लोकतंत्र में सवाल: सिंहासन की ऊंचाई से नहीं, उत्तर की ऊंचाई से नेता बड़ा होता है

अच्छे राजनेता और अच्छे पत्रकार के बीच संबंध प्रतिद्वंद्विता का नहीं, तनावपूर्ण सम्मान का होता है. पत्रकार पूछता है; क्योंकि वह नागरिक की ओर से खड़ा है. राजनेता जवाब देता है; क्योंकि वह राज्य की ओर से ज़िम्मेदार है. दोनों के बीच यह निरंतर रस्साकशी ही लोकतंत्र के ताक़त देती है. जिस लोकतंत्र में पत्रकार केवल जयकार करे और नेता केवल भाषण दे, वहां जनता धीरे-धीरे दर्शक बन जाती है और संसद राजशाही की दर्शक दीर्घा.

जिन्हें पत्रकारिता का रखवाला समझा, वे कूचा-ए-क़ातिल के मुसाफ़िर निकले

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे पत्रकार जगदीश उपासने ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल करने वाली नॉर्वे की पत्रकार हेले ल्यूंग की आलोचना में उनकी निजी तस्वीरें पोस्ट की हैं. अगर सवाल पूछना अपमान है तो फिर पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में क्या पढ़ाया जाए? प्रेस नोट का संपादन? नेता की मुस्कान का वर्णन? विद्यार्थी अगर देखें कि एक विदेशी पत्रकार ने प्रश्न पूछा और वरिष्ठों ने उसके व्यक्तित्व पर हमला शुरू किया तो वह क्या सीखेगा?

चुनाव को ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की सरल कथा में बदल देना लोकतंत्र के जटिल विज्ञान का अपमान है

राजनीति की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अक्सर विजय को ही सत्य मान लेती है. जैसे चुनावी मैदान कोई जैविक जंगल हो, जहां जो बच गया वही श्रेष्ठ है, जो गिर गया वही अयोग्य. यह निष्कर्ष जल्दबाज़ी है. प्रकृति में भी जीवित रहना और नैतिक होना एक ही बात नहीं. कोई रणनीति क्षणिक रूप से सफल हो सकती है, लेकिन दीर्घकाल में विनाशकारी सिद्ध हो सकती है.

सोने की त्याग की नैतिकता किसके लिए, और प्रदर्शन की छूट किसे?

भारत जैसे आर्थिक असमान समाज में जब त्याग की भाषा आती है तो सबसे पहले पूछा जाना चाहिए कि त्याग कौन करेगा? वह जो पहले से ही राशन, किराया, फीस, ईएमआई के बीच फंसा है या वह जो संपत्ति को वस्त्र की तरह पहन सकता है? यह प्रश्न ईर्ष्या का नहीं, नैतिक अनुपात का है. यह द्वेष नहीं, सार्वजनिक न्याय का प्रश्न है.

बंगाल में भाजपा क्यों जीती? हार-जीत से आगे की कहानी

बंगाल को लेकर ज़मीन से आने वाली बात यह है कि बहुत-सी जगहों पर भाजपा का कैडर तो तृणमूल के ख़िलाफ़ लड़ ही रहा था, स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और वामपंथी कार्यकर्ताओं का एक हिस्सा भी तृणमूल-विरोध की मनःस्थिति में भाजपा को रास्ता दे रहा था.

‘ममता ने भाजपा का रास्ता खोला’: राहुल गांधी के बयान में कांग्रेस की पराजय कथा

राहुल का तर्क यह है कि यदि ममता ने अच्छी सरकार चलाई होती तो भाजपा के लिए रास्ता नहीं खुलता. अब इसी तर्क को बिना किसी छूट और बिना किसी नेहरू-गांधी भावुकता के 2014 पर लगाकर देखिए. अगर कांग्रेस नेता और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी ने साफ़-सुथरी सरकार चलाई होती तो क्या नरेंद्र मोदी के लिए दिल्ली का रास्ता इतना आसानी से खुला होता?

भारत ‘नरक’ नहीं: अमेरिकी निगाह दुनिया को बराबरी से देखने की क्षमता खो चुकी है

भारत को 'नरक' कहना भारत का अपमान नहीं, इतिहास के अमेरिकी बोध की निरक्षरता है. जिस धरती ने अमेरिका के जन्म से बहुत पहले गणित को शून्य और पाई दिए, भाषिक अनुशासन को पाणिनि दिया, करुणा को बुद्ध दिया और बहुलता को जीवन का स्वभाव बनाया- उसे 'हेलहोल' कहने के लिए केवल असभ्यता नहीं, गहरी अज्ञानग्रंथि भी चाहिए.

भाजपा को नारी शक्ति के ‘वंदन’ से आगे उसकी स्वायत्तता के स्वीकार की ज़रूरत है

भारतीय लोकतंत्र को अब 'नारी वंदन' से आगे बढ़ना होगा. वंदन में हमेशा एक ऊंच-नीच छिपी रहती है. कोई ऊपर है, कोई नीचे, कोई हाथ जोड़ रहा है, कोई पूजित है. लोकतंत्र का संबंध वंदन से नहीं, सहभागिता से है.

‘घर की जाति नहीं होती’ वही कह सकते हैं, जिनके नाम के चलते घर शक की निगाह से नहीं देखे गए

भारत में घर की जाति नहीं होती, यह वैसा ही वाक्य है जैसे कोई कहे कि लाठी की कोई विचारधारा नहीं होती. सही है, लाठी की नहीं होती; जिस पीठ पर टूटती है, उसकी होती है. घर की जाति नहीं होती, बस देश को उसे पहचानने का पुराना संस्कार है! फिर किसी दिन संसद में कोई कह देगा कि घर की जाति नहीं होती, और सत्तापक्ष की बेंचों पर बैठे लोग ऐसे मुस्कुराएंगे जैसे उन्होंने समाजशास्त्र को अभी-अभी मात दे

स्त्री आबादी में आधी है तो उसे गणराज्य आधा क्यों नहीं?

गणतंत्र में आधी हिस्सेदारी केवल स्त्रीवादी आग्रह नहीं, लोकतांत्रिक तर्क की स्वाभाविक परिणति है. आधी दुनिया को एक-तिहाई पर रोक देना प्रतिनिधित्व का संशोधन है, न्याय नहीं. भाजपा सचमुच 'नारी शक्ति वंदन' की राजनीति करती है तो उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि वंदन का नैतिक अर्थ प्रतीक नहीं, साझेदारी है; और साझेदारी का अर्थ 33 नहीं, 50 है.

राहुल गांधी केरल में क्या कर रहे हैं: प्रतिद्वंद्विता या आत्मघात?

फ़ासीवादी या अर्ध-फ़ासीवादी राजनीति से लड़ने का पहला नियम होता है कि आप अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी और गौण प्रतिद्वंद्वी के बीच फ़र्क बनाए रखें. केरल में एलडीएफ को हराने की बेचैनी समझी जा सकती है; पर राहुल गांधी की भाषा रणनीतिक परिपक्वता का संकेत नहीं दे रही है. एलडीएफ को आरएसएस के बराबर ठहरा देना राजनीतिक बुद्धिमत्ता नहीं, बौद्धिक उतावलापन है.

राजस्थान की तपती धरती पर ‘ओरण’ के पक्ष में उठती एक लंबी, अथक और पैदल आवाज़ों का एक सफर

राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों से किसान, पशुपालक और ग्रामीण ‘ओरण बचाओ, गोचर बचाओ’ के आह्वान के साथ जयपुर तक पदयात्रा कर रहे हैं. उनका कहना है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि आवंटन से सदियों पुरानी सामुदायिक संरक्षित ओरण भूमि और पशुधन आधारित जीवन-संस्कृति पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है.

भू-राजनीति का यथार्थ: क्यों अमेरिका भारत को ‘दूसरा चीन’ बनने से रोकना चाहता है

रायसीना डायलॉग में अमेरिकी डिप्टी सेक्रेटरी क्रिस्टोफ़र लैंडौ का बयान वैश्विक शक्ति-राजनीति की वास्तविकता उजागर करता है. अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थायी मित्रता नहीं, बल्कि हितों पर आधारित होते हैं. ऐसे में भारत के लिए चुनौती यह है कि वह भावनात्मक राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर विज्ञान, तकनीक और आत्मनिर्भर नीति के सहारे अपनी वैश्विक भूमिका तय करे.

भारत-ईरान: हम उतने जुड़े हुए हमेशा रहे हैं, जितना हमें याद नहीं

आज भारत-ईरान संबंधों की चर्चा प्रायः तेल और रणनीति के संदर्भ में होती है. परंतु सदियों पहले गुजरात के व्यापारी हॉर्मुज़ और बंदर अब्बास तक जाते थे. मसाले, वस्त्र, नील और रत्न पश्चिम की ओर जाते; घोड़े और धातुएं पूर्व की ओर आतीं. समुद्र सीमा नहीं था. वह सेतु था. आज का चाबहार पोर्ट उसी प्राचीन समुद्री तर्क का आधुनिक रूप है. एक ऐसा मार्ग जो भूगोल को राजनीति से ऊपर उठाने की कोशिश करता है.

अजित पवार: खाली हो गया महाराष्ट्र की सियासत का ‘पावर-रूम’

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ कहलाने वाले अजित पवार का 28 जनवरी, 2026 को एक विमान हादसे में निधन हो गया. सहकारिता, गठबंधन और सत्ता-यथार्थवाद की राजनीति के प्रतीक रहे पवार के जाने से राज्य की सत्ता-संरचना में एक पूरा ‘पावर-रूम’ अचानक खाली हो गया.

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