न रहा. वह किसी-न-किसी सरहद की अमानत रह गया. उस सरहद के पार बैठा हर व्यक्ति एक शत्रु हो गया और उसके प्रति क्रूरता, क्रूरता न रही. वह किसी देश या किसी वाद, किसी आदर्श या किसी धर्म के प्रति निष्ठा कहलाने लगी.

अलका सरावगी की पुस्तकें. (फोटो साभार: फेसबुक/@alka.saraogi)

लेखक इस दुनिया के बीच बैठकर यह सोचता है कि क्या इस आत्महंता सभ्यता के दिमाग़ को वह डिकोड कर सकता है कि ऐसा क्यों हुआ? क्या पौने दो सौ साल पहले हुई औद्योगिक क्रांति ने, पदार्थों-वस्तुओं ने हमारे दिमाग़ों को धीरे-धीरे इतना जड़ बना दिया कि हम जिस डाल पर बैठे, उसे ही काटने लगे? क्या रही-सही कसर टेक्नोलॉजिकल क्रांति ने हमारे हाथों-कानों-आंखों को मोबाइल-टीवी के स्क्रीन में फंसाकर पूरी कर दी? वरना ऐसा कैसे हुआ कि देश की राजधानी तक में सांस लेने को हवा न बचे? हमारे खाने और पानी में जहरीले तत्व घुले हों? विज्ञान मनुष्यों को मारने के लिए नए हथियार ईज़ाद करने में लगा रहे? आख़िर इस पागल सभ्यता के पागलपन की वजह क्या हुई? क्या विकास की दौड़ में लगे मनुष्य ने अपना एकांत खो दिया जिसमें पश्चाताप, अफ़सोस, आत्मालोचन की कोई जगह न बची?

इस समय में फंसा हुआ लेखक कौन से सपने देखे? पाठक को किस यूटोपिया के सपने दिखाए? क्या वह इस उम्मीद से लिखे कि उसका लिखा इस सभ्यता के दिमाग में कोई तब्दीली ला सकता है? क्या वह कोई ऐसी सुनहरी दुनिया रच सकता है कि उसका आकर्षण इस पागलपन को कम कर सके, इसका इलाज़ कर सके? राजा परीक्षित को सात दिन महाभारत की कथा सुनने से मोक्ष मिल गया था. क्या हमारी लिखी हुई कहानियों में इतनी ताक़त है कि वे इस समय को बदल सकती हैं?

क्या मेरे पात्र कुलभूषण ने सन 47 में पूर्वी बंगाल के पूर्वी पाकिस्तान बनने के बाद रिफ्यूजी बनकर पश्चिमी बंगाल में जब क़दम रखा था तो पाठक को सिरिल रैडक्लिफ़ के मैप पर विभाजन की रेखा खींचने से कोई आपत्ति हुई थी? क्या उसके जीवन भर के लिए उजड़ने की यातना कहीं किसी को इतना संवेदनशील बना सकती है कि वह एक रिफ्यूजी के दर्द को अपनी आत्मा में उतार सके?

लेखक हमेशा उस संदेह से घिरा रहता है कि क्या उसकी कविताएं, कहानियां एक इंसान को बदल सकती हैं?

सोशल मीडिया और सूचना क्रांति से घिरे मनुष्य के पास आज किताबों के लिए यूं भी समय कम है. लेकिन सच पूछिए तो कहानियों के अलावा, शब्द की शक्ति के अलावा और कौन सी ताक़त है जो हाशिये पर फेंके गए इंसान का दर्द किसी को महसूस करा सके? संवेदनाओं के मरने के दौर में एक पल के लिए पाठक की आंखों में पानी की एक रेखा उभार सके? लेखक का एकांत जब पाठक का एकांत बनता है, तभी वह संभावना जन्म लेती है कि वह एक बेहतर मनुष्य बन सके. इसलिए लेखक को लिखते रहना है. वह अपने अंदर उस स्वप्न को जिलाए हुए लिखता है और इसे जिलाए रखने के लिए लिखता है.

अक्सर मैं अपने रचे हुए पात्रों को मुड़कर देखती हूं तो मुझे वे एक ऐसी भुतहा दुनिया के बाशिंदे लगते हैं जो एक बेहतर दुनिया के अपने वायदों को पूरा नहीं कर पाए. ‘कलिकथा वाया बाइपास’ के किशोर बाबू आज़ादी की लड़ाई के आदर्शों की बात करने पर मनोचिकित्सक के पास भेजे जाते हैं. ‘जानकीदास तेजपाल मेन्शन’ का जयगोविंद मेट्रो की खुदाई के कारण झुक गए मकान को बचाने की मुहिम में परास्त होते-होते ख़ुद एक अकेली बुढ़िया को बेदख़ल करने में जुट जाता है. कुलभूषण जैन अपना नाम-गोत्र बदलकर गोपालचंद्र दास बनकर सड़क पर डेढ़ चप्पल घिसते हुए हर जगह अपमानित होता है.

फिर भी अंततः थियोडोर एडोर्नो की यह बात लेखक को ऊर्जा देने के लिए काफ़ी है, ‘भले ही यह विरोधाभासी लगे, पर कला की असहायता (powerlessness) और अतिशयता (superfluity) ही उसे वह शक्ति देती है कि वह नैतिक और राजनीतिक सवाल उठा सके.’

(अलका सरावगी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

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