लगभग 75 बरसों से साहित्य में भटकते रहने के बाद मैं कह सकता हूं कि जिन लोगों की पहले से तय मंज़िल होती है, जो सीधा रास्ता अपनाते हैं, जिन्हें पहले से ही पता है कि उन्हें जीवन में क्या-कुछ-कैसे करना-पाना है, उनके लिए साहित्य सहायक या उपयोगी नहीं होता. साहित्य भटकने का परिसर है जिसमें चलना, चलते रहना अभीष्ट होता है, कहीं पहुंचना नहीं. भटकने में मुक़ाम आते हैं पर मंज़िल नहीं. यह ‘विरथ’ और ‘विपथ’ होना है: साहित्य में चलना-भटकना ही मंज़िल है. इस भटकने के लिए कमसामानी ज़रूरी होती है. भटकने में बहुत बोझ सिर या कन्धों पर रखकर निकलना अव्यावहारिक है. भटकने के दौरान कुछ-न-कुछ मिलता ही रहता है.
भटकने में कमसामानी के अलावा गुमनामी भी ज़रूरी है. अपने नाम का बोझ उतारकर पीछे छोड़ना लाभप्रद होता है. जो लोग, प्राणी, चरित्र, प्रसंग, अनुभव आपको भटकने के दौरान मिलेंगे उन्हें आपका नाम जानने की कोई उत्सुकता नहीं होती. बल्कि आप अपनी गुमनामी में, उनसे तदात्म होते हुए उनके नाम धारण करते चलते हैं. जीवन में कई नाम रखना दुश्चक्र या षड्यंत्र माना जा सकता है: साहित्य में आप नए-नए नाम सहज भाव से धारण करते, छोड़ते रहते हैं. हबीब तनवीर के एक नाट्यगीत की पंक्ति है: ‘गुमनामी अच्छी है या कि नामवरी?’
भटकने में जब-तब अनहोनी घटती रहती है. निर्धारित मार्ग पर न चलने के कारण और भटकने में अप्रत्याशित होता रहता है. साहित्य आपको अप्रत्याशित की रमणीयता का अनुभव कराता है. साहित्य में अनहोना या अप्रत्याशित उतना ही सच होता है जितना और कुछ. पिकासो ने कहा था कि ‘कला झूठ है जो सच कहती है.’
याद करें कि आल्बेयर कामू के उपन्यास की शुरूआत होती है इस पंक्ति से कि ‘मेरी मां कल मर गई. या शायद परसों.’ काफ़्का की एक कहानी शुरू होती है कि साम्सा जब सुबह उठा तो उसने पाया कि वह एक कीड़े में बदल गया है. ‘महाभारत’ में एक प्रसंग है. अर्जुन युद्ध को लेकर संशय-मुक्त होकर पांडवों की सेना के आगे कृष्ण द्वारा हांके जा रहे रथ पर खड़े हैं. तूर्यनाद हो चुका और युद्ध शुरू होने को है. तभी रथ के एक अश्व पर एक चिड़िया आकर बैठ जाती है और कृष्ण की भर्त्सना करते हुए कहती है कि मैं यह युद्ध नहीं होने दूंगी. तुम कैसे प्रभु हो जो मनुष्यों को एक-दूसरे को मारने के लिए उकसा रहे हो, पक्षियों-वृक्षों को नष्ट करने के लिए उतारू कर रहे हो?
अर्जुन समझाने की कोशिश करते हैं कि क्यों युद्ध ज़रूरी है, कैसे कोई नहीं मरता, सभी सब समय में रहते हैं, रहेंगे आदि. चिड़िया इससे आश्वस्त नहीं होती और इस पर इसरार करती है कि उसके नवजात बच्चे सुरक्षित अपने घोंसले में रह-बढ़ सकें और वे युद्ध कहीं और ले जाएं. फिर अपने आग्रह का कोई प्रभाव पड़ते न देख, चिड़िया हताश उड़ जाती है. अर्जुन जो पहला बाण छोड़ते हैं वह अपना लक्ष्यबेध नहीं करता जो कि सर्वथा अप्रत्याशित था. वह हाथी की विशाल घंटियों को बिखेर देता है. भयानक सत्यानास युद्ध में बदस्तूर होता रहता है. अठारह दिन बाद, युद्ध की समाप्ति पर कृष्ण जब अर्जुन के साथ अपना रथ उस गुलमोहर वृक्ष तक ले जाते हैं जहां चिड़िया का घोंसला था तो वहां गिरी हाथी की भारी घंटी के नीचे से चिड़िया-चिड़ा और उनके बच्चे पंख फड़फड़ाकर उड़ जाते हैं.
भटकने में ऐसे कई मुक़ाम, छबियां, अनुभव, लोग आप से मिलते हैं जो इर्द-गिर्द, आस-पास, पुरा-पड़ोस में हैं जिन्हें हम चीन्ह नहीं पाए− जो हमारे लिए अनचिन्हार थे. साहित्य, एक तरह से, उस जीवन को आपको पहचनवाता है जो आपके जीवन के नज़दीक ही था पर जिसे आप साहित्य के बताये-चेताये बिना पहचान नहीं पाते. साहित्य आपको ‘दूसरा जीवन’ देता है.
भटकने से सीधी राह या राजमार्ग आदि भले न मिलती हों, पगडंडियां बहुत मिलती हैं. कुछ तो पहले से बनी होती हैं, आपको पहले भटकने वालों के पैरों से, कुछ आपके चलने-भटकने से बनती हैं. साहित्य में हम अपने लिए भर नहीं, दूसरों के लिए भी पगडंडियां पाते-बनाते हैं. संसार की अनेक महान कृतियां जैसे ‘महाभारत’, ‘ओडिसी’, ‘दान कि होते’, ‘वार एण्ड पीस’, शेक्सपीयर के नाटक आदि भटकने की महागाथाएं हैं- भटकने से बनी पगडंडियों की कथा भी.
भटकने में आप किसी न किसी सरहद पर पहुंचते हैं. लगता यह है कि अब आगे नहीं जाया जा सकता. साहित्य में अकसर ऐसे सरहदें ज़्यादातर अन्य शक्तियां जैसे धर्म, नीति, सत्ता, राजनीति, समाज, बाज़ार आदि बनाते हैं. लेकिन साहित्य ऐसे वन-प्रान्तर होता है जिसमें सरहदें रोकी-छेंकती नहीं, पार कराती हैं. साहित्य में ही ऐसी सरहदें होती हैं जो अपने अतिक्रमण का न्योता देती हैं. महान् और महत्वपूर्ण कृतियां पुष्टि या सत्यापन से नहीं, अतिक्रमण से संभव होती हैं.
‘महाभारत’ धर्मयुद्ध की अनिवार्यता के साथ-साथ उसकी अंततः व्यर्थता का काव्य है. कविता धर्म का भी अतिक्रमण करती है.
आप अकसर अकेले ही भटकते हैं पर आपको और ऐसे ही भटकनेवालों का संगसाथ मिलता रहता है. आप थोड़ा-बहुत उनके साथ भी रचते-ठहरते-भटकते हैं. थोड़ी देर के लिए सही, भटकनेवालों की, संग-साथ की एक बिरादरी बन जाती है. आप उनसे, वे आपसे कुछ साझा करते हैं. साहित्य संगसाथ का, साझेदारी और हिस्सेदारी का दूसरा नाम है.
भटकना हमें यह भी जताता है कि सतह से ऊपर उठा जा सकता है. सतह हमारी अनिवार्यतः अनुल्लंघ्य हद नहीं है. जो है, उसके पीछे कुछ और भी है. कई बार अनचिनहार है पर उसमें धंसकर उससे ऊपर उठ सकते हैं. सच और सचाई सीधे मामले नहीं होते: वे एक या एक से भी नहीं हैं: वे अनेक हैं, बहुतेरे हैं. वे हमेशा अदम्य रूप से बहुवचन हैं. साहित्य जब कभी एकवचन होने की कोशिश करता है, वह अपने जीवत्व और सत्व से, अपने सहित भाव से, अपने होने की बुनियादी प्रतिज्ञा से विश्वासघात कर रहा होता है.
साहित्य के वन प्रदेश में भटकते हुए, हर क़दम पर, यह गहरा-तीख़ा अहसास होता है कि संसार में, सृष्टि में, ब्रह्मांड में बहुत दुख है, पीड़ा है. साहित्य वह होता है जो ‘पीर पराई’ जानता है, अपनी पीर भर नहीं, पीर पराई. वह अपनी पीर और परायों की पीर जोड़कर देख पाता है. यह विवेक भी भटकने वाले में जागता है कि ‘पीर पराई’ की इतनी व्यापकता है कि किसी को अपनी पीर को अतिरंजित नहीं करना चाहिए.
भटकते हुए हमें यह भी समझ में आता है कि जीने की चाहत सिर्फ़ मनुष्य की वृत्ति नहीं है. प्रकृति में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, जीवजंतु, कीड़े-मकोड़े आदि सबमें ऐसी चाहत होती है. जीवन की पवित्रता इसी जिजीविषा का अध्यात्म है. साहित्य इस चाहत को उद्दीप्त करता है. तेज़-अधीर-बेचैन समय में साहित्य में भटकने का एक आशय धीरज रखने और प्रतीक्षा करने का होता है. साहित्य की असली लय धीरज और प्रतीक्षा की होती है. जो बहुत जल्दी में होते हैं, वे उपभोक्ता होते हैं, रसिक या पाठक नहीं.
भटकने के दौरान लुका-छिपी का एक खेल चलता रहता है. कुछ यकायक लुक-छिप जाता है हमें रहस्य के अंधेरे में ठेल देता है. हमारे समय में मानव-व्यापार से रहस्य और विस्मय के भाव ग़ायब ही कर दिये गये हैं. साहित्य में इनका पुनर्वास होता रहता है. ऐसा हो नहीं सकता कि भटकने में आपको कहीं सत्ता की बाड़ का सामना न करना पड़े. वह कई तरह से आड़े आती रहती है. आपको यह अनुभव भी होगा कि साहित्य अकसर सत्ता की सविनय अवज्ञा करता है. आज्ञापालक बनाने के अभियान में, अदब बेअदबी से काम लेता है, अदब बेअदब होता है!
भटकने से कुछ और होता हो या न होता हो, जीवन-जगत् की अपार विशाल जटिल विपुलता का सामना, अनुभव और बोध होते हैं. यह अदम्य विपुलता साहित्य के लिए चुनौती होती है. हमें यह समझ में आता है कि इस विपुलता का सम्पूर्ण निश्शेष करनेवाला बखान संभव नहीं है. कभी संभव नहीं हुआ. इस विपुलता के सिलसिले में साहित्य कमकहनी है. जीवन-जगत् साहित्य से हमेशा बड़े, असाध्य और विपुल रहे हैं.
साहित्य में समय के पार आवाजाही सहज और संभव होती है. उसमें कई समय एक साथ होते हैं और हम अपने समय की सीमाओं से मुक्त होकर अनेक समयों में जा-विचर सकते हैं. यह बहुसमयता, चलते-भटकते किसी और समय में दाखि़ल हो जाने का सुयोग, भटकने की विशेष उपलब्धि होती है. शताब्दियों से और में, समय के आर-पार, मनुष्य ने साहित्य में अपनी मनुष्यता के संघर्ष, मनुष्य बने-रहने की कोशिश की है. यह भी कि इतने सारे समयों में साहित्य मनुष्य का सहचर, साक्षी और प्रमाण रहा है.
भटकते हुए, जहां से आपने शुरू किया था और जहां आप अनेक मुक़ामों पर ठहरते-रमते, अंत में पहुंचेंगे, आपको लगेगा कि इस दौरान निपट साधारण, धूसर और बहुरंगी सचाई आप पाते रहे हैं. कहीं साधारणता की सुंदरता, कहीं उसका विद्रूप; कभी उसकी मलिनता, कभी उसकी उज्ज्वलता; कहीं उसकी लघुता तो कहीं उसका विराट्− जीवन, सचाई और साहित्य, कुल मिलाकर साधारणता का अनंत है− हम साधारण से, साधारण में, साधारण तक ही भटकते हैं. भटकना अपने साधारण होने और बने रहने की गरिमा को पहचानना है. ये बातें मैंने फारबस गुजराती सभा द्वारा आयोजित बलवन्त पारेख स्मृति व्याख्यान में कहीं.
मुंबई में गुजराती
इन दिनों हम धर्म और युद्ध के उन्माद में, दुश्मन को मिट्टी में मिलाने के उत्साह में हैं. ऐसे में मुंबई में, जहां जब-तब गुजरातीभाषियों के विरुद्ध अभियान भी चलते आए हैं वहां फ़ार्बस गुजराती सभा के तीन दिनों में फैले ‘व्यापन’ में शिरकत करना बड़ी राहत था. गुजराती कवि और विद्वान् सितांशु यशस्चन्द्र के निर्देशन में इस आयोजन में सिर्फ़ साहित्य पर नहीं ललित कला, सिनेमा, रंगमंच, स्त्रीयोगदान, पारसी योगदान, गुजराती कविताओं की संगीत-प्रस्तुति के सत्र थे जिनमें गुजराती के अनेक लेखकों-विशेषज्ञों ने भाग लिया. उनमें अतुल डोडिया, केतन मेहता, प्रबोध पारिख, कमल वोरा, वकुल टेलर आदि शामिल हुए. बड़ी संख्या में गुजरात के कई शहरों और विश्वविद्यालयों से युवा छात्र और अध्येता भी आए.
भारतीय भाषाओं में ऐसे समावेशी आयोजन कम ही होते हैं. कवितापाठ के एक सत्र में गुजराती के अलावा हिंदी, मराठी, अंग्रेज़ी, के कवि शामिल हुए. एक सत्र में तैयब मेहता और अकबर पदमसी पर विस्तृत बात हुई. कमी निकालने के लिए कहा जा सकता है कि एक-एक सत्र गुजरात में कथक-भरतनाट्यम और शास्त्रीय संगीत पर भी होना चाहिए था. पर जो सत्र हुए वे सभी सुविचारित रहे.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
