जब सिनेमा इतिहास को फिर से लिखने लगे: इतिहास लेखन की एक चेतावनी

इतिहास लेखन सिखाता है कि इतिहास कभी बंद ग्रंथ नहीं होता. वह अतीत और वर्तमान, प्रमाण और व्याख्या, स्मृति और अर्थ के बीच चलने वाला निरंतर संवाद है. जब यह संवाद एकालाप में बदल जाता है, तब इतिहास भी क्षीण होता है और समाज भी. सिनेमा अतीत को प्रकाशित कर सकता है, बशर्ते वह विनम्रता के साथ स्वयं को अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक बड़े और जटिल संवाद का सहभागी माने.

नेहरू-मोदी संवाद: बीते समय को कठघरे में खड़ा कर आज के सवालों से नहीं बचा जा सकता

'इतिहास को पढ़िए, उसकी आलोचना कीजिए, उससे सीखिए भी. लेकिन वर्तमान की समस्याओं का समाधान इतिहास के कब्रिस्तान में नहीं मिलेगा. बेरोज़गार युवा को नौकरी चाहिए, इतिहास का अभियुक्त नहीं. महंगाई से परेशान परिवार को राहत चाहिए, सत्तर साल पुरानी बहस नहीं.'

महंगाई झेलिए, मुस्कुराइए और राष्ट्रनिर्माण में योगदान दीजिए

सरकार ने जनता को समझाने का अद्भुत तरीका खोज लिया है. अब यदि पेट्रोल महंगा हो तो समझिए विदेश नीति मजबूत हो रही है. डीज़ल और महंगा हो जाए तो मान लीजिए भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है.

‘भू-राजनीतिक तनावों से उतना भय नहीं, जितना अचानक उठे किसी पत्रकार के हाथ से है’

अब कूटनीति का दायरा केवल देशों तक सीमित नहीं रहा, अब उसमें 'छवि-सुरक्षा' का नया आयाम जुड़ गया था. विदेश नीति को अनौपचारिक रूप से दो भागों में बांट दिया गया था, पहला, दुनिया के देशों से संबंध बेहतर बनाए रखना. दूसरा, दुनिया को यह विश्वास दिलाते रहना कि कोई असुविधाजनक प्रश्न वास्तव में असुविधाजनक था ही नहीं.

मी लॉर्ड, आलोचना लोकतांत्रिक आवश्यकता है, प्रदूषण नहीं

जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडियाकर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना 'कॉकरोच' और 'परजीवी' से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता; यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है.

‘हमारे यहां समस्याएं भी संस्कारी होती हैं; चुनाव होने तक चुपचाप कोने में बैठी रहती हैं’

भारतीय लोकतंत्र में शायद अब एक नया मौसम जोड़ देना चाहिए; गर्मी, बारिश, सर्दी और 'चुनाव-उपरांत त्याग काल'. चुनाव के दौरान नागरिक 'विकास' सुनेंगे और चुनाव के बाद 'संयम' का पाठ पढ़ेंगे.

सवाल महज़ एक प्रतिमा का नहीं, हमारे ऐतिहासिक बोध और राजनीतिक स्मृति सीमित होने का है

प्रतिमाएं पत्थर या धातु भर नहीं होतीं. वे इस बात का संकेत होती हैं कि समाज किन विचारों, संघर्षों और स्मृतियों को अपने सार्वजनिक जीवन में जगह देना चाहता है. जब राजनीति स्मृति-विनाश का रूप लेने लगे, तब कोई भी प्रतीक सुरक्षित नहीं रहता, न लेनिन, न गांधी, न नेहरू, न आंबेडकर.

ट्रैफिक जाम से जागरूकता तक: मज़दूरों की आवाज़ और हमारा लोकतंत्र

व्यवधान के महिमामंडन के पक्ष में न होते हुए यह मानना होगा कि राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह विभिन्न हितों के बीच संतुलन स्थापित करे. लेकिन समायोजन का बोझ केवल उन पर नहीं डाला जा सकता जो पहले से ही हाशिए पर हैं. न ही सार्वजनिक जीवन में प्रभुत्व वर्गों की परेशानी-जन्य अधीरता को वास्तविक शिकायतों को ख़ारिज करने का आधार बनाया जा सकता है.

झाल-मूढ़ी: तुम्हारा ‘ब्रांड मैनेजर’ तो था ही नहीं, इसलिए तुम्हें मौका मिलने में इतनी देर लग गई

प्रिय झाल-मूढ़ी, तुम राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गई हो. यह वही देश है जहां अक्सर मुद्दे अपनी बारी का इंतज़ार करते-करते बूढ़े हो जाते हैं, पर तुमने तो आते ही लाइन तोड़ दी, सीधे बहस और विमर्श के केंद्र में. अचानक मिले ‘राष्ट्रीय सम्मान’ का आनंद लो पर उससे भ्रमित मत हो जाना. इस देसी भक्ति-विशेष की कृपा से ऐसी ‘अल्पकालिक चर्चाएं’ हमने पहले भी देखी हैं, जहां मुद्दे नहीं, मौके चमकते हैं; और सरोकार नहीं, साउंडबाइट्स टिकते हैं.

क्या घरों की सचमुच कोई जाति नहीं होती?

लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री का कहना कि 'घरों की कोई जाति नहीं होती'- सुनने में सहज कथन लगे, पर व्यवहार में वह उस सच्चाई से आंख मूंद लेने जैसा है, जिसे देश का एक बड़ा हिस्सा रोज़ जीता है. आज भी देश के अनेक हिस्सों में बस्तियां जाति आधार पर विभाजित हैं और यह फांक केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित नहीं है.

दृश्य-प्रपंच के युग में राजनीति

विचारधारात्मक राजनीति की वकालत करते हुए उद्देश्य आधुनिक संप्रेषण को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके मूल अर्थ के उपनिवेशीकरण का प्रतिरोध करना है. राज्य और नागरिक के बीच संबंध को एक लेन-देन के रूप में नहीं, बल्कि पारस्परिक ज़िम्मेदारी पर आधारित संवाद के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए. हमें स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि नागरिक शासन के उपभोक्ता नहीं हैं; वे उसके निर्माण में सहभागी हैं.

शहादत को पराजय नहीं, बल्कि नैतिक विजय के रूप में देखा जाना चाहिए

पश्चिम एशिया के अनेक संघर्ष इस बात के साक्षी हैं कि त्वरित सैन्य जीत की कल्पना अक्सर दीर्घकालिक अस्थिरता में परिवर्तित हो जाती है. जब किसी समाज की पहचान, उसकी आस्था और उसकी ऐतिहासिक स्मृति दांव पर होती है, तब संघर्ष केवल भौतिक नहीं रहता; वह एक वैचारिक और नैतिक आयाम ग्रहण कर लेता है. ऐसे में 'जीत' और 'हार' के पारंपरिक मानदंड अप्रासंगिक हो जाते हैं.

राही मासूम रज़ा के नाम मनोज कुमार झा का ख़त: ‘आपकी याद हमें यह सिखाती है कि प्रतिरोध हमेशा नारा नहीं होता’

राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने लेखक राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए यह भावपूर्ण पत्र लिखा है. इसमें रज़ा की साहित्यिक विरासत, उनकी मानवीय दृष्टि और आज के समय में उनके शब्दों की प्रासंगिकता पर आत्मीयता से विचार किया गया है.

बिहार की कहानी भले ही गठबंधन-राजनीति की एक और कड़ी लगे, पर असली नाट्य कहीं और है

बिहार में एक ऐसा आख्यान गढ़ा जा रहा है जिसमें नाटक का केंद्रीय पात्र मंच पर तो उपस्थित है, पर अपनी ही कहानी कहने में असमर्थ. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के उदय के साथ जो राजनीतिक नाटक सामने आया था, इसी राजनीति का एक प्रारूप था. बिहार में जो घट रहा है, वह उस कथा की पुनरावृत्ति कम और एक नई व्याख्या अधिक प्रतीत होता है.

शंकर: महानगर की चमक के बीच एकाकीपन का अमर कथाकार

स्मृति शेष: शंकर का साहित्य इस अर्थ में अद्वितीय है कि वह अमूर्त समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को जीवंत मानवीय अनुभवों और ठोस सामाजिक परिस्थितियों में रूपांतरित कर देता है. उनके निधन के साथ एक ऐसे लेखक का अवसान हुआ, जिसने भारतीय शहरी आधुनिकता की जटिलताओं- वर्ग, आकांक्षा, नैतिक द्वंद्व और मानवीय अकेलेपन को सशक्त भाषा और संवेदना प्रदान की.