मनोज कुमार पांडेय
जब मैं इसे लिख रहा हूं तो सब तरफ़ तमाम तरह के दृश्य दुःस्वप्न की तरह हवा में बिखरे हुए हैं. होली बीत चुकी है. होली पर ढकी हुई मस्जिदों को देखना शर्म की दरिया में डूबकर मर जाना था. होली के दरम्यान अनेक ऐसे वीडियो सामने आए जिन्हें देखना किसी दुःस्वप्न से गुजरना था. होली और ईद के बीच ही कब्र में सैकड़ों सालों से सोया हुआ औरंगज़ेब का भूत जबरन जगा दिया गया.
नागपुर जिसे हम संतरों के रंग और सुगंध से पहचानते थे, जहां बगल में रामटेक में कभी महाकवि कालिदास ने तरह-तरह के स्वप्न देखे थे, जो लहराते बादलों की तरह आज तक हमारी आंखों में तैरते हैं. जहां बाबा साहेब परिवर्तन की एक यात्रा पर निकले थे. जहां बगल में वर्धा में गांधी ने सेवाग्राम में अपना आश्रम बनाया और आज़ादी के बाद वहां शांति से रहना चाहते थे. जहां मुक्तिबोध ने किसी जुलूस की अगुवाई करते हुए डोमाजी उस्ताद को देखा था, वहीं उसी नागपुर के तमाम दृश्य हवा में हैं जिनमें कथित रूप से पवित्र आयतों का जलाया जाना है. जहां सड़कों पर आगजनी और हिंसा के दृश्य हैं. जहां इकतरफा गिरफ्तारियां हैं और मुख्यमंत्री समेत और भी अनेक मंत्रियों के धमकाते हुए बयान हैं.

अभी उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश के एक मंत्री का घमंड भरा बयान हवा में तैर रहा था कि वह सात दरोगाओं के हाथ-पैर तुड़वाकर और उन्हें गड्ढे में फिंकवाकर यहां पहुंचा है. हम यह लगातार देख रहे हैं कि राज्य, जिसे कमज़ोरों का संरक्षक होना था वह उनके उत्पीड़न में अपने होने की अर्थवत्ता ढूंढ रहा है. बुलडोज़र त्वरित न्याय का नया प्रतीक बन रहा है, फिर इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि राज्य कथित रूप से सबसे ख़तरनाक अपराधों में निरुद्ध नागरिकों के खिलाफ़ भी कुछ साबित नहीं कर पाता और वे कुछ साल जेल काटने के बाद अपनी उम्र, गरिमा और प्रतिष्ठा गंवाकर, सदा के लिए संदिग्ध होकर घिसट-घिसटकर मरने के लिए बाहर की जेल में फेंक दिए जाते हैं.
यह सिर्फ अपने ही देश की बात नहीं हैं. दुनिया भर में दक्षिणपंथी गिरोहों की ताकत बढ़ती दिख रही है. आधुनिकता, पारदर्शिता और लोकतंत्र की दुनिया भर को सीख देने का दावा करने वाले यूरोप और अमेरिका ने जूलियन असांज जैसों के साथ क्या किया, यह हमने देखा है. अभी हाल में ही यूक्रेन के राष्ट्रपति को अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा सार्वजनिक तौर पर अपमानित होते हुए पूरी दुनिया ने देखा. हम उन्हें खुलेआम दूसरे देशों पर कब्जा करने की बात करते हुए देख रहे हैं.
भारत में भी कथित वृहत्तर भारत का सपना, दूसरे देशों की सम्प्रभुता का अपमान नहीं तो और क्या है? पड़ोस में, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के अनेक दृश्य हैं. फिलिस्तीन में भूख से बिलबिलाते बच्चों के समूह को देखना समूची मानवता पर लानत बरसने जैसा है. ज़ाहिर है कि देश हो या दुनिया इस तरह की बातें लगातार सब तरफ घट रही हैं. यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है.
आपको लग रहा होगा कि मैं वर्तमान से कुछ ज़्यादा ही आक्रांत हूं पर जब चीज़ें अतीत की तरफ भाग रही हों तो उसमें भविष्य की बात कर पाना भी एक स्वप्न ही है. जब हम वर्तमान के घटनाक्रम को यथार्थवादी ढंग से आगे बढ़ाते हैं तो भविष्य का यह स्वप्न अक्सर दुःस्वप्न में बदलने लगता है.
संस्कृत मैं बहुत कम जानता हूं पर अतीत के लिए वहां जिस शब्द का प्रयोग किया गया है वह मुझे हर तरह से अर्थवान लगता है. यह शब्द है भूत. लोक में भूतों के तमाम क़िस्से प्रचलित हैं पर आज यह भूत सबसे भयावह हॉरर फिल्मों के भूत में बदल गया है जो हमारे भविष्य और उसके सपनों को वीभत्स तरीके से नोच और खा रहा है और हम उसे ऐसा करते हुए देख रहे हैं.
आज इतिहास के तमाम प्रभावी चरित्रों को फिल्मी तर्ज पर नायकों और खलनायकों में विरूपित किया जा रहा है. वर्तमान की सभी समस्याओं के लिए अतीत के लोगों को कोसा जा रहा है. ऐतिहासिक इमारतें तोड़ी जा रही हैं. सड़कों और लोगों के नाम बदले जा रहे हैं. कभी ‘पीछे चलो, भविष्य कहीं नहीं है’ शीर्षक से एक कहानी लिखी थी. उसका कुछ हिस्सा यहां रखना चाहूंगा–
‘सड़कों, शहरों, नदियों, पहाड़ों और जंगलों का नाम बदल देने से शुरुआत में तो लोग बहुत खुश हुए. उन्हें लगा कि कुछ नया हो रहा है स्वर्णदेश में. पर जल्दी ही वे इन सारी चीज़ों के प्रति विरक्ति से भर गए. नए नामों के प्रति उनमें उत्साह तो बहुत था पर वह लगाव या परिचय की भावना कहीं बहुत ढूंढने पर भी नहीं मिलती थी जिससे कि पहले वे भरे रहते थे. शहरों की हवा और पानी तक में यह अपरिचय और अलगाव घुल गया था. उनकी समझ में ही न आता कि मात्र कुछ नाम बदल भर जाने से उनके भीतर इतने बड़े बदलाव क्यों कर हो रहे हैं.
जल्दी ही स्वर्णदेश के लोगों ने पाया कि वे किसी भूलभुलैया में फंस गए हैं. वे मंदिर जाने के लिए निकलते और श्मशान पहुंच जाते. ऑफिस जाने के लिए निकलते और किसी परेड में पहुंच जाते. बच्चे स्कूल जाने के लिए निकलते और किसी अनाथालय या बूचड़खाने में पहुंच जाते. रास्तों में मिलने वाले पहचान के चिह्न, जिनकी तरफ उनका अक्सर ध्यान भी नहीं जाता था पर वे उंगली पकड़कर लोगों को सही जगह पहुंचा ही दिया करते थे. इनमें से ज्यादातर चिह्न इतिहास के दाग-धब्बे मानकर मिटा दिए गए थे. इमारतें समतल मैदानों में बदल दी गई थीं. विश्वविद्यालय अजायबघर बन गए थे. सब कुछ उलट-पलट गया था.
बाद में यह समस्या और विकट हुई. जब यह भूल-गलती भाषा के भीतर भी सुधारी जाने लगी तो स्वर्णदेश के सभी लोग कमोबेश अपनी भाषा खो बैठे. वे जो भी वाक्य बोलते या लिखते उनमें कम-से-कम आधे शब्दों की जगह ख़ाली छूट जाती. उनकी जगह पर उनके मुंह से हवा की सनसनाहट निकलती. उनका बोलना इस सनसनाहट के बीच कुछ जानी पहचानी ध्वनियों का उच्चारण भर रह गया. यह और भी भयानक था कि हटाए गए शब्दों की अनुपस्थिति में बचे हुए शब्द भी अपना अर्थ खो बैठे. इस तरह से स्वर्णदेश के लोग कुछ भी बोल सकने में या कि लिख सकने में असमर्थ होते गए. उनकी बोली-भाषा दिव्यांग हो गई थी और इसी के साथ उसके अर्थ न जाने कहां उड़ गए थे.
भाषा के बाहर निष्कासित शब्दों और उनके अर्थों ने लोगों के सपनों पर हमला बोल दिया. वे सारे शब्द जो दिन में ग़लती से भी जुबान पर आने वर्जित थे वे सपनों में जी भर के उत्पात मचा रहे थे. इसी तरह वे सारी गलियां, सड़कें, इमारतें और शहर सपनों में नया जीवन पा रहे थे. लोग उन्हें अब तक बरतते आए थे पर अक्सर उन्हें उसका इतिहास भूगोल नहीं पता होता था. यह एकदम उसी तरह से था कि कोई यह न जाने कि उसके द्वारा ली गई सांस में कितने फीसदी ऑक्सीजन और कितने फीसदी नाइट्रोजन या कि अन्य चाही-अनचाही गैसें हैं पर इसका मतलब यह थोड़े था कि वह सांस ही नहीं लेता. यह सपने लोगों को सांस लेने में भी मुश्किल पैदा कर रहे थे. उनकी सांसें फूल रही थीं.
…जबकि इतिहास में रह रहे लोगों ने बहुत सारी लड़ाइयां लड़ी थीं. वे बेइन्तिहा थके हुए थे और किसी नई लड़ाई में नहीं उलझना चाहते थे. उनके अपने सुख-दुख थे, स्मृतियां और पश्चाताप थे. वे शांति से उनमें डूबे रहना चाहते थे. उनकी शांति की चाह कुछ इस कदर बढ़ गई थी कि अक्सर वे उन्हीं लोगों के कन्धों पर सिर टिकाए मिलते जिनसे वे जीवन भर लड़ते रहे थे.’
इनमें बतौर रचनाकार मेरे स्वप्न भी हैं जो ऊपर के उद्धरण के एकदम आखिरी पैरे में हैं. उसके ऊपर वह दुःस्वप्न हैं जो हमारे चारों तरफ रोज़-ब-रोज़ घट रहे हैं. आज राज्यसत्ता, बाजार और धर्मसत्ता एक दूसरे में इस तरह से घुले-मिले जा रहे हैं कि अलग से इन्हें पहचानना या चिह्नित करता तक असंभव होता जा रहा है, तो ऐसे समय में एक लेखक के स्वप्न क्या हो सकते हैं!
मैंने कहीं पढ़ा था कि ‘कल्पना’ स्मृति का स्वप्न है. स्मृति मेरे लिए वह सभी अनुभव हैं जिनकी कोई – मामूली सी ही सही – प्रतिक्रिया मेरे भीतर छुपकर बैठी हुई है, जिसे स्तानिस्लेवस्की ‘भावनात्मक स्मृति’ कहा करते थे. स्मृतियों से और स्मृतियों के स्वप्न यानी कल्पना से मैंने एक सचेत रचनात्मक संबंध बनाने की कोशिश की है. मेरा मानना है कि इन दोनों के अभाव में रचना संभव ही नहीं हो सकती. इन दोनों ही चीजों को थोड़ा और व्यापक कर के भी देखा जा सकता है कि स्मृतियां मतलब उत्पीड़न और संघर्ष की स्मृतियां, दुख और उल्लास की स्मृतियां.
ऐसे ही कल्पना का मतलब उड़ान, उत्पीड़न के सारे बंधन तोड़कर बाहर आने की ललक, आज़ादी. और यही वह चीज़ है जो स्मृतियों के साथ आपके रिश्ते को संतुलित बनाती है. यानी कि आप अतीत के बोझ से दब जाने से बचे रहते हैं. मुझे लगता है कि स्मृति और कल्पना यानी अतीत और भविष्य के बीच वर्तमान की सही अवस्थिति ही रचना को मुकम्मल बनाने वाली चीज़ है.
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पर बहुत कमाल का समय है यह. जो चीज़ें आज़ादी के नारे के साथ आईं उन्होंने हमें सबसे अधिक गुलाम बनाया. मोबाइल, आधार कार्ड या इंटरनेट जैसी चीज़ें इस बात के कुछ स्थूल उदाहरण भर हैं. इन चीज़ों ने हम तक सत्ता के शैतानी पंजे की पहुंच को बेहद आसान बना दिया. रफ़्तार का कायदे से मूल्यांकन अभी होना बाकी है. पर यह अनायास नहीं है कि हमारा एक महबूब लेखक जब ‘दीवार में रहने वाली खिड़की’ खोलता है तो वहां तेज रफ़्तार कारें और मोटर साइकिलें नहीं, हाथी और साइकिल होते हैं. प्रकृति खिड़की से आकर फल दे जाती है. पानी इतना साफ होता है कि नदी की गहराई में गिरा सिक्का एकदम साफ दिखाई देता है. लोग एकदम सीधे और सरल हैं. कहा गया कि यह एक काल्पनिक दुनिया है. कौन नहीं जानता कि यह एक काल्पनिक दुनिया है. कथाकार नहीं कल्पना करेगा तो क्या आलोचक करेगा?
पर सवाल यह है कि यह काल्पनिक दुनिया क्या कोई प्रतिरोध नहीं रचती? क्या प्रतिरोध का एकमात्र तरीका किसी प्रचलित यथार्थवादी परिणति तक पहुंचना ही है? क्या वे ही रचनाएं प्रतिरोधी चेतना की मानी जाएंगी जिनके चरित्र हथियार उठाए घूमेंगे? मैं इसे ऐसे भी कहना चाहूंगा कि ‘दीवार में खिड़की रहती थी’ हमारे एक जिम्मेदार लेखक द्वारा देखा गया स्वप्न है.
साहित्य की बहुत सारी परिभाषाएं हैं. उनमें से कुछ को पढ़ते हुए, थोड़ा बहुत साहित्य पढ़ते हुए और उससे भी बहुत ज़्यादा जीवन को पढ़ते-समझते हुए जाना कि साहित्य एक मनुष्य के साथ दूसरे मनुष्य के रिश्ते को, मनुष्य के विभिन्न संस्थाओं के साथ रिश्ते को और मनुष्य के प्रकृति के साथ के रिश्ते को संवेदना, विचार और सौन्दर्य के स्तर पर समझने की कोशिश का नाम है. यह कोशिश इतनी आसान चीज़ है क्या?
जिन्हें हम वस्तुएं कहते हैं उनके भी कुछ गुण धर्म होते हैं. वे उतनी निर्जीव नहीं हैं जैसा कि अक्सर हम उन्हें समझ लेते हैं. साहित्य तो है ही ऐसा कि निर्जीव वस्तुओं में भी जीवन देख ले पर विज्ञान भी हमें बताता है कि निर्जीव कही जाने वाली वस्तुएं भी उन्हीं मूलभूत कणों से बनी हैं जिनसे हम बने हैं. तो वे भी ख़ुद के साथ मनचाहे सलूक के विरोध में खड़ी होती हैं. वे अपना प्रतिरोध दर्ज करती हैं. फिर हम तो मनुष्य हैं. जीवन से लबालब भरे.
यह समय हमें ही नहीं उन्हें भी मार रहा है जिन्हें हम वस्तु कहते हैं. जहां वस्तुएं सिर्फ और सिर्फ भोग के लिए हैं. और जिन्हें बाज़ार कई बार इस तरह से हमारे सामने पेश करता है जैसे कि वे हमसे भी ज़्यादा सजीव हों. यह बाज़ार की उलटबांसी है जो हमें अपने उत्पाद के सम्मोहन में फंसाकर हमें अपने उत्पाद से कमतर साबित कर देती है.
अभी पिछले दिनों साहित्य अकादेमी ने एक बड़ा आयोजन किया. विषय था ‘साहित्य में नरक वर्णन’. इस विषय पर बोलने के लिए हमारे अनेक चर्चित नाम वहां पर उपस्थित थे. अभी नरक पर चर्चा हुई, कल को स्वर्ग पर होगी. फिर अनेक देवी-देवताओं पर होगी. एक स्वामी जी को साहित्य का ज्ञानपीठ पुरस्कार अभी पिछले साल ही मिला है.
लेकिन हमें यह भी समझ ही लेना चाहिए कि साहित्य के लिए बनाए गए तमाम सरकारी संस्थान तो खैर क्या ही कुछ करेंगे, अब जो समय है उसमें विश्वविद्यालयों में भी किसी ढंग के विषय पर चर्चा मुमकिन नहीं बची है. तो यह हमारे समय की सच्चाइयां हैं पर साहित्य के प्रचार-प्रसार या उन्नयन के लिए बनी इन संस्थाओं में साहित्य के लिहाज़ से अच्छी स्थितियां शायद ही कभी रही हों.
हमें समझना चाहिए कि साहित्य अकादेमी बेरोज़गारी, सांप्रदायिकता, जल-जंगल जमीन के मुद्दों या कि फासिज़्म पर तो सेमिनार नहीं ही करेगी. शायद पहले भी यह संभव न रहा हो लेकिन अब बात इसके भी आगे निकल गई है. आप ख़ुद इन मुद्दों पर कुछ करना चाहेंगे तो इसके लिए आपको कहीं जगह नहीं मिलेगी. इलाहाबाद जैसे शहर में साहित्य और संस्कृति पर केंद्रित किसी कार्यक्रम के लिए हॉल मिलना लगभग असंभव हो गया है. आपसे पूछा जाता है कि आपके वक्ता क्या बोलेंगे? किस विषय पर बोलेंगे? सरकार के विरोध में तो कुछ नहीं बोलेंगे? आप अपने किसी वक्ता के मुंह पर खोंच कैसे बांध सकते हैं!
दूसरी तरफ़ जिन्हें हम जनता कहते हैं उसकी वास्तविक मुश्किलें दूसरी हैं और उसे ऐसी तमाम काल्पनिक मुश्किलें थमा दी गई हैं जिन्हें उसने पूरी तरह से आत्मसात कर लिया है. यह उलटबांसी अक्सर घटती है जब सरकारी राशन के दम पर पेट भर पा रहा कोई नागरिक (?) अंबानी, अडानी जैसों के पक्ष में बहस करता मिले, बेरोज़गार छंटनी के पक्ष में बोलें, स्त्रियां बलात्कारियों का जयघोष करें. यह सब एक फंतासी की तरह हमारे सामने घट रहा है. ऐसे में किसी रचनाकार का स्वप्न क्या हो सकता है?
बतौर रचनाकार मैं यह स्वप्न देखता हूं कि यह फंतासी जैसी उलटबांसी पूरी तरह से ध्वस्त हो जाए. कि मेरे देश के लोग वह करें जो उन्हें ऐसे में सचमुच करना चाहिए. भूखा अपनी भूख के खिलाफ़ बोले. बेरोज़गार अपने रोज़गार के लिए लड़े. बिना जाति-धर्म देखे सभी स्त्री-पुरुष बलात्कारियों के खिलाफ़ उठ खड़े हों. इसी तरह से और भी तमाम बातें घटित हों जो इस आलेख के शुरुआती हिस्से को एक झूठ बना दें. पर हम जानते हैं कि कलाकारों के सपने इतनी आसानी से कहां पूरे होते हैं.
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तो हम वह करते हैं जो करना हमें थोड़ा-बहुत आता है. यह काम है अपने सपने के पक्ष में लिखना और यह करते हुए उस दुःस्वप्न को विखंडित करना जिसे लोग किसी सम्मोहक स्वप्न की तरह से देख रहे हों. हर तरह की ग़ैरबराबरी के लिए ज़मीन तैयार करता उन्मादी राष्ट्रवाद, धर्मान्धता और इससे पैदा होती सांप्रदायिकता और ग़ैरजरूरी वस्तुओं के प्रति एक पागल सम्मोहन यह हमारे समय के सबसे भयावह नशे हैं जिनकी पिनक में करोड़ों लोग खोये हुए हैं. तो सपना यही है कि कुछ ऐसा लिखा जा सके जो उन्हें इस पिनक से थोड़ा-सा ही सही पर निकाले.
और तब वह इंसानी गरिमा या उसके लघु जीवन की विराट निरन्तरता के अनुकूल व्यवहार करना सीखें. उनमें इंसानी खून और आंसू की क़ीमत समझने की तमीज़ विकसित हो. वे न सिर्फ दूसरे इंसानों के प्रति बल्कि इस समूची प्रकृति के प्रति थोड़े से विनम्र बनें. इस धरती पर हमारी विराट उपस्थिति है पर यह उपस्थिति तभी तक है जब तक हम इसे धरती के अन्य निवासियों के साथ एक साझा कायम करके चलें.
यह बात सुनने में भले ही बुरी लगे पर प्रकृति के लिए एक मनुष्य और एक जानवर में कोई भेद नहीं है. जल के लिए किसी मनुष्य की प्यास, जानवर की प्यास या किसी पेड़ की प्यास में कोई अंतर नहीं है. यह हम हैं – मनुष्य – जो अंतर पैदा करते हैं. हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह अंतर इतना बड़ा न हो जाय कि प्रकृति हमसे नाराज ही हो जाए. हम अपना यह बोध बनाए रखें कि प्यास को प्यास ही बनाए रखें, हवस न बनाएं.
हमारे समय के साहित्य की एक ज़रूरी ज़िम्मेदारी यह भी है कि वह हमें महामारी की तरह से व्याप रही इस हवस का व्याकरण समझाए. आज जब बाज़ारवाद संवेदना को विज्ञापनी संवेदना से और रिश्तों को, मनुष्यता को प्रोडक्ट से स्थानांतरित करने की कोशिश कर रहा है तो साहित्य को हमें बताना चाहिए कि मनुष्यता किसी प्रोडक्ट पर वारे जाने के लिए नहीं है. कि मनुष्य सिर्फ एक कमोडिटी (उत्पाद) में बदल जाने के लिए नहीं बना है. कि ठंडा का मतलब कोका कोला कतई नहीं होता, न ही सच्चाई का मतलब हमाम होता है.
आज़ादी का मतलब किसी खास ब्रांड की वस्तु के उपयोग के बाद भीतर पैदा होने वाला भाव नहीं है. मनुष्य कोई निर्जीव वस्तु नहीं है कि बाजार के मालिकान अपने फायदे के लिए उसे जैसे चाहें हांक दें.
मुश्किल यह है कि हमें एक ऐसा समाज मिला है जिसमें अभी भी अनपढ़ों की बड़ी तादाद है. यह भी विडंबना ही है कि यह बात अभिधा-लक्षणा-व्यंजना तीनों में कही जा सकती है. इस समाज में बहुत ही थोड़े से लोग हैं जो आपको पढ़ते हैं और वैसे तो न के बराबर लोग हैं जो आपके लिखे को लेकर आपसे लड़ते हैं, शिकायत करते हैं, आपसे संवाद करते हैं. तो एक निजी सपना यह भी है कि मेरे लोग पढ़ना सीखें और अपने लेखकों को भी ज़्यादा ज़िम्मेदार बनाएं.
संसार के सभी धर्मों के लोग यह जानें और मानें कि ईश्वर का जो भी नाम हो पर उसी ने इस दुनिया के सभी मनुष्यों को रचा है, इसलिए उनके धर्म चाहे जो भी हों पर उन्हें एक दूसरे के साथ मुहब्बत से रहना चाहिए. कि अल्लाह ने ही रचा होगा सुन्नियों, शियों और अहमदियों को. उसी ने यजीदियों को भी रचा होगा. हिंदुओं, ईसाइयों और बौद्धों को भी. या कि भगवान ने जब यह दुनिया बनाई तो अपने उन्हीं पवित्र हाथों से मुसलमानों और दलितों और स्त्रियों और दूसरे तमाम जेंडर्स को भी रचा होगा. मैं धर्मों की छतरी के बाहर फिंका हुआ होने के बावजूद सपना देखता हूं कि लोग अपना-अपना धार्मिक टेक्स्ट ‘जय हो जय हो’ कि अंध श्रद्धा से थोड़ा दूर होकर तार्किक होते हुए पढ़ें.
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तो एक रचनाकार के रूप में मेरे स्वप्न बहुत मामूली हैं, जिन्हें मैं बस आठ-दस पंक्तियों में बयान कर सकता हूं. मैं सपना देखता हूं कि ऊपर जिस दुनिया का बयान किया गया है वह एक स्वप्न ही हो. कि हमारे शासक लोककथाओं के राजाओं की तरह भेस बदलकर इस बात के लिए रात-रात भर जागें और घूमें कि वह सच में अपने नागरिकों की हंसी और आंसू समझ सकें. कि फिलिस्तीन में किसी एक बच्चे को भी चोट लगे तो समूचा इज़रायल उसके लिए दुआएं मांगे. इज़रायल में कोई संकट आए तो सारा फिलिस्तीन अपनी पूरी ताकत से उसके साथ खड़ा हो.
हां, मैं भी एक वृहत्तर भारत का सपना देखता हूं कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों में इतना प्रेम पैदा हो गया है कि सीमाएं अपने आप ही व्यर्थ हो रही हैं. कि स्टालिन अवधी सीख रहे हैं और मनोज उनसे तमिल में बतिया रहे हैं. कि सभी हिंदी-भाषी पुरुषों ने कम-से-कम दाल, चावल, रोटी, सब्जी और निमोना बनाना तो सीख ही लिया है और यह तो स्वाभाविक ही हो कि अक्सर वे सुबह अपनी प्रिय साथी के लिए चाय बनाते हुए पाए जाएं.
मैं बतौर लेखक कुछ ऐसा बयान करना चाहता हूं कि वह उन्हें पढ़नेवालों को उनकी जी जा रही दुनिया के समानान्तर एक दूसरी सार्थक और मुहब्बत भरी दुनिया में ले जा सके.
(मनोज कुमार पांडेय कवि और कथाकार हैं.)
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