ब्रिटिश राज में हिंदी पत्रकारिता पर पहरा: जब कलम को बेड़ियों में जकड़ने के लिए बनते थे क़ानून

पुस्तक अंश: पत्रकारिता के प्रारम्भ और विकास के साथ ही प्रेस की स्वतन्त्रता की अवधारणा पर विचार भी किसी-न-किसी प्रकार प्रारम्भ हो गया था. भारत में पत्रकारिता के जन्म के साथ ही उसका दमन भी शुरू हो गया था.

पुस्तक आवरण (साभार: राजकमल प्रकाशन)

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में हिंदी पत्रकारिता केवल खबरों के प्रसार का माध्यम नहीं थी, बल्कि यह उपनिवेशवाद के खिलाफ जनता की चेतना का जीवंत दस्तावेज भी बनी. राज सत्ता की तमाम पाबंदियों और दमन के बावजूद, हिंदी के अनेक समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने का साहस करती रहीं. हिंदी पत्रकारिता का यह स्वर्णिम लेकिन दमनग्रस्त अध्याय, जिसे इतिहास की मुख्यधारा में अक्सर उपेक्षित कर दिया गया, अब पुनः पाठकों के सामने है.

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित संतोष भदौरिया की पुस्तक ‘अंग्रेजी राज और हिंदी की प्रतिबंधित पत्रकारिता’ का यह अंश विस्तार से बताता है कि कैसे प्रेस-अधिनियमों, सेंसरशिप और जब्ती की नीतियों के बीच हिंदी पत्रकारिता ने अपनी राह खुद बनाई. यह न केवल उस दौर की पत्रकारिता के संघर्ष को सामने लाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस तरह सत्ता से टकराना भारतीय पत्रकारिता की बुनियाद में शामिल रहा है.

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स्वाधीनता आंदोलन और हिंदी-पत्रकारिता अपने उद्भव-काल से ही परस्पर सम्बद्ध रहे हैं. वस्तुतः हिंदी-पत्रकारिता भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन की एक अनिवार्य परिणति है. स्वाधीनता आंदोलन के समानान्तर हिंदी-पत्रकारिता का विकास हुआ. ब्रिटिश शासन का असली चरित्र उस समय की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों, सामयिक प्रतिक्रियाओं और टिप्पणियों के माध्यम से उजागर होता है. हिंदी पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन तथा उससे जुड़ी जनता की आकांक्षाओं को वाणी दी. फलस्वरूप अंग्रेज सरकार ने क्रान्तिकारी पुस्तकों के साथ-साथ पत्रिकाओं को भी जब्त कर लिया. सर्वप्रथम बंगाल के वन्देमातरम्, युगान्तर, फारवर्ड ब्लाक जैसे पत्रों को जब्त किया गया. साथ ही अनेक पत्रिकाओं के संपादकों और प्रकाशकों से जमानतें मांगी गईं. प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात जब स्वाधीनता आंदोलन ने जोर पकड़ा तो हिंदी पत्रिकाओं ने क्रान्तिकारी लेखों, कविताओं और कहानियों के माध्यम से आग उगलनी शुरू की. स्वाधीनता आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली पत्रिकाओं में प्रताप, मर्यादा, प्रभा, हंस, चाँद, सैनिक, क्रान्ति, विप्लव आदि विशेष उल्लेखनीय हैं. वस्तुतः जब कोई लेखन व्यवस्था के खिलाफ जाता है तो उसे प्रतिबंधन का शिकार होना पड़ता है. ब्रिटिश सरकार ने भी हिंदी की अनेक पत्रिकाओं को जब्त कर लिया.

हिंदी की प्रतिबंधित पत्रिकाओं के अंकों को देखने से प्रतिबंधन के कारणों का पता चलता है. प्रतिबंधन के कारणों की पड़ताल के लिए अधिक गइराई में जाने की आवश्यकता नहीं है. पत्रिकाओं के प्रतिबंधन का कारण आज जितना स्पष्ट है, उतना उस समय भी था. कोई भी साम्राज्यवादी सरकार विरोध में उठनेवाली आवाज को सहन नहीं कर पाती. पत्रिकाओं के प्रतिबंधन का कारण है यह है कि ये ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नींव को हिला रही थीं. यही कारण कि पत्रिकाओं के प्रत्येक अंक पर सरकार की निगाह चौकस रहती थी. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान प्रतिबंधित पत्र-पत्रिकाओं का महत्त्व इस बात में है कि उनमें अंग्रेजी राज का तीव्र अवरोध है. ये पत्रिकाएँ किसी कल्पनालोक का निर्माण नहीं करतीं, बल्कि हमें स्वाधीनता आंदोलन की चेतना से जोड़ती हैं. इनमें भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का अलिखित इतिहास बंद है. हिंदी पत्रकारिता के विकास में प्रतिबंधित पत्रिकाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है.

पत्रकारिता के प्रारम्भ और विकास के साथ ही प्रेस की स्वतन्त्रता की अवधारणा पर विचार भी किसी-न-किसी प्रकार प्रारम्भ हो गया था. भारत में पत्रकारिता के जन्म के साथ ही उसका दमन भी शुरू हो गया था. प्रशासनिक दमन के विरुद्ध संघर्ष का जो साहस तत्कालीन पत्रिकाओं ने दिखाया, वह आनेवाले काल में पत्रकारिता-जगत के लिए आदर्श बन गया. संघर्ष के इस मार्ग पर अनेक पत्रों और पत्रकारों ने कष्ट उठाए किन्तु कभी भी परिस्थितियों के समक्ष झुके नहीं, कहीं किसी प्रकार का समझौता नहीं किया. सत्ता एवं प्रेस का यह संघर्ष ऐतिहासिक तथ्य है. पराधीन भारत से लेकर स्वतन्त्र भारत के इस ऐतिहासिक दौर में अनेक ऐसे प्रकरणों के उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनमें सत्ता-पक्ष ने समाचार-पत्रों के मुँह बंद करने के प्रयास किए. प्रत्येक देश में यह संघर्ष किसी-न-किसी रूप में चलता रहता है- कहीं प्रखरता के साथ तो कहीं गौण रूप से. प्रेस जहां किसी प्रकार के बाह्य बन्धन में रहकर कार्य करने को इच्छुक नहीं होती, वहीं सरकार राष्ट्रीय और सामाजिक हितों एवं दायित्वों की आड़ में अपने स्वार्थों के पोषण के लिए प्रेस पर येन-केन प्रकारेण नियन्त्रण रखना चाहती है. ब्रिटिश सरकार की छत्रच्छाया में जन्मे भारतीय प्रेस की आरम्भिक संघर्ष-कहानी अत्यन्त रोचक है. विरोध, दमन एवं नियन्त्रण के दुश्चक्र से निकलकर स्वतन्त्र भारत में प्रेस ने राष्ट्रीय एवं सामाजिक नवनिर्माण की दिशा में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

भारत में प्रेस-अधिनियम का इतिहास पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन के साथ ही शुरू होता है. पत्रकारिता के प्रारम्भिक दौर में प्रेस कानून को निर्मित करने में ईस्ट इंडिया कम्पनी की प्रमुख भूमिका रही. आरम्भ में किसी भी प्रेस-संबंधी कानून के अभाव में पत्र-पत्रिकाएँ ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारियों की दया पर ही निर्भर थीं. कम्पनी के अधिकारी यह नहीं चाहते थे कि वे समाचार-पत्र जिनमें उनके उपक्रमों का उल्लेख होता था, किसी प्रकार लन्दन पहुँच जाएं. शासन के लिए परेशानी पैदा करनेवाले अंग्रेज संपादकों को तो लन्दन वापस भेज दिया जाता था, लेकिन यह सलूक भारतीयों के साथ नहीं किया जा सकता था. समाचार पत्रों की संख्यात्मक वृद्धि के साथ-साथ उनके बढ़ते प्रसार और प्रभाव को नियन्त्रित करने के लिए सर्वप्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली ने 13 मई, 1799 को प्रेस-अधिनियम को पारित किया. इस अधिनियम के द्वारा समाचार-पत्र के संपादक, मुद्रक एवं स्वामी का नाम स्पष्ट रूप से प्रकाशित करना अनिवार्य कर दिया गया था. प्रकाशक को प्रकाशित किए जानेवाले समाचार को पास कराने के लिए सरकारी सचिव को देना पड़ता था. इन नियमों को भंग करने पर तुरन्त जलावतनी का दंड मिलता था. 1807 में यह अधिनियम पत्रिकाओं, पैम्फ्लेट तथा पुस्तकों आदि सभी पर लागू कर दिया गया. 1799 के अधिनियम के अनुसार रविवार को पत्र का प्रकाशन नहीं किया जा सकता था.

समाचार-पत्रों के प्रचार-प्रसार के साथ तथा जनता की समाचारों के प्रति बढ़ती उत्सुकता ने पत्रों की विषयवस्तु आदि को भी प्रभावित किया. भारतीय जनता को नवीनतम गतिविधियों की सूचना प्राप्त होने लगी. संपादकीय स्तम्भों तथा अन्य वैविध्यपूर्ण सामग्री के प्रकाशन एवं उनके अध्ययन से नवीन राजनीतिक चेतना का अभ्युदय हुआ. इस स्थिति में यह स्वाभाविक ही था कि स्वातन्त्र्यप्रिय भारतीय मानव अंग्रेजी सत्ता को समाप्त करने के लिए संकल्पबद्ध हो जाएं. भारतीयों की इन भावनाओं को दबाने के लिए तत्कालीन गवर्नर जनरलों ने समय-समय पर प्रेस को नियन्त्रित करने के लिए कठोर अधिनियम पारित किए. समाचार पत्रों ने भारतीय प्रगति और समृद्धि में आड़े आनेवाले तत्त्वों का खुलेआम विरोध किया. इस दौर की मिशनरी पत्रकारिता ने हालाँकि प्रत्यक्ष रूप से भारतीय जनमानस को विशेष प्रभावित नहीं किया, फिर भी सार्वजनिक जागरण की दिशा में इनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. तत्कालीन भारतीय प्रगतिशील चिन्तकों ने भारतीय जनता को नेतृत्व प्रदान कर उसका मार्ग प्रशस्त किया. संघर्षशील भारतीय पत्रकारिता अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपनी धरती से जुड़कर भारतीय परिवेश को आत्मसात करती हुई आगे बढ़ी तथा जन-जन की आशाओं तथा आस्थाओं का केन्द्र बनी. यह राजा राममोहन राय का ही सामर्थ्य था कि जब ईसाई मिशनरियों ने भारतीय सांस्कृतिक वैभव तथा विशिष्टता पर प्रहार करने शुरू किए तो उनकी इस प्रवृत्ति का विरोध ‘ब्राह्मोनिकल मैगजीन’ के माध्यम से करके अपनी मौलिकता व विशिष्टता को सुरक्षित रखने का सार्थक प्रयास किया.

भारतीय पत्र-पत्रिकाओं ने जब जनता की वाणी को अभिव्यक्ति देना आरम्भ किया तो ब्रिटिश अधिकारी उसे सहन नहीं कर सके. प्रेस की शक्ति एवं महत्त्व से अवगत अंग्रेज अधिकारियों ने स्वतन्त्र प्रेस की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया. प्रेस पर लागू किए गए इन नियन्त्रणों के कारण समाचार-पत्र-प्रकाशन में अधिक तेजी न आ सकी. समाचार पत्रों में जब सैनिक गतिविधियों के बारे में तथा अन्य प्रतिबंधित सन्दर्भों के समाचार छपने लगे तो प्रेस पर कठोर नियन्त्रण लागू हुआ. इसका स्वाभाविक परिणाम हुआ-भूमिगत प्रेस का उदय. इसी दौरान 1807 में लॉर्ड मिंटो गवर्नर जनरल के तौर पर भारत आए. उसने आदेश दिया कि बैपटिस्ट मिशनरियाँ अपने प्रिंटिंग प्रेस कलकता में स्थानान्तरित करें, किन्तु यह प्रयास सफल नहीं रहा. 1799 में प्रेस-अधिनियम के नियमों को मिंटो ने सख्ती से लागू किया.

लॉर्ड हेस्टिंग्स की नियुक्ति 1813 में गवर्नर जनरल के रूप में हुई. हेस्टिंग्स ने प्रेस-अधिनियम में ढील दी. अपने उदारवादी और प्रगतिशील विचार के कारण उसने 1818 में समाचार-पत्रों का पूर्व-पत्रेषण (प्री-सेन्सरशिप) बंद कर दिया. फिर भी सरकार ने समाचार-पत्रों के संपादकों के मार्गदर्शन के लिए सामान्य नियम बनाए ताकि उन विषयों की विवेचना न हो, जिनसे सरकार के अधिकार अथवा जनहित को क्षति पहुँचे. लॉर्ड हेस्टिंग्स के उदारवादी दृष्टिकोण के कारण पत्रकारिता को विकास के नए अवसर मिले. अनायास ही समाचार-पत्रों की संख्या में वृद्धि हुई. संपादकों को मुख्य राहत यह मिली कि पत्र के प्रकाशन के पूर्व की सेन्सरशिप अथवा सरकारी अधिकारी को प्रूफ दिखाने की बाध्यता समाप्त कर दी गई. भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत इसी दौर में हुई. अंग्रेजी भाषा का पहला समाचार-पत्र ‘द बंगाल गज्जट’ (1818) गंगाधर भट्टाचार्य के संपादकत्व में शुरू हुआ. पत्र अल्पजीवी रहा, किन्तु गंगाधर भट्टाचार्य की सेवाएँ भारतीय पत्रकारिता में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं. भट्टाचार्य राजा राममोहन राय से काफी प्रभावित थे. एस. नटराजन लिखते हैं, ‘सम्भवतः राजा राममोहन राय इस नवीन प्रकाशन के लिए उत्तरदायी थे.’

सरकार के मुख्य प्रतिबंधन अधिकारी के रूप में कार्य कर चुके जॉन एडम सन 1823 में स्थानापन्न कार्यवाहक जनरल बने. एडम तथा तत्कालीन अधिकारियों ने प्रेस की स्वतन्त्रता को अंग्रेजी शासन के लिए खतरनाक समझा. भारत में प्रथम प्रेस-अधिनियम जारी करने का उत्तरदायित्व जॉन एडम को ही है. 1823 के अधिनियम द्वारा एडम को अपने प्रतिक्रियावादी विचारों को वास्तविक रूप देने का मौका मिला और ये नियम, उन सभी नियमों से कठोर थे, जो उस समय तक कभी भी भारत में लागू नहीं हुए थे. इस अधिनियम के तहत बिना किसी सरकारी स्वीकृति के इस प्रकार का कोई समाचार-पत्र, पत्रिका, पुस्तक तथा कोई विज्ञप्ति प्रकाशित करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, जिसमें सरकारी नीति या कार्यपद्धति के सम्बन्ध में कोई सूचना अथवा टीका-टिप्पणी की गई हो. सरकार के मुख्य सचिव से प्रकाशन-संबंधी लाइसेन्स प्राप्त करने के लिए प्रार्थनापत्र देते समय एक हलफनामा देना भी आवश्यक कर दिया गया, जिसमें समाचार-पत्र, पत्रिका या पैम्पलेट के प्रकाशन का नाम तथा पूरा पता दिया गया हो. यदि मालिक दो से ज्यादा हैं तो हिस्सेदार का पूरा ब्योरा देना आवश्यक कर दिया गया. प्रकाशन से सम्बन्धित मकान का विस्तृत विवरण एवं स्वरूप प्रस्तुत करना होता था. मुद्रक, प्रकाशक, स्वामी या स्थान-परिवर्तन की स्थिति में लाइसेन्स-प्राप्ति हेतु दुबारा आवेदन करना होता था. बिना लाइसेन्स प्राप्त किए किसी प्रकार के प्रकाशन पर चार सौ रुपये जुर्माना तथा चार माह तक की जेल-सजा का प्रावधान किया गया. प्रिंटिंग प्रेस पर भी नियन्त्रण लागू किया गया. बिना लाइसेन्स पुस्तकों या पैम्फ्लेटों का प्रकाशन व प्रेस का उपयोग करने पर सौ रुपये जुर्माना तथा छह माह की सजा का प्रावधान किया गया. प्रेस-जब्ती का अधिकार सरकार ने अपने पास रखा तथा लाइसेन्स सरकार रद्द कर सकती थी.

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर हुए इस प्रतिबन्ध का सम्पूर्ण भारतीय स्तर पर तीव्र विरोध हुआ. चन्द्र कुमार टैगोर, द्वारकानाथ टैगोर, राजा राममोहन राय, प्रसून कुमार टैगोर आदि ने अधिनियम के विरुद्ध संयुक्त रूप से याचिका दायर की, जिसे अस्वीकार कर दिया गया. कुमारी सोफिया कालेट ने प्रेस-नियन्त्रण के विरुद्ध दायर इस याचिका को भारतीय पत्रकारिता की ऐरियोपेजिटिका कहा है. याचिका की अस्वीकृति के विरोध में राजा राममोहन राय ने ‘मिरातुल अखबार’ नामक पत्र के प्रकाशन को 4 अप्रैल, 1823 को बंद कर दिया. अन्तिम संस्करण में राय ने लिखा- जो परिस्थिति उत्पन्न हो गई है, उसमें पत्र का प्रकाशन रोक देना ही एकमात्र मार्ग रह गया है. जो नियम बने हैं, उनके अनुसार किसी यूरोपियन सज्जन के लिए जिनकी पहुँच सरकार के चीफ सेक्रेटरी पर सरलता से हो जाती है, सरकार से लाइसेन्स लेकर पत्र निकाल देना आसान है, पर भारत के किसी निवासी के लिए जो सरकारी भवन की देहरी लाँघने में भी समर्थ नहीं हो पाता, पत्र-प्रकाशन के लिए सरकारी आज्ञा प्राप्त करना दुष्कर कार्य हो गया है. फिर खुली अदालत में हलफनामा दाखिल करना भी कम अपमानजनक नहीं है. लाइसेन्स के लिए जान का खतरा भी सदा सिर पर झूलता रहता है. ऐसी दशा में पत्र का प्रकाशन रोकना ही उचित है. ‘सार सुधानिधि’ के प्रथम वर्ष के सत्रहवें अंक में लिखा गया है कि जितने देशी भाषा के पत्र हैं, सब-के-सब प्रेस-ऐक्ट के चंगुल में पड़े दबी जीभ से बोलते हैं और बहुतेरे तो लिखना ही छोड़ बैठे १०

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में सर जे.एस. बकिंघम महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में उभरे. 1818 में ‘कलकत्ता जर्नल’ के सम्पादन का भार सँभालने के बाद उन्होंने अपनी पत्रकारीय क्षमता तथा सूक्ष्म दृष्टि से पत्र को युगीन पत्रकारिता के मानचित्र में तेजस्विता और निर्भीकता का यथार्थ बना दिया. इसमें संपादक का कर्तव्य गवर्नरों को उनके कर्तव्यों के प्रति सावधान करना, उन्हें उनके दोषों के बारे में उग्रता से चेतावनी देना और अप्रिय सत्य प्रकट करना था.” अनेक लोगों को पत्रकारिता के लिए प्रोत्साहित करनेवाले इस प्रतिभाशाली व्यक्ति की गतिविधियों को कम्पनी सहन नहीं कर सकी और 1823 में उसे देश से निर्वासित कर दिया गया. एस. नटराजन लिखते हैं- उसने समाचार-पत्र को जनता का दर्पण बना दिया, अन्वेषण तथा आलोचना की भावना को प्रखरता के साथ सतत प्रदर्शित किया तथा प्रेस को उसने नेतृत्व का गुण प्रदान किया. बकिंघम ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों की आलोचना की. इंग्लैंड वापस जाकर उसने ‘ओरिएंटल हेराल्ड’ पत्र शुरू किया. इसके माध्यम से तथा 1832 में संसद-सदस्य के रूप में उसने भारत में कम्पनी के प्रशासन पर प्रहार किए तथा प्रेस को नियन्त्रित किए जाने के प्रयासों का विरोध किया. भारत में प्रेस की स्वतन्त्रता के लिए किए गए संघर्ष में बकिंघम का महत्त्वपूर्ण स्थान है.

25 दिसम्बर, 1825 को कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने एक आदेश के तहत कम्पनी में सेवारत सभी कर्मचारियों को किसी-न-किसी पत्र से सम्बद्ध होने पर प्रतिबंधित कर दिया. इस आदेश के जारी होने के बाद यदि छह महीने तक कर्मचारियों ने समाचार-पत्रों से अपने सम्बन्ध समाप्त नहीं किए तो उनकी सेवाएँ समाप्त करने की धमकी दी गई.

लॉर्ड विलियम बैटिंक ने समाचार पत्रों के प्रति थोड़ा उदारवादी रुख अपनाया. पत्रकारिता के भावी विकास की दिशा में भी सम्भावनाओं के नए आयाम इस दौर में खुले. समाज-सुधार के प्रति समर्पित समाचार-पत्रों के महत्त्व को बैटिंक ने महसूस किया. प्रेस पर लगे प्रतिबन्धों को कम करने के कारण इस काल में समाचार-पत्र-प्रकाशन में तेजी से विकास हुआ. बैटिंक के गवर्नर जनरल के रूप में कार्य करते समय मेटकाफ़ ने सदा स्वतन्त्र प्रेस का समर्थन किया था. 1935 का वर्ष ब्रिटिश सत्ता के समय भारत में पत्रकारिता की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है. इसी वर्ष मेटकाफ़ भारत का गवर्नर जनरल बना. उसने प्रेस को स्वतन्त्र करने की दिशा में विशेष पहल की. डॉ. रामरतन भटनागर लिखते हैं कि ‘भारतीय पत्रकारिता के पूरे इतिहास में पत्रों की स्वतन्त्रता के लिए अथक परिश्रम करनेवाला मेटकाफ़ के समान दूसरा कोई अंग्रेज नहीं मिलेगा. उन्होंने उस पत्र का बड़े उत्साहपूर्वक विरोध किया था जो जनमत को सरकार के विरुद्ध भड़कानेवाला तथा न्याय का अवरोधक था. मेटकाफ़ भारतीय प्रेस के मुक्तिदाता के रूप में ख्यात हैं.

15 सितम्बर, 1835 से उसने लाइसेन्स प्रणाली को समाप्त कर समाचार-पत्रों के स्वतन्त्र विकास एवं प्रसार में अभूतपूर्व योगदान दिया. अधिकार-पत्र लेने की प्रथा को समाप्त कर दिया गया. प्रत्येक व्यक्ति सामान्य कानूनी और नैतिक परिधि में रहते हुए किसी भी सार्वजनिक विषय पर अपने विचार प्रकट करने के लिए पूरी तरह से स्वतन्त्र हो गया. मेटकाफ़ ने राजद्रोही, आपत्तिजनक तथा उकसाने एवं भड़कानेवाले लेखन को प्रतिबंधित किया और उसके लिए भारी जुर्माने की व्यवस्था की.

3 अगस्त, 1835 को मेटकाफ़ द्वारा भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का सर्वाधिक उदारवादी प्रेस-ऐक्ट पारित कर दिया गया. इस ऐक्ट के तहत 1823 के एडम के प्रेस-नियन्त्रण तथा उसी आधार पर 1825 व 1827 में बम्बई में जारी उन आदेशों को वापस ले लिया गया जिनमें यह प्रावधान किया गया था कि मुद्रक एवं प्रकाशक को गवर्नर जनरल से लाइसेन्स प्राप्त करना आवश्यक था. 1825 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया गया जिसके अनुसार कम्पनी के कर्मचारियों पर समाचार पत्रों से सम्बन्ध रखने पर लगाया गया था. मुद्रक अथवा प्रकाशक द्वारा समाचार-पत्र शुरू करने के लिए नाम तथा मुद्रक एवं प्रकाशक का पता देते हुए घोषणा-पत्र प्रस्तुत करना ही पर्याप्त था. मुद्रक एवं प्रकाशक को नया घोषणा-पत्र, पते में अथवा मुद्रक या प्रकाशक में परिवर्तन होने पर भरना आवश्यक होगा. पुस्तक और समाचार-पत्र पर प्रकाशक का नाम एवं पते का होना आवश्यक था. उपर्युक्त नियमों की अवहेलना करने पर पाँच हजार रुपया जुर्माना अथवा दो वर्ष की जेल की सजा हो सकती थी.

1836 से 1856 के बीच पत्रकारिता के इतिहास में प्रेस के सन्दर्भ में सरकार की नीतियों में विशेष परिवर्तन लक्षित नहीं होता. ऑकलैंड (जो मेटकाफ़ का उत्तराधिकारी था) के काल में कोई खास उपलब्धि नहीं रही. वह उदारतापूर्वक मेटकाफ़ की नीतियों का समर्थक रहा. 1842 में लॉर्ड एडनबरो ने अपने एक आदेश के तहत सरकारी अधिकारियों को बिना पूर्व-स्वीकृति के सरकारी दस्तावेजों को सार्वजनिक रूप से प्रकट करने तथा उसकी विषयवस्तु को किसी व्यक्ति को सूचित करने के लिए प्रतिबंधित कर दिया.

1857 के विद्रोह में तत्कालीन समाचार-पत्रों का विशेष योगदान रहा. प्रेस ने भारतीय जनता की आवाज एवं महत्त्वाकांक्षा को वाणी दी. पत्रों ने जनता की भाषा में अपने राष्ट्रीय चरित्र को सामने रखा. भाषाई प्रेस का तेजी से विकास हुआ. लॉर्ड केनिंग ने प्रेस को नियन्त्रित करने की बात पर जोर देते हुए 13 जून, 1857 को प्रिंटिंग प्रेस और उसके उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया. सरकार ने लाइसेन्स प्रदान करने एवं उसे रद्द करने का अधिकार अपने पास रखा. लॉर्ड केनिंग के इस अधिनियम को गलाघोंटू कानून नाम दिया गया. इस ऐक्ट के माध्यम से सरकार किसी भी समाचार-पत्र, पुस्तक या अन्य मुद्रित सामग्री के प्रकाशन या प्रसार को प्रतिबंधित कर सकती थी. यह हिंदी व अंग्रेजी पत्रों पर समान रूप से लागू किया गया.

प्रकाशक, मुद्रक का नाम तथा प्रकाशन-स्थल का सम्पूर्ण पता देना आवश्यक कर दिया गया. गलाघोंटू कानून को एक वर्ष के लिए लागू करते हुए लॉर्ड केनिंग ने लिखा-‘मुझे सन्देह है कि इस बात को पूरी तरह समझा भी जा रहा है या नहीं कि पिछले कुछ हफ़्तो से भारतीय समाचार-पत्र भी भारतीय जनता को जानकारी देने के नाम पर उनके हृदय में राजद्रोह का जहर उँडेलने की धृष्टता तक पहुँच चुके हैं. यह काम कड़ी मेहनत, चतुराई और कौशल से किया जा रहा है. अपने उद्देश्य के बारे में झूठ-मूठ के ऊँचे-ऊँचे दावे किए जा रहे हैं और सरकार तथा उसके प्रजाजनों के बीच असन्तोष और नफ़रत के बीज बोए जा रहे हैं. जो टिप्पणी इस समय मैं भारतीय समाचार-पत्रों के बारे में कह रहा हूँ, यह यूरोपियन समाचार-पत्रों पर लागू नहीं होती.” वाइसराय बनने के बाद केनिंग ने प्रेस का समर्थन जुटाने का प्रयास किया. 1860 में भारतीय दंड संहिता के अभिग्रहण पर विचार-विमर्श के दौरान भारतीय प्रेस के लिए और अधिक उदारता प्रदान की गई. केनिंग ने धारा 113 जो राजद्रोह से सम्बन्धित थी, को हटाने का सुझाव दिया जिसे स्वीकार कर लिया गया.

1857 के विद्रोह के पश्चात भारतीय प्रेस के स्वरूप में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. जनता की भाषा में बात करनेवाले भाषाई प्रेस ने राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में सार्थक भूमिका निभाई. सरकार के प्रति असन्तोष व्यक्त करते हुए विचार-स्वातन्त्र्य की माँग करनेवाले युगीन पत्र निर्भीक आलोचना की प्रवृत्ति के कारण सरकार के लिए घातक सिद्ध हुए. 1869 में सर जॉन लारेन्स के शासनकाल में छापेखानों तथा समाचार पत्रों को नियन्त्रित करने से सम्बन्धित कानून पारित किया गया. इसका मुख्य उद्देश्य सरकार को प्रिंटिंग प्रेसों की गतिविधियों के बारे में जानकारी एकत्र करना था. आगे चलकर 1869 में मेयो के शासनकाल में भारतीय दंड संहिता में संशोधन-प्रस्ताव पारित हुआ, जिसके अनुसार बोले गए, या लिखे शब्दों या संकेतों द्वारा भड़कानेवाले प्रसारणों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया जिनसे भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असन्तुष्टि उत्पन्न हो. 1898 में इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए में समाविष्ट किया गया. 124-ए धारा के तहत राजद्रोह फैलानेवाले व्यक्तियों को आजीवन निर्वासन अथवा कम काल के लिए निर्वासन, अथवा जुर्माने का प्रावधान किया गया. 1867 के पंजीकरण अधिनियम के अनुसार प्रकाशित सामग्री की एक प्रति एक मास के भीतर सरकार को सौंपनी होती थी.

1876 में लॉर्ड लिटन ने भारत के वाइसराय के रूप में कार्यभार सँभाला. इस दौर तक नई शिक्षा का प्रभाव भारतीयों पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा था. नई शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था सस्ते क्लर्क, अपने माल के लिए ग्राहक एवं राज के प्रति निष्ठा रखनेवाले वर्ग का निर्माण करना. किन्तु अंग्रेजों की इच्छा के विरुद्ध देशभक्तों की भी एक बड़ी संख्या अस्तित्व में आई, जिसने पत्रकारिता को बड़े पैमाने पर अपनाया. भारतीय भाषाओं के सामाचार-पत्र अंग्रेजों को, खासकर अखरते थे. पत्रकारिता का उद्देश्य अपनी शिकायतों को दूर कराने तक सीमित था. फिर भी भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों का जनता पर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा गहरा प्रभाव पड़ता था. लॉर्ड कर्जन तथा भारत-सचिव हैमिल्टन भी इन भाषाई पत्रों से परेशान थे. हैमिल्टन का विचार था कि अंग्रेजी शासन की बार-बार निन्दा करके लोगों के मन में अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय भाषाई पत्र जनमत तैयार कर रहे थे. बाद में लॉर्ड हार्डिंग ने भी भारतीय भाषाओं के पत्रों की बढ़ती हुई महत्ता एवं प्रभाव को समझा था. भारतीय भाषाओं के पत्रों का प्रभाव बढ़ रहा था, साथ ही भारतीयों का असन्तोष भी. लॉर्ड लिटन की जल्द ही भारतीय भाषाई समाचार-पत्रों में आलोचना होने लगी क्योंकि वे भारतीय हितों के विरुद्ध जानेवाली नीति का अनुसरण कर रहे थे. इस समय तक भारतीय भाषाओं के अनेक पत्र निकले और इनकी निर्भीक आलोचना से लॉर्ड लिटन की सरकार बहुत घबराई.” इस दौर में भाषाई पत्रों ने ब्रिटिश पत्रों को संख्या एवं प्रभाव में पीछे छोड़ दिया था. उस समय इन समाचार पत्रों के सम्भवतः एक लाख पाठक होंगे तथा किसी एक समाचार-पत्र की अधिकतम प्रसार-संख्या लगभग तीन हजार की थी. भाषाई समाचार-पत्रों की कटु आलोचना से परेशान होकर लॉर्ड लिटन ने वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम, 1878 पारित किया. इस अधिनियम को बनाने की आवश्यकता सरकार को इसलिए और भी अधिक लगी क्योंकि अंग्रेजी में प्रकाशित समाचार-पत्रों की तुलना में भाषाई समाचार-पत्रों का वितरण कहीं अधिक था.

9 मार्च, 1878 को पारित वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम प्राच्य भाषाओं के प्रकाशन पर बेहतर नियन्त्रण रखने के लिए अधिनियम के रूप में भी जाना जाता है. इस अधिनियम के द्वारा अंग्रेजी सरकार को उन समाचार-पत्रों पर कठोर नियन्त्रण रख उन्हें दंडित करने का अधिकार प्राप्त हो गया जो ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध द्रोहात्मक एवं भड़कानेवाले लेखन करते थे. जिलाधीश एवं पुलिस कमिश्नर को यह अधिकार मिला कि वे अपने क्षेत्रों से प्रकाशित समाचार-पत्रों के प्रकाशकों अथवा छापनेवालों से यह माँग कर सकते थे कि वे अनुबन्ध-पत्र पर हस्ताक्षर करके यह गारंटी दें कि वे ऐसा समाचार-पत्र प्रकाशित नहीं करेंगे जिससे सरकार के प्रति असन्तोष की भावना जगे. अनुबन्ध-पत्र के साथ प्रकाशकों एवं मुद्रकों से कुछ अग्रिम धनराशि भी जमा कराई जा सकती थी. यदि किसी अखबार में अवांछित सामग्री का प्रकाशन हो गया है तो अनुबन्ध की राशि को जब्त किया जा सकता था. साथ ही प्रकाशकों एवं मुद्रकों की सारी मशीनों को जब्त करने का अधिकार भी था. यह अधिनियम समाचार-पत्रों के अलावा किसी भी प्रकाशित पुस्तक या अन्य प्रकार की सामग्री पर लागू था. प्रकाशन-सामग्री के लिए निर्धारित अधिकारी से पूर्व-अनुमति आवश्यक थी. अधिनियम की सबसे घातक बात यह थी कि अधिनियम से सम्बन्धित किसी भी कार्यवाही के विरुद्ध न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती थी.

(साभार: राजकमल प्रकाशन)