व्यवधान के महिमामंडन के पक्ष में न होते हुए यह मानना होगा कि राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह विभिन्न हितों के बीच संतुलन स्थापित करे. लेकिन समायोजन का बोझ केवल उन पर नहीं डाला जा सकता जो पहले से ही हाशिए पर हैं. न ही सार्वजनिक जीवन में प्रभुत्व वर्गों की परेशानी-जन्य अधीरता को वास्तविक शिकायतों को ख़ारिज करने का आधार बनाया जा सकता है.
प्रिय झाल-मूढ़ी, तुम राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गई हो. यह वही देश है जहां अक्सर मुद्दे अपनी बारी का इंतज़ार करते-करते बूढ़े हो जाते हैं, पर तुमने तो आते ही लाइन तोड़ दी, सीधे बहस और विमर्श के केंद्र में. अचानक मिले ‘राष्ट्रीय सम्मान’ का आनंद लो पर उससे भ्रमित मत हो जाना. इस देसी भक्ति-विशेष की कृपा से ऐसी ‘अल्पकालिक चर्चाएं’ हमने पहले भी देखी हैं, जहां मुद्दे नहीं, मौके चमकते हैं; और सरोकार नहीं, साउंडबाइट्स टिकते हैं.
लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री का कहना कि 'घरों की कोई जाति नहीं होती'- सुनने में सहज कथन लगे, पर व्यवहार में वह उस सच्चाई से आंख मूंद लेने जैसा है, जिसे देश का एक बड़ा हिस्सा रोज़ जीता है. आज भी देश के अनेक हिस्सों में बस्तियां जाति आधार पर विभाजित हैं और यह फांक केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित नहीं है.
विचारधारात्मक राजनीति की वकालत करते हुए उद्देश्य आधुनिक संप्रेषण को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके मूल अर्थ के उपनिवेशीकरण का प्रतिरोध करना है. राज्य और नागरिक के बीच संबंध को एक लेन-देन के रूप में नहीं, बल्कि पारस्परिक ज़िम्मेदारी पर आधारित संवाद के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए. हमें स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि नागरिक शासन के उपभोक्ता नहीं हैं; वे उसके निर्माण में सहभागी हैं.
पश्चिम एशिया के अनेक संघर्ष इस बात के साक्षी हैं कि त्वरित सैन्य जीत की कल्पना अक्सर दीर्घकालिक अस्थिरता में परिवर्तित हो जाती है. जब किसी समाज की पहचान, उसकी आस्था और उसकी ऐतिहासिक स्मृति दांव पर होती है, तब संघर्ष केवल भौतिक नहीं रहता; वह एक वैचारिक और नैतिक आयाम ग्रहण कर लेता है. ऐसे में 'जीत' और 'हार' के पारंपरिक मानदंड अप्रासंगिक हो जाते हैं.
राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने लेखक राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए यह भावपूर्ण पत्र लिखा है. इसमें रज़ा की साहित्यिक विरासत, उनकी मानवीय दृष्टि और आज के समय में उनके शब्दों की प्रासंगिकता पर आत्मीयता से विचार किया गया है.
बिहार में एक ऐसा आख्यान गढ़ा जा रहा है जिसमें नाटक का केंद्रीय पात्र मंच पर तो उपस्थित है, पर अपनी ही कहानी कहने में असमर्थ. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के उदय के साथ जो राजनीतिक नाटक सामने आया था, इसी राजनीति का एक प्रारूप था. बिहार में जो घट रहा है, वह उस कथा की पुनरावृत्ति कम और एक नई व्याख्या अधिक प्रतीत होता है.
स्मृति शेष: शंकर का साहित्य इस अर्थ में अद्वितीय है कि वह अमूर्त समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को जीवंत मानवीय अनुभवों और ठोस सामाजिक परिस्थितियों में रूपांतरित कर देता है. उनके निधन के साथ एक ऐसे लेखक का अवसान हुआ, जिसने भारतीय शहरी आधुनिकता की जटिलताओं- वर्ग, आकांक्षा, नैतिक द्वंद्व और मानवीय अकेलेपन को सशक्त भाषा और संवेदना प्रदान की.
जब कलाकारों, लेखकों या सामान्य नागरिकों को आईना दिखाने पर दंडित किया जाता है, तब समस्या वो दर्पण नहीं है क्योंकि उस पर तो दरारें पहले से थीं. बदला यह है कि हमें देखना छोड़ देने की ट्रेनिंग दी जा रही है- टूटन को नकारने की, स्वीकार को ग़द्दारी मानने की. हम सब जानते हैं कि रहमान ने सिर्फ वही बात कही जो हममें से लाखों लोग देख रहे हैं. उन पर बरसी आग बताती है कि हमें झूठ नहीं,
लोकतंत्र केवल तब नहीं ढहते जब चुनावों में धांधली होती है; वे तब भी क्षीण होते हैं जब आज्ञाकारिता भागीदारी का स्थान ले लेती है, जब मतभेद को अवैध ठहराया जाता है, और जब सत्ता से प्रश्न पूछना ख़तरे के रूप में पेश किया जाता है, ज़िम्मेदारी के रूप में नहीं.
मंटो की 'टोबा टेक सिंह' और राही मासूम 'रज़ा' का 'टोपी शुक्ला' आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि विभाजन 1947 में खत्म हो चुका कोई अध्याय नहीं है. दक्षिण एशिया की राजनीति में यह हमेशा मौजूद रहा है. जब भी नागरिकों से 'वो यहीं के हैं' ये साबित करने के लिए कहा जाता है, जब ध्रुवीकरण का नतीजा किसी चुनावी जीत के तौर पर निकलता है, बंटवारे को दोहराया जाता है.
शिक्षा कोई तटस्थ विधा नहीं है. यह या तो आपको पालतू बनाती है या मुक्त करती है. इसी तरह सच्चा शिक्षक छात्रों को मुक्त करता है और उन्हें मुक्तिकामी पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. शिक्षक दिवस पर पढ़िए राजद सांसद मनोज कुमार झा का विचारवान लेख.
अपने देश में जातीय-राष्ट्रवादी नेता और वैश्विक मंच पर उदार राजनेता की दोहरी भूमिका निभाना नरेंद्र मोदी के लिए संभव नहीं है. जब प्रधानमंत्री देश के बाहर मूल्यों के पैरोकार के रूप में खुद को प्रस्तुत करते हैं, जबकि घर में संस्थानों की स्वायत्तता पर अंकुश लगाते हैं, तो वैश्विक नेता इस विरोधाभास को न सिर्फ़ पहचानते हैं बल्कि उसे भारत के विरुद्ध इस्तेमाल भी करते हैं.
जयप्रकाश नारायण पर आरोप लगता है कि उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ़ अपने आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से समर्थन लेकर हिंदुत्व को वैधानिकता दे दी, और उसके नेताओं का मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश सुनिश्चित कर दिया. राजद सांसद मनोज कुमार झा इसका ज़ोरदार प्रत्युत्तर देते हैं कि अगर आज जेपी होते तो मोदी सरकार का स्थायी प्रतिपक्ष होते.
अगर रामनाथ गोयनका जीवित होते और आज के 'अघोषित आपातकाल' पर अख़बारों के मालिकों और संपादकों को पत्र लिखते, तो शायद यह दर्ज करते कि वह प्रेस जो स्वतंत्र होने की अनुमति का इंतज़ार करती है, उसने अपनी मर्ज़ी से आजीवन क़ैदी बनना चुना है. और वह संपादक जो सत्य से मुंह मोड़ता है, उसे उस कुर्सी पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है.