हमारा पाकिस्तान का सैन्य और राजनयिक आकलन सही नहीं निकला

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: शांति का रास्ता बहुत कठिन है और होगा. हमारा पड़ोसी भी आसानी से उस पर चलने का मन नहीं बनाएगा क्योंकि वह सैन्य-संचालित देश है. पर रास्ता यही है जो हमें बर्बादी-तबाही से बचा सकता है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

पहलगाम पर आतंकी हमले में मारे गए भारतीय सैलानियों की पत्नियों की भावनाओं पर, लगता है, कि लोगों ने ध्यान दिया और सत्तारूढ़ शक्तियों के उकसावे के बावजूद उसे हिंदू-मुस्लिम विवाद नहीं बनाया और जब भारत के बदले की कार्रवाई में पाकिस्तान के कुछ चुने आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले ठिकानों पर हमला किया तो सारे देश ने, बिना किसी भेदभाव के, सभी धर्मों-जातियों-वर्गों के लोगों ने एकजुट होकर उसका समर्थन किया. कइयों द्वारा चाहे गए दंगे नहीं हो पाए. ज़हर बहुत फैलाया गया है और इसमें सत्ता-धर्म-मीडिया-बाज़ार की बड़ी सक्रिय भूमिका रही है पर भारतीय जनता ने जैसे उस ज़हर को और फैलने पर रोक लगा दी.

शायद इससे क्षुब्ध होकर भाजपा के ही कुछ नेताओं ने अब सेना के विरुद्ध ज़हर उगलने का अभियान ही शुरू कर दिया है. शुरुआत मध्य प्रदेश से हुई है जो भाजपा शासित प्रदेश है. पहले एक मंत्री ने स्वयं भारत सरकार द्वारा नियुक्त भारतीय सेना की प्रवक्ता कर्नल सोफिया कुरैशी के विरुद्ध विषवमन करते हुए उन्हें अपने धर्म के आधार पर ‘आतंकवादियों की बहन’ बताया. फिर उसी प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय सेना प्रधानमंत्री के चरणों पर झुक गई है. यह भारतीय सेना का अपमान और राजनीतिीकरण एक साथ है. आगे ऐसी कितनी विकृतियां और होने वाले हैं यह कहना कठिन है. पर चूंकि बिहार में चुनाव है, उनकी अतिशयता की पूरी संभावना है.

ऐसे मुक़ाम पर तरह-तरह के लांछन लगने का ख़तरा उठाते हुए यह कहना ज़रूरी लगता है कि जैसे भारतीय राज्य भारतीय जनता नहीं है वैसे ही पाकिस्तानी राज्य पाकिस्तानी जनता नहीं है. ये दोनों ही जनताएं एक-दूसरे से विद्वेष नहीं करती हैं. दोनों ही परस्पर शांति और समृद्धि चाहते हैं: दोनों को बेहतर ज़िंदगी और समग्र विकास का इंतज़ार है. दोनों समझते हैं कि आतंकवाद और युद्ध न तो उन्हें व्यक्त करता है और उन्हें शांति और बेहतर ज़िंदगी पाने की आड़े नहीं आने देना चाहिए.

हम यह भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि 78 बरस पहले हम एक ही राष्ट्र थे और अब पड़ोसी हैं. हमारी भाषाओं पंजाबी-उर्दू-सिंधी में, भोजन-पहनावे, जीवनशैलियों में, हमारे सामाजिक व्यवहार में बहुत समानता है. भौगोलिक बंटवारा हुआ पर संस्कृति का बंटवारा नहीं हुआ. पाकिस्तान के कवि, जैसे फ़ैज-अहमद फ़राज़-मुनीर नियाज़ी-किश्वर नाहिद, उनके कथाकार जैसे इंतज़ार हुसैन, उनके गायक जैसे मेहदी हसन, इकबाल बानो, फ़रीदा ख़ानम, नुसरत फ़तेह अली, उनके शास्त्रीय कलाकार जैसे रोशनारा बेगम, नज़ाकत अली- सलामत अली आदि भारत में उतने ही मान्य और लोकप्रिय रहे हैं जितने पाकिस्तान में.

यह भी निर्विवाद है कि इस दौरान का हमारी साझी उर्दू में लिखे गए श्रेष्ठ साहित्य का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में लिखा गया है. जैसे भारतीय लोकतंत्र में ज़्यादातर साहित्य व्यवसाय विरोधी रहा है वैसे ही पाकिस्तान में लेखक-कलाकार तानाशाहियों से असहमत और उनके विरोध में रहे हैं.

प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशीकर ने कहा है कि देश में इस समय तीन क्षेत्र हैं. पहले में यह माना जाता है कि पाकिस्तान से निर्णायक युद्ध, अंतिम नहीं पहला विकल्प है. उसमें युद्ध को लेकर भयानक रूमान है. दूसरे क्षेत्र में यह धारणा प्रबल है कि भारत को एक बार में बंटवारे के पाप से अपने को मुक्त कर लेना चाहिए और पाकिस्तान को नष्ट कर उसका नामोनिशान मिटा देना चाहिए. तीसरे क्षेत्र में मुसलमानों के विरुद्ध उन्माद बढ़ाया जा रहा है.

इधर ख़बर आई कि भारत सरकार संसार भर में अपना पक्ष समझाने के लिए कई राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को शामिल कर कई प्रतिनिधिमंडल भेज रही है. ज़ाहिर है कि इस संक्षिप्त युद्ध में भारत को व्यापक स्तर पर वह सद्भाव और समर्थन नहीं मिला जिसकी उसे अपनी अतिरंजित सरकारी आत्मछवि के कारण आशा थी. सारे विज्ञापनों, तामझाम, शोर-शराबे के बावजूद, विश्वगुरु माने जाने के निराधार दंभ के बावजूद, भारत का राजनय विफल साबित हुआ है. संसार अपनी समस्याओं, व्यापार आदि में व्यस्त है और उसे ‘विश्वगुरु’ की कोई परवाह नहीं है.

हमारे यहां पाकिस्तान को एक विफल राष्ट्र मानने का उत्साह भी व्यापक है. यह विशेषण हमने नहीं गढ़ा, पश्चिम से ही आया है. पर यही विफल पाकिस्तान विभिन्न आधारों पर बनाई जानेवाली विश्व-सूचियों में भारत से बहुत नीचे नहीं है, एकाध में शायद ऊपर भी है. जो कुछ हुआ है उसका यथार्थपरक विश्लेषण करें तो लगेगा कि हमारा पाकिस्तान का सैन्य और राजनयिक आकलन सही नहीं था.

इस मुक़ाम पर यह सुझाना, कितना ही विवादास्पद क्यों न हो, सुविचारित है कि हमें शांति और मैत्री के लिए नई पहल करना चाहिए. हमें अपने इतिहास को स्वीकार कर बंटवारे को समाप्त करने और अपने पड़ोसी को नष्ट करने का विचार को पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए. शांति का रास्ता बहुत कठिन है और होगा. हमारा पड़ोसी भी आसानी से उस पर चलने का मन नहीं बनाएगा क्योंकि वह सैन्य-संचालित देश है. पर रास्ता यही है जो हमें बरबादी-तबाही से बचा सकता है.

फिर शुक्ल

नागरीप्रचारिणी सभा बनारस ने इधर अपने प्रकाशन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के संशोधित नए संस्करण पर जो गोष्ठी दिल्ली में आयोजित की, उसका सबसे उत्साहजनक पक्ष यह था कि उसमें धवलकेशी और अधेड़ लेखकों से कई गुना अधिक युवा और छात्र उपस्थित हुए और उनमें से लगभग सौ तो दो घंटे से अधिक खड़े रहकर ही कार्रवाई सुनते रहे.

यह ग्रंथ अनूठा है और इतिहास के साथ-साथ आलोचना का भी गौरवग्रंथ है. शुक्ल जी में इतिहास-संस्कृति-साहित्य की बोधत्रयी सक्रिय थी. जब हिंदी आलोचना के उद्भव के बमुश्किल तीन दशक भी नहीं हुए थे, यह उसकी असाधारण-अप्रत्याशित परिपक्वता का आदिग्रंथ है. इतिहास के अलावा वह एक सजग-संवेदनशील-काव्य रसिक बौद्धिक की रसिकता की कथा भी है. उसमें साहित्य की विपुलता, उसमें प्रगट अपार जीवन-छवियों-प्रसंगों की बहुवस्तुस्पर्शिनी क्षमता का अद्भुत निरूपण है.

इस इतिहास ने साहित्य और कविता के गहन और विचारप्रवण संवेदनशील विश्लेषण की नई परंपरा को जन्म दिया. साहित्य और आलोचना की कई नई अवधारणाओं का आरंभ इस पुस्तक से हुआ.

परिसंवाद में रामेश्वर राय और पुरुषोत्तम अग्रवाल ने शुक्ल जी से अपनी असहमतियां भी प्रखरता और विनय से दर्ज कीं. उनका विवेचन भी किया. शुक्ल जी का सिद्धोंनाथों को कवि न मानना, कबीर के प्रति सहानुभूति का अभाव, रीतिकाव्य का अवमूल्यन, छायावाद के प्रति असामायिक सख़्ती, हिंदू-मुसलमान मुद्दे पर पश्चगामी रुख़ आदि मुद्दे उठाये गए.

यह ग्रंथ ‘साहित्य के विचार-श्रृंखलाबद्ध इतिहास की आवश्यकता’ की पूर्ति के लिए लिखा गया और हिंदी की अकादेमिक आलोचना की शुरुआत है. पर आजकी अधिकांश अकादेमिक आलोचना में शुक्ल जी जैसी प्रवाहमयता, प्रसाद गुण क्यों ग़ायब हो गए?

शुक्ल जी की भाषा के कुछ नमूने:

‘लोग कहते हैं कि समालोचकगण अपनी बातें कहते ही रहते हैं पर कवि लोग जैसी मौज होती है वैसी रचना करते ही हैं. पर यह बात नहीं है. कवियों पर साहित्य-मीमांसकों का बहुत कुछ प्रभाव पड़ता है. बहुतेरे कवि- विशेषतः नए- उनके आदर्शों के अनुकूल चलने का प्रयत्न करने लगते हैं. … इधर कुछ दिनों से ‘सत्यं, शिवंद्व सुंदरम्’ की भी बड़ी धूम है, जिसे कुछ लोग शायद उपनिषद्-वाक्य समझकर ‘अपने यहां भी कहा है’ लिख कर उद्धृत किया करते हैं. यह कोमल पदावली महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर की है और ‘द ट्रू, द गुड एंड द ब्यूटीफुल’ का अनुवाद है.’

‘ठीक-ठिकाने से चलने वाली समीक्षाओं को देखकर जितना संतोष होता है, किसी कवि की समीक्षा के नाम पर उसकी रचना से सर्वथा असम्बद्ध चित्रमयी कल्पना और भावुकता की सजावट देख उतनी ही ग्लानि होती है. … ऊपरी रंग-ढंग से तो ऐसा जान पड़ेगा कि कवि के हृदय के भीतर सेंध लगाकर घुसे हैं और बड़े-बड़े गूढ़ कोने झांक रहे हैं, पर कवि के उद्धृत पद्यों से मिलान कीजिए तो पता चलेगा कि कवि के विवक्षित भावों से उनके वाग्विलास का कोई लगाव नहीं. पद्य का आशय या भाव कुछ और है, आलोचक जी उसे उद्धृत कर कुछ और ही राग अलाप रहे हैं. …ऐसे आलोचकों के शिकार ‘छायावादी’ कहे जाने वाले कुछ कवि अभी हो रहे हैं.’

‘इधर हमारे साहित्य-क्षेत्र की प्रवृत्तियों का परिचालन बहुत कुछ पश्चिम से होता है. कला में ‘व्यक्तित्व’ की चर्चा खूब फैलने से कुछ कवि लोक के साथ अपना मेल न मिलने की अनुभूति की बड़ी लंबी-चौड़ी व्यंजना, कुछ मार्मिकता और कुछ फक्कड़पन के साथ करने लगे हैं. भावक्षेत्र में असामंजस्य की इस अनुभूति का भी एक स्थान अवश्य है, पर यह कोई व्यापक या स्थायी मनोवृत्ति नहीं. हमारा भारतीय काव्य इस भूमि की ओर प्रवृत्त रहा है जहां जाकर प्रायः सब हृदयों का मेल हो जाता है. इस सामंजस्य को लेकर अनेकता में एकता को लेकर- चलता रहा है, असामंजस्य को लेकर नहीं.’

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)