ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने देश के निवासियों को हर उस आधार पर गिना, जिसके तहत वे गिने जा सकते थे- शहरी, ग्रामीण, बेघर, कृषक, पशुपालक, चलवासी, घुमंतू, हिंदू, मुस्लिम, सिख, एंग्लो इण्डियन, आदिवासी, बहिष्कृत, अछूत. उसके निवासियों के एक हिस्से को तो जन्मना अपराधी ही घोषित किया गया था- 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट में. हर दस वर्ष पर उनकी संख्या बढ़ जाती थी क्योंकि कोई समुदाय जन्मना अपराधी है, इसे घोषित करने का अधिकार पुलिस सुपरिंटेंडेंट की सिफ़ारिश पर कलेक्टर को दे दिया गया था. और वे इस काम को पूरी मुस्तैदी से निभाते थे. ब्रिटिश शासन ने मनुष्यों को तो जाने दीजिए, सांपों की किस्मों से लेकर भालुओं तक को गिन डाला. पूरे देश के चप्पे-चप्पे की पैमाइश कर डाली. 1872 में जब पहली बार जनगणना आरंभ हुई तो उन्होंने भारत को ‘सांख्यकीय ज्ञान से शासित’ देश में बदल डाला. एक समय ऐसा आया कि भारतीय इस ज्ञान से खुद को अनुशासित करने लगे.
देश की आज़ादी से पहले के चार दशकों को यदि आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि इस सांख्यकीय ज्ञान का सबसे स्पष्ट प्रकटीकरण जनसंख्या, धर्म और जाति के आधार पर राजनीतिक सुधारों की मांगों में दिखा. वास्तव में इसकी शुरुआत 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों के समय ही हो गई थी लेकिन 1930-31 के गोलमेज सम्मेलन, उसी वर्ष हुई जाति आधारित जनगणना और 1932 में गांधी-आंबेडकर के बीच पूना समझौते ने जाति और उसकी संख्या का भारतीय समाज में महत्त्व स्थापित कर दिया. इस दौर में संख्या का उपयोग अपनी ताकत दिखाने या भयभीत करने के लिए भी हुआ.
संख्याबल: विमर्श और राजनीति
भारत की संविधान सभा की बैठकों में जनसंख्या, 1931 की जनगणना का उल्लेख लगातार आता रहा. विभिन्न समुदायों के नेता अपनी संख्या को बता रहे थे और कभी जनगणना के आंकड़ों पर सवाल भी उठा रहे थे. जब राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर बहस हो रही थी और सीटों के परिसीमन का मुद्दा उठा कि देश क्या पुराने आंकड़े से काम चलाएगा अथवा नई जनगणना कराई जाएगी, 13 दिसंबर 1948 को शिब्बन लाल सक्सेना ने संविधान सभा में कहा:
‘मुझे लगता है कि पिछले दस वर्षों में जनसंख्या के आंकड़ों में बड़ा बदलाव आया है, खासकर बड़े शहरों में. मुझे पता है कि कानपुर में 1941 में जनसंख्या चार लाख थी, अब यह लगभग दस लाख है. मुझे नहीं पता कि इसे और अन्य बड़े शहरों को कितनी सीटें दी जाएंगी. जैसा कि मेरे सम्मानित मित्र ने बताया, पंजाब और बंगाल प्रांतों में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है. मुझे यह भी पता है कि बाहर से आए लगभग एक करोड़ शरणार्थियों को सभी प्रांतों में बांटा गया है. इसलिए मैं आदरणीय ठक्कर बापा से सहमत हूं कि चुनाव से पहले जनगणना होनी चाहिए. मैं एक और सुझाव देना चाहूंगा. हम चुनाव में वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाने के लिए तैयार हैं. हम पहले कार्यकाल के लिए विभिन्न समुदायों में मतदाताओं की संख्या के आधार पर सीटें आवंटित कर सकते हैं. 33 करोड़ की जनसंख्या में से आपके पास 15 करोड़ मतदाता होंगे, और सीटें विभिन्न समुदायों के मतदाताओं के अनुपात के अनुसार बांटी जा सकती हैं.’
असम के कांग्रेसी नेता प्रोफेसर एनसी लश्कर जिन्होंने अपने इलाके में दलितों के लिए बहुत काम किया था, ने 24 अगस्त 1949 को संविधान सभा में कहा:
‘अध्यक्ष महोदय, कल मैं 1921 से अनुसूचित जातियों की जनसंख्या में क्रमिक गिरावट के बारे में बोल रहा था. आज मैं सदन का ध्यान 1921 की जनगणना रिपोर्ट, खंड तीन, भाग 1 की तरफ आकर्षित करना चाहूंगा. इस रिपोर्ट के पृष्ठ 154 पर एक तालिका दी गई है, जिसमें 1881 से जाति, जनजाति आदि में बदलाव को दिखाया गया है. इस तालिका से मैं दबे-कुचले वर्गों की जनसंख्या में क्रमिक कमी के कुछ उदाहरण पेश करूँगा. पाटनी समुदाय की जनसंख्या 1911 में 1,11,000 थी जो 1921 में 45,000 हो गई. नंदियाल जनसंख्या 1911 में 68,000 थी, 1921 में 18,000 हो गई. राजबंशी जनसंख्या (जिन्हें बंगाल में अनुसूचित जाति माना जाता है) 1911 में 1,33,000 थी, 1921 में 92,000 हो गई.’
इन उदाहरणों का तात्पर्य यह है कि आज़ादी की पूर्व-संध्या पर जनगणना की प्रविधि और जनगणना से उपजे आंकड़ों को लेकर देश के नेता तमाम तरह की बहस कर रहे थे. भिन्न समुदायों के नेता अपनी जनसंख्या को आगे रखते हुए राजनीतिक तर्कों का निर्माण कर रहे थे. 22 जुलाई 1947 को जब जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय ध्वज के लिए प्रस्ताव पेश किया, उस दौर के प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी और आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा ने कहा:
‘चूंकि इस सदन के विभिन्न समूहों ने उस ध्वज के प्रति अपनी स्वीकृति और निष्ठा व्यक्त करने की कोशिश की है, जिसे हम इस देश के राष्ट्रीय ध्वज के रूप अपनाने जा रहे हैं. मैंने भी सोचा कि मैं भी उन 3 करोड़ आदिवासियों की ओर से कुछ शब्द कहूं, जो इस देश के असली मालिक, वास्तविक धरती पुत्र हैं…और जो पिछले छह हजार वर्षों से स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं.’
जयपाल सिंह मुंडा 1931 की जनगणना से प्राप्त आंकड़े को एक सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में पेश कर रहे थे. बाद में उन्होंने इस आंकड़े को आदिवासियों की दिक्कतों को बताने के लिए भी पेश किया. और जब देश में पहले आम चुनाव हुए तो इन आंकड़ों के आधार पर बहुत सारे प्रत्याशियों ने वोट मांगे.
आंकड़ों के सहारे तय हुए तरक्की के पैमाने
आज़ादी के बाद नेता जनगणना के आंकड़ों को देश के विकास के लिए आवश्यक मानने लगे. 1951-52, 1957 और 1962 के चुनावों के दौरान जवाहरलाल नेहरू के भाषणों से साबित होता है कि वे श्रोताओं को याद दिलाते थे कि इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए भोजन, शिक्षा और चिकित्सा जैसी सुविधाओं को जुटाने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है. जनगणना और पंचवर्षीय योजनाएं भारत की तरक्की का आधार बन गईं.
जनगणना का उपयोग एक राजनीतिक और सामाजिक तर्क के रूप में भी बढ़ा, जब अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए काका कालेलकर आयोग गठित हुआ और कांग्रेस के पहले पन्द्रह वर्षों के शासन काल की ऑलोचना डॉ. राममनोहर लोहिया ने करनी शुरू की.
डेमोक्रेसी, मेरिटोक्रेसी और आरक्षण
आज़ादी का शुरुआती दशक डेमोक्रेसी के साथ मेरिटोक्रेसी का भी दशक था. इस दौर में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजजातियों के लिए आरक्षित सीटों को यदि छोड़ दिया जाए तो भारत के सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में उच्च जातियां काबिज़ थीं. डॉ. राममनोहर लोहिया ने इसके खिलाफ़ बोलते हुए कहा था कि मामला इन लोगों के योग्य होने का नहीं है बल्कि दूसरों को अवसर ही नहीं मिला है. उन्होंने कहा कि अवसर से योग्यता आती है और मांग की कि 90 प्रतिशत आबादी को 60 प्रतिशत अवसर मिलें. उनकी बात अनसुनी रही.
कालेलकर कमीशन बना, उसकी रिपोर्ट भले ही उच्च स्तरीय नहीं थी, उसे लागू नहीं किया गया. इसी प्रकार 1979 में मंडल आयोग गठित हुआ, जिसने 1980 में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की सिफारिश की. इसे भी लागू नहीं किया गया. 1990 में जब वीपी सिंह की सरकार आई तो उन्होंने अपनी सरकार के एक बेहद नाज़ुक क्षण इसकी सिफ़ारिशों के एक हिस्से को लागू कर दिया. इसका व्यापक विरोध हुआ और क्षुब्ध लोगों ने हिंसा की. भारत के उच्चतम न्यायालय ने 1992 में इसे बरकरार रखा, लेकिन ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा को लागू कर दिया.
मंडल कमीशन की रिपोर्ट के लागू होने के तीन दशकों बाद भारत का सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदला है. लेकिन आरक्षण का लाभ केवल कुछ जातियों को हुआ है. इसके लाभार्थियों में अन्य पिछड़ा वर्ग की अधिकांश जातियां, अनुसूचित जाति की अधिकांश जातियां, और अनुसूचित जनजाति लगभग पूरी तरह शमिल नहीं हैं.

जाति जनगणना: सामाजिक-आर्थिक महत्त्व
आधुनिकता के आगमन के बाद मनुष्यों की वर्तमान पीढ़ी प्रत्येक शताब्दी को पिछली शताब्दी से थोड़ी आधुनिक, मानवीय और प्रगतिशील मानती है. इसलिए जाति जनगणना को कुछ लोग अतीतगामी कदम कहते हैं, जो अंग्रेज़ी शासन कर ही रहा था.
कहा जाता है कि इससे जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन वे भूल जाते हैं जातिवाद की सांस्कृतिक मनोभूमि काफ़ी पुरानी है और जाति को ख़त्म करने के लिए सामाजिक समता और आर्थिक बराबरी को हासिल करना होगा. जाति जनगणना के द्वारा भारतीय समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. यह जाति जनगणना वह नहीं है जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन में सम्पन्न होती थी. आज इसका सामाजिक-आर्थिक महत्त्व है.
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. 1931 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर डॉ. बीआर आंबेडकर ने अपनी किताब ‘द अनटचेबल्स: हू वेयर दे एंड व्हाय दे बिकेम अनटचेबल्स’ में ‘क्रिमिनल ट्राइब्स’ घोषित किए जा चुके लोगों की संख्या 2 करोड़ बताई थी. इक्कीसवीं शताब्दी के पहले पच्चीस वर्षों में इन समुदायों के कल्याण के लिए दो आयोग गठित हुए. एक आयोग यूपीए सरकार ने गठित किया, एक एनडीए सरकार ने. दोनों आयोगों ने 1931 की जनगणना को आधार बनाया. इन आयोगों की रिपोर्ट लागू नहीं हुई है.
इन दोनों आयोगों ने घुमंतू एवं विमुक्त आयोगों के लिए आरक्षण की सिफारिश की और साथ ही जातिवार जनगणना की आवश्यकता पर भी जोर दिया है. यदि इन समुदायों की गणना की जा सके और उनकी संख्या जानी जा सके तो उनकी बेहतरी के उपाय खोजने में आसानी होगी.
आज अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को केवल एक श्रेणी बतौर पेश किया जाता है. उनकी तथा अन्य पिछड़ा वर्ग और ‘सामान्य’ समुदायों की संख्या पता लगने से एक बेहतर डेटा सेट सामने आ सकेगा. लंबे समय से विभिन्न समुदायों द्वारा अपनी संख्या के हिसाब से सरकारी नौकरियों, राजनीति और शिक्षा में आरक्षण की मांग की जा रही है. पिछले दो वर्षों से राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने इसे एक व्यापक मांग में बदला है. नीतीश कुमार ने बिहार में जातिवार जनसंख्या के आंकड़े जारी भी किए. इसी प्रकार कर्नाटक और तेलंगाना में जातिवार जनसंख्या जारी की गई है.
आत्म-छलना से मुक्त होने का समय
तमाम भारतीय जाति के आधार पर अपना जीवन जीते हैं, लेकिन भंगिमा ऐसी बनाते हैं जैसे वे जाति का नाम पहली बार सुन रहे हों. प्राय: सभी जातियां अपनी संख्या बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं. नीति-निर्माताओं को दूसरी जातियों के बारे में ठीक जानकारी नहीं होती, और पूर्व धारणाओं के जरिये नीतियां तय होती हैं. इन सभी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगने कि जरूरत है.
यदि प्रस्तावित जनगणना में कालेलकर कमीशन की उस सिफारिश को मान लिया जाए जिसमें कहा गया था कि जनगणना कार्यालयों में अर्थशास्त्रियों के अतिरिक्त स्थायी मानवविज्ञानियों और समाजशास्त्रियों को भी नियुक्त करना चाहिए, तो बेहतर होगा. इससे सभी जातियों के लिए एक नया डेटा सेट तैयार हो सकेगा. नवीन किस्म के अध्ययन और निष्कर्ष संभव हो पाएंगे.
प्रस्तावित जाति जनगणना मनुष्यों की गणना तक सीमित न रहे, बल्कि उन सभी आर्थिक संकेतकों को दर्ज करे जिससे भारतीय समाज में विशेषाधिकारों का निर्माण होता है. जाति जनगणना भारतीय समाज के भीतर व्याप्त असमानता को समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है.
17 सितंबर 1943 को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन वर्कर्स के अध्ययन शिविर में दिए गए भाषण में डॉ. बीआर आंबेडकर ने ध्यान दिलाया था कि आर्थिक असमानताओं से संसदीय लोकतंत्र दम तोड़ देते हैं. यदि आर्थिक बराबरी को सुगम बनाने वाले उपाय नहीं लागू किए गए तो जाति जनगणना राजनीतिक दलों के लिए वोट मांगने और जनता को सामाजिक रूप से लगातार पुनर्विन्यस्त करने की कवायद बनकर रह जाएगी.
जाति जनगणना अगर केवल यह सामने लाती है कि देश में किस जाति के कुल कितने लोग रहते हैं, तो यह निरर्थक रहेगी. हमें यह आकंड़े चाहिए कि किस जाति के पास कितनी कुल जमीन है और कितनी व्यक्तिगत जमीन है, किन आर्थिक संसाधनों पर किसकी दावेदारी है. तभी देश की असमानता का सामाजिक आधार सामने आएगा. इस जनगणना का प्रयोग बेघर, शहरों में पुलों के नीचे और पाइपों के भीतर रहने वाले मनुष्यों की स्थिति बदलने के लिए होना चाहिए. अन्यथा हमें डॉ. आंबेडकर की चेतावनी याद रखनी चाहिए.
(रमाशंकर सिंह इतिहासकार हैं.)
