सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट की नई रिपोर्ट- ‘प्रॉफिटिंग फ्रॉम हेट म्यूजिक’ संगीत के सहारे पल रहे नफ़रत के कारोबार के बारे में बताती है कि ऐसे गानों में भाजपा और संघ का वही नैरेटिव नज़र आता है, जिसमें मुसलमानों को ‘जिहादी’ और ‘देशद्रोही’ जैसे नामों से संबोधित किया जाता है. जिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ये सब उपलब्ध है, वे इसके ख़िलाफ़ कोई क़दम न उठाते हुए घृणा से हो रही इस कमाई को वैधता दे रहे हैं.
द वायर उर्दू के संपादक फ़ैयाज़ अहमद वजीह मक़बूल शायर बशीर बद्र को याद करते हुए लिखते हैं कि 'सादा लफ़्ज़ों की मीनाकारी उनके यहां इस क़दर है कि उन्हें उर्दू शायरी का ‘गोल्डस्मिथ’ और ‘ज़रगर’ कहते हुए मेरे सामने उस कुम्हार की सूरत आ जाती है जो कच्ची मिट्टी के साथ रक्स करते हुए अपनी आंखों के सुनहरे जादू जगाता है. बशीर बद्र इसी जादू के शायर हैं.'
जब आप घरों की जाति से इनकार करते हैं तो आप जाति की गणना से इनकार करना चाहते हैं और इस इनकार का सीधा मतलब है जब तक और जहां तक संभव हो हिस्सेदारी से इनकार करते रहो. वरना हमारे घर और उसकी भौगोलिक स्थिति हमें हमारी जन्मजात हैसियत की याद हमेशा से दिलाते आए हैं, और जाति के साथ अब धर्म के नाम पर भी हमारे घरों का जुग़राफ़िया तय कर दिया गया है.
13 अक्टूबर को दिल्ली सरकार ने ‘दीपावली मंगल मिलन’ कार्यक्रम के अंतर्गत प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों को मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के साथ बातचीत के लिए आमंत्रित किया था. लेकिन इस कार्यक्रम में उर्दू मीडिया से जुड़े किसी पत्रकार को शामिल नहीं किया गया.
दरभंगा में 'वोटर अधिकार यात्रा' के दौरान राहुल गांधी ने भाजपा के 50 साल तक सत्ता में बने रहने वाले बयान की आलोचना की और ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया. वहीं जातिगत जनगणना और आरक्षण के मुद्दों को भी उठाया.
बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची संशोधन के निर्वाचन आयोग के फैसले के ख़िलाफ़ विपक्ष के बिहार बंद का असर दरभंगा और मधुबनी में भी दिखा. प्रदर्शनकारियों ने आयोग पर कठपुतली होने का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने चुनाव आयोग को अपना हथियार बना लिया है.
डीयू के अंडर-ग्रेजुएट दाख़िला फ़ॉर्म में मातृभाषा के कॉलम में ‘उर्दू’, ‘मैथिली’, ‘भोजपुरी’ जैसी भाषाओं के बजाय ‘मुस्लिम’, ‘चमा*’, ‘देहाती’ जैसे जातिसूचक और आपत्तिजनक शब्द दर्ज मिलने पर विवाद खड़ा हो गया है. आलोचना के बाद विश्वविद्यालय ने इसे ‘लिपिकीय त्रुटि’ बताया है.
नए हिंदुस्तान में उर्दू की सियासत पुराने हिंदुस्तान से ज़्यादा अलग नहीं है, निशाने पर असल में मुसलमान हैं, और मक़सद ध्रुवीकरण है . वर्ना उर्दू में नाम पैदा करने वाले और लिखने-पढ़ने वाले हर रंग और नस्ल के ग़ैर-मुस्लिम तो भारत से फ्रांस तक और पूरी दुनिया में जाने कहां-कहां आबाद हैं.
दरभंगा लोकसभा क्षेत्र और निकटवर्ती लोकसभा सीटों- झंझारपुर, मधुबनी और समस्तीपुर- यानी मिथिलांचल में 55 पिछड़ी एवं अत्यंत पिछड़ी जातियों के मतदाता जिन्हें ‘पचपनिया’ कहा जाता है, की भूमिका निर्णायक मानी जाती है. पिछले चुनाव में एनडीए की जीत में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान बताया जाता है.
वीडियो: पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर से उनकी हालिया किताब ‘सम्पूर्ण दलित आंदोलन पसमांदा तसव्वुर’ के विशेष संदर्भ में देश की पसमांदा राजनीति, 2024 के लोकसभा चुनाव पर इसके प्रभाव और एससी कोटा में मुसलमानों को शामिल किए जाने को लेकर बातचीत.
‘ह्वाइल वी वॉच्ड’ डॉक्यूमेंट्री घने होते अंधेरों की कथा सुनाती है कि कैसे इसके तिलस्म में देश का लोकतांत्रिक ढांचा ढहता जा रहा है और मीडिया ने तमाम बुनियादी मुद्दों और ज़रूरी सवालों की पत्रकारिता से मुंह फेर लिया है.
दिल्ली-6 के उर्दू बाज़ार में स्थित उर्दू के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान 'मकतबा जामिया' की शाखा बीते दिनों बंद हो गई.
स्मृति शेष: इरतिज़ा निशात नहीं रहे. बे-ज़बानों की शायरी करने वाले इस शायर ने ख़ुशहाली से ज़्यादा संघर्ष के दिन गुज़ारे और एक तरह की गुमनामी ओढ़कर दुनिया से चले गए. अब शायद इनको सच्ची श्रद्धांजलि यही हो कि इनकी शायरी किसी तरह उर्दू-हिंदी के पाठकों तक पहुंचे.
दक्षिणपंथी स्तंभकार मधु किश्वर के 'मानुषी' ट्रस्ट ने दारुल उलूम देवबंद में 'बहिश्ती ज़ेवर' नाम की किताब पढ़ाए जाने का दावा करते हुए कहा था कि इसमें यौन हिंसा और यौन अपराध को वैध बताने की कोशिश की गई है. हालांकि, सच यह है कि यह किताब दारुल उलूम के पाठ्यक्रम में ही शामिल नहीं हैं.
उत्तराखंड में अंग्रेज़ी की किताब में ‘अम्मी-अब्बू’ क्यों? वो भी दूसरी कक्षा की किताब में? बड़ा वाजिब सवाल था और अब भी है, लेकिन इसकी आड़ में उर्दू को निशाना बनाकर धार्मिक आस्था पर हमले की बात कहकर आप सियासी नफ़रत की वही दीवार अपने आंगन में भी खड़ी कर रहे हैं, जिसको हमारी सियासत अक्सर मज़बूत करने को तत्पर रहती है.