पिछले पचास वर्षों से चित्र बना रहा हूं. लिखने का सफ़र भी लगभग चालीस वर्षों से जारी है. रंगमंच के साथ जुड़ने का मौका भी मुझे मिला. इस दौरान मुझे विभिन्न कलाओं की सीमाओं और विशेषताओं को थोड़ा बहुत समझने का अवसर भी मिला. कला, सतह पर स्वतःस्फूर्त भले ही क्यों न दिखे, उसका जन्म वस्तुतः एक विचार से ही होता है. यह विचार तमाम मंथनों के बाद एक रचना के रूप में सामने आता है और जब वह अपने दर्शक, श्रोता या पाठक तक पहुंचता है तो उसकी यात्रा न केवल पूरी होती है बल्कि उसके कला होने की सार्थकता भी मिलती है.
साहित्य के संदर्भ में पाठक द्वारा पढ़े जाने पर यह यात्रा पूरी होती है तो वहीं चित्रकला में यह देखे जाने पर पूरी होती है. यानी रचनाकार का विचार, कला के माध्यम से जब तक पाठक के मन में एक विचार को जन्म नहीं दे देता तब तक कला की यात्रा पूरी नहीं होती. कविता का प्रकाशित होना, चित्र का प्रदर्शित होना, नाटक का मंचित होना या किसी गीत को सुना जाना, कलाओं के लिए अनिवार्य शर्त है. इसलिए रचनाकार का अस्तित्व केवल रचना से ही नहीं जुड़ा होता बल्कि उसके पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों से भी अनिवार्य रूप से जुड़ा होता है. समय, जितना रचनाकार का होता है, उतना ही उसके दर्शकों, श्रोताओं और पाठकों का भी होता है.
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एक चित्रकार के रूप में, आज का समय केवल मेरा समय नहीं है बल्कि मेरे दर्शकों का भी समय है. यह सच है कि मेरी और मेरे दर्शकों की राष्ट्रीयता और नागरिकता बोध के साथ- साथ हमारे सुख-दुःख, जय-पराजय, मान-अपमान आदि अगर कमोबेश समान न भी हों तो हम विपरीत ध्रुवों में अवस्थित नहीं हो सकते क्योंकि हम एक समाज में एक ही समय में जी रहे हैं.
लेकिन पिछले एक दशक से मुझे धीरे-धीरे लगने लगा है कि मेरे और मेरे दर्शकों के बीच की दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि आज हम एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े नज़र आते हैं. मैं एक राष्ट्र के नागरिक के रूप में, स्वयं को दूसरों से ज्यादा बौद्धिक और तार्किक, लिहाज़ा बेहतर नागरिक नहीं मान सकता. लेकिन, यह सच है कि मेरे आसपास के लोग दिनों-दिन मुझे अजनबी-से लगने लगे हैं.
मैं उनकी आस्था को, उनमें व्याप्त व्यापक नफ़रत को, उनके उग्र विचारों, उनके नारों और मकसदों को नहीं समझ पाता हूं. मुझे अहसास होता है कि मैं अपने ही आसपास के समाज से अलग हूं; मैं अपने अपनों से भी दूर छिटक गया हूं. मैं अपने रचनाकार होने पर सवाल उठाता हूं कि मैं फिर किसके लिए रच रहा हूं ? क्या महज एक चित्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाये रखने के लिए ही मैं कैनवासों पर रंग चढ़ा रहा हूं?
एक रचनाकार के रूप में, पचास वर्षों के इस लंबे दौर से गुजरते हुए मैंने चित्रकला को एक उदार और वैश्विक कला के रूप में देखने की कोशिश की लेकिन, एक भारतीय चित्रकार के रूप में मैं इस सच से भी वाक़िफ़ हूं कि आज मेरा समाज जिस संकीर्णता से ग्रस्त है, उसके पीछे चित्रकला के जरिये सत्ता की साजिशों की सफलता ही है. अनेक भाषाओं में विभाजित भारत जैसे देश में, युगों-युगों से धर्म और राजसत्ता ने अपने स्वार्थ में असंख्य कल्पित कथाओं को गढ़कर, चित्रों के माध्यम से निरक्षर जनता के बीच निरंतर पहुंचाया है.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में राजा रवि वर्मा ने देवी-देवताओं की छवियों को अपनी कल्पना से यूं साकार किया कि इतिहास में पहली बार हमें अपने देवी-देवता, हम जैसे ही जीवंत लगने लगे. यह वास्तव में एक ऐसा यथार्थ था जो काल्पनिक होते हुए भी परम विश्वसनीय था. इस विश्वसनीयता के पीछे न केवल पाश्चात्य कला का योगदान था बल्कि चित्र रचना में बेहतर और वैज्ञानिक तकनीकों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी.
लेकिन दुर्भाग्य से विज्ञान ने जहां मनुष्य को प्रगति के पथ पर अग्रसर होने की राह दिखाई, वहीं हमारे देश में धर्म ने उसका प्रयोग कलाओं के साथ जोड़कर अतीत में लौटने की आस्था को आधार दिया.
राजा रवि वर्मा के समय ही भारत में फोटोग्राफी का आगमन हुआ जिसने ‘यथार्थ’ की अनुकृति को एक सर्वथा नए ढंग से प्रस्तुत किया. फोटोग्राफी जैसी वैज्ञानिक तकनीक के विकास के दौर में ही रंगीन छापा चित्रकला (क्रोमोलिथोग्राफी) का आविष्कार हुआ और जिसने जल्द ही भारत में हिंदू धर्म की एक नई अवधारणा प्रस्तुत करने में अपनी युगान्तकारी भूमिका अदा की.
राजा रवि वर्मा के चित्रों की सबसे बड़ी सीमा उनके प्रदर्शन को लेकर थी. भारत जैसे बड़े किंतु साधनविहीन देश की जनता को चित्र प्रदर्शनियों के माध्यम से, देवी-देवताओं के नव निर्मित रूपों से परिचित करवाना संभव नहीं था. ऐसे समय में क्रोमोलिथोग्राफी छापा-चित्रों के माध्यम से छोटे-बड़े शहरों-कस्बों-गांवों तक राजा रवि वर्मा के चित्र पहुंचे.
यहां गौरतलब है कि तब तक धार्मिक कथाएं साहित्य के माध्यम से ही आमजन तक पहुंचती रही थीं लेकिन रंगीन छापा-चित्रों के जरिये इन कथाओं को न केवल व्यापक विस्तार मिला बल्कि धार्मिक कथानायकों के रूपों का एक मानकीकरण भी संभव हुआ. जिस रूप में देवता मंदिरों की मूर्तियों में दिखते थे, उससे कहीं ज्यादा प्रमाणिक और विश्वसनीय ढंग से वे आमजन के घरों की दीवारों पर टंगे छापा-चित्रों में दिखे.
भारत में आमजन के लिए मूर्तियां अपरिचित नहीं थीं और चित्रकला का संबंध धार्मिक, सामाजिक उत्सवों के समय दीवार, किसी वस्तु या फर्श पर बनाई जाने वाली परंपरागत आकृतियों और नक्काशियों तक ही सीमित था. ऐसे समाज में पहली बार, छापा-चित्र वास्तव में लोककला से सर्वथा भिन्न, एक नागर कला के रूप में सामने आए जिसके माध्यम से, ‘दीवार पर टांगी जाने वाली द्विआयामी कला-वस्तु’, जिसे पेंटिंग या चित्र कहा जाता है; के रूप से जनता परिचित हो सकी.
यहां ध्यान देने योग्य बात है कि भारत के विभिन्न काल के शासकों के अधीन, प्रायः उनकी राजधानियों में विकसित राज्याश्रित चित्रकला का संबंध न तो आम जन से था और न ही (कुछ अपवादों को छोड़कर) उनमें आम जन का जिक्र था.

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इस दौर में छापा-चित्रों का असर पूरे देश पर समान रूप से पड़ा जिसके चलते प्रांतों और प्रदेशों में बंटे हिंदुओं का एक समुदाय के रूप में उदय हुआ. अपने तमाम अंतरों के बावजूद, दक्षिण प्रदेश का हिंदू स्वयं को उत्तर या पूर्वी प्रदेश के हिंदू से जुड़ा पाने लगा.
छवि या प्रतिमा-निर्माण के क्षेत्र में यह एक बहुत बड़ी क्रांति थी. जिन देवी-देवताओं को जनता ने पत्थरों पर तराशी गई वर्णहीन मूर्तियों के रूप में देखा था, उन्हें अब वह एक ऐसे नए रूप में देख रही थी, जहां उनकी त्वचा का रंग उनके वस्त्रों और पृष्ठभूमि के रंग से भिन्न था. उनके बालों की कोमलता, उनके पास से होकर बहती नदी की तरलता से भिन्न थी. चित्रों के वे सभी पात्र, चित्रकार की कोरी कल्पना ही थे, लेकिन आम दर्शकों को वे जीवंत और यथार्थ लगने लगे.
भारत की विशाल जनता के लिए ऐसा यथार्थ किसी जादुई अनुभव से कम न था. सामूहिक पूजा-पाठ के लिए बने गिने-चुने मंदिरों के स्थान पर इन छापा-चित्रों की उपलब्धता के चलते घर-घर में पारिवारिक देवालय बनने लगे.
इससे हालांकि मंदिरों का महत्त्व कम नहीं हुआ लेकिन धार्मिक कार्यकलापों का लोकतांत्रीकरण अवश्य हुआ. जिन देवालयों में दलितों और महिलाओं का प्रवेश वर्जित था, वहां वे अपने घरों की दीवारों पर इन चित्रों को टांगकर, अपने व्यक्तिगत ‘मंदिर’ बनाकर उनकी उपासना कर सके.
एक ऐसे वक़्त, जब पारसी रंगमंच ने पौराणिक, धार्मिक या ऐतिहासिक कथाओं को मंचन के माध्यम से जनता तक पहुंचाया; ऐसी ही कथाओं के चित्रणों को छापा-चित्रों के जरिये जनता के बीच धार्मिक आस्था की नई छवियों के सहारे अभूतपूर्व गति दी गई. गाय के, न केवल माता मानकर चित्र बने बल्कि गाय में असंख्य देवी-देवताओं का वास है, यह दर्शाते हुए अनेक छापा-चित्रों के संस्करण पूरे हिंदुस्तान में दिखाई देने लगे. इन चित्रों में अनिवार्य रूप से पारसी, ईसाई, मुसलमान और हिंदू नागरिकों को दिखाया गया. इन चित्रों में योजनाबद्ध तरीके और सहजता से पक्ष और प्रतिपक्ष के निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत भी की गई.
सन् 1880 से 1930 तक के दौरान मुंबई-कलकत्ते में छोटे-बड़े प्रेसों से बहुत बड़ी संख्या में धार्मिक चित्रों का मुद्रण और वितरण संभव हुआ. इन चित्रों में पूरी तरह झूठ का आधिपत्य था, जिसका उद्देश्य चित्रकला की विश्वसनीयता को भुनाकर अपने-अपने स्वार्थों की सिद्धि करना था. चित्रों का यह व्यापक प्रभाव केवल धर्म तक ही सीमित नहीं था बल्कि विपणन और राजनीति में इसने अपने आकर्षक दिखने वाले झूठ से जनता को गुमराह किया.

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छापा-चित्रों के माध्यम से चित्रकला के ऐसे प्रभावी दौर में ही धीरे-धीरे सिनेमा के आगमन और विकास की शुरुआत हुई. प्रतिमा या इमेज बनाने में सिनेमा, अन्य सभी कला विधाओं से कहीं ज्यादा प्रभावशाली साबित हुआ और उसने सस्ते मनोरंजन के नाम पर कुरुचि और अंधविश्वास को बहुत कम समय में, बेहद असरदार तरीके से समाज में फैलाया. आज हम कई देवी-देवताओं के बारे में जानते हैं, जिनका आगमन महज पिछली सदी में फिल्मों के माध्यम से हुआ था.
चित्रकला के इसी विस्तार के क्रम में, सिनेमा को हम विज्ञान और तकनीक के, प्रतिगामी आस्था के प्रचार में एक प्रभावी माध्यम के रूप में सक्रिय होते देखते हैं. किसी देवता या बाबा के मंदिर में पूजा-पाठ से किसी का अंधत्व दूर होने से लेकर देवताओं द्वारा स्वप्न निर्देश मिलने की उत्कट कथाओं जैसे तमाम अन्य किस्म के तिलस्मी क़िस्सों, कहानियों को फिल्मों के माध्यम से देश की विशाल, अशिक्षित और निरक्षर जनता तक बेहद विश्वसनीय तरीके से पहुंचाया गया.
नित नए वैज्ञानिक अन्वेषणों और तकनीकों के सहारे कला के नाम पर जनता के बीच मनचाही प्रतिमाओं या इमेज का निर्माण कर, उसे आस्था के ऐसे अन्धकार में ले जाने का प्रयास किया गया, जहां सत्य के वैज्ञानिक और तार्किक आधारों को अर्थहीन बना दिया गया.
सुनियोजित ढंग से प्रतिमाओं का पुनर्निर्माण और समाज पर उसके प्रभाव को समझने के लिए हम 2015 में मंगलुरु के चित्रकार करन आचार्य द्वारा बनाये गए उग्र या ‘नाराज़’ हनुमान की छवि को देख सकते हैं. राम-कथा में सदियों से ज्ञान के सागर के रूप में पूजित, शांत स्वभाव के हनुमान का एक चित्रकार ने अत्यंत औसत दर्जे का चित्र बनाया.
चित्रकार ने इसकी व्याख्या में कहा कि, ‘मेरे हनुमान में तेवर है पर वे आक्रामक नहीं हैं. वह शक्तिशाली हैं पर दमनकारी नहीं.’
शुरुआती दौर में बैंगलोर में ये चित्र बहुत कम समय के भीतर दीवारों, गाड़ियों, स्कूटरों आदि पर स्टिकर्स के रूप में व्यापक रूप से चिपके दिखाई दिए. 2017 में यकायक बैंगलोर में सर्वत्र, ‘नाराज हनुमान’ के नारंगी और काले रंग के विभिन्न आकारों वाले असंख्य स्टिकर चिपके दिखाई दिए. इसके कुछ ही दिनों बाद समूचे हिंदीभाषी पट्टी के सभी शहरों में अनगिनत वाहनों पर यह स्टिकर चिपके दिखाई देने लगे. विशेष रूप से रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों की टैक्सियों के शीशों पर नाराज़ हनुमान के चित्र दिखने लगे.
इसी क्रम में, 2018 को मंगलुरू की चुनाव रैली में देश के प्रधानमंत्री द्वारा इस चित्र की प्रशंसा से, हनुमान की इस नवनिर्मित छवि को और भी व्यापक प्रचार मिला.

अब यहां यह सवाल उठता है कि इस उग्र छवि के अनुसार हनुमान किस पर और क्यों नाराज़ हैं?
दरअसल, किसी के ‘नाराज़’ होने की स्थिति में अनिवार्य रूप से एक ‘विपक्ष’ का निर्माण होता है. हनुमान की उग्र छवि के सामने ‘विपक्ष’ के रूप में एक दूसरे धर्म, औपनिवेशिक अतीत और वर्तमान राजनीतिक विपक्षी दल को खड़ा करने का प्रयास किया गया. पहले यह मान लिया गया कि हमारी मौजूदा दुर्दशा के लिए ये तीन शक्तियां ज़िम्मेदार हैं, जिन्होंने हम वीर भारतीयों को दब्बू या डरपोक बनाया.
ऐसे प्रतिपक्ष को नष्ट करने के लिए हनुमान का उग्र होना स्वाभाविक है और इसीलिए हनुमान की ऐसी उग्र छवि में हिंदुओं को कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा. हनुमान की नाराज़ प्रतिमा का प्रयोग केवल वाहनों पर चिपकाए जाने वाले स्टिकरों तक ही सीमित नहीं रहा. कई दक्षिणपंथी संस्थाओं ने अपनी पताकाओं में इसे इस्तेमाल किया तो कांवरों के झंडों पर भी नाराज हनुमान दिखे.
वाहनों पर चिपके ऐसे स्टिकरों ने वाहनों के चालकों और स्वामियों को एक खास धर्म के साथ जोड़ने में सफलता हासिल की. इस सफलता ने इन धर्मावलंबियों को आज़ादी के बाद पहली बार गाड़ी के शीशे पर नारंगी पताका युक्त अपने धार्मिक परिचय का उद्घोष करने वाले स्टिकर चिपकाने के तर्क भी दिए.
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इस प्रकार जनता के बीच ‘विपक्ष’ यानी शत्रु को चिह्नित करने के लिए निर्मित एक आख्यान के अनुरूप छवि का निर्माण और फिर उसे योजनाबद्ध तरीके से व्यापक प्रचार के माध्यम से समाज में पक्ष और विपक्ष जैसे दो ध्रुवों का निर्माण! इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में चूंकि ‘चित्र’ या ‘छवि’ की प्रमुख भूमिका रही है, इसलिए एक चित्रकार होने के नाते मैंने भारत में चित्रकला के राजनीतिक और धार्मिक इस्तेमाल की पड़ताल करने की कोशिश की. मेरा मानना है कि
राजा रवि वर्मा द्वारा देव-प्रतिमाओं के निर्माण और उसके साथ छपाई की नई तकनीकों के आगमन के बाद, पिछले डेढ़ सौ सालों में क्रमशः भारतीय समाज में तार्किकता का ह्रास होता गया और अंधश्रद्धा तथा नियतिवाद को एक व्यापक विस्तार मिला. आज की परिस्थितियां महज उसकी निरंतरता को ही दर्शाती हैं.
युगों से भारतीय चित्रकला की यात्रा, किसी काल्पनिक कथा-चरित्र के साहित्य से निकलकर चित्रकला के जरिये ‘मूर्त’ होने की यात्रा रही है, जिसे हम चित्रण या इलस्ट्रेशन कह सकते हैं. बावजूद इसके कि, आज़ादी के पहले के सौ वर्षों के दौरान हमारे देश में चित्रकला का उपयोग धार्मिक प्रचार में ही ज्यादा होते दिखा; इस जकड़न से मुक्त होने का प्रयास भी दिखा.

बीसवीं सदी के आरंभ में इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं – सरस्वती, प्रवासी और मॉडर्न रिव्यू में न केवल चित्रकला पर केंद्रित आलोचनाएं प्रकाशित हुईं बल्कि देश के अग्रणी चित्रकारों के रंगीन चित्रों को भी पत्रिका में स्थान मिला, जिसके चलते साहित्य के पाठकों और तत्कालीन चित्रकारों के बीच एक संवाद बन सका.
देश के प्रमुख शहरों में संग्रहालयों के साथ-साथ कलादीर्घाएं भी बनने लगी थीं, जिनके माध्यम से चित्रों का जनता के साथ एक संबंध बन रहा था. इस दौर में कलकत्ता, बंबई, लाहौर, दिल्ली और मद्रास जैसे शहरों में कलाकारों के बीच चित्रकला को लेकर नई-नई बहसों की शुरुआत हो चुकी थी. आज़ादी के बाद यकायक चित्रकला परिदृश्य में बदलाव की आंधी-सी चल पड़ी.
जहां भारतीय कलाकारों में पश्चिम की कला का अनुकरण करने की प्रवृत्ति दिखाई दी, वहीं दूसरी ओर अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश की अगुआई में अमूर्त चित्रकला के प्रचार का एक सुनियोजित प्रयास भी दिखा. भारतीय चित्रकला में प्रगतिशील धारा को हाशिये से बाहर कर पाश्चात्य चित्रकला का अनुकरण करते कलाकारों के एक समूह ने भारतीय चित्रकला परिसर के केंद्र में अपनी जगह सुनिश्चित कर ली. उनकी ऐसी सफलता के पीछे विदेशी कूटनीतिक ताकतों के साथ-साथ महानगरों में रह रहे उच्चमध्यवर्गीय समाज की बदलती रुचियों का सम्मिलित योगदान था.
आज़ादी के बाद इस वर्ग ने कम समय में आशातीत आर्थिक संपन्नता अर्जित कर ली थी और वह हर तरह से अपने आसपास संघर्षरत आमजन से भिन्न दिखने के लिए प्रयासरत था. कलाओं के बारे में उनकी समझ और रुचि किसी अन्य कला के मानक को प्रभावित करने में सफल नहीं हो सकती थी, लेकिन, उनके लिए चित्रकला ही एक कला थी, जिसे वे अपनी आर्थिक क्षमता के बल पर अपनी रुचियों के मुताबिक बदल सकते थे.
इस वर्ग का आकार बहुत बड़ा तो कभी नहीं रहा लेकिन, भारतीय चित्रकला को इसने अपनी रुचियों के सांचे में सहज ही ढाल लिया. इस वर्ग ने न केवल चित्रकला को मात्र ‘पैसों से खरीदी जा सकने वाली कला’ के रूप में पहचाना बल्कि चित्रकला में निवेश से आर्थिक लाभ की संभावनाओं को भी विकसित किया.
कई दशक बीत जाने के बाद हम यह समझ सके कि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित चित्रकला समीक्षाओं और आलोचनाओं का उद्देश्य वास्तव में आम जन को कलाकारों और कला गतिविधियों के बारे में परिचित कराना नहीं था, बल्कि मुकम्मल ‘बाज़ार’ के निर्माण में यह महज एक प्रचारतंत्र के हिस्से के रूप में सक्रिय थे. हमने चित्रों को ऐसी पत्र-पत्रिकाओं के नामचीन प्रकाशकों और अखबार घरानों के स्वामियों के संग्रह से निकलकर नीलाम घरों तक पहुंचते भी देखा.

हमने जिस चित्रकला की विस्तार से यहां चर्चा की; सदियों से धर्म और राजसत्ता ने उसी चित्रकला के जरिये सुनियोजित तरीक़े से समाज के उस विशाल वर्ग को गुमराह किया है जिसे आज़ाद देश में एक स्वतंत्र कला की उत्कृष्टता से परिचित होना था. चित्रकला के आधुनिक स्वरूप को, जहां अनिवार्य रूप से लोकतांत्रिक होना था; भारत में एक ख़ास वर्ग ने उस पर अपना एकाधिपत्य कायम कर लिया है, जिसका आम इंसान से कोई रिश्ता नहीं है. इस वर्ग ने न केवल चित्रकला के लिए, अपने सुविधानुसार मनमाने प्रतिमान गढ़े बल्कि ख़ास अंग्रेजी भाषा में निष्णात आलोचकों और इतिहासकारों तक सीमित करने का काम भी किया है.
ऐसी स्थिति में आज देश के असंख्य गांवों-शहरों-कस्बों में रह रही विशाल आबादी का आधुनिक चित्रकला से कोई भी संवाद नहीं बचा है. महानगरों में भी, जहां सघन कला गतिविधियों की चर्चा होती है, आधुनिक भारतीय चित्रकला कुछ चिह्नित इलाकों तक ही सीमित हो चुकी है, महानगर के शेष इलाकों के बाशिंदों से उसका कोई लेना देना नहीं है. अन्य कलाओं से भिन्न, चित्रकला में मानो एक ऐसे नए ‘शासक वर्ग’ का आगमन हुआ है, जिसकी शर्तों पर अब चित्रकारों को रचना और जीना पड़ रहा है. उनका मान-सम्मान, सभी कुछ इस वर्ग की इच्छाओं पर टिका हुआ है.
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यह स्थिति, दो हज़ार वर्षों से चली आ रही उस परंपरा से ज्यादा भिन्न नहीं दिखती जहां देवालयों की दीवारों से लेकर शासकों के शौर्य के दस्तावेज के रूप में बनाई गई पोथियों पर क्या चित्रित करना है – इसे तय करने की आज़ादी चित्रकारों या मूर्तिकारों को नहीं थी बल्कि इसे उसके प्रायोजक ही तय करते थे.
समकालीन भारतीय चित्रकला भी न केवल महानगर केंद्रित है बल्कि यह सत्ता द्वारा प्रायोजित कला से बहुत ज्यादा भिन्न भी नहीं है.
एक चित्रकार के रूप में जब मैं अपने समाज के वर्तमान के साथ अतीत को समझने की कोशिश करता हूं तो मुझे चित्रकला के माध्यम से जनता के शोषण की निरंतरता दिखती है. एक चित्रकार को, जहां अपने कौशल में सिद्धहस्त होने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना पड़ता है; तार्किक, वैज्ञानिक और मानवतावादी दृष्टि को भी अपने में विकसित करने की ज़रूरत होती है.
चित्रकला में किसी प्रकार की संकीर्णता का कोई स्थान नहीं है. अपने मूल स्वरूप में चित्रकला वैश्विक होती है. उसे किसी प्रांत, प्रदेश या देश की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है. चित्रकला किसी भाषा पर आश्रित नहीं होती इसलिए साहित्य या रंगमंच की तरह उसे किसी भाषा विशेष के साथ भी नहीं जोड़ा जा सकता. युगों से विभिन्न सत्ताओं ने चित्रों को अपने स्वार्थ में किसी निश्चित कथा संदर्भ से जोड़ने की कोशिश की लेकिन चित्रकला में स्वयं को संदर्भों से मुक्त करने का सामर्थ्य सन्निहित होता है.
लेकिन चित्रकला को विकासमान बने रहने के लिए एक प्रगतिशील समाज की ज़रूरत होती है. अतीत में अपना अस्तित्व खोजने वाले समाज में चित्रकला, सत्ता स्वार्थों के लिए इस्तेमाल होने के लिए अभिशप्त होती है.
वे चित्रकार, जो बहुत छोटे दायरे में सीमित महानगरीय कला के बाज़ार के अभिन्न अंग हैं या वे, जो सत्ता के स्वार्थ सिद्धि हेतु अतीत,आस्थाओं और परम्पराओं से जुड़े दिखने के लिए अपने को तरह-तरह की संकीर्णताओं में सीमित करते जा रहे हैं; इन दोनों से अलग जो चित्रकार आज रचनारत हैं, उनके लिए आज का समय कहीं से भी उत्साहवर्धक नहीं लग सकता है.
पचास वर्षों से चित्र बनाने के बाद आज मुझे मेरा दर्शक अपरिचित लगने लगा है. अपने आसपास के साथी कलाकारों की बातों को नहीं समझ पा रहा हूं.
मुझे लगने लगा है कि हम एक ऐसा समाज बना चुके हैं, जिसे अब उस कला की ज़रूरत नहीं रही, जिसे हम कला मानते हैं. दरअसल चित्रकला, उनके लिए वाहनों पर चिपके स्टिकरों और पताकाओं पर बने उग्र हनुमान की छवि तक सीमित रह गई है.
यह मान लिया गया है कि रचनाशीलता का उत्कर्ष अशोक स्तम्भ के शेरों की आक्रामक मुद्रा में पुनर्रचना करने में ही है. ऐसे में आज भारतीय चित्रकला को सबसे बड़ी चुनौती, उसके बदले हुए दर्शक समाज की बदली हुई रुचि से मिल रही है. साथ ही, इस बात को मान लेने का कोई तर्कसंगत कारण नहीं है कि भविष्य में यदि कोई व्यवस्थागत बदलाव हुआ तो इस समाज में भी बदलाव आएगा.
(अशोक भौमिक चित्रकार, लेखक हैं.)
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