नई दिल्ली: गोड्डा से भाजपा के विवादास्पद सांसद निशिकांत दुबे को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है.
हालिया टिप्पणियों के लिए पहले से ही विपक्ष के निशाने पर आए दुबे के लिए एक बड़ा झटका तब लगा, जब गुरुवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि उनकी ‘टिप्पणियां बेहद गैर-जिम्मेदाराना थीं और भारत के शीर्ष अदालत और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर आक्षेप लगाकर ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति को दर्शाती हैं.’
अदालत ने दुबे को बयानों को लेकर कहा की ‘वे संवैधानिक अदालतों की भूमिका और संविधान के तहत उन्हें दिए गए कर्तव्यों और दायित्वों के बारे में अज्ञानता दिखाते हैं.’
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ अधिवक्ता विशाल तिवारी द्वारा दायर जनहित याचिका पर विचार कर रही थी, जिसमें दुबे के खिलाफ स्वत:संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना कार्यवाही करने और वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 के संदर्भ में राजनीतिक नेताओं द्वारा दिए गए नफरत भरे भाषणों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी.
दुबे ने इससे पहले सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधते हुए तीखे बयान दिए थे, जिससे भाजपा प्रमुख जेपी नड्डा को भी उनसे ‘दूरी’ बनानी पड़ी थी. दुबे ने कहा था कि कि भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ‘देश में सभी गृहयुद्धों’ के लिए और सर्वोच्च न्यायालय ‘धार्मिक युद्धों’ के लिए जिम्मेदार हैं.
उन्होंने ये बयान तब दिया था, जब सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्यों के राज्यपालों द्वारा भेजे गए विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय कर दी थी.
तब दुबे ने कहा था, ‘कौन सा कानून कहता है कि राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा? इसका मतलब है कि आप इस देश को अराजकता की ओर ले जाना चाहते हैं… देश में धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है. सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है. अगर हर बात के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ता है, तो संसद और राज्य विधानसभा को बंद कर देना चाहिए.’
‘नफरत फैलाने वाले किसी भी प्रयास से सख्ती से निपटा जाना चाहिए’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘अदालतें फूलों की तरह नाजुक नहीं हैं जो इस तरह के बेतुके बयानों से मुरझा जाएंगी. चूंकि वे यह नहीं मानते कि जनता की नज़र में अदालतों के प्रति विश्वास और विश्वसनीयता ऐसे बेतुके बयानों से डगमगा सकती है, हालांकि यह बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है कि ऐसा करने की इच्छा और जानबूझकर प्रयास किया जा रहा है. इसलिए वे भाजपा सांसद के खिलाफ अवमानना कार्यवाही दर्ज करने के अनुरोध को स्वीकार करने से बचेंगे.’
अदालत ने 1978 के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि ‘न्यायपालिका आलोचना से मुक्त नहीं है, लेकिन जब आलोचना एक स्पष्ट विकृति या घोर गलत बयान हो, जो न्यायपालिका के सम्मान को कम करने और जनता के विश्वास को नष्ट करने के लिए किया गया हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.’
अदालत ने कहा है कि ‘अदालतें स्वतंत्र प्रेस, निष्पक्ष सुनवाई, न्यायिक निडरता और सामुदायिक विश्वास जैसे मूल्यों में विश्वास करते हैं. इसलिए, न्यायालयों को अवमानना की शक्ति का सहारा लेकर अपने फैसले और निर्णयों की रक्षा करने की आवश्यकता नहीं है.’
निश्चित रूप से अदालतें और न्यायाधीशों के कंधे काफी चौड़े हैं और उनमें पूर्ण विश्वास है कि लोग समझेंगे और पहचानेंगे कि आलोचना या आलोचना पक्षपातपूर्ण, निंदनीय और दुर्भावनापूर्ण है.
पीठ ने यह भी कहा है कि हालांकि वह रिट याचिका पर विचार नहीं कर रही है.
कोर्ट ने कहा, ‘हम यह स्पष्ट करते हैं कि सांप्रदायिक नफरत फैलाने या हेट स्पीच का प्रयोग करने के किसी भी प्रयास से सख्ती से निपटा जाना चाहिए. हेट स्पीच को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे लक्षित समूह के सदस्यों की गरिमा और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है, समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ता है और सहिष्णुता और खुले विचारों का ह्रास होता है, जो समानता के विचार के लिए प्रतिबद्ध बहु-सांस्कृतिक समाज के लिए आवश्यक है. लक्षित समूह को अलग-थलग करने या अपमानित करने का कोई भी प्रयास एक आपराधिक अपराध है और इसके साथ उसी तरह से निपटा जाना चाहिए.
