क़रीब नौ महीने पूर्व मैंने कॉनटाई, यानी कांथी, सबडिवीज़न के सबडिवीज़नल ऑफिसर (एसडीओ) का पदभार ग्रहण किया था. किंतु सरकारी भाषा में कहूं तो कुछ प्रशासनिक कारणों के चलते एवं लोक हित में जून 1992 के आरंभ में अकस्मात् मेरा तबादला हो गया. शायद सरकार बहादुर मुझसे कुछ ज़्यादा ही प्रसन्न थी क्योंकि तबादला भी ऐसा कि बंगाल में इससे लम्बा तबादला नहीं हो सकता था.
कांथी राज्य के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर, बंगाल की खाड़ी और ओडिशा की सीमा पर, स्थित है. मेरा स्थानांतरण किया गया अलीपुरद्वार सबडिवीज़न (अब ज़िला) में जो पश्चिम बंगाल के उत्तर-पूर्वी कोने में असम और भूटान की सीमाओं पर अवस्थित है. अलीपुरद्वार राज्य के एक सुदूर कोने में तो था ही, जलपाईगुड़ी ज़िले के भी कोने में था. ज़िला मुख्यालय से अलीपुरद्वार शहर लगभग 120 किलोमीटर और तीन घंटे दूर था.
मेरे कुछ वरिष्ठ शुभचिंतक अफ़सरों ने जब मेरे असामयिक तबादले की बात सुनी तो कहा, ‘अच्छा है. अलीपुरद्वार नीरव जगह है. वहां तुम शांति से बिना किसी घटना के अंदेशे के काम कर पाओगे.’ मेरे शुभचिंतकों की कम-से-कम आधी बात तो सच निकली. कॉनटाई और अलीपुरद्वार सबडिवीज़नों में उतना ही अंतर था जितना समुद्र और पहाड़ों के बीच होता है.
कांथी समुद्र के किनारे स्थित एक समतल कृषि प्रधान इलाक़ा था जहां की उर्वर भूमि औसतन दो से तीन फसल देती थी, जनसंख्या 20 लाख के ऊपर थी, लोग पढ़े-लिखे थे और जुझारू मुकदमेबाजी में दृढ़ विश्वास रखते थे. कांथी में जन्मे छोटे-मोटे मुक़दमे भी ज़िला न्यायालय में पल-बढ़कर घूमते-घामते बहुधा कलकत्ता पहुंच जाते थे. कहा जाता था कि कांथी कलकत्ता उच्च न्यायालय का एक स्तंभ है.
अलीपुरद्वार सबडिवीज़न हिमालय की तराई के उस छोर पर है जहां प्राचीन काल से भूटान जाने के रास्ते या द्वार थे. इसी वजह से इस इलाक़े को दुआर क्षेत्र कहते हैं. सबडिवीज़न के उत्तरी तीन ब्लॉकों में चाय के बाग़ान हैं और दक्षिणी तीन ब्लॉकों में साल में धान की इकलौती फसल उगाई जाती थी. उत्तर से दक्षिण तक घने जंगल हैं, फलस्वरूप यहां दो राष्ट्रीय उद्यान हैं, जलदापारा और बक्सा. जनसंख्या तथा उसका घनत्व कांथी के आधे से भी कम था. पढ़ाई का मान भी नीचा था और मुक़दमे कभी-कभार ही अलीपुरद्वार से सरककर जलपाईगुड़ी ज़िला अदालतों तक पहुंचते थे.
इन भिन्नताओं के बीच कांथी तथा अलीपुरद्वार में एक समानता थी — दोनों शहर की जनता लोड शेडिंग से पीड़ित थी. विद्युत की कमी के कारण किसी इलाक़े में आए-दिन निर्दिष्ट समय के लिए बिजली के काटे जाने को बंगाल में लोड शेडिंग कहा जाता था. तथ्य यह था कि औद्योगिक क्षेत्रों के मुक़ाबले ग्रामीण क्षेत्र में इसका प्रभाव अधिक होता था, और लोगों का विश्वास यह था कि लोड शेडिंग की अवधि का कलकत्ता से दूरी से सीधा और आनुपातिक संबंध है. चूंकि कांथी और अलीपुरद्वार राज्य के दो छोर पर स्थित हैं, यहां की जनता को लोड शेडिंग का प्रकोप भारी लगता था.
शायद पाठकगण मुझसे सहमत होंगे कि हर शहर की अपनी एक ऊर्जा होती है जो उसकी गति निर्धारित करती है. सघन ऊर्जा वाले शहरों में कदम रखते ही ऊर्जा और गति का आभास हो जाता है, पहले तो सड़क पर दौड़ती गाड़ियों, लोकल ट्रेनों और मेट्रो की वेग से और फिर उससे भी अधिक पैदलगामी लोगों की तेज चाल से.
1984 में मैं जब पहली बार दिल्ली से मुंबई गया और फिर डेढ़ साल पश्चात 1985 के दिसंबर में जब मैं न्यूयॉर्क पहुंचा तो वहां की ऊर्जा इतनी प्रबल थी कि मुझे झटका सा लगा. दिन के किसी भी वक्त मुंबई या न्यूयॉर्क में पैदलगामी लोगों की गति में ऐसी चपलता और संकल्प की झलक दिखती है जैसे कि हर व्यक्ति अपने जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति में कोई विलंब बर्दाश्त नहीं कर सकता, हालांकि वह कॉफ़ी पीने ही क्यों न जा रहा हो.
अलीपुरद्वार में इस तरह का झटका लगने का कोई भय न था. जनसंख्या कम थी तो गाड़ियों तथा मोटर-साइकिलों की संख्या भी कम थी. दूरियां इतनी ही थीं कि मुहल्लों से लोग शहर के मुख्य बाज़ार तक पैदल आ-जा सकते थे. इसके अलावा रिक्शे और साइकिल ही आवाजाही के मुख्य साधन थे. सड़कों की सुगमता को देखकर कभी ऐसा नहीं लगता था कि किसी को किसी प्रकार की हड़बड़ी है, बल्कि समय-समय पर भ्रम होता था कि यह अवसर प्राप्त लोगों की नगरी है.
दीर्घ प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भी जगह की ऊर्जा का एक और अचूक सूचक होता है. पश्चिम बंगाल के सबडिवीज़न सही मायने में एक लघु कलेक्टरेट के रूप में कार्य करते हैं जो कि उत्तर भारत के कई राज्यों से भिन्न है. ज़िला मुख्यालय की तरह, सबडिवीज़नल दफ़्तर में स्थानीय ऊर्जा का आभास पाने की युक्ति है यहां की डाक फ़ाइल. डाक यानी कि दफ्तर में आने वाली हर तरह की चिट्ठी-पत्री.
डाक हरेक प्रशासनिक कार्यालय में ऊर्जा का जनक भी है और मापदंड भी. सरकार का कोई सीधा-सपाट निर्देश-पत्र हो या नई-पुरानी स्कीम के दिशा निर्देश, आशावान आवेदन पत्र स्थानीय लोगों के हों या प्रवासियों के, कड़वे-तीखे शिकायत पत्र विभिन्न दफ़्तरों के विरुद्ध हों या पड़ोसियों के ख़िलाफ़, रूखे-सूखे दस्तावेज नए मुक़दमों के लिए दलील हों या आदेशों के विरुद्ध अपील, दफ़्तर के कर्मचारियों के ‘अत्यावश्यक’ प्रार्थना पत्र वेतन निर्धारण के लिए हों या फिर बच्चों की परीक्षा के दौरान छुट्टी के लिए हों—- यानी कि आधिकारिक रूप से जमा किए गए कैसे भी पत्र हों वह डाक फ़ाइल में जकड़कर सर्वप्रथम एसडीओ को उसी दिन पेश किए जाते हैं.
एसडीओ हर काग़ज़ पर नज़र दौड़ा कर उसे उसके महत्व एवं प्रसंग के अनुसार कार्यान्वयन के लिए उचित विभाग में या अधिकारी के पास भेज देता है. इस तरह कार्यालय के यंत्र को ईंधन मिलता है और गति बनी रहती है.
कॉनटाई सबडिवीज़न में प्रतिदिन एक बजे तक मेरी मेज़ पर मोटी, चिट्ठियों से अभिभूत डाक फ़ाइल पहुंच जाती थी और अक्सर शाम तक एक और भी हाज़िर हो जाती थी. कई बार पूरे दिन के कामकाज या दौरे से लौट कर डाक को देखने और निबटाने में रात हो जाती थी. अलीपुरद्वार में रोज़ाना डाक फ़ाइल समय से आ तो जाती थी परंतु कभी भी पत्रों की संख्या या भार से पराजित नहीं दिखती थी और मैं भी संध्या तक डाक देखकर वापस भेज दिया करता था.
जनवरी 1993 का बीसवां दिन था. ठंड पीछे हटने का नाम नहीं ले रही थी. अक्सर देर सुबह तक कुहासा शहर के रास्तों पर भटकता रहता था. शाम के चार बज चले थे पर दफ़्तर के डाक की फाइल मेरे पास नहीं पहुंची थी. मैंने अपने निजी सहायक, सत्येन बाबू, से पूछा, ‘आजकेर डाक कोथाय (आज की डाक कहां है)?’ ‘एखोनो तो आशे नी, सार. आमी आबार खोज नीच्ची (अभी तक तो आई नहीं है, सर. मैं फिर से पता करता हूं).’ कुछ देर बाद सत्येन बाबू उलझन भरे भाव के साथ वापस आए, ‘आजके तो डाक आशेई नी, सार. एकटा ओ चिठी आशे नी (आज तो डाक आईं ही नहीं है, सर. एक भी चिट्ठी नहीं आई है).’ उस दिन लगा जैसे कि पूरे अलीपुरद्वार सबडिवीज़न में लोड शेडिंग हो गई है.
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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