नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के कम से कम आठ जिलों में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद राज्य के वन विभाग को एक विवादित आदेश वापस लेना पड़ा. इस आदेश में कहा गया था कि वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के क्रियान्वयन के लिए ‘नोडल एजेंसी’ आदिवासी कल्याण विभाग नहीं, बल्कि वन विभाग होगा. इसके विरोध में प्रदर्शन 1, 2 और 3 जुलाई को हुए.
गुरुवार (3 जुलाई) को मुख्य वन संरक्षक वी. श्रीनिवास राव ने 15 मई को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि जब तक केंद्र सरकार सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन की रूपरेखा नहीं देती, तब तक एफआरए के तहत वनभूमि पर दिए गए अधिकारों के प्रावधानों को वन विभाग लागू करेगा.
इसका सीधा मतलब यह था कि सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को लागू करने की जिम्मेदारी अब आदिवासी कल्याण विभाग की बजाय वन विभाग को दी जाएगी, जो एफआरए के प्रावधानों के खिलाफ है.
इस आदेश के खिलाफ छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी इलाकों में भारी नाराज़गी देखने को मिली. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक और वन एवं आदिवासी अधिकारों के कार्यकर्ता आलोक शुक्ला ने द वायर से कहा कि यह आदेश एफआरए का सीधा उल्लंघन है और कम से कम आठ जिलों में इसका विरोध हुआ.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 1, 2 और 3 जुलाई को बस्तर और सरगुजा समेत कई जिलों में हज़ारों लोगों ने रैलियों में हिस्सा लिया.
3 जुलाई को वन विभाग ने यह आदेश वापस ले लिया. विभाग द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया, ‘वन मंत्री केदार कश्यप ने आदेश वापस लेने का निर्देश दिया था. 15 मई को जारी यह आदेश आदिवासी समुदायों और नागरिक समाज संगठनों के भारी विरोध के बाद वापस ले लिया गया, क्योंकि यह उनके वैधानिक अधिकारों को कमजोर करता था.’
टाइपिंग की गलती !
वन विभाग ने यह सफाई दी कि यह आदेश केवल एक अस्थायी व्यवस्था थी, जब तक पर्यावरण मंत्रालय की ओर से ग्राम स्तर की योजनाओं को मंजूरी नहीं मिलती. साथ ही यह भी कहा गया कि वन विभाग को नोडल एजेंसी बताना एक ‘टाइपो ग्राफिकल एरर’ (टाइपिंग में हुई चूक) थी और विभाग की भूमिका सिर्फ समन्वय की थी.
इस पर आलोक शुक्ला सवाल उठाते हैं, ‘यह कैसे हो सकता है? चार साल पहले भी वन विभाग ने यही आदेश दिया था, तो इतनी बड़ी गलती बार-बार कैसे हो सकती है’
शुक्ला ने कहा कि वन विभाग को नोडल एजेंसी बनाना हितों का टकराव होगा, क्योंकि देशभर में वन विभाग पारंपरिक रूप से संरक्षण के नाम पर स्थानीय समुदायों को वनभूमि का इस्तेमाल करने से और कभी कभी तो वहां जाने से भी रोकता रहा है.
उन्होंने कहा कि कानून साफ तौर पर कहता है कि ग्राम सभाएं अपनी कार्य योजनाएं बना सकती हैं और वन प्रबंधन योजनाएं उसी के अनुसार संशोधित होंगी. इस आदेश का मकसद ग्राम सभाओं को वन प्रबंधन का अधिकार देने से रोकना था.
द वायर से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘अगर राज्यभर में विरोध नहीं होता, तो वन विभाग यह आदेश वापस नहीं लेता.’
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच ने आदेश की वापसी को जनता के संघर्ष और ग्राम सभाओं की एकता की जीत बताई है.
स्थानीय जन संगठनों ने एक बयान में यह भी चिंता जताई कि अगर वन विभाग यह मानती है कि ग्राम सभाएं वैज्ञानिक तरीके से वन प्रबंधन नहीं कर सकतीं, तो इससे एक केंद्रीकृत, जनविरोधी और कॉरपोरेट हितों से जुड़ी वन नीति बन सकती है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
