रचनाकार का समय: कई सारे समय मिलकर मुझे रचते हैं…

साहित्य जिंदगी को, सच्चाई को कुछ अधिक होशमंद, अधिक मर्यादाबद्ध होकर, उनके कुरूपतम रूप में, हर किस्म के धोखे और भ्रम का प्रवंचना का पर्दा हटाकर खुली आंखों से दिखा देता है. इस रास्ते पर न दर्द से मुक्ति मिलती है, न शांति. रचनाकार का समय में आज पढ़ें अप्रतिम कथाकार योगेंद्र आहूजा का आत्म-कथ्य.

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योगेंद्र आहूजा (दाएं) (फोटो साभार: फेसबुक/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

‘Time is the substance I am made of.’

पिछली सदी के सबसे बड़े साहित्यिक व्यक्तित्वों में से एक, आर्हेंतीनी कवि-लेखक बोर्गेस का कथन है. हम सभी, मनुष्य, अन्य प्राणी, वस्तुएं और कृतियां, समस्त चराचर सिर्फ अपने समय की निर्मिति नहीं, जैसा कहा जाता है – हम ‘समय’ से निर्मित भी हैं. हम सभी समय नाम के पदार्थ से बने हैं, किसी एक नहीं, बल्कि तमाम समयों से. कितने ही ‘समय’ हैं जो मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं, एक साथ मेरे भीतर जीवित हैं. अनंत और अनश्वर ‘काल’ का यह क्षणभंगुर टुकड़ा, जो मेरे हिस्से में आया है, मेरा निजी समय, मेरी अपनी ज़िंदगी के पल और साल … सिर्फ उतना ही नहीं – कितने ही ‘विगत-काल’, समूचा अतीत, मध्य-युग और उसके पहले का समय, ऐतिहासिक, मिथकीय, यहां तक कि ‘प्राक-एतिहासिक’ … वे सब मेरे भीतर मौजूद हैं. शायद ऐसे भी अनेक समय हैं, जिनका मुझे सचेत बोध नहीं.

पिछली सदी के मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग बता चुके हैं कि

इंसान के अवचेतन में सिर्फ उसके निजी अनुभव और यादें नहीं, पूरी मनुष्यता के अनुभव और स्मृतियां शामिल होते हैं. सभी मनुष्यों का एक साझा सामूहिक अवचेतन है जो सभी इंसानों की, जीवित और मृत, स्मृतियों को संग्रहीत करता है. ‘समय’ की प्रकृति अथवा ‘काल-बोध’ की अलग-अलग अवधारणाओं में से एक के मुताबिक समय सीधी रेखा में चलता है, हर पल अंतिम होता है और एक बार प्रकट होकर हमेशा के लिए विलीन हो जाता है. दूसरी धारणा यह है कि समय, समयहीन है और उसके भीतर कुछ भी समाप्त या विलुप्त नहीं होता.

सब कुछ एक अनुक्रमिकता, दोहराव है और जो कुछ दूर जाकर अदृश्य हो जाता है, वह किसी दूसरे समय में लौटकर वापस आने के लिए. मैं बाहरी समय के बारे में नहीं जानता लेकिन जहां तक मेरे ‘भीतर का समय’ है – वहां कुछ भी बीतता नहीं, एक बार होकर विलुप्त नहीं होता. वहां कुछ भी ‘होता’ या ‘हो चुकता’ नहीं, हमेशा ‘होता रहता’ है.

फिर इन सबके अलावा, अलग, ‘रचना के भीतर का समय है, जो हमारी संवेदना की दुनिया में एक अलग ही अहमियत रखता है. रचनाओं की ‘काल-वीथि’ या ‘कालखंड’, जिसमें से कथा की घटनाएं और पात्र गुजरते हैं, भी ‘रचनाकार के समय’ का ही एक अंश होता है. रचना के भीतर का वह आत्मपरक समय वास्तविक या भौतिक समय से जुड़ा होते हुए भी उसका गुलाम नहीं होता. रचनाओं का अपना ही, एक निजी काल-तंत्र होता है जिसमें समय वास्तविक समय से इतर, फैल या सिकुड़ सकता है, कभी तेज़ी से भागता है और कभी ठहर सकता है, अतीत से भविष्य और फिर भविष्य से अतीत तक छलांग लगा सकता है .

‘यूलिसिस’ (‘जेम्स जॉयस’) में समय की रफ़्तार इतनी धीमी है कि चौबीस घंटों की कहानी छः सौ पृष्ठों में कही जा पाती है – और इसके दूसरे छोर पर हंगारी कहानी ‘यान कोवाच का अंत’ (‘लायोश जिलाही’) दो-तीन पन्नों में ही एक पूरे जीवन बल्कि उसके बाद के 49 वर्षों की भी एक मुकम्मिल कहानी कहती है.

रचनाओं के उस निजी काल-तंत्र में एक ही पल में बरसों बीत जाते हैं, अलग-अलग शताब्दियां अपनी क्रमबद्धता तजकर एक दूसरे के करीब खिसक आती हैं. होमर अली सरदार जाफ़री को इशारे से क़रीब बुलाते हैं, फ़ैयाज़ खां बीटोफेन के (बहरे) कानों में संगीत सुनाते हैं. वहां टैगोर, तुलसी, ग़ालिब और हाफिज एक टेबल पर साथ बैठे दिख सकते हैं, गोर्की होरी से मिलने चला आता है और जोश नेरुदा से जाम टकराता है. (‘अम्न का राग’, शमशेर) कहने का अर्थ यह कि रचना के ‘भीतर के समय’ में यह सब सहज और संभाव्य होता है. उस ‘भीतरी समय’ का ‘बाहर के समय’ से नाता-यह कला के बुनियादी सवालों में से है, इस पुराने सवाल की बदली हुई शक्ल कि ‘कथा और यथार्थ’ या ‘कला और जीवन’ में क्या रिश्ता होता है.

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रचनाकार का वह ‘भीतरी समय’ अथवा उसका ‘आभ्यंतर’ जहां उसके अलग-अलग अनुभव और ख़याल अर्थों के किसी साफ पैटर्न में जुड़ते, एक आकार और स्पष्टता, पूर्णता प्राप्त करते हैं – उसके लिए महत्वपूर्ण होता है. एक हद तक वह हर सृजनकर्म का ज़रूरी हिस्सा है. ‘आभ्यंतर’ का अर्थ यहां वह ‘अंदरूनी एकांत’ या ‘आंतरिक गुहा’ या कारा’ नहीं जो दुनिया से अ-लिप्त, ‘स्थितप्रज्ञ’ कवि-लेखकों का स्थायी शरण्य और आवास होती है, जिसके भीतर बंद रहकर, दुनिया की ओर पीठ कर, वे ‘आत्मा की फुसफुसाहटें’ सुनते हुए शब्दजाल बुनने में लीन रहते हैं.

न उस कायर चुप्पी से ही इसका कोई संबंध है, जिसे कुछ कवि-लेखक संकटग्रस्त समयों में कवच की तरह ओढ़ लेते हैं. मेरा आशय है लेखक का ‘अंतर’, जहां यथार्थ ‘सृजन’ में ढलता है, या, अन्य शब्दों में, वह ‘आंतरिक समय’ जिसके बीच ‘कला का तीसरा क्षण’ (‘मुक्तिबोध’) घटित होता है. लेखक इस ‘आंतरिक समय’ में ही अपना अस्तित्व तलाशता है. लिखना अवश्य अपने में एक सामाजिक कर्म, और अपने सीमित ‘निज’ की चौहद्दी के परे, ‘अन्य’ से संवाद है – लेकिन लिखने का उद्वेग, उसकी अनिवार्यता का बोध, उसकी प्रामाणिकता के पैमाने और उसका पुरस्कार, यह सब लेखक को अपने भीतर ही मिलता, वहीं मिल सकता है, और वहां नहीं तो अन्यत्र भी कहीं नहीं .

लेकिन हमारे समय की बेरहम सच्चाई यह है कि दुनिया अधिकाधिक खून और कीचड़ में लिथड़ती जा रही है. इस खून और कीचड़ के कुछ छींटे लेखक की ‘अंदरूनी दुनिया’, उसके ‘भीतरी एकांत’ में भी चले आते हैं, क्योंकि वह दुनिया इसी दुनिया में स्थित है, इसके बाहर नहीं. लेखक चाहे तो उन छींटों को पोंछकर, निर्विकार भाव से भीतर रमे रहकर, वहां की घनी शांति में अपने अबूझ, अपरिभाषित, ‘अंदरूनी खालीपन’ को शब्दों से पाटते रह सकता है.

भीतर बैठकर भावनाओं का माया-जाल रचते हुए उसमें एक मकड़ी की तरह फंसे रह सकता है. वह खुद को इस भुलावे में रख सकता है कि बाहर की दुनिया ‘मिथ्या’ या ‘माया’ है, और ‘सत्य’ तो उसके भीतर पहले ही मौजूद है, या इस खोखली तसल्ली के हवाले हो सकता है कि समय आने पर समय अपने-आप सब कुछ सुलझा देगा, सभी सवालों के जवाब दे देगा. एक ‘अति-संवेदनशील’ लेखक यह भी कर सकता है (हां, यह भी कहीं-कहीं दिखता है), कि इश्तवान साबो की फिल्म ‘मेफिस्टो’ के नायक की तरह, अपने समय से नाता तोड़कर, आंखें मूंदकर ‘औपनिषदिक’, ‘बौद्ध’ या किसी अन्य प्राचीन काल में या दुनिया के ‘क्लासिक्स’ या संस्कृत कविता और नाटकों की दुनिया में, उनके सर्जकों-पात्रों के साथ जीता रहे.

तोल्स्तोय, दोस्तोएव्स्की, चेखव, रिल्के, वाल्ट व्हिटमैन, टैगोर, ग़ालिब, खलील जिब्रान या मम्मट, आनंदवर्धन, भवभूति, वेदव्यास और वाल्मीकि सरीखे कालजयी रचनाकार-विचारक-दृष्टा हमारी आत्मा का अविभाज्य अंश हैं. शमशेर के ‘अम्न का राग’ से शब्दों का सहारा लेकर कहूं तो, ‘हमारे दिलों के पावरहाउस के कुशल ऑपरेटर’. सृजन के प्रति खरी-गहन निष्ठा, विराट संकल्पों, और बार-बार अचंभित करती कृतियों के कारण वे हमारे लिए ताकत का अनंत स्रोत हैं.

हर संजीदा लेखक को, जब वह संशयों या संभ्रम की चपेट में हो या इच्छा-शक्ति डगमगाती महसूस हो, फिर-फिर उनके पास जाना ही होता है. लेकिन उन्हें एक किस्म का ‘बौद्धिक बाबा’ बनाकर (‘ज्ञान की गुफा’ में विराजमान), ‘बौद्धिक मोक्ष’ की उम्मीद में अपने समय को तजकर, उनके संग उन्हीं के समय में डेरा जमा लेना, यह एक अलग ही बात है. जैसे कुछ लोग बाबाओं, फ़क़ीरों, दरवेशों के आगे सिर नवाते हैं, उसी अंदाज़ में कुछ आत्माएं ‘महाकवियों’ और ‘महान लेखकों’ के द्वार पर माथा टेकती हैं. वे उन्हें पढ़ती नहीं, ‘जपती’ हैं.

योगेंद्र आहूजा की पुस्तकें. (साभार: संबंधित प्रकाशन)

वर्तमान की भयावहता के बीच अंतरात्मा को शांत रखने, सुकून पाने का यह तरीका … एक मायने में यह ‘आध्यात्मिक’ होने, बल्कि ‘बाबावाद’ का ही एक प्रकार है, गोकि कुछ अधिक परिष्कृत. बहरहाल, ऐसा कोई भुलावा या दिलासा कितनी देर काम आ सकता है? खून के छींटे धब्बों में बदलते जाते हैं और फिर एक पतली लाल लकीर उसकी कोठरी के भीतर रिस आती है. आखिरकार एक निर्णायक पल में लेखक को कांपते हुए, प्राचीन ग्रंथों के पन्ने मोड़कर या अपने वाक्यों को अधूरा छोड़कर, ‘भीतर’ से ‘बाहर’ अथवा ‘अनंतता’ की उड़ान से जमीन पर, अपने समय में वापस लौटना होता है. वहां उसे जो दिखता है उससे भयाकुल होकर वह लड़खड़ाते हुए वापस न मुड़ पड़े तो वास्तविकता को कुछ अधिक सजगता के साथ देखने, उन छींटों का स्रोत या उत्स जानने की कोशिश कर सकता है.

साहित्य या कला के इस दूसरे रास्ते पर चक्कर आते हैं. इस रास्ते में जिंदगी को, अनुभवों को, सच्चाई को कुछ अधिक होशमंद, अधिक मर्यादाबद्ध होकर, उनके नग्नतम, कुरूपतम रूप में, हर किस्म के धोखे और भ्रम का, प्रवंचना का पर्दा हटाकर उनकी यथातथ्यता में खुली आंखों देखना होता है. इस रास्ते पर शांति या निवृत्ति या दर्द से मुक्ति नहीं मिलती.

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एक बार फिर याद करें कि समय के बारे में यह जो कुछ कहा जा रहा है, यह खुद किस समय में कहा जा रहा है? हम देखते हैं कि कम से कम तीन दशकों से (2014 में सिर्फ उसकी रफ्तार तेज़ हुई) एक ‘नया भारत’, लालच, वासना, दुखों, हिंसा और लाचारी का एक ‘नया देश’ बनाने का ‘प्रोजेक्ट’ जारी है. इस नए देश को इकहरे और नफ़रत भरे दिमाग, एक बेरहम, सपाट सोच और पत्थर जैसे दिल से गढ़ा जा रहा है और जिसमें प्रवेश पाने की शर्त भी यही है – पत्थर या लाश होना. ‘अन्याय’ अधिकाधिक संगठित और ‘संस्थाबद्ध’ हो रहा है, ‘प्रतिरोध’ का चरित्र बदल रहा है, वह भी एक कमोडिटी में तब्दील हो रहा है, ‘कल्पनाशक्ति’ पर चौतरफा हमले हैं, संवाद सिकुड़ रहे हैं, सिर्फ अन्यों से नहीं, व्यक्ति के अपने आप से भी.

माहौल ऐसा है कि ‘नकारवाद’ या ‘निषेधवाद’ या ‘विनाशवाद’ की चपेट में आ जाना आसान है. यह विचित्र है कि जब ‘असहमति’ (dissent) को जुर्म माना जा रहा है, उसी समय, दूसरी ओर, साहित्य की दुनिया में एक खास तरह की उत्तेजना, उत्सवधर्मिता, रोमांच बढ़ते जाते हैं, साहित्य को सिर्फ एक ‘लुत्फ़’ या ‘मज़े’ में, ‘वाचा के स्वाद’ या ‘लफ़्ज़ों के खेल’ में रिड्यूस कर देने की कोशिशें जारी हैं.

सरोकारों, पक्षधरता या प्रतिबद्धता को गुज़रे ज़मानों के मूल्य माना जाने लगा है, सच-झूठ और सही-गलत की पहचान धुंधली कर दी गयी है. फटकार कर सच बोलने वाले सीधी रीढ़ के कवि-लेखक विदाई ले चुके हैं. हमारे सामाजिक जीवन में रोज़ कुछ-न-कुछ टूटता-बिखरता है. रोज़ कुछ ऐसा घटता है जो हमारे डर और उदासी को गहरा करता है. रोज़ नए और अधिक संगीन सवालों से हमारा साबका होता है.

वर्तमान पर काबिज़ होने के बाद सत्ता अतीत पर कब्ज़ा करना चाहती है. एक मनचाहा अतीत गढ़ा जा रहा है. राजनीतिक विचारधाराएं तीव्र ध्रुवीकृत हैं, पारंपरिक और नई राजनीति और लोकतंत्र और अधिनायकवाद के बीच टकराव रोज़ तेज़ हो रहा है, सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, वैश्विक स्तर पर. संवाद के तरीक़े बदल चुके हैं. ‘फेक न्यूज’ और विशाल आबादियों पर असर डालने वाले मिथ्या प्रचार गंभीर चिंता का विषय हैं. आर्थिक असमानता के साथ पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और लैंगिक समानता के मुद्दे प्रमुख हो रहे हैं. तकनीक ने आपसी जुड़ाव को आसान बनाया है, लेकिन मानवीय संबंध कमज़ोर हो रहे हैं. परिवारों और समुदायों के ढांचे बदल रहे हैं. तनाव से मुक्ति के लिए पिछले समयों से अधिक लोग ‘आध्यात्मिकता’ और ‘अतीत’ की ओर मुड़ रहे हैं.

सोशल मीडिया’ के आगाज़ के साथ पहली बार हमारा इंसानों की एक ‘नई किस्म’ से सामना हुआ – ‘शैतानों’ से आविष्ट और उनके उपासक, हर मर्यादा और नैतिकता से आज़ाद और हर तर्क, विचार और संवाद से दस्त-बरदार. तमाम द्वंद्वों और दुविधाओं से छुटकारा पा चुकी यह प्रजाति, जिसका नाम है ‘ट्रोल्स’, अर्थों के अवसान और अपने जंग लगे ज़मीर, बंधक ईमान और पतनशीलता का जश्न मनाती है. कुछ दशकों पहले तक जो फंतासी या दु:स्वप्नों का हिस्सा था, देखते-ही-देखते यथार्थ होकर हमारे समय का सच हो गया. यह चेतना को सुन्न कर देने वाला बल्कि अक्सर घोर अवसाद में ले जाने वाला अनुभव रहा है.

जब मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं, यह और भी अशांत, अस्थिर, सुलगता हुआ समय है. पिछले कुछ दिनों में घटनाएं तूफानी रफ़्तार से घटीं और लगा कि एक विकराल, भीषण भवितव्यता, जो दु:स्वप्नों और फंतासियों का हिस्सा थी, बहुत क़रीब आकर हमारी आंखों में घूरने लगी है. कश्मीर में आतंकवादियों के द्वारा निर्दोष, निहत्थे नागरिकों की जघन्य हत्या पर देश-व्यापी शोक, फिर उन्माद का उबाल और ‘परमाणु युद्ध’ जैसे भयावह शब्दों का खबरों का हिस्सा बनना.

लेखक-कवि-कलाकार – नागरिक और सर्जक दोनों ही स्तरों पर – देश की नियति का हिस्सा हैं और देशवासियों की विपदा के भागीदार. वे उन्हें अपनी ही त्वचा पर झेलते हैं. गज़ा के बच्चों की सहमी आंखें, यूक्रेन की तबाही, मणिपुर, ‘बुलडोजर-न्याय’ … लेखक की आत्मा पर कितने ही दाग-ज़ख्म हैं जिनका सिलसिला रुकता ही नहीं. लेकिन हमारे वक़्त में अख़बारों और संचार-माध्यमों ने अनिश्चित ब्यौरों, झूठ, छल, अटकलों और व्यावसायिकता के मेल से जो अवास्तविक, दुर्बोध,‘कागजी संसार’ रच डाला है, उसमें उनकी बेचैनी को ठौर नहीं मिलता. एक आम नागरिक के पास इस संसार की असलियत को जाँचने या चुनौती देने का समय या ताकत कहां है?

सांसों को भारी बनाने और ताकत सोख लेने वाली खबरों के बीच, असमंजसपूर्ण और आतंककारी परिस्थितियों में लेखक का शोक, उदासियां और बेचैनियां भी जैसे बेचैन भटकती हैं. कृत्रिम डिजिटल दुनिया उन्हें हीन, तुच्छ बना देती है. शब्द नि:सत्व महसूस होते हैं, कहे जाते ही ‘काग़जी संसार’ के शोरगुल और ओछेपन (जिसमें साहित्य-संसार के विद्वेष और गुटबाज़ियां और इज़ाफ़ा करती हैं) के हवाले हो जाते हैं. उनके जरिये कुछ कहना अपनी ही आत्मा को आघात देता है.

ऊपर लिखे से ज़ाहिर है कि मैं इस समय को एक शोकाकुल दृष्टि से ही देखता हूं. लेकिन मन के किसी कोने में यक़ीन है कि यह सब हमेशा यूं ही नहीं चल सकता. अंततः लोग फिर एक दूसरे के क़रीब आएंगे, तकलीफ़ों का साझा करेंगे और मिल-जुलकर सामूहिक दुखों के निराकरण की तरकीबें सोचेंगे. साहित्य-कलाओं के अश्लील उत्सव उजाड़ हो जाएंगे. संजीदा लेखक अपने उदास-उचाट कोनों से निकलकर बाहर आएंगे, फिर से कॉफी हाउस (और चाय की टपरियां) आबाद होंगे और ज़रूरी सवालों पर गंभीर संवाद शुरू होंगे. लोग अपने खोये हुए स्वत्व को हासिल करेंगे और जीवन को यत्किंचित स्वीकारना संभव होगा. जब तक ऐसा न हो, तब तक हर पल एक बोझिल पहाड़ है.

(योगेंद्र आहूजा वरिष्ठ कथाकार हैं.)

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