नागरी की नगरी में हिंदी का पुनर्जागरण

नागरी प्रचारिणी सभा के गलियारों में कभी आधुनिक हिंदी ने अपना उत्कर्ष देखा था. फिर कुछ ऐसा हुआ कि दशकों तक यह संस्था उपेक्षा और विस्मृति के अंधेरे में डूबी रही. कुछ बरस पहले इसकी बागडोर कवि-गद्यकार व्योमेश शुक्ल के पास आयी, और आरंभ हुआ एक नया अध्याय.

कवि-गद्यकार व्योमेश शुक्ल के नेतृत्व में नागरी प्रचारिणी सभा नया अध्याय लिख रही है. (फोटो: सोशल माडिया)

कुछ नगर अपने समय से बाहर जीते हैं, वे इतिहास में नहीं, स्मृति में टिके रहते हैं. बनारस भी ऐसा ही एक नगर है, जहां कदम रखने से पहले आत्मा उतरती है. गलियों के भीतर धीमा अंतर्नाद पिघलता है.

बनारस के विश्वेश्वर गंज में, हेड पोस्ट ऑफिस के ठीक सामने, एक लाल रंग की इमारत खड़ी है. ईंटों से बनी हुई. पुरानी. छिली हुई. बरसों से बारिश उसे छूती रही है और वह बिना कोई शिकायत किए सब सहती रही हैं. उसकी दीवारें कुछ कहना चाहती हैं, पर हर बार कहने से ठीक पहले चुप हो जाती हैं. इंडो-सरसेनिक स्थापत्य की इस इमारत का जन्म एक विचार, एक उद्देश्य के साथ हुआ था. और अब उसी उद्देश्य की प्रतीक्षा में खड़ी है, चुपचाप.

यह है नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी का घर.. वह संस्थान जिसने कभी एक भाषा को खड़ा होना, चलना और शालीनता से बोलना सिखाया.

यह एक इरादा था, जो वर्ष 1893 में जन्मा. तीन विद्यार्थी थे. बहुत साधारण से, जैसे पुराने कस्बे में होते हैं. क्वींस कॉलेज में पढ़ते थे– श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र, शिवकुमार सिंह.

किसी दोपहर या शाम, किसी ऐसे कमरे में जहां खिड़की शायद बाहर किसी पीपल के पेड़ की तरफ खुलती थी. उन्होंने तय किया कि हिंदी को एक ठिकाना चाहिए. जैसे भीगते हुए यात्री को छत की दरकार होती है. जैसे किसान बीज बोता है.

उन्होंने सभा की स्थापना की.

उन दिनों देश पर कोई और हुकूमत कर रहा था. अदालतों में लोग उर्दू-फारसी बोलते थे. ताक़त अंग्रेज़ी में थी. और हिंदी? हिंदी को कोई ठीक से जानता भी नहीं था. कुछ लोग इस को भाषा को भावुक मानते थे. कुछ कहते थे कि यह बहुत मुलायम है, बहुत घरेलू भी. सरकारी फाइलों में यह ज़ुबान नहीं समाती थी.

लेकिन उन तीनों ने, और बाद में अन्य तमाम विभूतियों ने—इस भाषा के भीतर कुछ और देखा. उन्होंने उसकी कमज़ोरियों में उसका सच देखा. उसकी अपूर्णता में उसका विस्तार देखा. उन्हें लगा यह भाषा अपने खेत, अपने कुएं, अपने दुख, अपने गीतों से आती है. यह बोलने से पहले सुनती है. यह किसी पुरानी कथा की तरह है—जो हर पीढ़ी खुद को सुनाती है.

नागरी प्रचारिणी सभा वही श्रवण-तंतु बन गई. वह स्वर—जो दोहरा जाया सके.

आज उसके प्रधानमंत्री, कवि-गद्यकार व्योमेश शुक्ल कहते हैं; ‘जब हम अपनी भाषा खोते हैं, तो हम केवल शब्द नहीं खोते. हम वे मनुष्य खो देते हैं, जिन्होंने उन शब्दों को अपनी आवाज़ में जगह दी थी, किसी प्रार्थना की तरह…’

नागरी प्रचारिणी सभा ने केवल हिंदी की रक्षा नहीं की, उसने हिंदी को उसका आत्मबल लौटाया—जैसे कोई मां अपने बच्चे को पहचान ले, भीड़ में.

नागरी प्रचारिणी सभा के प्रकाशन जिन्होंने आधुनिक हिंदी को संस्कार दिया.

सरस्वती और शब्दसागर

उन तीनों ने छोटे-छोटे कदमों से शुरुआत की. सन् 1900 में सभा ने सरस्वती नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया, जो आधुनिक मानक हिंदी की पहली मासिक साहित्यिक पत्रिका थी. फिर श्यामसुंदर दास आए. उन्होंने हिंदी को एक घर दिया, ‘हिंदी शब्दसागर’. जैसे बहुत सारी सीपियां समेट ली गई हों, जिनमें किसी समय की भाषा की चमक थी.

उनकी यह कोशिश व्यर्थ नहीं गई. ब्रिटिश राज को अंततः हिंदी और देवनागरी लिपि को प्रशासनिक मान्यता देनी पड़ी. यह आंदोलन केवल नारों से नहीं चला, बल्कि व्याकरण, गद्य, और काव्य की बुनियाद पर खड़ा हुआ. यह इलाहाबाद से लेकर आगरा, लखनऊ से दिल्ली तक फैला एक बौद्धिक आंदोलन था.

पुस्तकालय और भारत कला भवन

सभा ने एक और सपना देखा. सभा ने ऐतिहासिक आर्य भाषा पुस्तकालय की भी स्थापना की, जहां हज़ारों पांडुलिपियां और दुर्लभ पुस्तकें एकत्र की गईं. यह पुस्तकालय एक स्मृति-स्थान था. वह स्मृति नहीं जो इतिहास की किताबों में दर्ज होती है. बल्कि वह जो पन्नों के बीच बताती है कि यहां कभी कोई आया था, और उसने शब्दों से समय को छुआ था.

1930 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का भारत कला भवन  सभा की संरक्षण में स्थापित हुआ. यहां चित्रकला, मूर्तिकला, वस्त्र, विस्मृत देवताओं और अनाम गाँवों की स्त्रियां, सबको एक नया स्थान मिला, जहां अतीत वर्तमान से संवाद कर सके.

इसके साथ ही सभा ने दिल्ली और हरिद्वार में दो और शाखाएं खोलीं, ताकि यह आंदोलन केवल एक शहर तक सीमित न रहे.

‘यह स्थान,’ व्योमेश शुक्ल कहते हैं, ‘कभी केवल ईंट-पत्थर की एक इमारत नहीं था. यह अर्थों, विचारों और स्मृतियों का भंडार था. जब आप इसके भीतर आते थे, तो ज्ञान के साथ अपनी जड़ों और पहचान की एक नई समझ लेकर बाहर निकलते थे.’

अनुराधा बनर्जी. (फोटो साभार: स्पेशल अरेंजमेंट)

पतन की गाथा

एक समय फारसी दरबारों में राज करती थी. अंग्रेजी विद्यालय की भाषा थी. और हिंदी इंतजार कर रही थी. नुक्कड़ों में, गलियों में, बिना पते के घरों में. लेकिन धीरे-धीरे, इस भाषा ने अंगड़ाई ली. नागरी प्रचारिणी सभा ने ईंट दर ईंट, आधुनिक हिंदी की नींव स्थापित की.

लेकिन कालांतर में इस संस्था पर उन शक्तियों का कब्ज़ा हो गया जिन्हें हिंदी से प्रेम नहीं था, जो हिंदी को राजनीतिक नारे की तरह इस्तेमाल करते थे.

कई दशक बीत गए, सभा खुद को खोने लगी. काग़ज़ों का ढेर बढ़ने लगा. विचारों पर धूल जमने लगी. पुस्तकालय की दीवारों में नमी आ गई. पांडुलिपियां, जो कभी सोने की स्याही से लिखी गई थीं, अब बेमुरव्वत पत्तों में बिखरी पड़ी थीं. वर्षों तक यह संस्था बिना चुनावों के चलती रही. वित्तीय अनियमितताएं उसकी आत्मा में दरारें डालती रहीं. लगभग दो दशकों तक भाषा की चेतना से कटकर सभा एक निष्क्रिय स्थल बन गई. ऐसा भूत-घर, जिसे न शब्दों ने पुकारा, न विचारों ने खोजा. छतों पर बैठे कबूतर उसके मौन पतन के साक्षी रहे.

‘चींटी भूकंप की तरह नहीं आती,’ व्योमेश शुक्ल कहते हैं, ‘वह न तो शोर मचाती है, न चेतावनी देती है, वह बस धीरे-धीरे, अनुशासन और धैर्य से सब कुछ खोखला करती जाती है.जब हमें होश आया, तब शेल्फ़ खाली थे. ऐसे खाली, जैसे कोई स्मृति अपनी ही जड़ों से कटकर गिर गई हो, और उसे गिरने की आवाज़ तक न आई हो.’

अंततः न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा. बरसों की कालिख साफ़ होना शुरू हुई.

पुनर्निर्माण की ओर उठे कदम 

2022 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की देखरेख में एक चुनाव हुआ, और सभा का नेतृत्व बदल गया. व्योमेश शुक्ल सभा के प्रधानमंत्री बने. उन्होंने और अध्यक्ष प्रोफ़ेसर अनुराधा बनर्जी ने संकल्पपूर्वक एक नया अभियान शुरू किया.

व्योमेश शुक्ल कहते हैं, ‘इस उपेक्षा और चुप्पी को तोड़कर ही विचार और संवाद की नई शुरुआत की जा सकती थी. आज पुस्तकालय में पुस्तकों की सूची तैयार हो रही है. पांडुलिपियां डिजिटाइज की जा रही हैं.’

व्योमेश शुक्ल. (फोटो साभार: फेसबुक)

सभा का पुनर्निर्माण केवल पुस्तकों के पुनः प्रकाशन तक सीमित नहीं है, इसके अंतर्गत प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण भी शामिल है. ताकि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रह सकें.

आज सभा के अभिलेख फिर से सांस ले रहे हैं. सभा एक अत्याधुनिक ऑडिटोरियम और अतिथि गृह निर्मित करना चाहती है. हिंदी के अनुभव का पुनर्वास करना चाहती है.

‘हम नहीं चाहते कि सभा सिर्फ अतीत की निशानी बनकर रह जाए,’ व्योमेश शुक्ल कहते हैं. ‘हम चाहते हैं कि यह संवाद का एक केंद्र बने.’

शोधार्थी लौट रहे हैं—नोटबुक और लैपटॉप लेकर. कोई पुराना सपना, नई आंखों से फिर देखा जा रहा हो.

समादृत चिंतक अशोक वाजपेयी कहते हैं, ‘नागरी प्रचारिणी सभा केवल पुस्तकों का संग्रहालय नहीं है, बल्कि वह स्थान है जहां हिंदी को देखने, समझने और अनुभव करने का नज़रिया आकार लेता है. सभा द्वारा पुनः प्रकाशित पुस्तकें, जैसे ‘बिहारी सरित सागर’ और आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व में समाहित हैं. ये हमारी पहचान, हमारी स्मृति और हमारी सांस्कृतिक धरोहरों की अमूल्य कहानी हैं.’

हिंदी कभी स्थिर नहीं रही. यह हमेशा एक गतिशील भाषा रही है, जैसे प्रकाश, जैसे शोक, जैसे स्मृति. यह अपना अतीत अपने साथ लेकर चलती है, परंतु भविष्य की राह भी गढ़ती है. यही वह धारा है जो उसे लगातार आगे बढ़ाती है.

विद्वान आलोचक प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि ‘सभा केवल एक साहित्यिक स्थल नहीं थी. वह राजनीतिक भी थी. उसने एक परंपरा बनाई थी.’

प्रोफ़ेसर अग्रवाल के अनुसार, नागरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी को एक गौरवमयी और ‘सांस्कृतिक आत्मसम्मान’ की भाषा बनाने में और आधुनिक हिंदी साहित्य के संवर्धन में अहम भूमिका निभाई है.

व्योमेश शुक्ल कहते हैं, ‘नागरी प्रचारिणी सभा ने हाल के वर्षों में हिंदी साहित्य के अमूल्य खजाने को पुनर्जीवित करने और संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.’

सभा के गलियारों में हिंदी शब्दकोश को आकार देने वाली कई नयी शब्दावली का जन्म हुआ. ‘प्रधानमंत्री’, ‘संविधान’, ‘संसद’, ‘पर्यावरण’ जैसे शब्द यहां से निकलकर समूचे देश में प्रचलित हुए. तुलसीदास के रामचरितमानस का पहला प्रकाशन भी यहीं हुआ.

 

व्योमेश शुक्ल कहते हैं, ‘सभा कभी सिर्फ कोरी जगह नहीं थी. यह वह मुकाम थी जहां भाषा अपने आप को समझती थी. जहां संस्कृति बैठकर थोड़ी देर सो जाती थी और फिर जाग उठती थी—थोड़ी बदलकर, थोड़ी वैसी ही.’

बनारस की सभा, सभा का बनारस 

यह अनायास नहीं है कि यह संस्था बनारस में स्थापित हुई. बनारस सैकड़ों वर्षों से भाषाओं, बोलियों और लिपियों का मिलन-बिंदु रहा है. यहां एक तरफ तुलसीदास का रामचरितमानस है, तो दूसरी तरफ कबीर की उलटबाँसियां. भारतेंदु की परछाईं काशी की गलियों में गिरती है. प्रेमचंद की कथाएं किसी सड़क से गुज़रता आपके पास पहुंचती हैं.

सभा इस विराट परंपरा की वाहक बनना चाहती है. नागरी में लिखी जाती तमाम भाषाओं– नेपाली, मराठी, भोजपुरी, मैथिली– की अपनी ध्वनियां है, जो इस लिपि में उभरती हैं. सभा इन्हें एक साझा स्वर देना चाहती है.

आप कह सकते हैं कि नागरी प्रचारिणी सभा आज काशी के सांस्कृतिक भूगोल का एक अनिवार्य पड़ाव है.

(आशुतोष कुमार ठाकुर पेशे से मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं, जो साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं.)