नई दिल्ली: अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार के बीच पिछले कुछ महीनों से एक भीषण टकराव चल रहा है. यह टकराव केवल राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने हजारों छात्रों के भविष्य, विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति और अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था और स्वतंत्रता को भी चुनौती दी है.
इस विवाद की अगली कड़ी में ट्रंप ने विश्वविद्यालय पर यहूदी-विरोधी रुख अपनाने और कट्टरपंथी विदेशी छात्रों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए 3 बिलियन डॉलर की संघीय फंडिंग रोकने की धमकी दी है. उन्होंने यह भी कहा कि यह राशि व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों (ट्रेड स्कूलों) को दी जा सकती है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने 26 मई को अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, ‘मैं हार्वर्ड जैसी यहूदी-विरोधी संस्था से तीन अरब डॉलर की अनुदान राशि वापस लेने और उसे देश भर के व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों (ट्रेड स्कूल) में लगाने पर विचार कर रहा हूं. अमेरिका के लिए यह एक बेहतरीन और बेहद ज़रूरी निवेश होगा.’
इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने 14 अप्रैल को हार्वर्ड को मिलने वाली 2.3 बिलियन डॉलर की संघीय फंडिंग को रोक दिया है.
जानते हैं हाल के हफ्तों में ट्रंप प्रशासन और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के बीच टकराव किस तरह बढ़ता चला गया और यह कैसे शिक्षा, स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के भविष्य पर असर डालने लगा.
ट्रंप प्रशासन की मांगें और हार्वर्ड का विरोध
टकराव की शुरुआत तब हुई जब ट्रंप प्रशासन ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय पर आरोप लगाए कि वह परिसर में यहूदी-विरोधी गतिविधियों और हिंसक विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने में विफल रहा है. प्रशासन ने 11 अप्रैल को विश्वविद्यालय के समुख कई कठोर मांगें रखीं, जिनमें ‘योग्यता-आधारित’ प्रवेश नीतियों को लागू करना, विविधता, समानता और समावेशन के कार्यक्रमों को बंद करना, और छात्र आंदोलनों पर कड़ी निगरानी रखना शामिल था. ट्रंप प्रशासन ने यह भी कहा कि हार्वर्ड को ‘फेस मास्क पर प्रतिबंध लगाने’ और विरोध प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय की इमारतों पर कब्जा करने वाले छात्रों को निलंबित करने जैसे कदम उठाने होंगे. फेस मास्क पर प्रतिबंध की मांग को फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाने के रूप में देखा गया.
हार्वर्ड ने ट्रंप प्रशासन की इन मांगों को मानने से इंकार कर दिया, जिसके बाद अमेरिकी शिक्षा विभाग ने 14 अप्रैल को हार्वर्ड को संघीय कोष से मिलने वाले लगभग 2.3 बिलियन डॉलर के फंड को रोकने की घोषणा की.
हार्वर्ड के अध्यक्ष एलन गार्बर ने स्पष्ट किया कि प्रशासन की मांगें विश्वविद्यालय के प्रथम संशोधन अधिकारों का उल्लंघन हैं और ये अमेरिका के नागरिक अधिकार कानून ‘शीर्षक 6’ के तहत वैधानिक सीमाओं को पार करती है. उन्होंने लिखा, ‘कोई भी सरकार यह तय नहीं कर सकती कि निजी विश्वविद्यालय क्या पढ़ा सकते हैं, किसे प्रवेश दे सकते हैं या किसे नियुक्त कर सकते हैं.’
संघीय फंडिंग पर रोक और इसका प्रभाव
ट्रंप प्रशासन की इस कार्रवाई ने हार्वर्ड के वित्तीय संसाधनों पर गहरा प्रभाव डाला है. अप्रैल में, शिक्षा विभाग ने 2.2 अरब डॉलर के फंडिंग और 60 मिलियन डॉलर के अनुबंध रोक दिए. यह केवल हार्वर्ड तक सीमित नहीं रहा, प्रशासन ने पहले भी पेंसिल्वेनिया, ब्राउन, प्रिंसटन जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की फंडिंग रोक दी थी.
हार्वर्ड ने इस कार्रवाई के खिलाफ बोस्टन की संघीय अदालत में याचिका दायर की. बोस्टन की संघीय अदालत में दायर याचिका में विश्वविद्यालय ने कहा, ‘सरकार यह नहीं बता पाई है, और न ही बता सकती है, कि यहूदी-विरोधी (एंटीसेमिटिज़्म) को लेकर जताई गई चिंताओं का उन मेडिकल, वैज्ञानिक, तकनीकी और अन्य शोध परियोजनाओं से क्या तार्किक संबंध है, जिन्हें रोक दिया गया है. ये परियोजनाएं अमेरिकी जीवन, सुरक्षा और नवाचार से जुड़ी हैं.’
हार्वर्ड के छात्र रह चुके डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने प्रशासन की इस रणनीति की आलोचना करते हुए कहा, ‘ट्रम्प प्रशासन विश्वविद्यालयों को कमजोर करने या नष्ट करने की कोशिश कर रहा है.’
विदेशी छात्रों पर प्रतिबंध का ऐलान
टकराव का एक और बड़ा आयाम अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लेकर सामने आया. गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) ने 22 मई में हार्वर्ड की अंतरराष्ट्रीय छात्रों को दाखिला देने की मान्यता रद्द कर दी. इसका मतलब है कि हार्वर्ड नए विदेशी छात्रों को प्रवेश नहीं दे सकता, और मौजूदा विदेशी छात्रों को या तो अन्य संस्थान में स्थानांतरित होना होगा या वे अमेरिका में रहने का कानूनी दर्जा खो देंगे.
यह निर्णय विश्वविद्यालय के लगभग 27 प्रतिशत गैर अमेरिकी छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है. हार्वर्ड में हर साल तकरीबन 500-800 भारतीय छात्र पढ़ते हैं.
हालांकि, हार्वर्ड द्वारा इस फैसले को ‘मनमाना और असंवैधानिक’ बताकर अदालत में चुनौती देने के बाद एक संघीय न्यायाधीश ने इस पर फिलहाल रोक लगा दी है.
डीएचएस ने हार्वर्ड पर आरोप लगाए थे कि विश्वविद्यालय ने उन विदेशी छात्रों के रिकॉर्ड सौंपने से इनकार किया है जो हिंसा या गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल रहे हैं. गृह सुरक्षा सचिव क्रिस्टी नोएम ने कहा, ‘यह विश्वविद्यालय जानबूझकर अमेरिका-विरोधी और आतंक समर्थक लोगों को प्रोत्साहित करता रहा है.’
उल्लेखनीय है कि हार्वर्ड अमेरिका के उन कई विश्वविद्यालयों में से एक है, जहां छात्र फिलिस्तीन के गाजा पर इजरायल के हमलों के खिलाफ मुखर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
हार्वर्ड ने इस फैसले को ‘गैरकानूनी’ और ‘प्रतिशोधात्मक’ बताया. विश्वविद्यालय के प्रवक्ता जेसन न्यूटन ने कहा, ‘हम 140 से अधिक देशों से आने वाले छात्रों का स्वागत करते हैं, जो हमारे देश और विश्वविद्यालय दोनों में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं.’ उन्होंने चेतावनी दी कि यह कदम न केवल विश्वविद्यालय समुदाय को बल्कि अमेरिकी शिक्षा और शोध प्रणाली को भी प्रभावित करेगा.
ट्रंप ने हार्वर्ड को ‘मजाक’ करार दिया
पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने हार्वर्ड को ‘मजाक’ बताते हुए कहा कि इसे फेडरल फंडिंग नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि यहां ‘नफ़रत और मूर्खता’ सिखाई जाती है. उन्होंने कहा था, ‘हार्वर्ड एक ‘जोक’ है, और उसे दुनिया के महान विश्वविद्यालयों की सूची में जगह नहीं मिलनी चाहिए.’
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि विश्वविद्यालय ‘अमेरिकी मूल्यों के प्रति शत्रुता’ को बढ़ावा दे रहा है और कैंपस के अंदर गाजा के समर्थन में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को अनियंत्रित रखा गया है.
ट्रंप प्रशासन के इस रवैये को लेकर अकादमिक स्वतंत्रता, शिक्षा की स्वायत्तता और विश्वविद्यालयों में विचारों की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं.
हार्वर्ड झुकने को तैयार नहीं
हार्वर्ड ने इस पूरे विवाद को केवल अपने खिलाफ नहीं बल्कि पूरे अमेरिकी विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता पर एक बड़ा हमला बताया है. विश्वविद्यालय ने कहा है कि सरकार की मांगें न केवल उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं, बल्कि वे शिक्षा की गुणवत्ता और शोध की स्वतंत्रता को भी नुकसान पहुंचाती हैं.
हार्वर्ड के अध्यक्ष एलन गार्बर ने कहा, ‘हम उन मूल्यों के साथ खड़े हैं जिन्होंने अमेरिकी उच्च शिक्षा को दुनिया में एक मिसाल बनाया है. हमारा मानना है कि विश्वविद्यालय बिना सरकारी दखल के समाज में अपनी भूमिका निभा सकते हैं.’
