'तमलुक आने के कुछ दिनों बाद मैंने पाया कि मेरा हर सोमवार और शुक्रवार कलकत्ता उच्च न्यायालय में बीत रहा है. ऐसा लगने लगा था कि हरेक मामले में ही ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी, तमलुक ने न्यायालय की अवमानना की है.' बंगनामा की इस क़िस्त में एक पुराना विभागीय क़िस्सा.
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद राइटर्स बिल्डिंग पश्चिम बंगाल सरकार का सचिवालय बन गया. यह परिवर्तन उल्लेखनीय था क्योंकि वही भवन, जो कभी अंग्रेज़ अधिकारियों का मुख्यालय था, अब पश्चिम बंगाल के मंत्रियों और ‘नौकरशाहों’ का कार्यालय बन गया. इन दिनों राइटर्स फिर चर्चा में है क्योंकि पश्चिम बंगाल में बनी भाजपा की नई सरकार ने एक बार फिर इसी भवन को अपना महाकरण (मुख्य सचिवालय) बनाने का निर्णय लिया है.
ब्रिगेड परेड मैदान में पश्चिम बंगाल के नए सीएम का शपथ ग्रहण समारोह कर भाजपा कुछ संकेत दे रही है. प्रथम, कि वो जनता को पार्टी की विपुल सफलता के विशाल जन उत्सव में हिस्सा लेने का अवसर दे रही है. दूसरा, रवीन्द्र जयंती के अवसर पर इस आयोजन से वह सिद्ध करना चाहती है कि वह पश्चिम बंगाल की संस्कृति में ढली हुई बंगाल की ही पार्टी है, बाहर की नहीं. बंगनामा की पैंतालीसवीं क़िस्त.
2011 के पूर्व पश्चिम बंगाल में विचारधारा की राजनीति प्रबल थी और वर्ग राजनीति, भूमि सुधार, मज़दूरों के मुद्दे ही चुनावी प्रचार विषय होते थे, मुद्दे अब भी हैं पर जिस तरह बंगाल में विचारधारा की राजनीति भावनात्मक और प्रतीकात्मक राजनीति में परिवर्तित हुई है, उसी तरह चुनावी संदेश और छवियां भी अब दिमाग और तर्कों से अधिक भावनाओं को अपील करते हैं. बंगनामा की चवालीसवीं क़िस्त.
चुनाव की ऋतु में दीवार लेखन जनता को पार्टियों का संवाद है, उस क्षेत्र में उनके उम्मीदवारों का परिचय है. पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रचार से जुड़ा यह लेख करीब साढ़े तीन दशक पहले वहां राजनीतिक दलों द्वारा जनता तक पहुंच के तरीके से लेकर आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया और स्मार्टफोन तक उनके बदलते स्वरूप का वर्णन करता है.
ढोकरा शिल्प भारत के पुरातन शिल्पों में एक है, जिसमें धातु उद्योग के प्राचीनतम विधि लुप्त मोम विधि (सिरे पेरड्यू) का व्यवहार होता है. शायद यह जानकारी सर्वविदित न हो कि इस सुंदर शिल्प के केंद्र में बंगाल का एक गांव और आदिवासी समुदाय है. बंगनामा की बयालीसवीं क़िस्त.
पूर्वी भारत में आने वाली बिजली, बारिश और ओलों से लैस विनाशकारी आंधी को, जिसे अंग्रेज़ी में नॉर्वेस्टर कहते हैं, बंगाल में काल बैसाखी के नाम से जाना जाता है. ‘काल’ का तात्पर्य यहां मृत्यु से है और ‘बैसाखी’ क्योंकि बैसाख में इनकी व्यापकता रहती है. काल बैसाखी अक्सर ही तबाही का संदेश ले कर आती है.
बनारस के घाटों पर समय बिताकर कलकत्ता के घाटों का ध्यान आना स्वाभाविक था. वाराणसी के घाटों का अध्यात्म और परलोक से संबंध अधिक है और कलकत्ता के घाटों का ज़्यादा सरोकार है इस लोक में जीवनयापन से. बंगनामा की चालीसवीं क़िस्त.
1952 में पांचमुड़ा गांव के रासबिहारी कुंभकार को बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही आरंभ हुई बांकुड़ा के घोड़े की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान की यात्रा. देश में सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इम्पोरियम ने इसे अपना प्रतीक चिह्न बनाया, और विदेशों में भी हस्तशिल्प के चाहने वालों के बीच पहुंचा दिया. ऐसे यह सुंदर, लंबी गर्दन वाला कलात्मक मिट्टी का घोड़ा भारतीय हस्तकला का प्रतिनिधि बन गया.
बंगाल के कुछ हिस्सों में पूजी जाने वाली मनसा देवी की गाथा से देश के आदिवासी तथा देशज सांस्कृतिक परंपराओं दोनों का ही मुख्य सामाजिक धारा में लड़खड़ाते, बाधित, और अधूरे समावेश की कहानी समझ सकते है. शिव की पुत्री होकर भी वह सवर्ण जातियों की श्रद्धा का पात्र नहीं हो सकतीं क्योंकि उनकी माता अनार्य हैं, क्योंकि वह परलोक की नहीं, इसी धरती और जंगल की हैं, आदिवासी हैं.
बांकुड़ा कई साम्राज्यों के अधीन रहा, अंग्रेज़ों ने भी यहां शासन किया और राजस्व भी बटोरा लेकिन ग्रामीण समाज तथा रीति रिवाज़ों पर कोई छाप नहीं छोड़ पाए. यहां के वासियों के जीवन पर ऋतुओं, कृषि चक्र, चैतन्य महाप्रभु और वैष्णव पंथ, तथा स्थानीय देवी-देवताओं का प्रभाव बना रहा.
अगर बंदर टोपी और मफ़लर पश्चिम बंगाल में शीतकाल के प्रतीक हैं तो खजूर का गुड़ सर्दियों का स्वाद. बंगाल के लोग-बाग बाज़ार में खजूर के गुड़ के आने का इंतज़ार करते हैं. बंगाल के इस स्वाद को जानिए बंगनामा की इस क़िस्त में.
1993 में अलीपुरद्वार में एकाएक आई बाढ़ ने सब कुछ बदलकर रख दिया था. देर से पहुंची राहत, अन्न की लूटपाट व दंगे स्थिति को और भयावह बना रहे थे. ऐसे में सबडिवीज़न के प्रशासन को सेना का ही सहारा था, पर क्या सेना के लिए यह मदद करना संभव था? पढ़िए बंगनामा की पैंतीसवीं क़िस्त.
एकाएक आई बाढ़ के अगले दिन अलीपुरद्वार से कालजानी का पानी उतरने लगा, और पीछे छोड़ गया कीचड़ से भरे घर, मवेशियों के शव और मटमैले पानी से भरी सड़कें और क्रुद्ध शहरवासी. इन सबसे निपटने का क्या रास्ता था? क्या सरकार को इसकी ख़बर थी? पढ़िए बंगनामा की चौंतीसवीं क़िस्त.
20 जुलाई 1993 को अलीपुरद्वार सबडिवीज़न में भीषण वर्षा हुई— नदी किनारे बसे इस शहर की रक्षा के लिए बना बांध कई स्थानों से टूटने लगा और पानी तेज़ी से नगर में घुसा. लेकिन बांध कैसे टूटा और पूरे शहर में पानी इतनी जल्दी क्यों भर गया? बंगनामा की तैंतीसवीं क़िस्त.