नई दिल्ली: दिल्ली में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों पर कुछ समय से पुलिस की कार्रवाई बढ़ गई है. उत्तम नगर और विकासपुरी में शरण लिए रोहिंग्या क्रिश्चियन कम्युनिटी के सदस्यों का कहना है कि मंगलवार (6 मई) को वेरिफिकेशन के नाम पर ले जाए गए उनके परिजनों को बिना बताए हिरासत में ले लिया गया है. उन्हें आशंका है कि उनके लोगों को म्यांमार डिपोर्ट किया जा रहा है.
पुलिस के डर से अपने किराए के कमरे से दूर छिपे रोहिंग्या शरणार्थियों ने यूएनएचसीआर कार्ड दिखाते हुए द वायर हिंदी से कहा, ‘जिन लोगों को पुलिस उठा ले गई है, उन सभी के पास ऐसे कार्ड हैं.’
मालूम हो कि शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त अथवा यूएनएचसीआर, संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी संस्था है, जो रोहिंग्या समुदाय को एक उत्पीड़ित समुदाय के रूप में मान्यता देती है.
मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. गुरुवार (8 मई) को जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एनके सिंह की बेंच के सामने वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्वेस और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने शरणार्थियों के डिपोर्टेशन का मुद्दा उठाया. प्रशांत भूषण ने कोर्ट का ध्यान हाल में दायर एक हलफनामे की तरफ की दिलाया, जिसमें बताया गया था कि म्यांमार शरणार्थियों को वापस लेने को तैयार नहीं है.
जब सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह कहा कि भारत रिफ्यूजी कन्वेंशन का का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है तो भूषण ने कहा कि सिर्फ रिफ्यूजी कन्वेंशन ही नहीं है, जिनेवा कन्वेंशन भी है, जिसे भारत मान्यता देता है.
गोंजाल्वेस ने कहा कि यूएन का स्टेटलेस पर्सन्स (राज्यविहीन व्यक्तियों) से संबंधित कन्वेंशन शरणार्थियों के भोजन आदि के अधिकारों को मान्यता देता है… और शरणार्थियों की हिरासत पर रोक लगाता है.
गोंजाल्वेस ने मांग की है कि तब तक कोई और डिपोर्टेशन न हो जब तक सुनवाई पूरी न हो. अगली सुनवाई 31 जुलाई को होनी तय हुई है.
‘ठीक से कपड़े पहनने तक का वक्त नहीं दिया गया’
रोहिंग्या कार्यकर्ता डेविड नज़ीर अपने माता-पिता नज़ीम अहमद और हज़ारा खातून को लेकर चिंतित हैं. उन्होंने द वायर हिंदी को पूरा वाकया सुनाते हुए कहा, ‘शनिवार (3 मई) को उत्तम नगर थाने से दो पुलिसकर्मी (सुमित त्यागी और जितेंद्र) एक लिस्ट लेकर आए. लिस्ट में 15 लोगों के नाम थे, जिसमें से दो उस वक्त वहां मौजूद थे. उनका यूएनएचसीआर कार्ड चेक किया गया और तस्वीर खींची गई.’
डेविड ने आगे बताया कि मंगलवार (6 मई) को पुलिस फिर आई और कुछ लोगों को लेकर चली गई.
उत्तम नगर के हस्तसाल गांव में पिछले करीब दस वर्षों से 100 से अधिक रोहिंग्या क्रिश्चियन समुदाय के लोगों ने शरण ले रखी है. ये सभी तीन से चार हज़ार रुपये प्रति माह वाले किराए वाले छोटे-छोटे कमरों में रहते हैं. वक्त-वक्त पर पुलिस इनका वेरिफिकेशन करती रहती है. लेकिन इस बार वेरिफिकेशन के लिए बुलाए गए लोग वापस नहीं लौटे.

सादिक बताते हैं ‘मेरे पास पुलिस का कॉल आया. उन्होंने मेरे भाई अनवर को पुलिस स्टेशन में बुलाया. कहा कि ‘द्वारका डोज़ियर सेल’ ने जो फिंगरप्रिंट लिए थे, उसमें कुछ दिक्कत आ रही है. फिर से वेरिफिकेशन करना है.. (इसके बाद) मेरे भाई अपनी पत्नी के साथ थाने चला गए.’
लेकिन उसके बाद वे वापस नहीं लौटे.
डेविड बताते हैं कि हस्तसाल गांव से 15 रोहिंग्या शरणार्थी उत्तर नगर थाने गए थे, जिनमें से केवल तीन वापस लौटे हैं. एक पति-पत्नी को वापस भेजा क्योंकि उनका डेढ़ माह का बच्चा घर पर था. तीसरे व्यक्ति को इसलिए वापस भेजा क्योंकि उसकी पत्नी भारतीय है.

‘अब मोबाइल बंद है’
सादिक के मुताबिक़, ‘थाने में पहुंचने के बाद सभी को ‘द्वारका डोज़ियर सेल’ ले जाया गया. वहां से मेडिकल चेकअप के लिए द्वारका सेक्टर 9 स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल ले जाया गया. मेडिकल के बाद सभी को ‘राजौरी डोज़ियर सेल’ ले जाया गया. रात 11:15 बजे तक मैं अपने भाई और अन्य लोगों से बात कर पा रहा था लेकिन उसके बाद मोबाइल बंद हो गया.’
डेविड बताते है कि वे लोग लगातार यूएनएचसीआर के संपर्क में हैं. लेकिन उन्हें भी कोई जानकारी नहीं दी जा रही है. फ़ॉरेन रजिस्ट्रेशन ऑफ़िस से भी कोई जानकारी नहीं मिल रही है.
सादिक दावा करते हैं कि बुधवार (7 मई) की दोपहर उनके भाई अनवर ने एक अनजान नंबर से कुछ सेकेंड के लिए कॉल किया था और बताया था कि उन्हें डिपोर्ट किया जा रहा है.
हालांकि, अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि किसी को डिपोर्ट किया गया है या नहीं.
‘हम भी यहां बसना नहीं चाहते, सर’
अपने हालात पर मायूस सादिक कहते हैं, ‘हमें पता है, रोहिंग्या भारत में राजनीतिक मुद्दा बन गए हैं. हमारे बारे में गलत-गलत बातें कही जाती हैं. अफवाह उड़ाया जाता है. लेकिन हम भारत को अपना घर बनाकर बसना नहीं चाहते हैं, सर. हम तो यहां सहारा लेने के लिए आए हैं, जब तक हमारा देश शांत नहीं होता है. फिर भी अगर सरकार हमें डिपोर्ट करना चाहती है तो अच्छे से करे. इज्जत से करे. बताकर करे.’
डेविड बताते हैं, ‘पुलिस के बार-बार आने से हमारे पड़ोसी हमें अच्छी नजर से नहीं देखते. हमें अपराधी समझते हैं. पुलिस दिन-रात कभी भी आ जाती है. मकान मालिक हम पर कमरा खाली करने का दबाव बना रहे हैं.’
पुलिस का क्या कहना है?
उत्तर नगर पुलिस स्टेशन के सुमित त्यागी ने द वायर हिंदी को बताया, ‘मैं उनके फिंगरप्रिंट लेने के लिए लेकर आया था. उसके बाद का मुझे नहीं पता, आप सीनियर ऑफिसर से बात कर लो.’
सुमित ने स्वीकार किया कि वह जिन लोगों को ले गए थे, उन सभी के पास यूएनएचसीआर कार्ड था. उत्तम नगर थाने के थाना प्रभारी (एसएचओ) राजेश कुमार ने इस मामले पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
कानूनी पक्ष क्या है?
भारत में करीब 40,000 रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं, जिनमें से 16,500 यूएनएचसीआर द्वारा पंजीकृत हैं, उन्हें कार्ड जारी किया गया है ताकि उत्पीड़न, मनमानी गिरफ्तारियों, हिरासत और निर्वासन से बचने में मदद मिल सके.
लेकिन भारत सरकार सभी रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध मानती है और उन्हें वापस भेजना चाहती है.
एक इंटरव्यू में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने स्पष्ट कहा था कि यूएनएचसीआर का पंजीकरण कोई मायने नहीं रखता, ‘वे (यूएनएचसीआर) ऐसा कर रहे हैं, हम उन्हें पंजीकरण करने से रोक नहीं सकते. लेकिन भारत शरणार्थियों से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं.’
रिजिजू की बात तथ्यात्मक रूप से सही है. भारत 1951 के शरणार्थी सम्मेलन (Refugee Convention) और 1967 के इसके प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है. इसलिए भारत इस अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत बाध्य नहीं है. शरणार्थियों को निर्वासित न करना इस सम्मेलन का एक मूल सिद्धांत है.
हालांकि, भारत ने ऐतिहासिक रूप से शरणार्थियों को शरण दी है (जैसे तिब्बती, बांग्लादेशी, श्रीलंकाई तमिल), लेकिन यह पूरी तरह राज्य का नीतिगत निर्णय रहा है, कोई स्पष्ट राष्ट्रीय शरणार्थी कानून नहीं बना है.
