येनपक कथा: कवि की कहानियां

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कवि कहानियां भी कहते-लिखते हैं. पहले वे कविता में ही कहानी कहते थे और महाकाव्य, खंडकाव्य उसी का प्रमाण हैं. कहानी के क्षेत्र में यह समांतर परंपरा है. अनामिका अनु के कहानी-संग्रह ‘येनपक कथा’ को इसी परंपरा की सार्थक बढ़त के रूप में देखा जा सकता है.

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(साभार: मंजुल प्रकाशन)

कवि कहानियां भी कहते-लिखते हैं. पहले वे कविता में ही कहानी कहते थे और महाकाव्य और खंडकाव्य उसी का प्रमाण हैं. आधुनिक काल में उन्होंने सीधे गद्य में कहानियां लिखना शुरू किया और उनकी एक लंबी परंपरा ही बन गई. हम याद कर सकते हैं कि प्रसाद, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, कुंवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल आदि इसी परंपरा में कवि-कथाकार हैं. हाल के दशकों में इसमें अनामिका, प्रयाग शुक्ल, ध्रुव शुक्ल, उदयन वाजपेयी, अंबर पांडे आदि जुड़े हैं.

कहानी के क्षेत्र में यह एक समांतर परंपरा है. हाल में अनामिका अनु का पहला कहानी-संग्रह ‘येनपक कथा’ [मंजुल द्वारा प्रकाशित] को इसी परंपरा की एक सार्थक बढ़त के रूप में देखा जा सकता है. उनका पहला कविता-संग्रह ‘इंजीकरी’ पहले प्रकाशित और पुरस्कृत हो चुका है.

यों तो उनकी कविता में एक तरह की आख्यानपरकता रही है. वे कई बार कविता में कहानी कहती रही हैं. इसी के अनुरूप, उनकी कहानियों में कविता है- कई बार प्रगट, कई बार अंत:सलिल या अंतर्ध्‍वनित. उनके चरित्र या पात्र साधारण लोग हैं. पर वे उनके संबंधों में, उनके संघर्षों और द्वंद्वों में, उनके सहज जीवनयापन में जो कहानी छुपी है उसे तो कहती ही हैं, उसमें अंतर्भूत कविता को भी साथ ही पकड़ती हैं. इसलिए ये कहानियां प्रचलित कहानियों और उनके शिल्प से अलग हैं.

वे एक कवि-कथाकार की कृतियां हैं. उनमें गहरा लगाव है तब भी जब वे अलगाव की स्थिति का सामना कर रही होती हैं. उनका मर्म हमेशा ही जीवनासक्ति और जिजीविषा से जुड़ा है और उसी से दीप्त होता है.

उनमें कई बार एक मानवीय संबंध है, फिर वह प्रेमियों, पति-पत्नी, मां-बेटी आदि के बीच का हो: उसी की कहानी होती है जिसमें परिवेश, समाज, समय, प्रकृति आदि सब आते-जाते रहते हैं. कई बार लगता है कि शिल्प लोककथाओं जैसा है जिसमें संभव और असंभव के बीच दूरी नहीं होती है और यथार्थ उतना देखा-भोगा उतना नहीं होता जितना रचा गया यथार्थ.

इन कहानियों की कथा-भाषा में बीच-बीच में ऐसी पंक्तियां या अंश आते हैं जो प्रसंग का एक तरह से सूक्ति जैसा साधारणीकरण करते हैं और उसे आभासिक्त कर देते हैं:

राग-रौशनी से विराग-छाया तक की दूरी नाप चुका वह बूढ़ा बैरागी

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प्रेम से स्थायी कुछ भी नहीं, न यह ब्रह्मांड, न इस जड़-चेतन की उपस्थिति, न ही समय की व्याप्ति, हमारा डर, हमारी शंका, कितने दुखों को निमंत्रण देती है पर चाहकर भी प्रेम की विदाई नहीं कर पाती.

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सिंदूर में कोई जादू होता है, नन्हीं चिड़िया को

गुरु-गंभीर-देवता बना देता है

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वह बांस थी बस एक बार फूली फिर समाप्त

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रोटी कहां पटक दे किसको, कौन जानता है.

रोटी से बड़ा विस्थापक और सम्मोहक कोई दूसरा नहीं, उसी की चलती है

लोग कौन-कौन से पाप-पुण्य नहीं करते इसे पाने के लिए.

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वह हर रोज़ दोपहर में जब सब दोपहर का भोजन कर आराम कर रहे होते हैं तब पीछे की जाफरी से बाहर निकलकर बलूही माटी पर बैठ जाती है. तपती माटी का दुख आमौर के दुख में समा जाता है. दुखों का मेलघेल मन और देह को मंथर कर देता है. दुख तो जोरन है छह-छह दूध से बहते मन और देह को जमा देती है.

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चमौली की मृत्यु के बाद घर में कोई भी विद्यापति के गीत नहीं गाता है. निर्गुण और कबीर बजता रहता है चमौली की अम्मा आमौर के मन में.

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दुख एकदम से उतरता है और सभी रास्ते एक बार में बंद कर देता है. फिर जो बचता है, वह कोई एक दलदली गली भर होती है बलिस्त भर जगह, पिल्लू से सिहरते दुख, आफ़त के हज़ार फतिंगों से भरी गली. दुख में चीखने पर कोई हाथ भर बढ़ा दे तो मन उसके प्रति इतना नम हो जाता है कि आदमी उसका असली रंग देख ही नहीं पाता.

कवि का गद्य

जोशना बैनर्जी आडवानी कवयित्री हैं और उनके दो कवितासंग्रह ‘सुधानपूर्णा’ और ‘अंबुधि में पसरा है आकाश’ प्रकाशित हुए हैं. प्रलेक प्रकाशन से उनकी एक गद्य पुस्तक आई है ‘वंचनावध’. हमारी परंपरा में गद्य को कवियों का निकष कहा गया है.

इस समय के गद्य का बहुत बोलबाला है और ऐसे कवि कम ही रह गए हैं जो कविता के अलावा गद्य न लिखते हों. ऐसे गद्य में, आदर्श रूप में, कविता का लालित्य और गद्य की सपाटबयानी का संयोग होता है. यह भी कहा ही जाता है कि श्रेष्ठ कविता में गद्य के सभी गुण होते हैं और श्रेष्ठ गद्य में कविता के. जोशना के गद्य के प्रवाह में कविता भी घुली-मिली है यह अलक्षित नहीं जा सकता. पुस्तक का रूपाकार तो डायरी का है. हर अंश अलग से शीर्षक लिए हुए है.

कुछ शीर्षक हैं: ‘वह तिथि जब बुधोन की स्मृति में मिट्टी से एक किताब बनाई’, ‘वह तिथि जब एक विधवा ने पूछा वह कौन सा रंग पहने’, ‘वह तिथि जब पिता की मृत्यु की सूचना मुझे नहीं दी गई’, ‘वह तिथि तब द्वारपाल को देर तक देखा’, ‘वह तिथि तब लगा कि चेरापूंजी एक आंख है’, ‘वह तिथि तब एक वेश्या के चार व्यंग्य पत्र चोरी किए’, ‘वह तिथि जब मैंने जंगल होना चुना’.

पुस्तक के कुछ उद्धरण देखें:

‘एकांत वाकई में एक प्रकार के उपचार की तरह काम कर रहा है, मुझे कुछ नहीं करना पड़ रहा है. अंदर सब कुछ अपने आप ठीक हो रहा है. कोई बुनाई चल रही है अंदर जैसे ऑपरेशन से पहले एनेस्थीसिया देने पर पेट काटने के लिए जब चाकू चलाते हैं तो मुझे पता चल गया था चाकू चला है, ऐसे ही पता चल रहा था कि अंदर बुनाई कटाई हो रही है जिन चीज़ों की ज़रूरत नहीं, वे बाहर फेंकी जा रही हैं. पर्वत मुझे उपहार अवश्य दे रहा था, जैसे कुछ अदल बदल रहा हो, मैं शायद अंधेरे का संपार्श्विक हूं. परन्तु इससे मुझे लाभ ही हो रहा है, अतिरिक्त कुछ भी नहीं परंतु फिर भी अतिरिक्त बहुत कुछ, आठों तरफ़, हलचल, हलाहल.’

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‘कम से कम चीज़ों के इस्तेमाल के विषय में हमारे गांव के पंडितजी हमें बताते थे उनका एक छोटा कमरा था, जिसमें उनकी ज़रूरत की चीज़ें थीं मात्र, एक भी चीज़ अतिरिक्त नहीं. हमारे पिता और काकाओं से भी वे ऐसा ही कहते थे. बस अंतर यह था कि पंडितजी ने यह किसी किताब में लिखा नहीं अपने आसपास के लोगों से कहकर छोड़ दिया और यहां से पांच हज़ार आठ सौ सत्ताईस किलोमीटर दूर टोक्यो में एक लेखक ने इस पर किताब लिख दी.’

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‘पिता के बिना पिता के जन्मदिवस पर पिता द्वारा लगाए नीम गाछ के नीचे बैठी, यहां आश्रय लिया, पिता की किताबों को खोलकर उसमें चेहरा छिपाए बैठी रही, आकाश की तरफ़ बार-बार देखा, पुराने घर की दीवारों पर हाथ फिराया कई बार, आह्वनीय अग्निदेव जो पिता को ले गए थे, उनकी स्तुति की, अन्य तो कोई फलप्रापक स्तुति नहीं की. पिता की मृत्यु के समय पिता के समीप नहीं थी, इस दरिद्रता के अंतरिक्ष भरा हुआ दिखा.’

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‘मां अन्नपूर्णा जब थीं, तब थीं, उनके बाद जैसे मैं जीवन के सुख पाने के लिए कांसे का एक बर्तन लेकर भिक्षुणी हो गई हूं. सभी ख़ास चीज़ें मुझे आम लगती हैं. ग्राण्ड ट्रंक एक फुटपाथ लगता है, दीपावली में जलते दिये मेरी मां की आंख के छोटे-छोटे टुकड़े लगते हैं और पृथ्वी एक पुतुल लगती है जिसकी गर्दन दाई, बाई तरफ़ हिलती रहती है. रह लेते होंगे सभी मां के जाने के बाद ठीकठाक, मैं तो खड़ी भी ऐसे होती हूं एक हाथ आगे करके जैसे मां का पल्लू पकड़ रखा हो …’

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‘कितना भी निस्सार हो जाए यह संसार, स्त्रियां इस संसार को अपने सबसे सुंदरतम रूप में जीवंत रखने के लिए प्रयत्न करती रहेंगी. बड़े-बड़े फूल, पत्तियां, टहनियां, छोटे बड़े ब्‍लाक तेज़ गति से काढ़ रही थीं वे सभी स्त्रियां, अपनी भाषा में कुछ कुछ एक दूसरे से कहती हुई. . .’