दरभंगा: बिहार में वोटर लिस्ट रिविज़न के ख़िलाफ़ महागठबंधन के राज्यव्यापी चक्का-जाम का व्यापक असर दरभंगा और मधुबनी में देखने को मिला. मुख्य सड़कों और रेलवे स्टेशनों पर चक्का-जाम करते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया.
इस बाबत दरभंगा में स्थानीय पत्रकार मंसूर खुश्तर ने जानकारी दी कि शहर के अलावा आसपास के इलाक़ों और नेशनल हाईवे पर बड़े पैमाने पर बंद का असर देखा गया और सामान्य जनजीवन पूरी तरह से ठप नज़र आया. उन्होंने बताया कि बसों और अन्य वाहनों की आवाजाही के अलावा दरभंगा जंक्शन और आसपास के छोटे स्टेशनों पर भी ट्रेन की सेवाएं घंटों प्रभावित रहीं.
जानकारी के मुताबिक, दोपहर दो बजे तक यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा. इस दौरान शहर में प्राइवेट स्कूलों के पूरी तरह से बंद रहने की सूचना थी.
मधुबनी में भी हुआ बंद का असर
वहीं, मधुबनी में स्थानीय पत्रकार मोहम्मद करीमुल्लाह ने द वायर को बताया कि पार्टी कार्यकर्ताओं ने सुबह सात बजे मधुबनी रेलवे स्टेशन पहुंचकर शहीद एक्सप्रेस के सामने चक्का-जाम करते हुए विरोध प्रदर्शन किया.
उन्होंने जानकारी दी कि इस चक्का-जाम का नेतृत्व कर रहे गठबंधन के नेताओं ने चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (एसआईआर) की प्रक्रिया को कमज़ोर और पिछड़े वर्गों को मतदान के अधिकार से वंचित करने की साज़िश क़रार दिया.
बता दें कि मधुबनी में ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं ने स्टेशन से प्रतिरोध मार्च करते हुए ज़िला मुख्यालय के दोनों द्वार के सामने भी सड़क जाम किया और जमकर नारेबाज़ी की.
इस बीच मनीगाछी प्रखंड के अंतर्गत नेशनल हाईवे-27 स्थित राजे टोल प्लाजा पर महागठबंधन के कार्यकर्ता वोटर लिस्ट रिविज़न की प्रक्रिया के ख़िलाफ़ उग्र प्रदर्शन करते नज़र आए.

‘ग़रीबों का वोट काटने की साज़िश’
यहां चक्का-जाम विरोध प्रदर्शन में शामिल माले कार्यकर्त्ता किशुन पंडित ने द वायर को बताया, ‘…चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर नाच रहा है. ये नाच और इनकी हिटलर-शाही हम चलने नहीं देंगे.’
उन्होंने इस पूरी क़वायद को ‘वोट-बंदी’ क़रार देते हुए बताया कि, ‘चुनाव आयोग को ये तमाशा फ़ौरन बंद करना चाहिए, चार महीने बाद बिहार में चुनाव है और आयोग को सब पता है कि जब इस तरह की प्रक्रिया 2003 में अपनाई गई थी तो दो साल का समय लगा था और अब ये एक महीने के अंदर कैसे हो सकता है? ये कुछ और नहीं ग़रीबों का वोट काटने की साज़िश है.’
माले कार्यकर्त्ता ने इस प्रक्रिया के जारी रहने पर और उग्र प्रदर्शन की बात भी कही. वहीं तेजनारायण यादव ने ग्रामीणों में डर और दहशत की बात करते हुए बताया कि, ‘मैं पंचायत का मुखिया हूं, गांव-ग्रामीण को भलीभांति जानता हूं, इसलिए कह सकता हूं कि जिस तरह का दस्तावेज़ मांगा जा रहा है वो गरीब-गुरबा के पास कहां से आएगा, लोगों में डर फैल गया है.’
‘डर’ के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘और क्या डर हो सकता है, हमें लगता है कि ये सिर्फ़ वोट की बात नहीं है, इस प्रक्रिया के बहाने हमारी नागरिकता पर सवाल खड़ा किया जा रहा है, और कल को हमें हर तरह की सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जा सकता है.’

ग्रामीणों के डर को संदर्भित करते हुए वो ये भी बताते हैं कि लोगों के डर का फ़ायदा उठाकर कुछ लोग दस्तावेज़ बनवा देने के नाम पर उन्हें ठग भी रहे हैं. लोग साइबर कैफ़े का चक्कर लगा रहे हैं, प्रखंड कार्यालय भाग रहे हैं. आख़िर इतनी उठापटक किसलिए.
उनकी मानें तो आयोग की इस प्रक्रिया से सबसे ज़्यादा परेशानी दलित, महादलित और ग़रीब जनता को हो रही है. वो कहते हैं, ‘ये तबक़ा बहुत डर गया है’.
तेजनारायण ग्रामीणों के मन के डर और परेशानी से अलग सवाल उठाते हैं कि ऐसे ही बिहार में शिक्षा व्यवस्था ऐसे ही चौपट है और आयोग ने शिक्षकों को ही इस काम में लगा दिया है. उन पर कितना दबाव है आप जाकर देखिए, उनके बारे में कोई बात नहीं कर रहा है.
वो आगे कहते हैं, ‘सरकार चाहती है कि हम अपने हिसाब से वोटर चुनें और शिक्षा बर्बाद होती है तो हो जाए. सरकार को ये प्रकिया करनी ही थी तो अलग से स्टाफ़ लगाते, समय देते. मगर नहीं, सरकार चाहती है सब परेशान रहे, शिक्षक घर-घर भटके काग़ज़ मांगे और मतदाता ख़ुद को नागरिक साबित करे. ये सब क्या है सत्ता ने सबको उलझा दिया है.’
तेजनारायण मनीगाछी प्रखंड के अंतर्गत कटमा बहुअरवा पंचायत के बारे में बताते हैं कि लोग शिकायत लेकर आ रहे हैं कि बीएलओ एक ही परिवार में कुछ लोगों का फॉर्म दिया है और कुछ लोगों का नहीं दिया है, ये सब क्यों हो रहा है, क्या बीएलओ जानबूझकर ऐसा कर रहा है. बिल्कुल नहीं, उन पर दबाव बहुत है….’
वहीं मौजूद एक युवा नोमानुलहक़ बीच में कहते हैं, ‘सरकार से इतनी हमदर्दी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, नागरिकों की सुविधा, बीएलओ पर दबाव इन सबसे सरकार को क्या लेना है. इस प्रक्रिया के बहाने पूरे लोकतंत्र को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया है.’
वो कहते हैं आयोग तो मुखौटा है, सत्ता अपना खेल खेल रही है. वो पूछते हैं आख़िर विपक्ष ही क्यों इस प्रक्रिया पर विरोध कर रहा है सत्ता पक्ष चुप क्यों है. आख़िर किस आधार पर सरकार लोगों को राशन देती आ रही है, क्या वो अंधेरे में मुफ़्त की योजना चला रही है और अब अचानक ख़याल आया है कि लोगों से उनकी नागरिकता पूछनी चाहिए.’

‘सरकार ने चुनाव आयोग को अपना हथियार बना लिया है’
हरेराम राम भी चुनाव आयोग के कठपुतली होने की तरफ़ इशारा करते हैं, वो कहते हैं, ‘सरकार ने चुनाव आयोग को अपना हथियार बना लिया है, और उसी हथियार से पिछड़ा समुदाय में जो निरक्षर लोग हैं, ग़रीब लोग हैं मज़दूर हैं उनको निशाना बनाया जा रहा है. इनके पास क्या है आधार कार्ड है या मतदाता पहचान पत्र है और इसका अर्थ क्या है यही न कि मैं भारतीय नागरिक हूं, फिर इसको क्यों नहीं माना जा रहा. ऐसा क्यों किया जा रहा है बस इसलिए कि इनकी आवाज़ दब जाए, लोकतंत्र में इनका हिस्सा न हो.’
वो वोटर लिस्ट रिविज़न को सरकार का ‘झांसा’ कहते हुए बताते हैं, ‘ये बिहार की बड़ी आबादी के साथ साज़िश है. आख़िर यही मतदाता तो थे जिन्होंने लोकसभा चुनाव में सरकार को चुना, फिर इतने कम समय में चुनाव से ठीक पहले हम संदिग्ध हो गए.’
‘चोर दरवाज़े से एनआरसी को लागू करने की प्रक्रिया’
राम मानते हैं कि सरकार को यही सब करना था तो समय लेकर करना चाहिए था और उन दस्तावेज़ों (मुख्यतः आधार कार्ड) को भी मान्यता देना चाहिए जो आम तौर से पिछड़े वर्ग के लोगों के पास हो सकते हैं. कुछ इसी तरह की बात करते हुए रामप्रकाश भी पिछले लोकसभा चुनाव का हवाला देते हैं, वो कहते हैं, ‘इसी मतदाता सूची से वोट लेकर मोदी जी प्रधानमंत्री बने हैं, अगर ये सूची ग़लत है संदिग्ध है तो पहले वो इस्तीफ़ा दें फिर इस प्रक्रिया में जाएं.’
वो स्पष्ट शब्दों में इसे पिछड़ा और अल्पसंख्यक मतदाता पर हमला मानते हैं और कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि ये चोर दरवाज़े से एनआरसी को लागू करने की प्रक्रिया है.’
राजद नेता मोहम्मद अलक़मा सरकार और चुनाव आयोग के रिश्तों पर सवाल खड़े करते हैं, वो कहते हैं, सरकार ने चुनाव आयोग को अपने चुंगल में फंसा रखा है और बिहार में चुनाव से ठीक पहले नागरिकता का दस्तावेज़ मांगा जा रहा है, विपक्ष इसके पीछे की मंशा को समझता है, और अवाम को भी मालूम है कि कौन उनसे उनकी नागरिकता का प्रमाण चाहता है. आख़िर ये काम लोकसभा चुनाव के फ़ौरन बाद क्यों नहीं किया गया.’
वो 2003 की मतदाता सूची को आधार बनाकर दस्तावेज़ मांगे जाने पर भी सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘क्या 2003 के बाद सूची में शामिल होने वाले मतदाता संदिग्ध हैं? अगर संदिग्ध हैं तो फिर पिछले सारे चुनाव क्या थे, और क्या इस सूची को संदिग्ध मानकर ख़ुद आयोग अपनी पिछली प्रक्रिया पर सवाल खड़े नहीं कर रहा है.’
उनका मानना है कि ‘स्क्रिप्ट’ असल में कहीं और लिखी गई है, और स्क्रिप्ट लिखने वालों को बिहार में डर सता रहा है.

(फोटो: X/@INCIndia)
वो कहते हैं, ‘मतदाता कहां से अपने माता-पिता का काग़ज़ लाएंगे, वो भी इतने कम समय में. 25 दिन में आप सिर्फ़ तमाशा कर सकते हैं. लोकतंत्र में हिटलरशाही नहीं चलती है, आज हमने चक्का-जाम किया है और मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है उम्मीद है लोकतंत्र की जीत होगी.’
इससे इतर कई पार्टी कार्यकर्ताओं ने इसे हर तरह से जनविरोधी फैसला बताते हुए कहा कि अगर इसको वापस नहीं लिया गया तो आंदोलन और उग्र होगा.
कुलमिलाकर, महागठबंधन के इस राज्यव्यापी बंद से साफ़ है कि वो इस मुद्दे को आम लोगों तक ले जाने में कई मानों में सफल रही. ऐसे में देखने वाली बात ये है कि चुनाव आयोग और सरकार इस विरोध को किस तरह लेती है, और क्या आयोग पीछे हटेगा? हालांकि आम लोगों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की तरफ लगी हुई हैं.
