1 जून, 2025 को हरियाणा लोक सेवा आयोग द्वारा सहायक प्राध्यापक (हिंदी) की परीक्षा आयोजित की गई. इस परीक्षा के लिए तैयार किए गए प्रश्न-पत्र को देखकर किसी भी व्यक्ति का भरोसा शिक्षण संस्थाओं से उठ जाएगा.
हिंदी के इस प्रश्न-पत्र में इतनी गलतियां हैं कि इसे देख कर यह यकीन नहीं होता कि इस प्रश्न-पत्र को किसी राज्य की एक संवैधानिक संस्था द्वारा तैयार करवाया गया है. इस प्रश्न-पत्र में कई स्थानों पर लेखकों और रचनाओं के गलत नाम, वाक्यों में गलतियां, आधे-अधूरे वाक्य विन्यास/ उद्धरण, गलत प्रश्न, विकल्पों में त्रुटियां और अन्य तथ्यपरक गलतियों की भरमार है.
अभ्यर्थियों के भारी विरोध के कारण आयोग ने अंततः इस परीक्षा को रद्द कर दिया है और जल्द ही दोबारा परीक्षा करवाने को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया है.
मसलन, इस प्रश्न-पत्र में भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘भारत-दुर्दशा’ से तीन प्रश्न पूछे गए. पर तीनों प्रश्नों में ‘भारत दुर्दशा’ को ‘भारद्वाजाश्रम’ टाइप किया गया है. ‘परीक्षा गुरु’ उपन्यास को ‘परिता गुरु’ लिखा गया है. ‘आषाढ़ का एक दिन’ से पूछे गए एक प्रश्न के विकल्प में इस नाटक के एक पात्र ‘विद्रुप’ के नाम को ‘विडप’ लिख दिया गया है.
ऐसी त्रुटियों के और भी कई उदाहरण हैं, जैसे आलस्य को हास्य, अनिमा को अतिमा, डॉ. ममता को डॉ. मल्लिका, रौतहट स्टेशन को रोहित स्टेशन, दंतवीणोपदेशाचार्य को धीरमोपदेशाचार्य, लतिका को नतिका, गिरीश नेगी को हरीश नेगी, चीफ की दावत को चीड़ की दावत, चन्द्रकला को चंद्रिका, दा साहब को दादा साहब, राउलवेल को राउतबेल, भारत दुर्दैव को भारद्वाज टाइप किया गया है.

इसके अलावा, पाठ्यपुस्तकों के कई उद्धरणों को गलत लिखा गया है. मसलन ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती…’ को ‘धमाधर्म दंभी श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ लिखा गया है. इसी तरह से ‘उतारोगे अब कब भू-भार, बार-बार क्यों कह रखा था लूँगा मैं अवतार’ को ‘उबारोगे अब कब भू-भार, बार-बार क्यों कह रखा था दूँगा मैं अवतार’ टाइप किया गया है.

इसके साथ ही इस प्रश्न-पत्र में कई प्रश्न ऐसे पूछे गए हैं जो एक सहायक प्राध्यापक के चयन के लिहाज से स्तरहीन और अतार्किक हैं. उदाहरण के तौर पर, ‘मैला आँचल उपन्यास में वासुदेव जी रेलवे स्टेशन पर ‘जाति किताब’ पुस्तक कितने पैसे में खरीदते हैं?’ (यहां ‘जाति किताब’ भी ग़लत टाइप किया हुआ है)

हिंदी के इतने प्रसिद्द और कालजयी उपन्यास से आयोग द्वारा इस तरह के प्रश्न अभ्यर्थियों से पूछना कितना तर्कपूर्ण है? क्या यह प्रश्न और इसका उत्तर अभ्यर्थियों की मैला आँचल उपन्यास को लेकर वैचारिक या सैद्धांतिक समझ को पुष्ट करता है? क्या प्रोफ़ेसर की नौकरी लेने के लिए किसी उपन्यास या कहानी की कथावस्तु, उनके चरित्र और उनकी विशेषताएं एवं उस रचना में निहित सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक उद्देश्यों पर अपनी समझ न बना कर सिर्फ उसके छोटे-छोटे गैरज़रूरी तथ्यों को याद करना पड़ेगा?
यही नहीं, आयोग द्वारा ‘हिंदी’ विषय के तय पाठ्यक्रम के बाहर से कई प्रश्न पूछे गए हैं जो साफ़ तौर से प्रश्न-पत्र बनाने वाले की लापरवाही को दिखाता है.
इस प्रश्न-पत्र को देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि राज्य की इतनी बड़ी संस्था और इसके पदाधिकारी कितने लापरवाह और अपने कर्तव्यों के निर्वहण में अयोग्य हैं. यह भर्ती 2024 में आई थी. इसकी परीक्षा भी पिछले वर्ष होने वाली थी, पर यह परीक्षा इतने समय बाद आयोजित की गई है. इतना समय लेने के बावजूद आयोग द्वारा इस तरह के प्रश्न पत्र अभ्यर्थियों को उपलब्ध करवाना यह दिखाता है कि आयोग अपने कर्तव्यों से किस हद तक च्युत हैं.
(सूरज राव दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी (हिंदी) कर रहे हैं.)
