हमारे यहां सिंदूर के साथ पवित्रता से लेकर रूमान के भाव जुड़े रहे हैं. लखनऊ के एक कवि ठाकुर प्रसाद सिंह ने दशकों पहले लिखा था: ‘…सिंदूरी आभा से हुई लाल/ ब्याही हूं, क्वांरी मत समझो नन्दलाल.’ सिंदूर विशेषतः हनुमान की मूर्तियों पर और ब्याहताओं की मांगों पर, माथों पर सोहता रहा है. हाल ही में उसे एक नई जगह मिल गई: एक ग़ैर-जैविक राजनेता ने दहाड़कर बताया कि अब उसकी रगों में गरम लहू नहीं, सिंदूर बह रहा है.
हमारे एक महाकवि ग़ालिब ने एक सदी से अधिक पहले लिखा था: ‘रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल/जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?’ उसी ग़ज़ल में वह पहले कह चुके थे कि ‘तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े-गुफ़्तगू क्या है?’ तो नया विकसित अंदाज़ बता रहा है कि लहू की जगह सिंदूर ने ले ली है. अब उसे ही आंख से टपकना होगा.
जैसे बहुत सारे नौजवानों को काम या नौकरी के बजाय दंगा-हुड़दंग, निरपराधों को दिनदहाड़े मारने-पीटने का काम मिला हुआ है सो सिंदूर को भी नया काम मिल गया: रगों में बहने का, लहू के बजाय.
बहुत सारे लोग, जो रूपक नहीं समझते, राजनेता की गर्वोक्ति को अभिधा समझकर बताने में जुट गए हैं कि रगों में सिंदूर का बहना कितना ख़तरनाक और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है. कुछ लोग तो यह जिज्ञासा करने लगे हैं कि अगर रगों में अब नहीं बह रहा है तो वह लहू कहां गया? क्या सूख गया या कहीं और बहने लगा?
एक और कवि याद आए. जीवनलाल वर्मा विद्रोही, जो भोपाल आने के पहले नागपुर में मुक्तिबोध- मंडल के सदस्य रहे थे. हरिशंकर परसाई द्वारा जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘वसुधा’ में उनकी एक कविता की पहली पंक्तियां याद आईं:
कागभुसुण्डि गरुड़ से बोले –
हो लें अपनी दो-दो चोचें.
चलो किसी मंदिर में चलकर,
प्रतिमा का सिंदूर खरोंचें.
स्पष्ट है कि सिंदूर की महिमा अपार है: ‘केसव, कहि न जाई का कहिये.’
इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता
‘आलोचना’ पत्रिका के कविता विशेषांक का पहला खंड प्रकाशित हुआ है. उसके संपादक आशुतोष कुमार ने एक लंबे संपादकीय में आज की कविता का विशद विश्लेषण किया है. उनकी एक स्थापना है: ‘वह बुनियादी तौर पर सत्ताओं को सवालों से घेरती छापामार कविता है.’
यह अलग विचार का विषय है कि पत्रिका में प्रकाशित कविताएं किस हद तक इस स्थापना का सत्यापन करती हैं. एकाध को छोड़कर सभी संकलित कवियों ने कविता के बारे में वक्तव्य भी दिए हैं जो उनकी कविताओं के साथ प्रकाशित किए गए हैं.
विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं: ‘स्त्रियां अब अधिक स्वतंत्र हैं. वे रचना के ज़रिये अपने को अभिव्यक्त अधिक कर रही हैं. कवि स्त्रियां अब अधिक हैं. वे कविता को नए आसमानों में ले जा रही हैं.’
मोहन मुक्त का मंतव्य है कि ‘… साथ ही इन नई लोकेशनों वाली हिंदी कविता का एक संकट इसमें आत्मालोकन और आत्मालोचन का अभाव, जिसके चलते इसमें बहुत जल्दी ठहराव आ जाता है. सम्यक आलोचना के अभाव में कोई भी कविता अपनी जीवन्त संभावनाओं को गंवा देती है’.
विहाग वैभव सोचते हैं कि ‘यही कारण है कि हिंदी कविता में कलावादी और चमत्कृत कर देने की मंशा से लिखी गई की मांग-आपूर्ति बढ़ती गई है. बहुत बड़ी संख्या में हिंदी कवियों के पास कहने के लिए ऐसी कोई बात नहीं रह गई है जो सामान्य जनता के किसी काम आ सके…. इक्कीसवीं सदी की अब तक की कविता का बड़ा हिस्सा सत्ता-स्वर से मिला हुआ है.’
कल्लोल चक्रवर्ती कहते हैं कि ‘फिर दूसरे समाजों की तुलना में हिंदीभाषी समाज … ज़्यादा कट्टर, ज़्यादा परंपरावादी है. इस कारण भी हिंदी कविता में प्रतिरोध सहज नहीं है. इसके बावजूद अनेक कवि ख़तरा उठाकर विरोध दर्ज़ करा रहे हैं…’
पराग पावन का मत है कि ‘लोकप्रियतावाद और संख्याबलवाद ने एक ऐसी धुंध निर्मित की है जिसमें वास्तविक कविता के संकट बढ़ते जा रहे हैं. इसीलिए इक्कीसवीं सदी की कविता को सबसे अधिक आवश्यकता सच्ची आलोचना की है… आज की कविता को अपना आलोचक पैदा करना होगा.’
अर्चना लार्क नोट करती हैं कि ‘इन दिनों एक ‘विनम्र दंभ’ विकसित हुआ है वह भाषा में तैरता हुआ नहीं दिखेगा लेकिन सतह पर पैठ जमाये बैठा रहेगा.’
अनामिका अनु कहती हैं कि ‘किसी समय की परिस्थितियों, आशाओं और आकांक्षाओं की संयमित और सुन्दर अभिव्यक्ति कविता में होती ही है.’
पार्वती तिर्की का ख़्याल है कि ‘इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता अपनी लोकतांत्रिकता के लिए खुद को गतिशील और संघर्षशील बनाती दिख रही है.’
रवि प्रकाश कुछ तीख़ेपन के साथ कहते हैं कि ‘कविता में शास्त्रीयता का आग्रह, आधुनिक भावबोध के लिए पौराणिक आलंबन, रीतिकालीन भाव और सौन्दर्यबोध का समकालिक कविता में पुनरुत्पादन, … किसी भी क़िस्म की राजनीतिक संस्कृति या चेतना का विरोध करते हुए अधिकतम निरपेक्ष मानववाद, कविता के नाम पर सूक्ति और नीति वचन का निर्माण, कविता के नाम पर उपदेशात्मक मुहावरे गढ़ना आदि कुछ ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जिन्होंने कविता ही रचना-प्रक्रिया, संरचना और उसके भीतर के कवि के आत्मसंघर्ष के प्रश्न को लगभग ख़त्म कर दिया है.’
फ़रीद ख़ाँ कहते हैं कि ‘…उसी तरह यह कहा जा सकता है कि जन सरोकारों की कविताएं लिखने और अपने व्यक्तिगत समीकरणों के आधार पर कविताएं लिखने में एक समान ऊर्जा ख़र्च होती है. इसलिए क्यों न जन-सरोकारों की ही कविताएं लिखी जाएं.’
जमुना बीनी को लगता है कि ‘इस समय सबसे बड़े संकट की बात की जाए तो वह है– अभिव्यक्ति का संकट.’
कमल जीत चौधरी का कथन है कि ‘हिंदी कविता के सामने फ़ासीवादी शक्तियां एक बड़ी चुनौती हैं. उससे बड़ी चुनौती है कि आज ‘बिग ब्रदर इज़ वाचिंग यू’ की भाषा भी जनभाषा हिंदी ही है, और कवियों को इसी हिंदी में उसे सबके सामने लाने का कार्य करना है.’
मृत्युंजय की व्याख्या है कि ‘दमन के रोज़मर्रा के आख्यान इन कविताओं बहुत साफ़ शब्दों में सुने जा सकते हैं. इन कविताओं ने नई भाषा, नए सौंदर्यबोध और ‘यहां से देखो’ के नए-नए बिंदु विकसित किए हैं. इससे न सिर्फ़ कविता के प्रतिमानों का विस्तार हुआ है बल्कि एक नया पाठक वर्ग भी हिंदी कविता के दायरे में दाखि़ल हुआ है.’
अविनाश मिश्र कहते हैं कि ‘इस कालावधि में जिन कवियों को ठीक से चीन्हा गया है, उनके पास राजनीतिक सजगता के साथ संकटों को पहचानने का पर्याप्त विवेक है. यह अलग बात है कि आत्ममुग्धता को महत्वाकांक्षा प्रायः उस विवेक को धुंधला कर देती है.’
सपना भट्ट मानती हैं कि जितना राजनीतिक प्रतिरोध समाज में मौजूद है उससे कम हिंदी कविता में मौजूद नहीं है और जैसा अराजनीतिक हमारा समाज हुआ है उतनी ही अराजनीतिक हमारी कविता भी हुई है.’
अनामिका के लिए ‘इक्कीसवीं सदी की कविता की यही पहल है. गली-मुहल्ले की भाषा में हृदय की बात रख रहे हैं वे सब जिन्हें आज तक बोलने नहीं दिया गया.’
सविता सिंह का मत है कि ‘सबको अवसर मिले अपना बेहतर पाने का, जीवन की ऐसी संपदाओं से पूरित हो पाने का कविता आखि़र तक इंतज़ार करती है जीवन के रहस्य को समझने का, उसकी पूर्णता में खुद के अभिव्यक्त हो पाने का.’
शुभा को लगता है कि ‘नारीवाद के नाम पर एक ऐसा रुझान भी मौजूद है जो दक्षिणपंथ का समर्थक है. दुनिया में इस रुझान को ‘सांस्कृतिक नारीवाद’ के नाम से पहचाना गया है. तमाम स्त्री लेखन को नारीवाद के खाते में डालने का रुझान भी मौजूद है.’
मदन कश्यप का कहना है कि ‘ऐसे में कविता जिसका मूल धर्म है, मानवीय संवेदना के विस्तार के माध्यम से बृहत्तर मनुष्यता को स्थापित करना, उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह खंडित संवेदनाओं वाले समाज को कैसे संबोधित करे. आज की कविता अपने-अपने स्तर से इस चुनौती से जूझ रही है.’
कला को राजनीति का उच्चतम रूप बताते हुए देवीप्रसाद मिश्र का मन्तव्य है कि ‘हमारे पास बहुत सारे विकल्प नहीं हैं. फ़ासीवाद उन्माद और युयुत्सा के सामने लिबरल लेथार्जी की पस्ती साफ़ है. लेकिन जब कुछ नहीं होता तो दिशा होती है. निर्विकल्प होने के इस अंधेरे दौर में हम निर्विकल्प होने की महत्ता को समझें.’
इन बीस कवियों के मंतव्यों को पढ़कर यह धारणा बनती है कि उनमें ये प्रायः किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा है जो पिछले लगभग पचास वर्षों में उनसे पहले के कवियों ने अपने ढंग से न कहा हो. आज की कविता का कोई समेकित दृश्य नहीं उभरता क्योंकि ऐसा दृश्य हिंदी कविता की लगभग जन्मजात जैविक बहुलता के कारण हो ही नहीं सकता.
कुछ कवि राजनीतिक चेतना और विवेक का आग्रह कर रहे हैं तो उसके बरक़्स यह भी कहा जा रहा है कि आज कविता उतनी ही अराजनीतिक है जितना कि हिंदी समाज. फ़ासीवाद आदि घिसेपिटे पदों से काम चलाया जा रहा है और उन शक्तियों का नाम तक नहीं लिया जा रहा है जो समाज-बुद्धि-सृजन-ज्ञान-असहमति, प्रश्नवाचकता-विकल्प की खोज को नष्ट करने के अभियान में लगी हुई हैं. जो कुछ वैचारिक कहा जा रहा है वह चिरपरिचित आलोचना की भाषा में ही है, जिससे यह संदेह होता है कि कुछ ख़ास नया नहीं है जिसके लिए नई आलोचना-भाषा की दरकार हो.
बहुत सारे कवि, हस्बे मामूल, कविता का अतिपाठ कर रहे हैं. फ़ैज़ ने कभी कहा था: ‘न उनकी रस्म नई, न अपनी रीति नई.’ हो सकता है यह सब मेरी बूढ़ी आंखों की तंगनज़री और कुंदज़हनी का इज़हार भर हो!
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
