नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार स्त्री-कल्याण को लेकर बहुत वायदे करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से बहुत दूर है. सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना’ के तहत पिछले तीन वित्तीय वर्षों (2021-22 से 2023-24) में स्वीकृत बजट का करीब दो तिहाई यानी 63% हिस्सा खर्च ही नहीं हुआ है.
यही नहीं, इस योजना के तहत राशि का आवंटन भी कम होता गया है. जहां अन्य योजनाओं की आवंटित राशि में बढ़ोतरी होती है, इस योजना की राशि में 56.25% की कटौती कर दी गई. 2022-23 में योजना के लिए जहां 40,000 लाख रुपये रुपये स्वीकृत किए गए थे, वहीं अगले ही वर्ष यानी 2023-24 में यह घटकर 17,500 लाख रुपये रह गया — यानी करीब 56% की कटौती. वित्त वर्ष 2024-25 में फिर से कमी हुई, और कुल 16,716.67 लाख का बजट स्वीकृत किया गया.
यह उत्तर प्रदेश सरकार की प्रमुख सामाजिक कल्याण योजना है, जिसकी शुरुआत 25 अक्टूबर, 2019 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने की थी. इस योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य में बालिकाओं के जन्म से लेकर उच्च शिक्षा तक उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करना है, जिससे कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह और बालिकाओं के प्रति सामाजिक भेदभाव जैसी कुप्रथाओं को रोका जा सके.
आज लोक भवन, लखनऊ में ‘मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना’ के शुभारंभ कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल @anandibenpatel एवं मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी के साथ भाग लिया.
यह योजना बेटियों को शैक्षणिक रूप से सशक्त बनाने एवं उनके मान-सम्मान को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी. pic.twitter.com/VsS5q514Az
— Smriti Z Irani (@smritiirani) October 25, 2019
योजना छह चरणों में वित्तीय सहायता प्रदान करती है – जन्म, टीकाकरण, और कक्षा 1, 6, 9 में प्रवेश तथा स्नातक या डिप्लोमा कोर्स में नामांकन जैसे विभिन्न पड़ावों पर लाभार्थी परिवारों को एकमुश्त धनराशि दी जाती है. अंतिम चरण में, कॉलेज या डिप्लोमा में नामांकित छात्राओं को 7,000 रुपये तक की सहायता मिलती है. लाभ केवल उन्हीं परिवारों को मिल सकता है जिनकी वार्षिक आय 3 लाख रुपये से कम हो और जिनके अधिकतम दो ही संतान हों. कुछ विशेष मामलों में जुड़वां बच्चियों को अपवाद स्वरूप लाभ मिलता है.
उत्तर प्रदेश में 3 लाख रुपये वार्षिक आय से कम वाले परिवारों का आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं, हालांकि, नीति आयोग के मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स (एमपीआई) के अनुसार, राज्य की लगभग 22.93% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है.
अगस्त 2022 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य की जनसंख्या 25 करोड़ बताई थी. इस हिसाब से प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे आने वाले लोगों की संख्या 5.73 करोड़ हो सकती है.

स्वीकृत राशि खर्च नहीं हो रही, बजट घटता जा रहा
‘सूचना अधिकार अधिनियम-2005’ के तहत दायर एक आरटीआई के जवाब में पता चला है कि इस योजना के लिए आवंटित बजट का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं हो पाया है. 8 मई, 2025 को आरटीआई के जवाब में महिला कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक:
वित्त वर्ष 2021-22 में 20,000 लाख रुपये स्वीकृत हुए थे, लेकिन खर्च केवल 8,092.94 लाख रुपये हुए.
वित्त वर्ष 2022-23 में 40,000 लाख रुपये स्वीकृत हुए, जिसमें से 7,516.60 लाख रुपये खर्च हुए.
वित्त वर्ष 2023-24 में 17,500 लाख रुपये स्वीकृत हुए और खर्च केवल 7,467.18 करोड़ ही हुआ.
ध्यान दें कि 2023-24 में मंज़ूर बजट अचानक बहुत कम (17,500 लाख रुपये) हो गया, लेकिन खर्च पिछले वर्षों के बराबर ही रहा. 2022-23 में सबसे ज़्यादा बजट था (40,000 लाख), लेकिन खर्च केवल 7,516.60 लाख हुआ.
इस प्रकार कुल 61,750 लाख रुपये स्वीकृत हुए लेकिन खर्च हुए 23,076.72 लाख रुपये, यानी केवल 37.37%.
हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से दावा गया किया है कि वित्त वर्ष 2024-25 में कन्या सुमंगला योजना के लिए कुल 16,716.67 लाख का बजट स्वीकृत किया गया था. इस बजट में से मार्च 2025 तक 16,450.05 लाख खर्च किए जा चुके हैं.
प्रस्तावित बजट में भी 42% की गिरावट
स्वीकृत बजट के साथ-साथ इस योजना के प्रस्तावित बजट में भी लगातार गिरावट देखी जा रही है. वित्त वर्ष 2021-22 में इस योजना के लिए प्रस्तावित बजट 1,200 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 तक घटकर 700 करोड़ रुपये रह गया है यानी गत पांच वित्त वर्ष में बजट में 500 करोड़ रुपये (करीब 42%) की कमी आ गई है.

प्रचार पर कितना खर्च हुआ, सरकार ने नहीं बताया
आरटीआई आवेदन में योजना के प्रचार-प्रसार पर हुए खर्च का भी विवरण मांगा गया था, लेकिन महिला कल्याण विभाग ने इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी. यह हाल तब है जब योजना का प्रचार प्रमुखता से किया जाता रहा है और मुख्यमंत्री स्वयं इसका उल्लेख अपने भाषणों में करते रहे हैं.
द वायर हिंदी ने महिला कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश से संपर्क कर योजना से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों पर विभाग का पक्ष जानने की कोशिश की. आरटीआई के जवाब पर हस्ताक्षरकर्ता और विभाग के उप निदेशक आशुतोष कुमार सिंह के सवाल भेजे गए, जिनमें योजना के लिए स्वीकृत राशि खर्च न होने के कारण, प्रचार-प्रसार पर हुए खर्च का विवरण, सामाजिक समूहों के अनुसार लाभार्थियों का वर्गीकरण और योजना के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों से जुड़े बिंदु शामिल थे. लेकिन समाचार लिखे जाने तक इन सवालों का कोई जवाब नहीं मिला.
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
द वायर हिंदी से बातचीत में अर्थशास्त्री और आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर रीतिका खेरा कहती हैं, ‘कल्याणकारी योजनाओं में बजट का पैसा पूरी तरह से खर्च न होना नई बात नहीं है, हालांकि यह दुख की बात ज़रूर है, क्योंकि इस तरह के समर्थन की लोगों को, खासकर महिलाओं को, सख्त जरूरत है. उदाहरण के लिए केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का बजट जरूरत से बहुत कम रहा है और यह भी पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया; दूसरी ओर गर्भवती महिलाओं को यदि यह समर्थन प्राप्त होता तो वह अपनी गर्भवती और शिशुवती अवस्था ने के दौरान की खास जरूरताओं को पूरा कर सकतीं.’
जनकल्याणकारी योजनाओं को केंद्र में रख शोधपरक पुस्तक ‘रेवड़ी या हक़’ लिखने वाली प्रोफेसर खेरा आगे कहती हैं, ‘जब नई योजना लागू होती है, उसके बारे में लोगों को जानने में समय लगता है – उदाहरण के तौर पर, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना में हमने देखा है कि पहले 1-2 सालों तक जानकारी के अभाव के कारण बजट कम उसे हुआ. लेकिन उत्तर प्रदेश की योजना के तीसरे साल तक तो इसका उपयोग बढ़ जाना चाहिए. पीएमएमवीवाई बजट कम यूटलाइज़ होने कि एक बड़ी वजह रही कि लाभ प्राप्त करने के लिए महिलाओं को बहुत कठिन पेपरवर्क से जूझना पड़ता है. उत्तर प्रदेश की योजना में भी यह हो सकता है.’
