नई दिल्ली: हरियाणा पुलिस ने रविवार (18 मई) को अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को गिरफ्तार किया था और मंगलवार को उन्हें चौदह दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. सोनीपत की जिला अदालत में मामले की अगली सुनवाई 27 मई को होगी.
ज्ञात हो कि उन पर धार्मिक भावनाएं आहत करने और राजद्रोह से संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है. यह गिरफ़्तारी भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर उनकी टिप्पणियों को लेकर हुई.
हालांकि उनके सोशल मीडिया एकाउंट्स पर नज़र डालें तो वे सब उसके उलट हैं , जिसके उन पर आरोप लगाए जा रहे हैं.
22 अप्रैल के पहलगाम हमले के बाद उन्होंने इस कृत्य की तुरंत भर्त्सना की थी. आतंकी हमले की निंदा करते हुए उन्होंने लिखा था, ‘मेरा हृदय पहलगाम में हुए कायराना और जघन्य आतंकवादी हमलों के सभी पीड़ितों के साथ है. दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए और ऐसा दंड मिलना चाहिए जो उदाहरण बने. जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए मेरी प्रार्थनाएं. (उनकी) तस्वीरें और वीडियो दिल दहला देने वाले हैं.’

इसके बावजूद प्रोफेसर महमूदाबाद के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गईं- पहली, भारतीय जनता पार्टी के एक पदाधिकारी और दूसरी हरियाणा राज्य महिला आयोग की शिकायत पर. महिला आयोग की अध्यक्ष ने उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर उन्हें नोटिस भेजा था.
जिन पोस्ट को आधार बनाकर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई और उन्हें गिरफ्तार किया गया, क्या वे वाकई आपत्तिजनक थे? ऑपरेशन सिंदूर पर उनकी प्रतिक्रियाओं में देश के प्रति उनकी फिक्र साफ झलकती है. अपनी पोस्ट के अंत में वे ‘जय हिंद’ भी लिखते हैं. आखिर उनकी किन बातों को देशविरोधी माना गया?
पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उन्होंने क्या लिखा
8 मई के सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट में वह लिखते हैं, ‘रणनीतिक रूप से भारत ने पाकिस्तान में सेना और आतंकवादियों (गैर-राज्य तत्वों) के बीच का फर्क खत्म करने की दिशा में एक नया दौर शुरू किया है. अब किसी भी आतंकी गतिविधि की प्रतिक्रिया सैन्य कार्रवाई से दी जाएगी, जिससे यह दबाव पाकिस्तानी सेना पर है कि वह आतंकियों के पीछे छिप न सके. पाक सेना लंबे समय से भारत को अस्थिर करने के लिए ऐसे तत्वों का इस्तेमाल करती रही है, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को पीड़ित बताती रही है.’
‘ऑपरेशन सिंदूर ने भारत-पाक संबंधों की पुरानी समझ को झकझोर दिया है, अब आतंक का जवाब सेना देगी और पाक सेना व आतंकियों में कोई फर्क नहीं रहेगा. इसके बावजूद, भारतीय सेना ने यह सुनिश्चित किया है कि नागरिक या सैन्य ढांचे को नुकसान न पहुंचे.’
उन्होंने लिखा था कि संदेश साफ है: अगर आप अपने आतंकवाद से नहीं निपटते, तो हम निपटेंगे.
युद्ध की वकालत करने वालों पर उन्होंने लिखा था, ‘कुछ लोग बिना सोचे-समझे युद्ध की वकालत करते हैं, लेकिन उन्होंने कभी संघर्ष नहीं झेला है. एक नकली ड्रिल में भाग लेने से आप सैनिक नहीं बन जाते, न ही युद्ध के दर्द को समझ सकते हैं. युद्ध क्रूर होता है, ज्यादा नुकसान गरीबों को होता है, और फायदा नेताओं और रक्षा कंपनियों को.’

उन्होंने यह भी लिखा था कि सैन्य समाधान कभी स्थायी हल नहीं रहे हैं.
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सरकार की प्रेस ब्रीफिंग में दो महिला सैनिकों की मौजूदगी पर वह लिखते हैं, ‘मैं यह देखकर खुश हूं कि कुछ दक्षिणपंथी टिप्पणीकार कर्नल सोफिया कुरैशी की सराहना कर रहे हैं, लेकिन उन्हें उतनी ही मुखरता से मॉब लिंचिंग, बुलडोज़िंग और भाजपा की नफरत का शिकार हुए लोगों की भी सुरक्षा की मांग करनी चाहिए. दो महिला सैनिकों की उपस्थिति ज़रूरी प्रतीक हो सकती है, लेकिन उसे ज़मीनी सच्चाई में बदले बिना यह केवल दिखावा रह जाएगा.’
वह आगे लिखते हैं, ‘मेरे लिए वह प्रेस कॉन्फ्रेंस एक क्षणिक झलक थी, शायद एक भ्रम, एक ऐसे भारत की, जिसने कभी पाकिस्तान के तर्क को नकारा था. ज़मीन पर मुसलमानों की जो हकीकत है, वह सरकार द्वारा दिखाए जाने की कोशिश से अलग है, लेकिन फिर भी प्रेस कॉन्फ्रेंस से यह उम्मीद बनी है कि विविधता में एकता का विचार अभी पूरी तरह मरा नहीं है.’
ज्ञात हो कि उनकी इसी टिप्पणी को लेकर हरियाणा की राज्य महिला आयोग ने उनको तलब किया था.
11 मई के अपने फेसबुक पोस्ट में उन्होंने फिर से युद्ध के लिए मचलती भीड़ को लताड़ा था.
उन्होंने लिखा था कि ‘कुछ लोग युद्ध विराम के बावजूद युद्ध के लिए मचल रहे हैं. वे भूल जाते हैं कि युद्ध अब सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, यह हर किसी को, हर जगह प्रभावित करता है. आज की सैन्य तकनीक से आम नागरिकों को पहले से कहीं ज्यादा नुकसान होता है. जब आप ‘उन्हें मिटा दो’ या ‘खत्म कर दो’ जैसे नारे लगाते हैं, तो असल में आप बच्चों, बुज़ुर्गों, और निर्दोष लोगों के नरसंहार की वकालत कर रहे होते हैं.’
‘मीडिया, नेता और कट्टर सोच वाले लोग दुश्मन को अमानवीय दिखाते हैं ताकि हम उनकी मानवता भूल जाएं. लेकिन सच यह है कि युद्ध हमेशा सबसे ज़्यादा गरीबों और आम लोगों को नुकसान पहुंचाता है.’

वह लिखते हैं, ‘जो लोग दूर बैठे युद्ध चाहते हैं, वे खुद कभी जंग का दर्द नहीं झेलते. वे नहीं जानते कि गोली, बम और मौत की सच्चाई क्या होती है. युद्ध में वीरता की कहानियाँ होती हैं, पर असली वीरता अहंकार पर जीत पाने में है, जैसा कि गीता और इमाम अली की कहानियों में दिखता है.’
अंत में उन्होंने लिखा, ‘हमेशा याद रखें: शांति की बात करना कायरता नहीं, बल्कि सबसे बड़ी हिम्मत है. युद्ध से कोई नहीं जीतता, हम सब हारते हैं.’
