भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रशासित अयोध्या नगर निगम ने गत दिनों अयोध्या की लुप्तप्राय तिलोदकी गंगा (जिसको तीन साल पहले पुनर्जीवित करके शहर को जलभराव से मुक्त कराने का दावा कर रहा था) नदी को नाला बताकर ऐसा बवंडर खड़ा कर दिया कि भाजपाइयों से अभी भी कुछ कहते-सुनते नहीं बन रहा.
यह मानने के कारण हैं कि और दिन होते, निगम पर किसी अन्य पार्टी का कब्जा होता तो अब तक ये भाजपाई इस मामले को लेकर आसमान सिर पर उठा चुके होते. ‘धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने’ को लेकर उनकी असहनशीलता अपनी कोई सीमा मानने को तैयार नहीं हो रही होती. लेकिन फिलहाल, बाजी पलटी हुई है. ठेस पहुंचाने की शिकायतों ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए दूसरे मुंह तलाश लिए हैं और भाजपाई हैं कि अपने मुंह ही नहीं खोल पा रहे. न शिकायतों के समर्थन में, न ही विरोध में, जबकि कई लोग इसको वक्त का फेर बताकर मजे ले रहे हैं.
बहरहाल, आगे बढ़ने से पहले तिलोदकी गंगा के बारे में जान लेते हैं. तीन साल पहले, साल 2022 में इसके पौराणिक महत्व के मद्देनज़र इसको पुनर्जीवित करने से जुड़ी कवायद व कोशिशें खूब चर्चा में रही थीं.
पौराणिक मान्यताओं में विश्वास करने वालों की मानें, तो राजा राम ने अपने समय में सिंधु देश के घोड़ों के पानी पीने के लिए दूसरी सिंधु नदी के समान इसका ‘निर्माण’ कराया और ‘स्थापित’ किया था. ये विश्वासी बताते हैं कि इस नदी का पानी काले तिल के रंग का हुआ करता था, इसलिए इसका नाम ‘तिलोदकी गंगा’ पड़ गया.
1905 के फैजाबाद जिले (जिसमें तब अयोध्या स्थित थी) के गजेटियर में इसका जिक्र जिले के मंगलसी नामक स्थान से निकलने वाली छोटी नदी के रूप में किया गया है, जिसे तिलई, तिलोई या तिलंग कहा जाता था और यह अयोध्या के पूर्व में सरयू की मुख्य धारा में मिलकर मंगलसी के पूर्व व हवेली अवध के पश्चिम से होकर बहती थी.
कई अन्य विवरण यह भी बताते हैं कि यह नदी वर्षा ऋतु में महज दो महीने प्रवाहित हुआ करती थी. इन दो महीनों में युगल सरकार यानी सीता व राम अयोध्या स्थित मणि पर्वत की तलहटी में झूलनविहार व बाग में रात्रि विश्राम किया करते थे. अन्य ऋतुओं में वे अन्यत्र वनों में बिहार व निवास की लीला संपन्न करने चले जाते तो, कई आस्थावान बताते हैं कि यह नदी उनका वियोग सह नहीं पाती थी और सूख जाती थी.
कुछ लोगों द्वारा यह भी कहा जाता है कि यह नदी पंडितपुर गांव में ऋषि रमणक की तपस्या से उद्भूत हुई और लंबे अंतराल में एकदम से सूखकर पौराणिक विवरणों व जनस्मृतियों भर में ही रह गई.
अयोध्या के चर्चित साहित्यकार यतीन्द्र मिश्र ने आठ साल पहले 2017 में ‘शहरनामा फैजाबाद’ नामक पुस्तक संपादित की तो उसमें इस नदी के बारे में यह विवरण दर्ज किया था:
मूलरूप में इस नदी का अस्तित्व आज समाप्तप्राय है. केवल प्रतीकात्मक अर्थों में इसका अंकन करना हो तो मणि पर्वत, यज्ञवेदी के पास पौराणिक रूप से मुखर होने के अतिरिक्त इसकी सूक्ष्म उपस्थिति को इन दोनों ही स्थानों पर एक लंबी पतली सूख चुकी धारा के रूप में आसानी से देखा जा सकता है. इसका विस्तार क्षेत्र अयोध्या के पंचकोसी परिक्रमा मार्ग से चौदहकोसी परिक्रमा मार्ग की ओर जाने पर इसी मार्ग के समानांतर मिलता है, जो पूरी तरह खेतों में बदल चुका है और नदी तो क्या छोटे तालाब के रूप में भी दिखाई नहीं देता.
‘अयोध्या के प्राचीन गौरव’ की बहाली!
गौरतलब है कि 2017 में लगभग यही समय था, जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार आई और उसने ‘अयोध्या के प्राचीन गौरव’ की बहाली पर काम शुरू किया. तब कई हलकों में तिलोदकी गंगा को पुनर्जीवन देने की ‘जरूरत’ भी कुछ ज्यादा ही जताई जाने लगी. कहा जाने लगा कि अयोध्या में हुए अंधाधुंध निर्माणों व अतिक्रमणों ने पहले अयोध्या की इस गंगा का रूप बदला, फिर अस्तित्व ही समाप्त कर डाला और अब इसे फिर से खोज निकालने के भगीरथ प्रयत्नों के बगैर अयोध्या में त्रेता यानी भगवान राम के युग के स्वरूप को साकार करने का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का स्वप्न साकार नहीं हो सकता. क्योंकि तिलोदकी गंगा के बगैर अयोध्या से होकर बहने वाली सरयू, गोमती, तमसा, बिसुही और कल्याणी नदियां अधूरी लगती हैं.
इसके थोड़े अरसे बाद जिला अनुश्रवण समिति की एक बैठक में अयोध्या के जिलाधिकारी द्वारा इस नदी का पुनरुद्धार शुरू कराने की घोषणा की गई. सरकारी महकमे सक्रिय हुए और राजस्व अभिलेख खंगालने के बाद सर्वे कर इसका रूट साफ किया गया तो पाया गया कि यह नदी लगभग 47 किलोमीटर लंबी हुआ करती थी. इसके रूट की कई झीलों और तालाबों की बिना पर यह दावा भी किया गया कि तत्कालीन फैजाबाद जिले की दो तहसीलों सदर और सोहावल से होते हुए यह नदी सरयू में जा मिलती रही है.

यह दावा करने वाले यह दावा भी करते थे कि 47 किलोमीटर के इस नदी के मार्ग में इसको पुनर्जीवन देने में बाधक सबसे ज्यादा अतिक्रमण व अवरोध सदर तहसील के उस क्षेत्र में ही हैं, जो अयोध्या नगर निगम की सीमा में है. तब अयोध्या नगर निगम ने कहा था कि उसने इन अतिक्रमणों व अवरोधों से जूझते हुए चार किलोमीटर तक तिलोदकी नदी का स्वरूप उजागर कर दिया है और उसमें पानी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए उसको आसपास के कुंडों एवं तालाबों से जोड़ रहा है. इस चार किलोमीटर में रामायण काल के आठ हजार पौधे रोपने की भी उसकी ‘योजना’ थी.
इसके अलावा सोहावल ब्लॉक में पंडितपुर गांव में उद्गम स्थल से भी इस नदी का स्वरूप ‘उजागर’ करने का दावा किया जा रहा था, जहां यह एक झील से होते हुए आगे का रास्ता तय करती है.
यह सब चल ही रहा था कि अक्टूबर, 2022 में नगर निगम के एक ट्वीट ने खासी खलबली पैदा कर दी थी. दरअसल, हुआ यह था कि एक ओर भारी बारिश के चलते आई भीषण बाढ़ से अयोध्या के दर्जन भर मोहल्ले जलमग्न थे और मकानों की निचली मंजिल में रहने वाले लोग अपने घरों में पानी भर जाने से बुरी तरह त्रस्त थे, तो दूसरी ओर निगम के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक ट्वीट में कह दिया गया था कि तिलोदकी गंगा के उद्धार से नगर को जलभराव से मुक्ति मिल गई है.
प्रदेश सरकार और उसके कई बड़े अधिकारियों को टैग कर इस ट्वीट में लिखा गया था: संवरती अयोध्या!!! अयोध्या नगर निगम द्वारा पौराणिक तिलोदकी गंगा के जीर्णोद्धार के फलस्वरूप विगत कई वर्षों की जलभराव की समस्याओं का हो रहा स्थायी समाधान. यह तब था, जब लोग जमीन पर कोई उद्धार या समाधान नहीं देख पा रहे थे.
वरिष्ठ पत्रकार इंदुभूषण पांडेय की मानें, तो उक्त ट्वीट का एक ही मतलब था. यह कि तिलोदकी गंगा के पुनर्जीवन के नाम पर खेल किया जा रहा था और सच्चाई यह थी कि अयोध्या के रानोपाली क्षेत्र में भूमाफिया व तहसील के काकस ने मिलकर तिलोदकी गंगा की भूमि पर बना ली गई दुकानों व मकानों आदि के विरुद्ध शिकायत के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जांच के आदेश भी दे रखे थे.
फिर भी निगम द्वारा दावा किया जा रहा था कि नदी पुनर्जीवित कर दी गई है और लोगों को उसका लाभ मिलने लगा है, जबकि सदर तहसील के उपजिलाधिकारी रामकुमार शुक्ला कह रहे थे कि कई क्षेत्रों में उक्त शिकायत की जांच चल रही है.
तिलोदकी नदी बनी तिलोई नाला
वर्तमान में लौटें तो पिछले दिनों इससे जुड़ा नया बखेड़ा तब शुरू हुआ, जब नगर आयुक्त नगर निगम की परिधि में आने वाले नालों की सफाई का वर्षा पूर्व निरीक्षण करने निकले और उसके सिलसिले में अपनी फेसबुक पोस्ट में निगम को तिलोदकी नदी के पुनर्जीवन से जुड़ी सारी बातें भूल गईं!
उसने इस नदी को तिलोई नाला बताते हुए लिखा: नगर आयुक्त श्री जयेन्द्र आईएएस द्वारा वर्षा ऋतु के दृष्टिगत नगर क्षेत्र में संचालित विशेष नाला सफाई अभियान के अंतर्गत महोबरा बाईपास के समीप स्थित तिलोई नाले के सफाई कार्यों का स्थलीय निरीक्षण किया गया.

जिन लोगों को ‘पुनर्जीवित की जा रही’ तिलोदकी नदी को यों एक झटके में तिलोई नाला बता दिए जाने से झटका लगा, वे यह कहते हुए निगम की लानत-मलामत करने पर उतर आए कि इससे सिद्ध होता है कि उसके पुनर्जीवन की कवायदें कागजी ही थीं, तो निगम ने अपने बचाव की कोई और राह न पाकर संबंधित फेसबुक पोस्ट्स को डिलीट कर दिया. लेकिन तब तक बात बहुत दूर तक जा चुकी थी.
इस बीच ‘मैं भी जागरूक’ अभियान के संयोजक सामाजिक कार्यकर्ता अभिषेक सावंत ने प्रदेश के नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव और मुख्यमंत्री पोर्टल को पत्र लिखकर नदी को नाला बताये जाने की आलोचना की है, क्योंकि उनके अनुसार वह रामायणकालीन होने के साथ हर वर्ष भाद्रपद की अमावस्या को उसमें स्नान की धार्मिक परंपरा से भी जुड़ी हुई है.
वे बताते हैं कि इस नदी के अस्तित्व के अन्य साक्ष्य तो हैं ही, 1902 में अयोध्या के धार्मिक व सांस्कृतिक स्थलों की पहचान व संरक्षण के लिए गठित अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा ने विभिन्न स्थलों की पहचान के लिए वहां पत्थर लगवाये तो एक पत्थर पर इस नदी का उल्लेख भी किया था. उन्होंने आश्चर्य जताया है कि वर्ष 2021–22 में जो नगर निगम इसको पुनर्जीवित कर रहा था, वही अब इसे नाला कह रहा है. इसके बावजूद कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल कथित रूप से गत मार्च में इस नदी को विकसित करने को भी कह चुका है और उसकी एक समिति इसका निरीक्षण भी कर गई है.
दूसरी और स्थानीय डिजिटल कंटेंट क्रिएटर ओमप्रकाश सिंह कहते हैं कि पहले अयोध्या विकास प्राधिकरण और भू माफियाओं के गठजोड़ ने तिलोदकी नदी के उद्धार के बहाने खुद को तार लिया है और अब नगर निगम इसको नाला बताने पर उतर आया है, जो दिन को रात और रात को दिन बताने जैसा है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
