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फ़ैयाज़ अहमद वजीह

राहुल कुमार राम, तौकीर शाह और रोहित कुमार राम. (बाएं से दाएं) (सभी फोटो: फ़ैयाज़ अहमद वजीह)

बिहार: अंधेरी बस्तियों से फूटी रोशनी की किरण

बीते महीने बिहार के दरभंगा ज़िले की अदलपुर पंचायत में मुस्लिमों के अत्यंत पिछड़ा वर्ग से आने वाले और अमूमन सामाजिक उपेक्षा का शिकार रहे ‘फ़कीर’ समुदाय के दो बच्चे हाईस्कूल की दहलीज़ तक पहुंचे, वहीं गांव के ही दो दलित बच्चों ने पहली बार मैट्रिक पास किया है.

सागर सरहदी [जन्म: 1933-अवसान 2021] (फोटो साभार: इंस्टाग्राम/जैकी श्रॉफ)

सागर सरहदी, जो ताउम्र विभाजन के विषाद और उजड़ जाने का एहसास लिए जीते रहे

स्मृति शेष: सागर सरहदी इस एहसास के साथ जीने की कोशिश करते रहे कि दुनिया को बेहतर बनाना है. मगर अपनी बदनसीबी के सोग में इस द्वंद्व से निकल ही नहीं पाए कि साहित्य और फिल्मों के साथ निजी जीवन में भी एक समय के बाद अपनी याददाश्त को झटककर ख़ुद से नया रिश्ता जोड़ना पड़ता है.

Bulandshahr: An elderly Muslim along with other voters shows his ink-marked finger after casting vote at a polling station at Siyana, during the 2nd phase of Lok Sabha elections, Bulandshahr, Thursday, April 18, 2019. (PTI Photo/Vijay Verma) (PTI4_18_2019_000093B)

बिहार: क्या इस बार के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतों का विभाजन हुआ है?

इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं में नीतीश सरकार द्वारा उनके कल्याण के लिए की गई पहल की बातें थीं, लेकिन महागठबंधन से अलग होने और बीजेपी के साथ सरकार बनाने को अल्पसंख्यक समुदाय में उनके जनादेश के तौहीन की तरह देखा जा रहा था.

अगस्त महीने में बिहार सरकार द्वारा अनुमोदित नियोजित शिक्षक सेवाशर्त 2020 की प्रति जलाकर विरोध जताते बिहार के नियोजित शिक्षक. (फोटो साभार: ट्विटर/@Dharmendrajee1)

बिहार चुनाव: ‘नियोजित शिक्षकों में जैसा गुस्सा है उससे साफ है कि ये सरकार नहीं रहेगी’

ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार के क़रीब चार लाख से अधिक नियोजित शिक्षकों की सेवा शर्त, पूर्ण वेतनमान जैसी विभिन्न मांगों को लेकर लंबे समय से नीतीश सरकार से ठनी हुई है. अब शिक्षक संघ और शिक्षकों का कहना है कि वे इस चुनाव में सरकार से आर पार की लड़ाई करने जा रहे हैं.

राहत इंदौरी. (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स//Imfarhad7 CC BY SA 4.0)

राहत इंदौरी: ख़ामोश हो गए इक शाम और उसके बाद तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू हम थे

बहुत कम शायर अवाम की बेचेहरगी और अवसाद को सत्ता के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बनाने में कामयाब हुए. ऐसे में राहत ने ग़ज़ल के हाशिये में पड़ी भाषा और मुंहफट चरित्रों को सत्ता के सामने खड़ा कर दिया. उनसे पहले भी शायरोंं ने सत्ता को आईना दिखाने की कोशिश की, लेकिन उनकी ग़ज़लें ज़रा ज़्यादा मुंहफट साबित हुईं.

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‘बिहार में बाढ़ प्राकृतिक नहीं, राजनीतिक आपदा है’

वीडियो: इन दिनों पूरा बिहार बाढ़ की चपेट में है. इस रिपोर्ट में बिहार से गुज़रने वाले नेशनल हाईवे 57 पर प्लास्टिक शीट डालकर रह रहे बाढ़ प्रभावित लोगों से उनकी परेशानियों को जानने की कोशिश की गई है.

New Delhi: People who came for ‘Jamat’, a religious gathering at Nizamuddin Mosque, being taken to LNJP hospital for COVID-19 test, after several people showed symptoms of coronavirus, during a nationwide lockdown, in New Delhi, Tuesday, March 31, 2020. (PTI Photo/Vijay Verma)(PTI31-03-2020 000142B)

तबलीग़ी जमात की ग़लती पर बिना दुर्भावना के बात होती, तो बेहतर होता

तबलीग़ी जमात की आलोचना सही है, लेकिन ज़रूरी है कि उनके इतिहास को पढ़ा जाए और सोच समझकर उनके बारे में कोई राय बनाई जाए.

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‘शर्मिष्ठा सिर्फ़ सिंगल मदर का संघर्ष नहीं स्वाभिमानी औरत की कहानी भी है’

वीडियो: युवा कथाकार अणुशक्ति सिंह का पहला उपन्यास ‘शर्मिष्ठा’ बीते दिनों आया है. इस उपन्यास के मद्देनज़र उनसे मिथकीय और पौराणिक चरित्रों में स्त्री की मौजूदगी, सिंगल मांओं के संघर्ष, स्त्री-पुरुष के कथित वैध और अवैध प्रेम समेत विभिन्न विषयों पर फ़ैयाज़ अहमद वजीह की बातचीत.

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सीएए-एनआरसी प्रदर्शन में रोमांटिक गाने क्यों बन रहे हैं इंक़लाबी?

वीडियो: दिल्ली के शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल ‘चुप्पी तोड़ो’ समूह के शारिक़ हुसैन और शाएक़ा शौकत ने बॉलीवुड के गीतों के साथ प्रतिरोध के शब्द मिलाकर कुछ गीत तैयार किए हैं. उनसे फ़ैयाज़ अहमद वजीह की बातचीत.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का ‘हम देखेंगे’ मज़हब का नहीं अवामी इंक़लाब का तराना है…

जो लोग ‘हम देखेंगे’ को हिंदू विरोधी कह रहे हैं, वो ईश्वर की पूजा करने वाले ‘बुत-परस्त’ नहीं, सियासत को पूजने वाले ‘बुत-परस्त’ हैं.

कृश्न चंदर. (फोटो साभार: अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू हिंद)

‘अगर कृश्न चंदर आज लिख रहे होते तो तिहाड़ जेल में होते’

बीते दिनों आईसीएसई ने प्रसिद्ध कहानीकार कृश्न चंदर की कहानी ‘जामुन का पेड़’ को दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम से हटा दिया था. उनकी लेखनी और ज़िंदगी की महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में उनके भतीजे पवन चोपड़ा से द वायर के फ़ैयाज़ अहमद वजीह की बातचीत.

शौकत कैफ़ी. (फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन)

शौकत कैफ़ी: फ़क़त बहार नहीं हासिल-ए-बहार

बेपनाह प्रेम के एहसास में हर तरह के अभाव से लड़ते हुए जीवन की जद्दोजहद से कभी हौसला न हारने वाली शौकत कैफ़ी की पूरी ज़िंदगी एक इंक़लाबी किताब है. असीमित उड़ान के सपने देखने वालों के लिए वे ख़ुद एक संस्मरण हैं.

प्रतीकात्मक फोटो (साभार: https://dpsbdn.org)

सड़कों पर नाम-पता पूछने वाला ‘जय श्रीराम’ अब भेस बदलकर स्कूलों में पांव पसार रहा है

मुल्क की सियासत अब ज़्यादा शिद्दत से पहचान की राजनीति के गिर्द नाच रही है. राम को इमाम-ए-हिंद कहने वाले इक़बाल की दुआ को मदरसे की दुआ कहकर सीमित किया जा रहा है, लेकिन देश के बच्चे शायद इक़बाल की दुआ के सबक़ के माने समझ रहे हैं.