पाकिस्तान ने 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए डोनाल्ड ट्रंप को नामित किया

पाकिस्तान ने डोनाल्ड ट्रंप को 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करते हुए दावा किया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान संकट में निर्णायक भूमिका निभाई. ट्रंप खुद भी बार-बार इसका श्रेय लेते रहे हैं. हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि कोई अमेरिकी मध्यस्थता नहीं थी और बातचीत सैन्य स्तर पर हुई थी.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. (फोटो साभार: The White House)

नई दिल्ली: पाकिस्तान ने 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नामित किया है.

पाकिस्तान ने एक्स पर लिखा है कि ट्रंप को यह पुरस्कार ‘हालिया भारत-पाकिस्तान संकट के दौरान उनकी निर्णायक कूटनीतिक पहल’ के सम्मान में मिलना चाहिए.

ट्रंप बार-बार यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई— हालांकि भारतीय अधिकारी इस दावे को खारिज करते रहे हैं.
यह नॉमिनेशन उस समय सामने आया जब शुक्रवार, 20 जून, 2025 को ट्रंप से नोबेल पुरस्कार को लेकर सवाल पूछा गया.

इस पर उन्होंने कहा कि उन्हें यह पुरस्कार कई वजहों से मिलना चाहिए— जिनमें भारत और पाकिस्तान को लेकर उनका काम और वह संधि भी शामिल है, जो कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य तथा रवांडा के बीच शत्रुता को समाप्त करेगी. ट्रंप के मुताबिक़, इस संधि पर सोमवार को हस्ताक्षर होना है.

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, ‘मुझे अब तक चार या पांच बार नोबेल शांति पुरस्कार मिल जाना चाहिए था.’ उन्होंने आगे जोड़ा, ‘लेकिन वे मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं देंगे क्योंकि वे यह सिर्फ उदारवादियों को देते हैं.’

‘भारत-पाक युद्ध रोकने’ के लिए नोबेल नहीं मिलेगा: ट्रंप

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफसोस जताया है कि उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध ‘रोकने’ के लिए या रूस-यूक्रेन और इज़राइल-ईरान संघर्षों में उनकी कोशिशों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा.

शुक्रवार, 20 जून, 2025 को अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए ट्रंप ने लिखा, ‘मैं जो भी कर लूं, मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा.’

उन्होंने अपनी पोस्ट की शुरुआत इस खबर से की कि वे, विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ मिलकर, कांगो और रवांडा के बीच एक ‘शानदार’ संधि लेकर आए हैं. यह युद्ध ‘भीषण रक्तपात और मौत’ के लिए जाना जाता था, जो ‘कई अन्य युद्धों से भी ज़्यादा हिंसक’ था और दशकों से चला आ रहा था.

ट्रंप ने बताया कि रवांडा और कांगो के प्रतिनिधि सोमवार को वॉशिंगटन में इससे संबंधित दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने आएंगे. उन्होंने इसे ‘अफ्रीका के लिए एक महान दिन, और साफ-साफ कहें तो, दुनिया के लिए एक महान दिन’ बताया.

इसके बाद उन्होंने लिखा कि फिर भी, उन्हें अपनी किसी भी कोशिश के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा.

ट्रंप ने कहा, ‘मुझे इसके लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, मुझे भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रोकने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, मुझे सर्बिया और कोसोवो के बीच युद्ध रोकने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा.’

हालांकि भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि पाकिस्तान के साथ सैन्य संघर्ष खत्म करने पर बनी सहमति दोनों देशों की सेनाओं के सैन्य अभियान महानिदेशकों (डीजीएमओ) के बीच सीधे संवाद के ज़रिए हुई थी.

अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने आगे लिखा कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार इस बात के लिए भी नहीं मिलेगा कि उन्होंने ‘मिस्र और इथियोपिया के बीच शांति बनाए रखी.’

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मध्य पूर्व में अब्राहम समझौते के लिए भी नहीं मिलेगा, जबकि अगर सब कुछ ठीक रहा, तो इसमें ‘कई और देश’ शामिल होंगे और यह ‘ऐतिहासिक रूप से पहली बार’ पूरे मध्य पूर्व को एकजुट कर देगा. उन्होंने कहा, ‘नहीं, मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, चाहे मैं कुछ भी कर लूं— रूस/यूक्रेन, इज़राइल/ईरान — इन सबका जो भी नतीजा हो, लेकिन लोग जानते हैं, और मेरे लिए बस वही मायने रखता है.’

पाकिस्तान सरकार ने एक बयान में कहा, ‘क्षेत्रीय अस्थिरता के इस नाजुक दौर में, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस्लामाबाद और नई दिल्ली दोनों के साथ मज़बूत कूटनीतिक संवाद के ज़रिए जबरदस्त रणनीतिक दूरदर्शिता और असाधारण राजनयिक नेतृत्व का प्रदर्शन किया, जिससे तेज़ी से बिगड़ती स्थिति में गिरावट आई. इसका नतीजा संघर्षविराम के रूप में सामने आया और दो परमाणु ताकतों के बीच एक बड़े युद्ध को टाल दिया गया, जिससे क्षेत्र और उससे बाहर करोड़ों लोगों पर विनाशकारी असर पड़ सकता था.’

बयान में कहा गया कि यह ‘हस्तक्षेप’ ट्रंप की एक ‘सच्चे शांतिदूत’ के रूप में भूमिका और संवाद के ज़रिए टकराव सुलझाने की उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है.

इसमें यह भी उल्लेख किया गया कि ट्रंप ने कश्मीर मुद्दा हल कराने की ‘पेशकश’ की थी.

पाकिस्तानी सरकार ने कहा, ‘2025 के भारत-पाकिस्तान संकट के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप का नेतृत्व उनकी व्यावहारिक कूटनीति और प्रभावी शांति प्रयासों की विरासत को दर्शाता है. पाकिस्तान को उम्मीद है कि उनके ईमानदार प्रयास क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता में योगदान देना जारी रखेंगे — खासतौर पर मध्य पूर्व के उन संकटों के संदर्भ में, जिनमें ग़ज़ा में जारी मानवीय त्रासदी और ईरान से जुड़ी बिगड़ती स्थिति शामिल है.’

ट्रंप नोबेल क्यों चाहते हैं?

एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में जॉन बोल्टन, जो ट्रंप के पहले कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे, ने कहा कि रिपब्लिकन नेता (ट्रंप) नोबेल शांति पुरस्कार पाना चाहते हैं, क्योंकि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को यह पुरस्कार मिला था.

बोल्टन ने लिखा, ‘उन्हें यह पुरस्कार रूस-यूक्रेन युद्ध सुलझाने के लिए नहीं मिलेगा. उन्होंने हालिया भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम का श्रेय लेने की असफल कोशिश की. वे अब ईरान के साथ किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम हो रहे हैं, और अब उनसे इसराइल कह रहा है कि वे तेहरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम को नष्ट करने में मदद करें. और अभी तक उन्होंने कोई फैसला नहीं लिया है.’

गौरतलब है कि ओबामा को 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार उस वक्त दिया गया था जब उन्हें अमेरिका का राष्ट्रपति बने हुए आठ महीने भी नहीं हुए थे.

ट्रंप के दावे को भारत नकार चुका है

10 मई को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि भारत और पाकिस्तान ने ‘पूर्ण और तुरंत प्रभावी’ संघर्षविराम पर सहमति बना ली है, जो वॉशिंगटन की मध्यस्थता में ‘पूरी रात चली बातचीत’ के बाद हुआ.

ट्रंप यह दावा दर्जनभर से ज़्यादा बार दोहरा चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को ‘शांत कराने में मदद की’. ट्रंप ने कहा कि उन्होंने इन परमाणु हथियारों से लैस दक्षिण एशियाई पड़ोसियों से कहा कि अगर वे संघर्ष रोकते हैं तो अमेरिका उनके साथ ‘बहुत सारा व्यापार’ करेगा.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप की मुलाकात इस सप्ताह की शुरुआत में कनाडा के कानानास्किस में हुए जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान होनी थी. लेकिन ट्रंप जल्द ही वॉशिंगटन लौट गए. कनाडा की अपनी एक दशक बाद की पहली यात्रा खत्म करने से पहले मोदी ने ट्रंप से 35 मिनट तक फोन पर बातचीत की.

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कानानास्किस से एक वीडियो संदेश में कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप को साफ-साफ बता दिया कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद के दिनों में ‘किसी भी समय’ भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर कोई बातचीत नहीं हुई, और न ही भारत और पाकिस्तान के बीच अमेरिका की मध्यस्थता को लेकर कोई प्रस्ताव आया.

मिस्री ने बताया कि सैन्य कार्रवाई रोकने को लेकर बातचीत सीधे भारत और पाकिस्तान के बीच हुई, जो दोनों देशों की सेनाओं के मौजूदा संचार माध्यमों के ज़रिए हुई थी, और इसकी शुरुआत पाकिस्तान की ओर से की गई थी. प्रधानमंत्री मोदी ने दृढ़ता से कहा कि भारत न तो कभी मध्यस्थता को स्वीकार करता है और न ही करेगा.

बुधवार, 18 जून, 2025 को ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर को ह्वाइट हाउस में दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया.