नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील की है, जिसमें 62 वर्षीय महिला रक्षंदा राशिद को वापस लाने का आदेश दिया गया था. रक्षंदा को पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान भेज दिया गया था, जबकि वह लगभग चार दशकों से लॉन्ग-टर्म वीज़ा (एलटीवी) पर भारत में रह रही थीं.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, गृह मंत्रालय ने न्यायाधीश राहुल भारती के 6 जून के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट की पीठ के समक्ष लेटर्स पेटेंट अपील दायर की, जिसमें केंद्रीय गृह सचिव को राशिद को दस दिनों के भीतर भारत वापस लाने का निर्देश दिया गया था.
मंगलवार को न्यायाधीश ने गृह मंत्रालय से अनुपालन मांगा तथा मंत्रालय को मामले पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए दस दिन का अतिरिक्त समय दिया.
महिला के वकील अंकुर शर्मा ने अखबार को बताया कि जज ने गृह मंत्रालय से अनुपालन पर जोर दिया, उन्होंने कहा कि अपील दायर होने के बावजूद अभी तक आदेश पर कोई रोक नहीं है. अपील पर बुधवार को मुख्य न्यायाधीश की पीठ सुनवाई करेगी.
गृह मंत्रालय ने कहा कि 29 अप्रैल को निर्वासन के समय एलटीवी अस्तित्व में नहीं था. वहीं राशिद ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्होंने जनवरी में एलटीवी नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था और आवेदन को कभी खारिज नहीं किया गया.
लॉन्ग-टर्म वीज़ा धारक
22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले – जिसमें 26 लोग मारे गए थे, के बाद गृह मंत्रालय ने सभी पाकिस्तानी नागरिकों के वीज़ा रद्द कर दिए और उन्हें 29 अप्रैल तक देश छोड़ने को कहा.
इस आदेश में लॉन्ग-टर्म वीज़ा धारकों के साथ-साथ भारतीय नागरिकों से विवाहित पाकिस्तानी महिलाओं को भी छूट दी गई थी.
राशिद दोनों श्रेणियों में आती हैं, एक पाकिस्तानी नागरिक होने के नाते, एक भारतीय से विवाहित, पिछले 38 वर्षों से जम्मू में एक लॉन्ग-टर्म वीज़ा पर रह रही हैं, जिसे हर साल नवीनीकृत किया जाता है.
उन्होंने 1996 में भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया था, लेकिन अनुरोध पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई थी.
‘तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया’
राशिद की बेटी फातिमा शेख ने कहा कि उनकी मां को 29 अप्रैल को पुलिस ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करके भारत से बाहर निकाल दिया.
शेख ने कहा, ‘पहलगाम आतंकी हमले से हम दुखी हैं, लेकिन किस आधार पर मेरी मां को भारत से निकाला गया? हमने जनवरी में लॉन्ग-टर्म वीज़ा एक्सटेंशन के लिए आवेदन किया था, फिर भी पुलिस द्वारा दिए गए ‘भारत छोड़ो’ नोटिस में कहा गया कि हमने 8 मार्च को आवेदन किया था. 26 अप्रैल को मुझे (विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय) एफआरआरओ से एक ईमेल मिला कि आवेदन पर कार्रवाई की जा रही है, फिर भी उन्हें 29 अप्रैल को निर्वासित किया गया.’
‘इसके बाद 9 मई को मुझे फिर से एक ई-मेल मिला कि आवेदन स्वीकृति के लिए उच्च अधिकारियों के पास भेज दिया गया है,’ उन्होंने बताया.
‘जल्दबाजी में निर्वासन’
उनकी बेटी ने कहा कि पुलिस अधिकारी सुबह 7 बजे उनके घर के बाहर आए और राशिद को पंजाब में अटारी सीमा चौकी पर ले गए, जहां से उन्हें निर्वासित कर दिया गया.
उन्होंने कहा, ‘उन्होंने हमें अपने वकीलों से बात करने भी नहीं दिया. वे उन्हें निर्वासित करने की इतनी जल्दी में थे. वह अपनी पूरी ज़िंदगी जम्मू में रही है. वह पाकिस्तान में कैसे ज़िंदा रहेगी? वहां बहुत महंगाई है, उनका वहां कोई नहीं है.’
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनकी मां का पाकिस्तान में कोई रिश्तेदार नहीं है. उन्होंने कहा कि पिछले तीन महीनों से वे एक छोटे से होटल में अकेली रह रही हैं और उनके पास अधिक पैसे भी नहीं हैं.
गौरतलब है कि बीते 6 जून को जस्टिस राहुल भारती ने केंद्रीय गृह सचिव को आदेश दिया था कि वे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की असाधारण प्रकृति को देखते हुए याचिकाकर्ता को पाकिस्तान से वापस लाएं.
उन्होंने आगे कहा, ‘मानवाधिकार मानव जीवन का सबसे पवित्र अंग है और इसलिए, ऐसे मौके आते हैं जब संवैधानिक न्यायालय को किसी मामले के गुण-दोषों के बावजूद एसओएस जैसी रियायत देनी पड़ती है, जिस पर समय रहते ही निर्णय लिया जा सकता है.’
