जयप्रकाश नारायण पर आरोप लगता रहा है कि इंदिरा गांधी के खिलाफ़ आंदोलन के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से समर्थन लेकर हिंदुत्व को वैधानिकता दी, और उसके नेताओं का मुख्यधारा की राजनीति का रास्ता प्रशस्त कर दिया. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा इस बात से नाइत्तिफ़ाक़ी रखते हैं. उनका कहना है कि अगर आज की तारीख़ जेपी होते, तो मोदी सरकार का स्थायी प्रतिपक्ष होते. वे कल्पना करते हैं कि साल 2025 में जेपी भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस से क्या कहते.
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आरएसएस और भाजपा के प्रिय मित्रों
नमस्कार,
हमारे संविधान की प्रस्तावना में संशोधन करने और ‘धर्मनिरपेक्ष’ तथा ‘समाजवादी’ शब्दों को हटाने के इरादे के बारे में इन दिनों कुछ सुगबुगाहट या एक कानाफूसी अभियान चल रहा है. ऐसे माहौल में मैं चुप नहीं रह सकता, अतः मैं ऐसे व्यक्ति के दृष्टिकोण से आप लोगों को लिख रहा हूं जिसने कभी न्यायपूर्ण, समावेशी और लोकतांत्रिक भारत का सपना देखा था. मैं इस उम्मीद में भी लिख रहा हूं कि सत्ता के शोर और बहुसंख्यकवाद के आकर्षण के बीच, आप अभी भी गणतंत्र की अंतरात्मा को सुनने की कोशिश करेंगे.
हमें यह स्पष्ट समझना चाहिए कि भारतवर्ष धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के बिना अपना स्वरूप बरकरार नहीं रख सकता है. ये कहीं से उधार लिए गए या आयात किये गए आदर्श नहीं हैं, न ही ये प्रत्यारोपण हैं. ये शब्द और ये भाव हमारे जीवित इतिहास से पैदा हुए हैं. ये सदियों की धार्मिक विविधता और सभी के लिए न्याय, समानता और सम्मान के लिए लड़े गए दशकों के स्वतंत्रता संघर्ष से पैदा हुए हैं. भारतीय अर्थ में धर्मनिरपेक्षता का मतलब नास्तिकता या अधर्म नहीं है.
इसका मतलब है सभी धर्मों के लिए समान सम्मान. इसका अर्थ है एक ऐसा राज्य जो एक धर्म को दूसरे धर्म के मुकाबले अधिक महत्व न दे, और एक ऐसा सार्वजनिक जीवन जहां हर नागरिक – हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन या नास्तिक – गरिमा में समान हो. धर्मनिरपेक्षता के बिना, हम अपने लोकतंत्र को एक बहुसंख्यकवादी परियोजना में बदलने का जोखिम उठाते हैं, जहां अल्पसंख्यकों को या तो सिर्फ किसी तरह सहन किया जाता है या फिर जैसा कि इन दिनों शैतान के रूप में पेश किया जाता है. यह वह भारत नहीं है जिसका हमारे संविधान निर्माताओं ने सपना देखा था.
इसी तरह, हमारे संदर्भ में समाजवाद कमांड अर्थव्यवस्था या राज्यवादी नियंत्रण के बारे में नहीं है. यह सामाजिक और आर्थिक न्याय के बारे में है. हमारे संदर्भ में समाजवाद यह सुनिश्चित करने के बारे में है कि उपलब्ध अवसर केवल विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए ही न हों. ऐसे देश में जहां जाति, वर्ग और समुदाय अभी भी जीवन में किसी के अवसरों को निर्धारित करते हैं, समाजवाद एक नैतिक कम्पास भी है. यह एक अनुस्मारक था और रहेगा कि राज्य को समानता के हित में कार्य करना चाहिए.
समाजवाद एक ऐसा विचार है जिसमें अंतिम व्यक्ति का उत्थान राज्य का कर्तव्य है. आप में से जो लोग प्रस्तावना से इन दो शब्दों को हटाना चाहते हैं, उन्हें खुद से पूछना चाहिए: आप कैसा भारत बनाना चाहते हैं? एक जहां धर्म नागरिकता निर्धारित करता है? एक जहां धन नागरिकों का मूल्य निर्धारित करता है? एक जहां संविधान सुविधा का दस्तावेज बन जाता है, विश्वास का नहीं?
भारतीय संविधान की प्रस्तावना एक नारा नहीं बल्कि एक गंभीर वादा है – खुद से, एक-दूसरे से और आने वाली पीढ़ियों से. यह ‘हम, भारत के लोग’ से शुरू होता है, और यह हमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए प्रतिबद्ध करता है. धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद नैतिक मचान हैं जो इन आदर्शों को बनाए रखते हैं. उन्हें खत्म करना खुद गणतंत्र को खत्म करना है. मुझे उम्मीद है कि आप सभी को जल्द ही ये बातें अच्छी तरह से समझ आएगी.
भारत की महानता विरोधाभासों – भाषाओं, विश्वासों, व्यंजनों, जातियों और संस्कृतियों को एक साथ रखने की इसकी क्षमता में निहित है. सभी को यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए कि प्रस्तावना के साथ छेड़छाड़ करने के किसी भी प्रयास का विरोध केवल विपक्षी दलों द्वारा ही नहीं किया जाएगा, बल्कि भारत के जागरूक नागरिकों द्वारा भी किया जाएगा. क्योंकि संविधान कोई पक्षपातपूर्ण दस्तावेज नहीं है. यह एक राष्ट्रीय विरासत है. और धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद इसकी धड़कन हैं.
मैं आप सभी को एक बार फिर याद दिलाना चाहता हूं कि ये दो शब्द हमारे संविधान में विदेशी भाषा में नहीं डाले गए थे; ये शुरू से ही निहित मूल्यों के क्रिस्टलीकरण थे. 1976 में आपातकाल के दौर में इन्हें स्पष्ट रूप से शामिल किए जाने से पहले ही, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की भावना मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक सिद्धांतों में समाहित थी और नीतियां, मूल्यों और आदर्शों से निकलती हैं और मेरे लिए ये एक डरावना सपना सा है कि अगर आप उन दो आधारभूत मूल्यों को नकारने पर अड़े रहे, जिसके लिए आपके कई महत्वपूर्ण लोगों ने अभियान छेड़ रखा है तो फिर आने वाले दिनों में मेरे प्यारे भारत का स्वरूप कैसा होगा!
मेरे लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब कभी भी धर्म के प्रति शत्रुता नहीं था, बल्कि सभी धर्मों के लिए समान सम्मान था – सर्व धर्म समभाव. इसका मतलब था राज्य द्वारा एक धर्म को दूसरे धर्म पर विशेषाधिकार देने से इनकार करना. हमारे जैसे विविधतापूर्ण देश में इस सिद्धांत को कमजोर करना कलह को आमंत्रित करना है. यह भारत के मूल विचार पर प्रहार करना है. इसी तरह, हमारे संदर्भ में समाजवाद कभी भी एक पश्चिमी सिद्धांत नहीं रहा, बल्कि एक सकारात्मक दिशा थी. यह गरीबों के लिए न्याय के प्रति प्रतिबद्धता है, एक ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए जहां अंतिम व्यक्ति को भुलाया नहीं जाता.
हमारे नेता, गांधीजी ने इसे अंत्योदय कहा, अंतिम व्यक्ति का उत्थान. अगर हम अनियंत्रित बाजारों और बढ़ती असमानता के पक्ष में इस रास्ते को छोड़ देते हैं, तो हम न केवल हाशिए पर पड़े लोगों के साथ विश्वासघात करेंगे, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा के साथ भी विश्वासघात करेंगे. राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में कई ऐसे अनुच्छेद हैं जो किसी भी घोषित समाजवादी घोषणापत्र की तरह ही क्रांतिकारी हैं.
हां, मैंने आपातकाल का विरोध किया और मैं उन लोगों के खिलाफ खड़ा हुआ जो लोकतंत्र को खत्म करना चाहते थे. मैंने वास्तव में आपातकाल के खिलाफ अपनी आवाज उठाई, इसलिए नहीं कि मैं एक व्यक्ति के रूप में श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ था. वास्तव में, मैंने उनके समर्पण और साहस के लिए एक से अधिक बार उनकी प्रशंसा की थी. लेकिन जब संवैधानिक मानदंडों को तोड़ा गया, जब असहमति को दबाया गया, जब प्रेस पर रोक लगाई गई, और जब संस्थानों को व्यक्तिगत शक्ति के साधनों में बदल दिया गया, तो मेरे पास लोगों के साथ खड़े होने और विरोध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.
यह मेरे और उस आंदोलन में शामिल लाखों अन्य लोगों के लिए नैतिक कर्तव्य का मसला था. लेकिन मेरा यह मतलब कभी नहीं था कि हमारे संघर्ष से ऐसी ताकतें सशक्त होंगी जो बदले में हमारे संविधान के स्तंभों को नष्ट कर देंगी. अगर मेरे नाम या उस आंदोलन की स्मृति से आपको ताकत मिलती है, तो उस ताकत का इस्तेमाल हमारे गणतंत्र की बहुलतावादी और मानवीय भावना को बचाने के लिए करें, न कि उसे कमजोर करने के लिए.
आज, मैं केंद्रीकृत सत्ता, असहमति के प्रति बढ़ती असहिष्णुता, जांच एजेंसियों के दुरूपयोग और अलग-अलग प्रतिरोध की आवाजों को चुप कराने के प्रयासों के चिंताजनक संकेत देख रहा हूं – ये सब राष्ट्रवाद या विकास के नाम पर हो रहा है. जिन संस्थानों को जांच और संतुलन के रूप में काम करना चाहिए, वे कमजोर दिखाई दे रहे हैं. प्रेस दबाव में है अस्साथ ही नागरिक समाज को कई स्तरों पर दबाया जा रहा है. और गरीब और हाशिए पर पड़े लोग, जिनका उत्थान हमारा सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए, अक्सर खुद को अनसुना पाते हैं.
आपका शासन ‘अमृत काल’ की बात करता है, लेकिन कोई भी युग वास्तव में सुनहरा नहीं हो सकता है यदि स्वतंत्रता सशर्त हो और न्याय चयनात्मक हो. मैं दोहराता हूं कि भारत केवल एक भूगोल नहीं है, यह एक सभ्यता है जिसने दुनिया को सत्य, अहिंसा और नैतिक साहस का मूल्य सिखाया है. वही मूल्य जिन्होंने हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित किया, हमें अब भी उनका मार्गदर्शन स्वीकार करना चाहिए. संविधान महज एक कानूनी दस्तावेज नहीं है; यह राज्य और उसके नागरिकों के बीच नैतिक अनुबंध है.
हर गणतंत्र के जीवन में एक ऐसा क्षण आता है जब उसे रुककर सोचना चाहिए, खुद को याद दिलाना चाहिए कि वह किन मूल्यों के लिए खड़ा है. हम ऐसे ही क्षण में आज जी रहे हैं. मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करता हूं कि बहुसंख्यकवाद के प्रलोभन को खारिज करें और संवैधानिक भरोसे का उल्लंघन न करें. आपके पास जो शक्ति है वह अपार है, लेकिन उससे भी बड़ी आपकी जिम्मेदारी है. इसका इस्तेमाल भारत की आत्मा को मिटाने के लिए नहीं, बल्कि इसके वादे को पूरा करने के लिए करें.
आशा और चिंता के साथ,
आपका साथी,
जयप्रकाश नारायण
(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)
