कविता जब आत्मा का स्वर बन जाती है, तब वह भाषा की परिधि में नहीं, अनुभव की परछाइयों में प्रकट होती है. कृष्णमोहन झा का नया कविता–संग्रह ‘तारों की धूल’ कुछ वैसी ही अभिव्यक्ति है, एक ऐसी अंतःयात्रा जो स्मृति और संवेदना के सहस्रदलीय पुष्प की तरह धीरे–धीरे खुलती है. लगभग दो दशकों के अंतराल के बाद आए इस संग्रह को पढ़ना, मानो किसी बंजर समय में हरित स्पर्श का अनुभव करना है. यह संग्रह उस कवि की वापसी नहीं है जो अनुपस्थित था, बल्कि उस सर्जक की उपस्थिति का विस्तार है जो मौन में भी बोलता रहा.
कृष्णमोहन झा की कविताएं किसी तात्कालिक उत्तेजना की उपज तो यक़ीनन नहीं हैं; वे समय के तलछट से निकली हुई वे सच्चाइयां हैं जो पाठक को आत्मीयता से भर देती हैं. इस संग्रह की मूल दृष्टि स्मृति की है, और वह भी एक ऐसी स्मृति, जो निजी होते हुए भी सार्वजनिक हो जाती है. यह संग्रह पाठक को वर्तमान से परे एक ऐसे विमर्श में सम्मिलित करता है, जहां स्मृति केवल अतीत का संदर्भ नहीं, एक नैतिक उपस्थिति बन जाती है.
स्मृति का रचना–तत्व
इस संग्रह की कविताएं बार–बार यह कहती जान पड़ती हैं कि स्मृति कोई स्थिर वस्तु नहीं है, बल्कि एक जीवंत और रचनात्मक शक्ति है. कृष्णमोहन झा की दृष्टि में स्मृति महज किसी बीते समय का पुनरावलोकन नहीं है, वह सर्जनात्मक भूमि है जहां अतीत का पुनर्निर्माण होता है. उनकी कविताओं में स्मृति कोई ठहरी हुई चीज़ नहीं, न ही केवल दस्तावेज़ मात्र ,वह एक संवाद है, स्वयं से, अपने लोगों से, और उस समय से, जो इतिहास की ठंडी परतों में दफन सा हो गया है.
वे स्मृति को अपने काव्य की केंद्रीय धुरी बनाते हैं. ऐसा करते हुए वे आधुनिक जीवन की विस्मरणशील प्रवृत्ति पर एक सांस्कृतिक और नैतिक प्रश्नचिह्न भी खड़ा करते हैं. यह स्मृति कभी किसी टूटे हुए बर्तन की छवि में उभरती है, तो कभी किसी सूनी दोपहर में खोए हुए बचपन की आहट बनकर सामने आती है. कृष्णमोहन झा अपनी कविताओं में स्मृति को पुनः जीने का साहस दिखाते हैं, न केवल आत्म–संवेदना के लिए, बल्कि समाज और संस्कृति के साथ एक गहन पुनःसंवाद की आकांक्षा के साथ.
प्रकृति का ध्वन्यात्मक स्पर्श
कृष्णमोहन झा की कविताओं की एक और विशिष्टता है, प्रकृति से उनका अंतरंग और आत्मीय संबंध. यह प्रकृति कोई बाहरी परिदृश्य नहीं है, जिसे मात्र दृश्य सौंदर्य या प्रतीक के रूप में देखा जाए. यह वहां है जैसे वह कवि के जीवन का अनिवार्य अंग हो, उसकी चेतना की लय, उसकी आत्मा की धड़कन. संग्रह की कविताएं बार–बार एक ऐसी पृथ्वी की ओर लौटती हैं जहां चिड़ियां थीं, जुगनू थे, हवा थी, और आकाश में टिमटिमाते तारे थे. यह चित्रण कोई भावुक नॉस्टैल्जिया नहीं है, बल्कि एक सजग पर्यावरणीय चेतना है, एक गहरी और सघन चिंता कि मनुष्य और प्रकृति का वह सहज साहचर्य अब धीरे–धीरे विलुप्त हो रहा है.
संग्रह को पढ़ते हुए सायास अनुभव होता है कि, कृष्णमोहन झा की कविता में प्रकृति बाहर की अपेक्षा भीतर अधिक उपस्थित है. यह वह प्रकृति है जो मनुष्य के स्वप्नों में गूंजती है, उसकी स्मृतियों में तिरती है, और कभी–कभी उसके मौन में बोल उठती है. कवि उस ‘मौन‘ को पकड़ता है, उसकी लय को सुनता है और उसे कविता की भाषा में ढालता है. यहां ध्यान देने की आवश्यकता है कि यह ‘मौन‘ प्रकृति की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि उसके सूक्ष्म संवाद का प्रतीक है. कवि प्रकृति को देखने की नहीं, उसे सुनने की और उसमें खो चुके तत्वों को पहचानने की अपेक्षा करता है. वह पाठक को यह भी अनुभव कराता है, कि प्रकृति हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर बोलती है, यदि हम उसकी भाषा समझने की संवेदना बचाए रख सकें.
‘आठवें दिन’ की कल्पना
इस संग्रह की एक विशिष्ट अवधारणा है ‘आठवें दिन’ की कल्पना. यह आठवां दिन न तो किसी कैलेंडर में दर्ज है, न किसी धार्मिक विधान का अंग है. यह दिन कवि की आत्मचेतना से जन्मा एक सांस्कृतिक और नैतिक स्वप्न है. एक ऐसी संभावित दुनिया की कल्पना, जहां मनुष्य अपने भीतर की हिंसा, स्वार्थ और विस्मृति से मुक्त होकर करुणा, सह–अस्तित्व और विवेक के साथ जीवन जी सके. जहां जीवन रक्त और आँसू की अनिवार्यता से परे हो; जहां मनुष्य अपनी मनुष्यता को केवल अस्तित्व के स्तर के साथ चेतना और संवेदना के स्तर पर भी सार्थक कर सके.
‘आठवें दिन’ की यह धारणा कृष्णमोहन झा की कविताओं को गहरी आत्मदृष्टि प्रदान करती है साथ ही साथ उन्हें एक दार्शनिक ऊंचाई भी देती है. यह किसी विचारधारा या वैचारिक कार्यक्रम का घोष नहीं है; यह एक आत्मालोचनात्मक दृष्टिकोण है, एक आंतरिक मंथन, जो आधुनिकता की उस अंधी दौड़ पर प्रश्न उठाता है जिसमें हम निरंतर स्मृति, संबंध और संवेदना को पीछे छोड़ते जा रहे हैं.
कृष्णमोहन झा की कविताएं इस ‘आठवें दिन‘ के स्वप्न को रचती हैं, एक ऐसी रचना जो यूटोपिया नहीं है, वह कविता के नैतिक हस्तक्षेप की आकांक्षा है. वे कविता को केवल सौंदर्य या भावनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मानते हैं. कवि उसे नैतिक चेतना और सांस्कृतिक पुनर्रचना की एक संवेदनशील ज़मीन बनाते हैं. इस दृष्टि से ‘तारों की धूल’ कविता–संग्रह एक वैकल्पिक विश्वदृष्टि का प्रस्ताव प्रतीत होता है, जहां कविता एक नई सुबह की संभावना की तरह उगती है.
भाषा और शिल्प की सजगता
‘तारों की धूल’ का काव्यशिल्प सधा हुआ, संयमित और गरिमामय है. कृष्णमोहन झा की कविता किसी शाब्दिक चमत्कार या अलंकारिक कौशल की ओर आकृष्ट नहीं करती है. वह पाठक को आत्मीयता, सादगी और गहन संवेदना की तरल भाषा में अपने अनुभव में सहभागी बनाती है. यह कविता किसी जटिलता का आग्रह नहीं करती है. अपने सहज, पारदर्शी शिल्प के माध्यम से जटिल से जटिल अनुभूतियों को भी पाठक के भीतर सहजता से पहुंचा देती है.
कृष्णमोहन झा की भाषा कोई बाहरी उपकरण नहीं है. भाषा उनके अनुभव की आत्मीय आभा है, एक ऐसी संवेदनात्मक धातु, जो शब्दों से अधिक, शब्दों के बीच के मौन से बोलती है. उनकी कविताओं में ‘अल्प‘ में ‘अधिक‘ कहने की जो सामर्थ्य है, वह हिंदी कविता की उस परंपरा से आती है जहां शब्दों के चयन में सच्चाई और अर्थ की सघनता अनिवार्य होती है. वे बिना किसी भाषाई आडंबर या वैचारिक उद्घोष के, जीवन की मूलभूत अनुभूतियों को गहरी सादगी के साथ अभिव्यक्त करते हैं.
यह संयमित और मितव्ययी भाषा पाठक को केवल भावनात्मक रूप से ही नहीं, बौद्धिक और नैतिक रूप से भी सजग बनाती है. हम अनुभव करते हैं कि,इस संग्रह की कविता, कैसे विवेक और आत्मचिंतन के साथ पाठक को संवाद की स्थिति में ले आती है. इसमें एक ओर आत्मा का संगीत है, जो संवेदना को छूता है, तो दूसरी ओर विवेक का संतुलन है, जो विचार को दिशा देता है.
कृष्णमोहन झा की कविता हिंदी साहित्य की उस समृद्ध परंपरा की वाहक है, जहां कविता निजी अनुभवों की भूमि से उठकर सामाजिक चेतना की ज़मीन तक पहुंचती है. यह कविता एक पुल बनाती है, आत्मा और समाज के बीच, अतीत और वर्तमान के बीच, स्मृति और संभावना के बीच. यहां कविता केवल निजी नहीं रहती, वह साझा होती है. इस संग्रह की कविता को पढ़ते हुए पाठक यह सहज ही अनुभव करते हैं कि कैसे कृष्णमोहन झा की कविता सामूहिक संवेदना का रूप ले लेती है, जो पाठक को अकेला नहीं छोड़ती, उसके साथ चलती है.
स्मृति का नैतिक आग्रह
कृष्णमोहन झा का यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता में एक अनिवार्य हस्तक्षेप है. यह कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ सांस्कृतिक स्मृति और नैतिक उत्तरदायित्व का एक दस्तावेज भी है. यह संग्रह हमें याद दिलाता है कि ‘कविता’ एक स्मृतिपरक नैतिक उपक्रम है.
‘तारों की धूल’ को पढ़ना, एक तरह से उस स्मृति को पुनः स्पर्श करना है, जो हमें मनुष्य बनाती है. इन कविताओं में एक विनम्र आग्रह है कि हम याद रखें, कि हम देख सकें उस आठवें दिन का स्वप्न, और कि हम, इस पृथ्वी को, उसकी नमी, उसकी हवा, उसके जुगनू और चिड़ियों सहित, फिर से जी सकें.
यह संग्रह अशोक वाजपेयी की उस मान्यता को पुष्ट करता है कि ‘कविता स्मृति का नैतिक उपक्रम है’ और कृष्णमोहन झा उसकी एक प्रतिबद्ध परंपरा के सच्चे उत्तराधिकारी हैं. यह कविता एक स्मृति-पथ है ,जिस पर चलना,अपने भीतर लौटना है.
(आशुतोष कुमार ठाकुर पेशे से मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं.)
