इन दिनों कोई भी गीत मैं पूरा नहीं गाती
गीत उठाती हूं आधा-तीहा गाकर छोड़ देती हूं
कोई उल्लास छूती ही हूं कि मन अहुक जाता है
जैसे दुख की कोई याद उमड़ती है
जब मैं बहुत बाद में बड़ी हुई थी तो मेरी बांह पर कई पंख उग आए थे
रंग-बिरंगे,चमकीले सपनों की ओर उठे हुए
जिनके साथ मैं बहुत दूर तक उड़ना चाहती थी
हरे-भरे खेतों की मेड़ों पर चलना चाहती थी
मैं सारे छूटे, बिसरे खेलों को याद करके पूरा खेलना चाहती थी
खूब नाचना था
याद आया मुझे कत्थक सीखना था
पंचम स्वर में कोई गीत गाना था
पिता के गाये रागों को सीखना था
खूब किताबें पढ़ना था
और कुछ किताबें लिखना भी था
दो, चार प्रेम करना था
चार, छः देश देखना था
खूब हंसना था और जब भी जी करे रो लेना था
जब मन करे उस ओर चल देना था
जिधर घने पेड़ों के बीच से नदी तक पगडंडी जाती है
लेकिन सोचती हूं फिर वहां से कहां जाऊंगी
वे धरती को दुखों से भरते जा रहे हैं
अभी तो न्याय के लिए लड़ते सारे मनुष्य उदास हैं
धूल ,धुंआ और गाली में लिथड़े बच्चे भूखे और बदहाल हैं
मैं किसके साथ हंसूं, किसके लिए गाऊं, और किससे प्रेम करूं.
जब मनुष्यों की धरती को मनुष्यों से ही बचाने का संकट अछोर होता जाए तो रचनाकार निर्वाक-सा हो जाता है. आत्मा को कचोटता दुख लेकर वो कहां चला जाए, वो जानता है कि जहां जाएगा दुख साथ जाएगा. आज धरती का एक कोना बच्चों के खून से भीजा हुआ है. गाजा के गुनहगारों ने एक सुंदर हंसती-खिलखिलाती दुनिया को एकदम से तबाह कर दिया. रुलाई की इतनी बेसंभार आवाज़ें हर ओर से आ रही हैं कि रचनाकार ही क्या, हर संवेदनशील मनुष्य दुख में है.
जल, ज़मीन और जंगल की अपनी लड़ाई लड़ते आदिवासियों को नक्सली कहकर बर्बरता से मार दिया जा रहा है. देश के अल्पसंख्यकों के दुख को भर-निगाह देखा नहीं जा रहा है. आज स्त्रियों का जीवन युद्धरत हो गया है. उन पर यौनिक हमले बढ़ते जा रहे हैं. हर स्त्री चाहे वह किसी भी वर्ग से हो, उन हमलों की जद में है. सामंती चेतना की तरफ़ तेजी से लौटा आज का समाज जैसे स्त्रियों के लिए अधिक बर्बर हो उठा हो. और ये कोई स्वतःस्फूर्त परिघटना नहीं है, पुनरुत्थानवादी ताकतों द्वारा बाकायदा इसे स्थापित किया जा रहा है. स्त्रियों के प्रति हिंसात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर उन्होंने भारतीय जनमानस को दूषित कर दिया है.
भारतीय न्यायालय जो फ़ैसले स्त्रियों के प्रति होने वाली आपराधिक घटनाओं में दे रहे हैं वो आधी आबादी को चरने का फ़रमान है. आज फासीवादी ताकतों का फैलाया जा रहा अंधेरा गाढ़ा होता जा रहा है. उसका आका पूंजीवाद पहले से कहीं ज़्यादा भयावह हो गया है. एक नए बनते देश-समाज के भीतर फासीवाद की प्रवृत्ति जो ख़त्म हो रही थी उसे वर्तमान सत्ता के आगमन ने पुनर्स्थापित ही किया.
एक स्त्री और रचनाकार के रूप में मैं जिस तरह से इस समय को देख रही हूं वो भयावह है. आज जिस तरह महिला अपराध का महिमामंडन राज्य के निर्देश पर हो रहा है, वो पिछले समय के महिला अपराधों से कहीं आगे की बात है. बिलकीस बानो से लेकर कठुआ, हाथरस ,उन्नाव आदि जगहों पर बलात्कार के पक्ष में जिस तरह जुलूस निकाला गया, वो हम स्त्रियों की आत्मा पर कभी न भरने वाला घाव है. मणिपुर में महिलाओं को नंगा घुमाया गया, महिला पहलवानों को यौन-उत्पीड़न मामलों में न्याय न देकर उन्हें जंतर-मंतर पर बर्बरता से घसीटा गया, बनारस हिंदू विश्विद्यालय में छात्रा के बलात्कार के विरोध में प्रदर्शन करती लड़कियों को मारा-घसीटा गया. दुनिया के किसी देश में ऐसा नहीं है कि बलात्कारी के पक्ष में जुलूस निकला हो या उन्हें सम्मानित किया गया हो!
ऐसा नहीं था कि वर्तमान सत्ता के केंद्र में आने से पहले महिलाओं के साथ अपराध नहीं होते थे, लेकिन तब की सत्ताएं बलात्कारी को सम्मानित नहीं करती थीं, उनके पक्ष में जुलूस नहीं निकालती थीं. आज़ादी के बाद महिलाओं पर इस तरह का हमला एकदम नया है.
पुराने सामंती समाज के भीतर दलित-घृणा और स्त्री-हिंसा जैसी चीज़ें पहले से ही थीं लेकिन वो जाति, धर्म और वर्ग का मसला ज़्यादा होता था. पर आज महिलाओं के साथ राज्य की ये अन्यायी धारा खाप पंचायतों से भी आगे निकल चुकी है. अभी हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट का बलात्कार के पक्ष में बेहद घिनौना फैसला आया जिसने स्त्रियों की चेतना को स्तब्ध कर दिया है. महिलाओं पर हमले करने में अब ये सत्ता किसी आड़ का सहारा नहीं ले रही है और सत्ता से संचालित न्याय-व्यवस्था भी स्त्रियों को उपभोग की वस्तु मानकर ही न्याय दे रही है.
अपनी हिंदुत्व की प्रयोगशाला में सत्ता कला, सिनेमा और विकृत इतिहासबोध के माध्यम से दुष्प्रचार फैलाकर समाज को घृणा की ओर ले जा रही है. झूठ और भ्रम पैदा करके मनुष्य को उसके सदियों पुराने घाव दिखा रही है लेकिन जिस दिन स्त्रियां इस समाज व्यवस्था से अपने घावों का हिसाब मांगेगी तो इस उन्मादी समाज के पास कोई हर्जाना नहीं होगा उन्हें देने के लिए.
मैं सोचती हूं कि आज जो लोग, सैकड़ों वर्ष पहले के शासकों के अन्याय की स्मृति में मुस्लिम घृणा से उपजी प्रतिक्रियाऐं दे रहे हैं, वही लोग देश में हर तीन मिनट पर एक स्त्री के बलात्कार की घटना से कैसे सहज रह पाते हैं. बल्कि इसके विपरीत वही सारे लोग बोलती ,लड़ती, प्रतिक्रिया में खड़ी औरतों को अमानुषिक घोषित करने में लगे हैं. सोचती हूं दुनिया की आधी आबादी जिस दिन प्रतिक्रिया पर उतर जाएगी तो स्थिति क्या होगी.

आज जिस तरह से पूरी दुनिया में साम्राज्यवादी ताकतों की क्रूरता बढ़ती जा रही है, कविता लिखना कठिन होता जा रहा. कभी-कभी लगता है कि लिखने भर से कुछ नहीं होगा, सड़क पर निकल कर प्रतिरोध किया जाए. फिर लगता है दोनों ही तरीक़ों से आज प्रतिरोध अनिवार्य हो गया है. आज का समय ऐसा है कि लेखक और नागरिक दोनों की चुनौतियां एक-सी दिखती हैं. कला व साहित्य भर से ही नहीं बल्कि यह समय ज़मीन पर खड़े होकर प्रतिरोध करने का भी है.
यह समय चीख भरी रुलाइयों का समय है, जिसका दस्तावेजीकरण और प्रतिरोध जरूरी है. स्याही और चोटों से रिसते ख़ून के मिलजुल प्रतिरोध द्वारा ही भारत को फासीवाद के चंगुल से बचाया जा सकता है. वरना आज के समय में जो रचनाकारों की लौ है, उसे यह फासीवादी सत्ता बुझा देगी. ऐसे समय में ज़रूरी हो गया है कि हम कविता में, साहित्य में अपनी बात रख छोड़ें कारण कि यही रचनाएं उन कालखंडों का इतिहास निर्मित करती हैं.
आज सत्ता कॉरपोरेट से मिलकर संस्कृतिकरण की आड़ में धरती और मनुष्य दोनों को नष्ट कर रही है. आज़ादी और न्याय के लिए लड़ने-बोलने वाले उमर ख़ालिद जैसे लोगों को जेल में डाल दिया गया है. ये आज़ादी की लड़ाइयां हैं. न्याय और बराबरी का एक भयमुक्त संसार आज़ादी का हासिल होना चाहिए था, लेकिन इस समय में तो यह संभव नहीं दिखता.
मनुष्य की मुक्ति और उसके दुखों के अंत के लिए अबरों और जबरों की ये लड़ाई चलती रहेगी. हार और असफलता इसके पड़ाव हो सकते हैं लेकिन मंज़िल नहीं. वहीं से नए लोग आते रहेंगे और लड़ाई को माथे पर ढोकर और आगे ले जाएगें. हम यहां असफल भी हो सकते हैं, भटक भी सकते हैं लेकिन न्याय की तरफ़ अन्याय की चकाचौंध से कहीं ज्यादा उजाला होता है. इस लड़ाई में सदियों के सताये यही हाशिये के जन, हमारे साथी होंगे. आज तमाम अस्मिताओं को एकजुट होकर एक स्वर में फासीवादी सत्ता से संघर्षरत रहने की आवश्यकता है.
जब सत्ता का मुंह एकदम से पूंजीवाद की तरफ़ हो जाता है तो हसदेव अरण्य को काटने जैसी विनाशकारी परियोजनाएं बनती है. आदिवसियों की रोज़ी-रोटी, जंगल-ज़मीन, भाषा-संस्कृति आज सब ख़तरे में है. आज प्रकृति के साथ मनुष्य की प्रकृति, उसकी मनुष्यता को भी बचाने की ज़िम्मेदारी तीव्र हो गई है. हरी-भरी धरती के साथ ही ऐसा मनुष्य भी हमारा हासिल होना चाहिए जो, लोकतांत्रिक मूल्यों से बना हो न कि सामंती और बाज़ारवादी अमानवीयता से.
हम न्याय और समता से बनी एक नई दुनिया का स्वप्न देखते मनुष्य हैं. मनुष्यता को सहेजता और अन्याय के लिए लड़ता मनुष्य ही हमारी दुनिया का मनुष्य होगा. प्रेम और साथ के लिए हम रचना में ऐसे मनुष्य की संरचना करेंगे जो पूर्ण मनुष्य होने के नए-नए अर्थ में उदघाटित होता रहे. जिसे आवाज़ देते हुए न्याय की ओर हम चल सकें.
तुम तो जानते हो मेरी मूल खोज मनुष्य ही है
उसे ही मैं मनुष्यों में पलट-पलट कर खोजती रहती हूं
एक वेदना भरी गहरी काली रात हमारे बीच खड़ी है
हमारे अपने जन हमसे ओझल होते जा रहे हैं
हमारे हाथ से मशालें छिटकती जा रही हैं
ऐसे में हम अपनों को हेर रहें हैं
पर हाथ हैं कि आत्मा तक पहुंचते ही नहीं
इतना घायल होता जा रहा है कलेजा कि अब गाढ़-अवसान सब एक जैसे लगते हैं
पर बचे होते प्रेम करने के दिन तो हम प्रेम की नई लोककथाएं रचते
इस बार सारी प्रेमिकाएं खिलंदड़ और दिलफ़रेब होतीं
और सारे प्रेमी सहज और शर्मीले
दुनिया को जीने लायक बनाने के स्वप्न से बनी कहानियों में हम गुड़-घी की तरह महकते
अपनों के दिलों को छोड़कर
थोड़ी-सी भी जगह हमारे किसी काम की नहीं साथी
तुम जानते हो हम कहानियों के पात्र नहीं थे
पर जाने कैसे इक नई कथा में हम अनायास आ रहे हैं.
यह आदिम लड़ाई चलती रहेगी. जब तक मनुष्य प्रकृति का दोहन करेगा, मुनाफ़ाखोर ढांचे से बना मनुष्य, मनुष्य का शोषण करता रहेगा. जब तक अल्पसंख्यक ,दलित, स्त्री दोयम दर्जे के नागरिक बने रहेंगे तब तक लड़ाई चलती रहेगी. और तब तक दुख और प्रतिरोध ही साहित्य का आधार होंगे. ‘पूर्ण मनुष्यत्व ‘ का हासिल ही साहित्य होगा.
जब समय घायल हो और चारों तरफ़ से चीख-पुकार सुनायी पड़ रही हो तो एक रचनाकार का काम है कि वो समय की पीड़ा,चीखों और रुलाइयों का वर्तमान-इतिहास-भूगोल, सब अपनी रचना में दर्ज करे. रचना में यही समकालीन हस्तक्षेप इतिहास के दस्तावेज बनेंगे. जनपक्षधर कला-साहित्य लेकर अब हमें वस्तुतः ‘जन ‘ तक पहुंचना होगा.
‘मनुष्य’ कविता ,कथा, कला और सौंदर्य से कहीं बड़ा होता है, लेकिन बात जब समय के संकट की हो तो उसकी संवेदना और कला पर ज़िम्मेदारी और भरोसा ज्यादा गहराता है. साथ ही रचनाओं के भीतर से उठती आवाज़ों की भी शिनाख़्त होगी क्योंकि अब समय के फ्रेम में यह सत्य बहुत भयावह रूप से उभरा है कि सत्ता की तरफ मुंह होते ही हर मनुष्य शोषक बन जाता है. यहां समझना होगा कि तमाम अस्मिताएं अंततः कैसे सत्ता के काम आ रही हैं.
आज जब सत्ता की ओर से सत्य की हत्या और झूठ की स्थापना के अलग-अलग माध्यम बनाये गए हैं और स्मृतियों और इतिहास को नष्ट करना राज्य के एजेंडे में है, तब यह कला और साहित्य की ज़िम्मेदारी है कि वो स्मृतियों, इतिहास और भाषाओं को घी की गगरी की तरह अपने अंतर में संजोए जिससे कि आने वाली पीढ़ी ज्ञान और मनुष्यता अर्जित करेंगे.
(रूपम मिश्र कवयित्री हैं.)
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