बंद हो गया भारत का सबसे महंगा साहित्यिक पुरस्कार ‘जेसीबी प्राइज़ फॉर लिटरेचर’

देश का सबसे महंगा साहित्यिक पुरस्कार ‘जेसीबी प्राइज़ फॉर लिटरेचर’ अब बंद कर दिया गया है. यह पुरस्कार न सिर्फ 25 लाख की राशि देता था, बल्कि भारतीय भाषाओं के अनुवादों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाला मंच था. लेखकों और अनुवादकों ने इस फैसले को साहित्यिक क्षति बताया है.

(फोटो साभार: फेसबुक/जेसीबी)

नई दिल्ली: देश का सबसे महंगा साहित्यिक पुरस्कार ‘जेसीबी प्राइज़ फॉर लिटरेचर’ अब बंद कर दिया गया है. सालाना दिया जाने वाला इस पुरस्कार की राशि 25 लाख रुपये थी.

इस पुरस्कार को आखिरी बार 2024 में लेखक उपमन्यु चट्टोपाध्याय को उनकी किताब ‘Lorenzo Searches for the Meaning of Life’ के लिए दिया गया था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुरस्कार को बंद किए जाने की पुष्टि जेसीबी पुरस्कार की लिटरेरी डायरेक्टर मीता कपूर ने 21 जून को की. हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट करने से इनकार कर दिया कि इस फैसले के पीछे क्या कारण थे.

उन्होंने कहा, ‘पुरस्कार बंद कर दिया गया है. मैं उस बात से इनकार नहीं करूंगी जो स्पष्ट है. लेकिन बाकी हर बात पर — नो कमेंट.’

यह खबर ऐसे समय आई है जब जेसीबी लिटरेचर फाउंडेशन का लाइसेंस रद्द कर दिया गया है, जो कि उसे कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8(5) के तहत जारी किया गया था. 12 मार्च को जेसीबी प्राइज़ की वेबसाइट पर जारी एक नोटिस के अनुसार, फाउंडेशन ने दिल्ली और हरियाणा के कंपनी रजिस्ट्रार के पास अपने लाइसेंस को रद्द करने का आवेदन भेजा था.

नोटिस में कहा गया, ‘कंपनी को अब अपने नाम में ‘फाउंडेशन’ की जगह ‘प्राइवेट लिमिटेड’ शब्द जोड़ना होगा.’ यह साहित्यिक पुरस्कार उस ‘फाउंडेशन’ द्वारा दिया जाता था, जिसे भारत में साहित्य की कला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था.

2018 में स्थापित जेसीबी प्राइज़ फॉर लिटरेचर, न केवल बड़ी नकद राशि वाला पुरस्कार था, बल्कि यह भारतीय कथा साहित्य, खासतौर पर अनुवादित रचनाओं को सम्मानित करने वाला एक अग्रणी मंच था.

इस पुरस्कार के सात संस्करणों में से पांच बार यह अनूदित कृतियों को दिया गया —

2018 में बेन्यामिन की ‘Jasmine Days’, जिसे मलयालम से शहनाज़ हबीब ने अनुवादित किया था,
2020 में एस. हरीश की ‘Moustache’, जिसे मलयालम से जया श्री कलातिल ने अनुवादित किया,
2021 में ‘Delhi: A Soliloquy’, मलयालम से फातिमा ई.वी. और नंदकुमार के. द्वारा अनुवाद,
2022 में खालिद जावेद की ‘The Paradise of Food’, जिसे उर्दू से बारन फारूक़ी ने अनुवादित किया,
और 2024 में पेरुमल मुरुगन की ‘Fire Bird’, जिसे तमिल से जननी कन्नन ने अनुवादित किया.
2019 में पुरस्कार माधुरी विजय की ‘The Far Field’ को मिला था.

पेरुमल मुरुगन, जो 2018 में ‘Poonachi’ और फिर 2019 में ‘A Lonely Harvest’ व ‘Trial by Silence’ के लिए शॉर्टलिस्ट हुए थे, उन्हें साल 2019 में यह सम्मान मिला था. मुरुगन पुरस्कार के बंद होने की खबर से दुखी हैं.

उन्होंने कहा, ‘यह भारतीय साहित्य, खासकर भारतीय भाषाओं के लिए दुखद है. जेसीबी पुरस्कार ने भारतीय भाषाओं का सम्मान किया और अनुवादों को पुरस्कार दिया. यह एक बड़ा पुरस्कार था — लेखक को 25 लाख रुपये और अनुवादक को 10 लाख रुपये मिलते थे. इससे यह साफ था कि वे भारतीय भाषाओं को अहमियत देते थे. मलयालम की रचनाएं दो बार जीतीं और तमिल व उर्दू एक-एक बार.’

मुरुगन अपने उपन्यास ‘Madhorubhagan’ (जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘One Part Woman’ है) के लिए जाने जाते हैं. हिंदी में इस किताब का अनुवाद ‘नर-नारीश्वर’ नाम से हुआ है.

दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया में उर्दू के प्रोफेसर खालिद जावेद ने इस फैसले की समीक्षा की मांग की है. जावेद 2022 में इस पुरस्कार के विजेता रहे थे.

उन्होंने कहा, ‘यह भारतीय लेखन और अनुवाद के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है, क्योंकि जेसीबी पुरस्कार से जो पहचान एक लेखक को मिलती है, वह वैश्विक साहित्यिक परिदृश्य में बेहद अहम है. वरना भारतीय लेखन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अदृश्य ही रह जाता. मेरा मानना है कि इस निर्णय की भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और यहां की भाषायी राजनीति को देखते हुए समीक्षा होनी चाहिए.’