भारत की वामपंथी राजनीति के सबसे चमकीले (राजनीतिक विश्लेषक सब्यसाची बसु राय के अनुसार साम्यवाद को सम्मानित कराने वाले) सितारों में से एक-स्मृतिशेष ज्योति बसु, जिनकी आज जयंती है -21 जून, 1977 से 5 नवंबर, 2000 तक कुल मिलाकर 23 वर्ष, 137 दिन देश के चुनिंदा बड़े राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार के मुखिया यानी मुख्यमंत्री रहे. लेकिन उन्हें बस इतनी-सी बात के लिए नहीं याद किया जाता.
इसे इस एक बात से ही बखूबी समझ सकते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह उन्हें भारतीय राजनीति में एक अद्भुत ‘फेनोमेना’ कहा करते थे.
बसु की अपनी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की निगाह से देखें तो उसके महासचिव रहे हरकिशन सिंह सुरजीत उनको ‘बहुत सरल और समर्पित’ बताते थे, तो सीताराम येचुरी ‘एक उदार मानवीय व्यक्तित्व.’ इसी तरह लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके सोमनाथ चटर्जी ‘अपना आदर्श’ और राज्यसभा की सदस्य रहीं वरिष्ठ महिला नेता सरला माहेश्वरी ‘कर्मयोगी कॉमरेड.’
दूसरी ओर वाम मोर्चा समिति के अध्यक्ष विमान बसु के निकट वे संघर्षों की आग में तपकर निखरे हुए ऐसे व्यक्तित्व थे, जिनका कोई सानी नहीं था.
पत्रकारों में कुलदीप नैयर को वे यथार्थवादी और प्रतिबद्ध नजर आते थे तो आशीष चक्रवर्ती को ‘कम्युनिस्ट कम, व्यावहारिक अधिक’ और डॉ. शिवकुमार मिश्र को ‘अपने समय का एक दुर्लभ अपवाद.’ इसी तरह सुधीश पचौरी का मानना है कि वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ब्रांड एंबेसेडर थे, जबकि इन्द्रनाथ बनर्जी का मानना है कि अपनी तुलना वे खुद ही थे.
निस्संदेह, एक समय देश के किसी भी राज्य में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहने का रिकॉर्ड बसु के ही नाम था, लेकिन सच पूछिए तो इससे कहीं ज्यादा काबिल-ए-गौर बात यह है कि उन्होंने वर्ष 2000 में मुख्यमंत्री का पद जनरोष या असंतोष के शिकार होने के बाद नहीं, बढ़ती उम्र की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण छोड़ा था.
जहां तक जनरोष की बात है, उनके मुख्यमंत्रीकाल में वह कभी इतना तीव्र नहीं हुआ कि उनकी बेदखली का सबब बन सके. पश्चिम बंगाल से वाममोर्चा सरकार की जिस विदाई को कई लोग वामपंथी दलों का लाल किला ढहने के तौर पर देखते हैं, वह उनके उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य के समय की परिघटना है.
रह गई हसरत
देश की बात करें तो वह बसु को ऐसे वामपंथी नेता के रूप में ज्यादा जानता है, जिसकी पार्टी ने साल 1996 में उससे सायास उसके समक्ष उपस्थित हुआ भारत का पहला वामपंथी प्रधानमंत्री बनने का अवसर छीन लिया था.
तिस पर उनका बड़प्पन कि जहां कई नेता पदलिप्सा में पार्टी के अनुशासन व सिद्धांतों को तिलांजलि देने में एक पल भी नहीं लगाते, उन्होंने पार्टी को सर्वोपरि रखते हुए सर्वथा निर्लिप्त भाव से उक्त अवसर को अपनी राह चले जाने दिया था. बावजूद इसके कि उन्हें लगता था कि पार्टी ने उनसे उक्त अवसर छीनकर हिमालय जैसी गलती की है.
लेकिन यह तो सिर्फ एक अवसर की बात हुई. जानकारों के अनुसार, अपने राजनीतिक जीवन में उनको एक नहीं, चार-चार बार प्रधानमंत्री बनने के प्रस्ताव मिले थे. इनमें पहला 1990 में वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस प्रमुख राजीव गांधी द्वारा दिया गया था, जिसे उन्होंने सात महीने बाद चंद्रशेखर की सरकार गिरने पर दोहराया भी था. आगे चलकर 1996 और 1999 में भी उन्हें ऐसे प्रस्ताव मिले, जिनमें 1996 का प्रस्ताव सबसे ज्यादा चर्चित हुआ.
दरअसल, 1996 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आए और गैर भाजपा-गैरकांग्रेस पार्टियां इस स्थिति में आईं कि केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना सकें तो उन्होंने ऐसे नेता की तलाश आरंभ की, जो उनके गठबंधन व सरकार को सुचारु रूप से चला सके. तब कहा गया कि एकमात्र ज्योति बसु ही ऐसा कर सकते हैं. फिर तो ऐसी स्थिति बन गई कि उनके नाम पर किसी भी विपक्षी पार्टी को एतराज नहीं रह गया, बस, उनकी पार्टी को छोड़कर.
बीबीसी के पूर्वोत्तर संवाददाता सुबीर भौमिक ने लिखा है कि 1996 के लोकसभा चुनाव से पहले ही कुछ लोग ज्योति बसु का कभी न कभी प्रधानमंत्री बनना अवश्यंभावी बताने लगे थे. कारण यह कि उस वक्त न सिर्फ देश की राजनीति में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी, बल्कि उसमें कुछ क्षेत्रीय नेताओं का ‘उदय’ और कुछ वाम व क्षेत्रीय दलों का गठबंधन भी हो रहा था. इसके बावजूद किसी को शायद ही अंदाजा रहा हो कि वे इस पद के सर्वसम्मत दावेदार बनकर उभर जाएंगे.
ऐसा इसलिए संभव हुआ कि पश्चिम बंगाल में वाम दलों के गठबंधन को लंबे अरसे तक अटूट रखने के बसु के अनुभव के कारण उम्मीद की जाने लगी थी कि वे केंद्र में किसी अस्थिर गठबंधन की सरकार को स्थिर बनाये रखने की चुनौती से भी सफलतापूर्वक पार पा लेंगे. लेकिन उनकी पार्टी ने अपने तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत की पैरवी के बावजूद उनके प्रधानमंत्री बनने के विरुद्ध फैसला किया.
ज्योतिरेंद्रनाथ से ज्योति
बहरहाल, 1914 में आज के ही दिन कोलकाता में पैदा हुए बसु तत्कालीन पूर्वी बंगाल (अब बंगलादेश) में ढाका के वार्दी गांव की मूल निवासी हेमलता व डॉक्टर निशिकांत बसु के तीसरे बेटे थे. माता-पिता ने उनका नाम ज्योतिरेंद्रनाथ बसु रखा था, लेकिन स्कूल में प्रवेश के वक्त प्रधानाचार्य ने इस नाम को बहुत बड़ा बताया तो छोटा करके ज्योति बसु कर दिया.
तमाम उतार-चढ़ावों के बीच 1940 में इंग्लैंड से बैरिस्टरी की पढ़ाई करके वे कलकत्ता (अब कोलकाता) लौटे तो लाल रंग में रंग चुके थे. इसलिए परिजनों के लाख मना करने के बावजूद खुद को देश की कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ने से नहीं रोक पाये. हालांकि इंग्लैंड में भी कई शुभचिंतकों ने उनको आगाह किया था कि इस जुड़ाव के चलते उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि भारत में कम्युनिस्ट पार्टी अवैध घोषित कर दी गई है.
1940 में उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत शुरू की तो कम्युनिस्ट पार्टी के भूमिगत और सार्वजनिक रूप से सक्रिय नेताओं के बीच संवाद के मजबूत सेतु की तरह काम किया. इसी का फल था कि पार्टी के पहले ही वैध सत्र में उन्हें उसकी प्रांतीय समिति का संगठनकर्ता (प्रोविंशियल कमेटी ऑर्गनाइजर) चुन लिया गया. अनंतर, उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
पार्टी से प्रतिबंध हटा तो वे उसके बांग्ला मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ के संपादन मंडल के अध्यक्ष और राज्य समिति के निर्विरोध सचिव बने. 1954 में मदुरै कांग्रेस में उन्हें पार्टी की केंद्रीय समिति और पालघाट कांग्रेस में केंद्रीय सचिवालय के लिए चुना गया, जबकि 1958 में अमृतसर में हुई कांग्रेस में राष्ट्रीय परिषद के लिए.
1964 में पार्टी के विभाजन के वक्त उन्हें 31 अन्य सदस्यों के साथ राष्ट्रीय परिषद से निलंबित कर दिया गया तो वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति व पोलित ब्यूरो के लिए चुने गए. तब से 2008 तक वे इस पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे.
इससे पहले 1944 में बंगाल-असम रेलवे के कामगारों को संगठित करते हुए वे श्रमिक आन्दोलन से जुडे और नाना प्रकार की भूमिकाएं निभाते हुए पश्चिम बंगाल के उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे.
अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत उन्होंने 32 वर्ष की उम्र में ही कर दी थी. 1946 में रेलवे (कांस्टीट्यूएंसी) की तरफ से बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए और उसके बाद 1972-77 के अंतराल को छोड़कर सक्रिय राजनीति से विदा लेने तक पश्चिम बंगाल विधानसभा को अपनी उपस्थिति से सुशोभित करते रहे. अपने मुख्यमंत्रीकाल में उन्होंने पंचायतीराज और भूमि सुधार कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू किया, जिसके फलस्वरूप पश्चिम बंगाल देश का ऐसा पहला राज्य बन गया, जहां फसल कटकर पहले बंटाईदार के घर जाती है और बिचौलिये नहीं होते.
राज्य में सद्भाव कायम रखने के उनके उपायों के चलते उनके रहते सांप्रदायिक राजनीति के लिए भी वहां कोई जगह नहीं बन पायी. अलबत्ता, नक्सलवाद संबंधी उनके विचार और उस पर काबू करने के अनेक लोगों की निगाह में उनके ‘बहुत सफल’ प्रयत्नों की कई हल्कों में ‘दुरंगे, आक्रामक और अंतर्विरोधों से भरे’ कहकर आलोचनाएं भी कुछ कम नहीं की जातीं.
यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि वे कोरे राजनेता नहीं थे और साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों से भी उनका बहुत गहरा जुड़ाव था. वे अपनी राजनीतिक आत्मकथा भी लिख गए हैं.
इक दिन ऐसा आएगा
उनकी दृढ़ मान्यता थी कि बीच में कितने ही उतार-चढ़ाव आते रहें, एक ऐसा दिन अवश्य आएगा, जब उस शोषणरहित समाज की स्थापना संभव हो जाएगी, कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स जिसका सपना देखते थे. अलबत्ता, इसके लिए उस सपने को ठीक से समझना होगा.
वे लोगों को मार्क्स व एंगेल्स की यह बात प्रायः याद दिलाया करते थे कि उनका सिद्धांत कोई पूजा करने का मंत्र नहीं है, वह व्यवहार के क्षेत्र में रास्ता दिखाने का काम करता है. वे बताते थे कि मार्क्सवाद परमसत्य जैसी किसी चीज को नहीं स्वीकारता है क्योंकि सत्य सदा ही सापेक्ष होता है. यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है. ज्योति बसु के ही शब्दों में कहें, तो मार्क्स एंगेल्स हर वैज्ञानिक आविष्कार का हार्दिक स्वागत करते थे और उससे शिक्षा लेते थे. इन दोनों मनीषियों की आकांक्षा थी कि कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुयायी अध्ययन द्वारा ही अपने ज्ञान की परिधि को और अधिक विस्तृत करें.
2010 में 95 साल की अवस्था में निमोनिया से पीड़ित होने के बाद उन्होंने 17 जनवरी की सुबह कोलकाता के एक अस्पताल में, जहां उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था, अंतिम सांस ली तो उनकी अंतिम यात्रा किसी श्मशान में नहीं बल्कि एक अस्पताल में जाकर समाप्त हुई ताकि उनका शरीर, जिसे उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए दान कर रखा था, उसको सौंपा जा सके.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
