स्वामी सहजानंद सरस्वती: किसान क्रांति के मार्गदर्शक और सदी की अभिव्यक्ति

सहजानंद के द्वारा चलाए गए किसान आंदोलन ने स्वातंत्र्योत्तर भारत में क्रमशः हिंद किसान पंचायत, सोशलिस्ट पार्टी तथा कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलाए गए आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार की. वह 21 फरवरी, 1950 को 'संयुक्त समाजवादी दल' के अध्यक्ष चुने गए और वाम पक्ष की एकता के लिए मृत्युपर्यन्त प्रयासरत रहे.

स्वामी सहजानंद सरस्वती

हर सदी को अपने-अपने शब्द और अभिव्यक्ति खोजनी होती है. स्वामी सहजानंद सरस्वती 20वीं सदी की अभिव्यक्ति थे. उन्होंने वही कहा जो तत्कालीन परिस्थिति में अनिवार्य था. वे निष्क्रिय वेदांतवाद से सक्रिय वेदांतवाद की तरफ अग्रसर हुए और कर्मकांडवाद, गुरुडम तथा ब्राह्मणवाद की आलोचना की. सामाजिक सुधार आंदोलन में पुरोहिती एकाधिकारवाद तथा राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने, एक समय, गांधी एवं कांग्रेस की रणनीति के खिलाफ आवाज उठाई जो समय की मांग थी.

सहजानंद ने परिस्थितिजन्य संवेदनहीनता और संवादहीनता की यथास्थिति को तोड़ा. जमींदार और अंग्रेज दोनों संवेदनहीन थे. वे शोषक थे. दूसरी तरफ कांग्रेस थी जो किसानों से संवाद नहीं करना चाहती थी. वह किसानों के मसले को लेकर आगे नहीं आना चाहती थी. ऐसी ही परिस्थिति में स्वामी सहजानंद आगे आए और किसानों को किसान आंदोलन के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन में भी सक्रिय किये.

उन्होंने औपनिवेशिक राजसत्ता और पार्टी संरचना को काफी करीब से देखा. दोनों ही भारतीय किसान समुदाय के हितों के प्रतिकूल सिद्ध हुए. इसलिए सहजानंद ने किसान आंदोलन की स्वायत्तता और केंद्रीयता पर बल दिया. उनके द्वारा 1949 में प्रस्तुत ‘संयुक्त किसान सभा’ का मांग पत्र स्वाधीनोत्तर किसान आंदोलन के मूल कार्यक्रम जैसा है. उन्होंने ‘गीता हृदय’ के जरिए भारतीय किसानों के सम्मुख उत्पन्न वैचारिक एवम दार्शनिक संक्रमण का समाधान प्रस्तुत किया. वे क्रांतिकारी परंपरा की अंतिम कड़ी साबित हुए. राजनीतिक (तत्कालीन) वातावरण में उनसे ताकतवर कोई व्यक्ति नहीं था. जहां तक मार्क्सवाद को ग्रहण करने का सवाल है तो उन्होंने अपने आंदोलन के अनुरूप ही इसे स्वीकार किया. उनके लिए आर्थिक क्रांति के बिना राजनीतिक आज़ादी अधूरी थी.

किसी नेतृत्व के साथ मुकम्मल न्याय के लिए शब्दों को पकड़ने की आवश्यकता होती है. कुछ समकालीन व्यक्तित्व व राजनीतिक दल उनके नए शब्दों और दृष्टि से परेशान थे. लेकिन जो समझ सकते थे उन्होंने तत्क्षण पहचान लिया कि वे वही कह रहे थे जो उनके लिए आवश्यक था और वही कह रहे थे जो सत्य व शाश्वत था- समय ने भी यह सिद्ध कर दिया. मैजिनी ने लिखा है कि ‘किसी व्यक्ति अथवा राष्ट्र के क्रिया कलापों का मूल्यांकन उसके चरित्र अथवा उद्देश्य के आधार पर किया जाना चाहिए.’

इतिहास के साथ चलते हुए परिस्थितियों की चुनौती को जो स्वीकार करता है वही जीवित रहता है. इसीलिए सहजानंद आज भी जीवित हैं. उन्हें समझने के लिए उनके प्रयत्न को समझना होगा. वे मात्र संन्यासी और जाति के नेता नहीं थे बल्कि रूढ़ियों व पाखंडों के खिलाफ खड़े होकर नए समाज की रचना करने वाले थे. वे जातीय आंदोलन से राष्ट्रीय आंदोलन की तरफ तथा पुरोहितवादी एकाधिकार विरोधी आंदोलन से जमींदार विरोधी आंदोलन कि तरफ अग्रसर हुए.

सहजानंद के द्वारा चलाये गए किसान आंदोलन ने स्वातंत्र्योत्तर भारत में क्रमशः हिन्द किसान पंचायत, सोशलिस्ट पार्टी तथा कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलाये गए आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार की. ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना और ‘अखिल भारतीय समझौता विरोधी सम्मेलन’ में सक्रिय भागीदारी के कारण सुभाष चंद्र बोस द्वारा उन्हें महत्वपूर्ण व्यक्ति रेखांकित किया गया. 21 फरवरी, 1950 को वे ‘संयुक्त समाजवादी दल’ के अध्यक्ष चुने गए और वाम पक्ष की एकता के लिए मृत्युपर्यन्त प्रयासरत रहे.

सहजानंद ‘चरैवेती चरैवेती’ का भाव लेकर निरंतर अग्रसर रहे. कभी रुके नहीं. इस यात्रा मे वे लोगों से, दलों से टकराते रहे और उनसे किनारे होके अपना मार्ग प्रशस्त करते रहे. उन्होंने वक्त की मांग को समझा और वक्त की मांग थी- क्रांति. क्रांति के लिए आवश्यक था जनता के, किसानों के मनोविज्ञान को समझना. इस प्रक्रिया मे उन्होंने धर्म की शाश्वत व्याख्या की और किसानों को खाने पीने का महत्त्व बतलाया. सहजानंद ने आदर्शवाद की सीमा को लांघ कर भौतिकवाद का पक्षपोषण किया. इस रूप में उन्होंने भगवान के ऊपर रोटी को प्राथमिकता दी और ‘संभवामि युगे युगे’ की घोषणा कर दी.

जन असंतोष को दिशा देने के लिए एक विचार चाहिए जिससे एकजुटता बढ़े. क्रांति जैसी कोई घटना बौद्धिक शून्य में नहीं होती. फ्रांसीसी क्रांति के लिए वाल्टेयर, रूसो व मॉन्टेस्क्यू आदि ने एक बौद्धिक वातावरण तैयार किया. दूसरी ओर 1857 का विद्रोह था जिसमें वैचारिकी, रणनीति व संगठन के साथ-साथ जन जुड़ाव का भी अभाव था. इसलिए अपनी तमाम शहादत के बावजूद यह विद्रोह असफल रहा और राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम नहीं बन सका. लेकिन स्वामी सहजानंद ने किसान आंदोलन को वैचारिक जामा पहनाया. बदलती परिस्थिति के अनुसार वे अपनी वैचारिकी निरंतर परिवर्तित करते रहे और इस क्रम में वे ‘किसान’ से ‘खेत’ मजदूर’ और ‘सर्वहारा’ तक गए.

सर्वहारा की आयातित परिभाषा की जगह नयी परिभाषा गढ़ दी. अंततः उनके नेतृत्व में भारतीय किसान आंदोलन ने ‘महारुद्र का महातांडव’ द्वारा उस किसान की परिवर्तनकारी भूमिका को स्थापित किया जिसे मार्क्स प्रतिगामी मानते थे.

स्वामी सहजानंद ने 1929-50 के दौरान किसान आंदोलन का नेतृत्व स्पष्ट वैचारिकी, सुव्यवस्थित संगठन और जुझारू रणनीति के आधार पर किया. वे औपनिवेशिक भारत ही नहीं अपितु समस्त एशिया में संगठित किसान आंदोलन के प्रथन जनक थे. उनके पूर्व के किसान आंदोलन स्थानीय परिप्रेक्ष्य में विद्रोहों की घटना मात्र, अस्पष्ट वैचारिकी से ग्रस्त, असंघटित, अराजनैतिक और अल्पजीवी थे.

उन्होंने ‘किसान’ और ‘किसान हित’ को परिभाषित किया, किसानों का संगठन खड़ा किया तथा साम्राज्यवादी और समांतवादी शोषण के खिलाफ किसानों को वर्गीय चेतना से लैस किया. ग्रामीण सर्वहारा को क्रांति की मुख्य शक्ति और गांव को क्रांति का केंद्र घोषित किया. सहजानंद ने स्वाधीन भारत में किसान मजदूर राज की परिकल्पना की. इसीलिए उन्हें स्वाधीनोत्तर भारत के किसान आंदोलन का महामंत्रदाता भी कहा जाता है.

‘भागवत’ में राजा रंतिदेव ने अपनी भावना कुछ इस रूप में व्यक्त की-

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्ग न पुनः भवं.
कामये दुखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनं..

कुछ इसी तरह की भावना स्वामी सहजानंद की भी थी जो उनके विचारों व कार्यों से स्पष्ट होता है. शोषितों, पीड़ितों व मजलूमों की मुकम्मल आज़ादी तथा ‘अंतिम आदमी’ के चेहरे पर मुस्कान देखने की ललक जो बीज रूप में उनमें निहित थी उसे उनकी जीवन यात्रा के अंतिम दौर तक वट वृक्ष बनते देखा जा सकता है. उनकी यात्रा केवल शून्य से शिखर तक न होकर प्रश्न से उत्तर तक की थी. उनके विचारों और संघर्षों से प्रेरणा लेते हुए हम सभी को अपने जीवन और समाज को बेहतर बनाने का संकल्प लेना चाहिए.

(डॉ. अरुण कुमार राय बीएसआर पीजी कॉलेज, रामगढ़, आजमगढ़ (उ.प्र.) के पूर्व प्राचार्य है. डॉ. बैकुण्ठ रॉय कॉलेज ऑफ कॉमर्स, आर्ट्स एंड साइंस, पटना में बतौर सहायक प्राध्यापक कार्यरत हैं. )