अरबी में रची जा रही है संसार की सबसे मार्मिक और विचलित करती कविता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर अरबी कविता मृत्यु अर्थात् नश्‍वरता की अनिवार्य छाया में, उसके पड़ोस में लिखी गई जिजीविषा की कविता है तो, लगता है, हिंदी कविता अपनी अदम्य जिजीविषा में मृत्यु या नश्‍वरता को नज़रअंदाज़ करती कविता है.

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ईराकी कवि सिनां अंतून के कविता-संग्रह का आवरण. (साभार: सीगल बुक्स)

यह निरा संयोग नहीं है. उत्कृष्ट और मार्मिक कविता वहां लिखी जाती है जहां सामाजिक उथल-पुथल, अशांति, आक्रामक हलचल होती है, और जीवन बहुत भयानक रूप से मृत्यु की छाया में या उसके पड़ोस में होता है. इस समय संसार की सबसे मार्मिक, विचलित करने वाली और मानवीय कविता अरबी में लिखी जा रही है. यह कविता फ़िलिस्तीन, ईराक, सीरिया आदि देशों से आ रही है.

बहुत सारे अरबी कवि अपने देश में नहीं रह पा रहे हैं: अपने देश में वे अवांछित और असह्य माने जाते हैं. उनमें से अनेक ने यूरोप, अमेरिका आदि में शरण ले रखी है. सौभाग्य से अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के अंग्रेज़ी भारतीय प्रकाशक सीगल बुक्स ने अरबी कविता और साहित्य के अंग्रेज़ी अनुवाद में प्रकाशन की एक श्रृंखला शुरू की है ‘द अरब लिस्ट’. इस कारण हमें अरबी कविता की वर्तमान स्थिति का पता चल रहा है.

इसी श्रृंखला में ईराकी कवि सिनां अंतून का एक संग्रह आया है ‘पोस्टकार्ड्स फ्राम द अंडरवर्ल्‍ड’. उसमें संकलित एक लंबी कविता का शीर्षक है- ‘हवा के माथे पर झुर्रियां’. उसके कुछ अंश देखिए:

चांद क़ब्रिस्तान है
रोशनी के लिए
सितारे औरतें हैं
विलाप करती हुई.

. . .

क़ब्र एक आईना है
जिसमें बच्चा देखता है
और ख़्वाब देखता है
मैं कब बड़ा होऊंगा
और अपने पिता की तरह होऊंगा
मृतक.

. . .

बच्ची खेलती है
वक़्त के बागीचे में
जंग उसे पुकारती है
जल्दी आओ.

. . .

मैं कान लगाता हूं
इस पल के पेट पर
विलाप सुनता हूं
मैं उसे दूसरे पल पर लगाता हूं
मैं वही सुनता हूं.

एक और कवितांश है:

कल हम उनकी लाशों को उघारेंगे
गीतों से
और उन्हें शब्दों के कफ़न से ढंक देंगे.

मूलतः फ़िलिस्तीन के, एक और अरबी कवि ग़सान ज़ाक्तां के काव्यसंकलन ‘स्ट्रेंजर्स इन लाइट कोट्स’ का एक कवितांश इस तरह है:

काठ की घंटी बजाई जाती है और वह बंद नहीं होती
और काफ़ी दूर, नदी किनारे के नन्हे बसेरों में
मैं उसे सुनता हूं
झकझोले देते हुए एक झूले की तरह

जो नाजुक उम्मीदों और शानदार हारों से लदा हुआ है.
वह यहां बजाई जाती है, ज्यों मैं बेकार के अचरजों को तहाता हूं
यहां अजनबी आते हैं हलके कोटों और बासी विचारों के साथ
और मैं उसे सुनता हूं वहां, जहां मैं युवा हूं
जहां मारे गए बच्चे अपने कपड़े सुखाते हैं.

नज़रअंदाज़ नश्‍वरता

अगर अरबी कविता मृत्यु अर्थात् नश्‍वरता की अनिवार्य छाया में, उसके पड़ोस में लिखी गई जिजीविषा की कविता है तो, लगता है, हिंदी कविता अपनी अदम्य जिजीविषा में मृत्यु या नश्‍वरता को नज़रअंदाज़ करती कविता है. कहा जाता है कि प्रेम और मृत्यु मनुष्य के दो परम अनुभव हैं और कोई भी कविता बड़ी नहीं हो सकती अगर वह इनसे जूझती न हो.

जिस सामाजिक यथार्थ का बड़ा आतंक हिंदी कविता पर दशकों से रहा है, उस यथार्थ का एक बड़ा हिस्सा मृत्यु से भरा हुआ है. हिंदी अंचल, इस समय, स्त्री-बच्चों-मुसलमानों-दलितों के विरुद्ध हिंसा-हत्या-बलात्कार के जघन्य अपराधों के राष्ट्रीय रिकॉर्ड में लगभग दो तिहाई हिस्से के लिए ज़िम्मेदार है. ऐसी घटनाएं आए दिन हिंदी अंचल में होती रहती हैं कि किसी दलित को इसलिए सवर्ण मौत के घाट उतार देते हैं कि वह अपनी बारात में घोड़े पर बैठकर जा रहा होता है. कोई निरपराध मुसलमान इसलिए मार दिया जाता है कि वह श्रीराम कहने से इनकार कर देता है या जिसके यहां गोमांस पाया गया हो जो बाद तहकीकात से झूठ साबित होता रहता है.

इतनी सारी हिंसा और उसके फलस्वरूप इतनी सारी मौतें हमारे सामाजिक यथार्थ का बहुत दृश्य हिस्सा हैं. पर हिंदी कविता में यह सब प्रायः अदृश्य है. कविता अदृश्य को दृश्य करती है पर यहां तो वह दृश्य को अदृश्य कर रही है!

इतनी सारी मृत्यु हमारे सामने, हमारे आस-पास होती रहती है और कविता उसे अक्षम्य रूप से नज़रअंदाज़ कर रही है.

मृत्यु या नश्‍वरता को लेकर हिंदी कविता में बहुत कम लिखा गया है. दशकों बाद हाल में अम्बर पाण्डेय और अरुण देव ने इस विषय पर कुछ लिखने की चेष्टा की है. उनका यह प्रयत्न अधिकतर अलक्षित गया. हिंदी में शोक या विलाप गीत बहुत कम हैं जबकि हिंदी अंचल की प्रायः सभी बोलियों में वे ख़ासी तादाद में हैं और अब भी गांव-देहात में गाए जाते हैं.

क्या हम पर जीने का, जिजीविषा का रूमान इस क़दर हावी है कि हम भूल जाते हैं देर-सवेर यह जीवन समाप्त होगा? अनेक पूर्वाभासों से लदी-फंदी कविता में मृत्यु का पूर्वाभास इतना बिरला और कम क्यों है?

एक उद्धरण

सिगमंड फ्रायड ने कहा था:

सभ्य संसार में जो बर्बरता, क्रूरता और झूठ बड़ी मात्रा में फैल गए हैं, उस बारे में सोचो! क्या तुम सचमुच यक़ीन करते हो कि थोड़े से महत्वाकांक्षी और धोखेबाज़ अंतःकरणहीन लोग इन तमाम बुरी भावनाओं को उकसाने में सफल हो गए होते अगर उन्हें अपने लाखों अनुयायियों का इस अपराध में साथ न मिला होता?

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)