कथा साहित्य को पढ़ते हैं तो सबसे सशक्त लेखक वे प्रतीत होते हैं जो या तो अपने पूर्वजों से जूझते हैं या फिर वर्तमान दौर को विद्रूप करती शक्तियों से. पाठक के मन में प्रतिरोध की ऐसी ऊष्मा पैदा करते, जो सहजता में बेचैन रहता है. पीड़ाओं के आंतरिक संसार के संघर्ष हों या इस जगत् के अव्यक्त मनोद्वेग, इन स्थापनाओं और मानवीय संवेदन के प्रतिरोधात्मक संघर्ष से जो प्रभाव पैदा होता है, वही मौलिकता में गलता, ढलता और बदलता हुआ एक आकार लेता है. अनामिका अनु की कहानियां इस संघर्ष की एक दुर्लभ भारतीय मिसाल हैं.
यह लेखिका किसी ‘परंपरा’ से ऋणी नहीं हैं, बल्कि अपने ही ढंग से प्रीकर्सर-वॉइड को भरती हैं; वह ‘कथा’ नहीं लिखतीं, कथामूल्य की पुनर्रचना करती हैं. कथा साहित्य की समीक्षा दृष्टि से साहित्य में ‘एस्थेटिक स्ट्रेंग्थ’ एक केंद्रीय मूल्य है. वह शक्ति, जो काव्यात्मक, नैतिक और स्मृति में लिपटी हुई हो, लेकिन किसी वर्चस्वशाली स्वरूप से मुक्त हो. अनामिका अनु की कहानियां इसी एस्थेटिक करेज का काम करती हैं.
जैसे उनकी एक कहानी ‘येनपक कथा: बूढ़ा छाते वाला’ है. यह कहानी मेमोरी-हॉन्टेड कैरेक्टर का आभास देती है. यह कथा कोई समाजशास्त्रीय दस्तावेज नहीं, बल्कि एकालाप की पारलौकिकता है. ऐसी पारलौकिकता, जहां नायक छाते में नहीं, छाया में जीता है. इसे माइनर लीयरियन ट्रेजेडी कह सकते हैं या कि जिसे एजिंग विदआउट किंगशिप, ग्रीफ़ विदआउट स्टेज भी कहा जाता है.
मैं उनकी किताब के पन्ने खोलता हूं तो एक कहानी आगे आती है, जो मैंने किसी पत्रिका में पहले भी पढ़ी थी: ‘काली कमीज का कुर्ता’. यह शीर्षक जैसे मिसप्रिज़न की अवधारणा को जगाता है. ख़ासकर जब कथाकार वस्तु और भाषा के बीच जानबूझकर एक विरूप दूरी बना देता है या कहें कि बना देती हैं. यह कहानी वस्त्र नहीं, व्यक्तित्व की परतें उघाड़ती है. यह कथाकार यहां ऐंटीथेटिकल सेल्फहुड की आकृति गढ़ती हैं.
अनामिका अनु की कहानियों में कई जगह स्वाद एक स्थूल बिम्ब नहीं, स्मृति और वंचना का उपकरण बनता है. जैसे उनकी कहानी ‘मछली का स्वाद’. इस कहानी को ट्रॉपोलॉजिकल सबवर्ज़न कह सकते हैं. कथा जब स्वाद की नहीं, अस्वाद, आस्वाद और आह्लाद की विरासत बन जाती है. इसी तरह ‘चारों सम्त आठों पहर छोड़ जाऊंगा’ कहानी को लें तो यह शीर्षक ही एक मेटाफिज़िकल विरोधाभास है. यह एक मिल्टॉनिक हाइपरबोली है, जो दिखता है, वह नहीं है; जो नहीं है, वही टिकता है. यहां विदाई स्थायित्व की परछाई बन जाती है.
उनकी एक कहानी ‘ग्रीन वीलो’ है, जो प्रकृति से नहीं, स्मृति और प्रतीक्षा से संवाद करती है. हम इसमें इनर सॉलिट्यूड भी देख सकते हैं; लेकिन वह अकेलापन स्त्री के पक्ष में आरोपित नहीं, अर्जित किया गया है. ‘स्वीटी की अम्मा’ में मां नॉट अ सोर्स ऑफ नर्चर बट ऑफ नैरेटिव रप्चर है. इस कहानी की ‘अम्मा’ कोई देवी या त्याग की मूर्ति नहीं, वह एक विरोधाभासी स्त्री की छवि है, जो सशक्त मां संकल्पना से मेल खाती है.
‘अम्फान’ का अपना अस्तित्व है. एक तूफान कथा में तब्दील नहीं होता, बल्कि एक ‘डेमॉनिक मेटाफर’ में ढलता है. डेमॉन वह शक्ति है जो कवि को अपने अंधेरे में बांधती है. ‘अम्फान’ में स्त्री और तूफान के बीच एक अचूक और अदभुत अनुनाद है. ‘अमलतास और आत्मा’ को एकफ्रास्टिक लिरिसिज़्म कह सकते हैं, जहां रंग और आत्मा एक-दूसरे को प्रतिबिंबित करते हैं. यह कोई प्राकृतिक कथा नहीं, बल्कि आत्मा की दीर्घ परछाई है.
‘फेसबुक और पाप’ एक समकालीन पैरोडिक थियोलॉजी है, जहां फेसबुक एक ईश्वर नहीं, बल्कि कन्फेशन बॉक्स है. मैं इस कहानी को मॉक मिल्टॉनिक कॉस्मोलॉजी कहूंगा. एक डिजिटल हेलफायर. ख़ासकर अगली कहानी इसकी तो पृष्ठभूमि प्रतीत होती है. कहानी है: ‘मृत पिता की चिट्ठी’. रिटर्न ऑफ द डेड पोएट शैली में लिखी गई सबसे प्रबल भारतीय कथाओं में एक हो सकती है. यहां ‘पिता’ जीवित नहीं, लेकिन सबसे ज़्यादा कहने योग्य वही हैं. ‘आमौर और चमौल’ बताती है कि भाषा की सांस्कृतिक अंतर्ध्वनियां बहुत महत्वपूर्ण हैं. यह कहानी दो शब्दों की लड़ाई नहीं, दो अस्तित्वों की सांस्कृतिक रेसल है, जैसे एक ग्रामीण टीएस एलियट गांव में उतर आया हो.
एक कहानी है ‘तर्क’. तर्क वैसे कुतर्क के रूप में ही रहता आया है. यह एक रिटॉरिकल मास्क होता है जीवन में, पर यहां वह जीवन और असहमति का निजी दस्तावेज बन जाता है. यह कहानी तर्क के भीतर की चुप्पियों को भी पकड़ती है. ‘चितकबरी’ में स्त्री कोई रंग नहीं, रंगों की असहति है. मुझे यह कहानी हेटरोग्लॉसिया ऑफ फीमेल बीइंग लगती है. ‘एक चित्रकार की वापसी’ में ऐसा आभास है कि हमारे जीवन में हमारे प्रिय पात्र कभी लौटते नहीं. वे बस लौटने का भ्रम रचते हैं. यह कहानी भी वापसी की नहीं, री-इमैजिनेशन की है. एक चित्रकार लौटता नहीं, दृश्य बदल देता है.
अगली कहानी है : ‘वह पागल नहीं थी’. यह शीर्षक एक आइरनी है. पाठक जान जाता है कि इस कहानी में किसी को पागल कहा गया होगा. यह एक तरह का मैड ओफ़ीलिया’ज़ रिवेंज कह सकते हैं. ‘हवाई चप्पल’ को देखते हैं. इसमें छोटे प्रतीक आकर्षित करते हैं. ख़ासकर जब वे सिम्बॉलिक ओवररीच कर जाते हैं. यह कहानी एक चप्पल की नहीं, चलने और ठहरने की दार्शनिक चिंता है.
‘भीगे तकिए की धूप’ नींद, विरह और रोशनी का रूपक है. ‘थोड़ा-सा सुख’ शीर्षक किसी साहित्यिक वाक्यांश के अनुगूंज लेकर आता है: ‘ऑल जॉय इज़ ब्रीफ़, बट लिटरेचर रिमेम्बर्स इट ऐज़ एटर्नल.’ यह कहानी उसी क्षणिक सुख की स्थायी अनुगूंज है. ‘दृगा लिखती हैं’ कहानी राइटर’ज़ एंग्ज़ायटी का चरम है. जब लेखिका स्वयं को लिखती है, नायक नहीं. यह आत्मकथ्य नहीं, लिटरेरी रेसिस्टेंस है.
दरअसल, साहित्य तब अर्थपूर्ण होता है जब वह ट्रुथ ऑफ बीइंग को छू लेता है, बिना उपदेश या यथार्थ की गुलामी किए. अनामिका अनु की कहानियां इस ट्रुथ को कथात्मक काया देती हैं. वे किसी परंपरा को आगे नहीं बढ़ातीं, वे अपनी एक नई परंपरा रचती हैं. यह कहना उचित होगा: शी इज़ नॉट ऑफ द कैनन, बट द कैनन मस्ट नाऊ रिस्पॉन्ड टू हर.
अनामिका अनु की ये कहानियां एक ऐसे स्त्री-साहित्य का निर्माण करती हैं, जो न केवल ‘इन्फ्लुएंस’ को समझती है, बल्कि उसे चुनौती देती है, और अंततः ‘ट्रांसेंड’ भी करती हैं. प्रख्यात समालोचक हरोल्ड ब्लूम ने एक बार कहा था, ‘पोएटिक इन्फ्लुएंस इज़ नॉट बेनाइन. इट इज़ ऐन ऐक्ट ऑफ मिसरीडिंग ऑफ सर्वाइवल.’ यही बात आज की हिंदी कहानी पर भी लागू होती है और अनामिका अनु के कथा-संसार पर विशेष रूप से. उनकी कहानियां उस स्त्री-लेखन की परंपरा से निकलती हैं जो न तो स्वयं को पीड़ित के रूप में घोषित करती हैं, न ही रचना को आत्म-केंद्रित घोषणा में सीमित करती हैं.
वे लिखती हैं जैसे कोई भीतर के अंधेरे में टटोलता हुआ आईना पकड़ रहा हो और यह लेखन शैली उस आलोचनात्मक दृष्टि के साथ एक अभूतपूर्व इंटरटेक्स्चुअल रेज़ोनेंस रचती है, जिसे साहित्य में ‘स्ट्रॉन्ग मिसरीडिंग’ माना जाता है. यह तो थी पश्चिमी दार्शनिक दृष्टि, लेकिन अगर भारतीय दर्शन की आत्मवत् सर्वभूतेषु को मानें तो आलोचना का मूल केंद्र ‘आत्मा बनाम परंपरा’ है. और अनामिका अनु की कहानियां भी इसी द्वंद्व से पैदा होती हैं. वे प्रीकर्सर ट्रेडिशन को स्वीकारते हुए भी उससे टकराती हैं और जहां ज़रूरत हो, उसे तोड़कर अपनी एक नई स्मृति की छाया गढ़ती हैं.
इन कहानियों में हम बार-बार देखेंगे: पिता, मां, प्रकृति, मृत्यु, स्मृति, पागलपन, साधारण वस्तुएं, नारी-स्पेस, सब कुछ एक निजी ब्रह्मांड में रूपांतरित होता है. कथाओं की शैली लीनियर नहीं, बल्कि बिलेटेड है. समय की लय को झटका देती हुई, रुकती, लौटती, फिर से फूटती. चरित्र कोई प्रतीक नहीं बनते, वे टेक्स्ट्स विदिन टेक्स्ट हैं. एक-दूसरे को व्याख्यायित करते हुए. एक सजग कथाकार के लिए ‘कैनन’ वह नहीं जो सत्ता तय करे, बल्कि जो एस्थेटिक चैलेंज पेश करे. और अनामिका अनु की स्त्रियां, बूढ़े, चित्रकार, अम्माएं और पागल, सब उसी चुनौती का हिस्सा हैं. वे कैनॉनिकल नहीं बनना चाहतीं. वे कैनन से बाहर रहकर कैनन को फिर से परिभाषित करती हैं.
हम ऐसे द्वंद्व वाले दौर में हैं, जहां साहित्य का मूल्य ‘प्रगतिशील’ या ‘राजनीतिक’ होना और साहित्य वही है, जो एंग्ज़ायटी ऑफ बीइंग को महसूस कर सके के बीच पेंडुलम की तरह लटके हुए हैं. लेकिन अगर उसके उत्तर-पक्ष को देखें तो अनामिका अनु की कहानियां लेट एस्थेटिसिज़्म की सर्वाधिक सशक्त उम्मीदवार हैं. उनके मौन में भी वह साहित्यिक गर्जन है, जिसे आलोचक पहचाने या न पहचाने, अलबत्ता, पाठक महसूस करता है और समय स्वीकार करता है, यह आशा की जा सकती है.
बहरहाल, सारी आलोचनाएं अंततः एक प्रश्न पर लौटती हैं, हू हैज़ द राइट टू लास्ट? यानी कौन सा लेखक, कौन सी कृति, काल के गर्जन में जीवित रह जाएगी?
अनामिका अनु की कहानियां इस प्रश्न का प्रतिरोध नहीं करतीं, वे उसे एक स्त्री की भाषा में दोहराती हैं; लेकिन एक ऐसे टिमटिमाते स्वर में, जो न तो अधिकार मांगता है, न दया, बल्कि केवल अपनी उपस्थिति की श्रद्धा में खड़ा होता है. दॅ एंग्ज़ायटी ऑफ इन्फ्लुएंस में जो संघर्ष पुरुष लेखकों के बीच होता है, वह यहां स्त्री, समाज, भाषा और स्मृति के बीच घटता है. अनामिका अनु उस स्ट्रॉन्ग पोएट की स्त्री-संस्करण हैं, जिन्हें ‘डॉटर ऑफ ट्रेडिशन’ कह सकते हैं, लेकिन ऐसी पुत्री जो पिता की भाषा से विद्रोह करके ही उत्तराधिकार अर्जित करती है.
अनामिका अनु की कहानियां कैनॉनिकल न होकर एंटी-कैनॉनिकल कैनन बनती हैं. वह कहते हैं न कि ‘द स्ट्रॉन्गेस्ट राइटर्स मेक अस रिवाइज़ द कैनन टू इन्क्लूड देम’, ये कहानियां हिंदी कहानी के ‘मुख्यधारा कथा-इतिहास’ से बाहर रहते हुए भी उस पर पुनर्विचार को बाध्य करती हैं.
अनामिका अनु कम शब्दों में अधिक कहती हैं और फॉर्म की जगह रेज़िड्यू छोड़ती है, जैसे पाठक कथा के बाद शेष मौन में कहानी को फिर से बनाता है. इनकी स्त्रियां ब्लूमियन हीरो नहीं, हीरोइन हैं; लेकिन ट्रैजिक नहीं, अवेयर. वे पराजित नहीं होतीं, न ही विजयी. वे केवल जाग्रत होती हैं.
इनके पात्र भी सच्चे अनुभव से गुजरकर मौन में लौटते हैं. इन कहानियों में एक तरह का पॉएटिक ट्रुथ भी है, जो वस्तुनिष्ठ सत्य नहीं, बल्कि आत्मिक यथार्थ है, जिसे तर्क से नहीं, केवल संवेदना और आत्मा की यात्रा से समझा जा सकता है. उन्हें पढ़ते और विवेचित करते हुए एक प्रतिध्वनि गूंजती है : शी मिसरीड्स ट्रेडिशन नॉट बिकॉज़ शी मिसअंडरस्टैंड्स इट, बट बिकॉज़ शी डेयर्स टू री-राइट इट. दैट इज़ द मार्क ऑफ अ राइटर हू विल लास्ट.
अनामिका अनु की कहानियां पाठक के भीतर अस्थायी पीड़ा को पिरो जाती हैं. आत्मा, स्मृति और प्रतिरोध की ये स्त्री-कथाएं सौंदर्यशास्त्रीय बोध की अनुपमा के साथ मौजूद हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
