त्रिभाषा सूत्र: भाषा कैसे सिखाई जाये, हर प्रदेश को अपना तरीका चुनने की आज़ादी हो

इन दिनों भाजपा की संघीय सरकार त्रिभाषा सूत्र को लेकर बहुत गंभीर दिखाई दे रही है. उसकी चिंता यह है कि बच्चे अधिक से अधिक भाषा सीख पाएं. लेकिन किसी भी शोध से सिद्ध नहीं हुआ है कि तीन भाषाएं पहले दर्जे से ही सिखाई जानी चाहिए.

भाषा किसी भी स्तर से सीखना शुरू करें, असल बात है भाषा के अध्यापक की क़ाबिलियत. पहली भाषा हो या दूसरी, अगर अध्यापक कुशल नहीं है तो विद्यार्थी के लिए अच्छी तरह भाषा सीखना मुश्किल होगा. (फोटो: फ्रीपिक/द वायर)

भाषा पर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है. भाषा पर और हिंदी पर.

इस बार यह बहस मुंबई में शुरू हुई है. बहस में तीन प्रश्न उभरकर सामने आए हैं. सबसे पहले भारत के स्कूलों में भाषा की शिक्षा की नीति का सवाल. दूसरा, चोर दरवाज़े से हिंदी को अनिवार्य बनाने की कोशिश. तीसरा, महाराष्ट्र या मुंबई में शांतिपूर्वक रहने के लिए मराठीभाषी होने की अनिवार्यता.

इस टिप्पणी में हम पहले सवाल पर बात करेंगे क्योंकि इस बार भाषा पर बहस शुरू हुई स्कूली शिक्षा में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी की अनिवार्यता के महाराष्ट्र सरकार के आदेश के बाद. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने इसका उग्र विरोध किया और सरकार को पीछे हटना पड़ा. उनका आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी स्कूल में हिंदी को अनिवार्य बनाकर उसे महाराष्ट्र पर थोपने की कोशिश कर रही है.

महाराष्ट्र सरकार ने इसका विरोध किया. लेकिन यह आशंका निराधार न थी. राज्य सरकार ने स्कूली शिक्षा में त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने का आदेश दिया था जिसमें तीसरी भाषा के रूप में हिंदी प्रस्तावित थी. ठाकरे बंधुओं ने पूछा और दूसरों ने भी कि आख़िर हिंदी को ही तीसरी भाषा के रूप में क्यों प्रस्तावित किया गया. और विकल्प क्यों नहीं दिए गए?

सरकार ने इस विरोध के दबाव में हिंदी की अनिवार्यता वाला आदेश वापस लिया और एक दूसरा आदेश जारी किया. उसके मुताबिक़, जिस भाषा का विकल्प 20 या उससे अधिक विद्यार्थी लेना चाहें, वह तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जा सकती है. लेकिन इसका भी विरोध यह कहकर हुआ कि यह पिछले रास्ते से हिंदी लाने की कोशिश है. फिर वह आदेश भी रद्द हुआ.

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार के कदम खींचने के बाद राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की पार्टियों ने विजय रैली की. उनका दावा था कि उन्होंने मुंबई पर हिंदी आरोपित करने की साज़िश नाकामयाब कर दी है.

इस पूरे मामले में दो बातें हैं. एक, स्कूल में भाषा शिक्षण की पद्धति का मसला. क्या पहले दर्जे से ही 3 भाषाएं पढ़ाई जानी चाहिए और क्या तीसरी भाषा अनिवार्यतः हिंदी होनी चाहिए? संघीय सरकार ने तमिलनाडु सरकार पर यही कहकर बार बार हमला किया है कि वह राज्य के बच्चों को तीसरी भाषा सीखने नहीं दे रही है. वह उन्हें एक भाषा से वंचित कर रही है.

त्रिभाषा सूत्र को न मानने के कारण संघीय सरकार ने राज्य सरकार को आर्थिक अनुदान नहीं दिया.

पिछले कुछ वक्त से भाजपा की संघीय सरकार त्रिभाषा सूत्र को लेकर बहुत गंभीर दिखाई दे रही है. उसकी चिंता यह है कि बच्चे अधिक से अधिक भाषा सीख पाएं. लेकिन शिक्षाविद बार-बार यह कह रहे हैं कि त्रिभाषा सूत्र भाषा शिक्षण की कोई नीति नहीं है. भाषा शिक्षण-संबंधी किसी भी शोध से सिद्ध नहीं हुआ है कि पहले दर्जे से तीन भाषाएं सिखाई ही जानी चाहिए.

त्रिभाषा सूत्र मात्र एक प्रस्ताव है. वह शिक्षा के क्षेत्र के लिए दिया अवश्य गया था लेकिन उसका तर्क शिक्षाशास्त्रीय नहीं है. यह प्रस्ताव भारत के अलग-अलग भाषाभाषी प्रदेशों को एक दूसरे के करीब लाने की चिंता से उपजा था. इसकी कल्पना करने वालों के दिमाग़ में यह बात रही होगी कि स्कूली शिक्षा में अलग-अलग स्तरों पर विद्यार्थी एक से अधिक भाषाएं सीख पाएं. इनमें से दो उनके अपने इलाक़े में बोली या इस्तेमाल की जाने वाली भाषाओं से भिन्न होगी. उम्मीद थी कि एक तो कम से कम एक तो दूसरे इलाक़े की होगी.

मसलन, बिहार की बच्ची मलयालम सीखना चाहे. या केरल की बच्ची बांग्ला सीखे. इस तरह देश के अलग-अलग इलाक़ों के लोग एक दूसरे के क़रीब आ सकेंगे. भाषा में ही आख़िरकार उनकी संस्कृति का सरमाया है. इस तरह देश में एकता क़ायम करने में मदद मिलेगी. याद करें कि नेहरू के ज़माने का एक लोकप्रिय शब्द था: एकता.

एकता लेकिन एकरूपता पर आधारित नहीं होनी चाहिए. वह एक दूसरे को समझ पाने और सबकी भिन्नता के स्वीकार पर निर्भर होगी. इसलिए सबको किसी एक भाषा या एक संस्कृति के रंग में रंग देने का प्रयास राजकीय स्तर पर नहीं किया जाना चाहिए. और न कोई भाषा हर जगह प्रथम भाषा मानी चाहिए.

त्रिभाषा सूत्र के साथ सबसे अधिक बेईमानी उन इलाक़ों में की गई जिन्हें हिंदी भाषी क्षेत्र कहते हैं. केरल या कर्नाटक या उत्तर पूर्व में तो दूसरी या तीसरी भाषा के तौर पर स्कूलों में हिंदी को जगह मिली लेकिन उत्तर प्रदेश या बिहार या राजस्थान में मलयालम या तमिल या बांग्ला की जगह संस्कृत को रख दिया गया. संस्कृत की पढ़ाई भी किस तरह की गई, यह हम सब जानते हैं.

इस तरह हिंदीवालों ने त्रिभाषा सूत्र की आत्मा की हत्या कर दी. दक्षिण के लोगों ने देखा कि हिंदी प्रदेशों के लोगों को अन्य भारतीय भाषाओं में कोई रुचि नहीं है. अगर त्रिभाषा सूत्र भारत में विविधता के बीच एकता का एक रस्ता था तो हिंदीवालों को उस रास्ते पर चलने में कोई रुचि नहीं थी. इस बात ने भी त्रिभाषा सूत्र की अपील धूमिल कर दी.

इसके अलावा यह दोहराना होगा कि भाषा शिक्षण में कोई शोध अनिवार्यतः तीन भाषाओं की शिक्षा की वकालत नहीं करता. तीन भाषाओं की संख्या कोई पत्थर की लकीर नहीं है. यह भी कोई वैज्ञानिक नियम नहीं है कि पहली कक्षा से ही एकाधिक भाषाओं की पढ़ाई शुरू हो जानी चाहिए. कोई भी नियम संदर्भ रहित नहीं हो सकता. असल बात है, भाषा सीखने के मामले में एक तरह का लचीलापन हासिल करना. देखा गया है कि एक भाषा में दृढ़ता दूसरी भाषाओं को अच्छे तरीक़े से सीखने में सहायक होती है.

अपेक्षा यह थी कि स्कूल में रहते हुए विद्यार्थी तीन भाषाओं से परिचित हो पाएं. उन्हें अलग-अलग स्तर तक सीखें. पहली कक्षा से ही यह शुरू हो, इसकी कोई अनिवार्यता न थी.

इसलिए किस कक्षा से कौन सी भाषा सीखना शुरू करना चाहिए, इसका कोई पक्का नियम नहीं है. और क्या भाषाओं की संख्या इन ही होनी चाहिए? दो या चार क्यों नहीं?

भाषा शिक्षण का कोई ऐसा सिद्धांत नहीं जो भाषाओं की संख्या निश्चित करता हो जो प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई ही जानी चाहिए. अमेरिका, चीन, अफ़्रीका या दूसरे मुल्कों में अलग-अलग स्तरों पर विद्यार्थी दूसरी भाषा का चुनाव करते हैं. अमेरिका के स्कूलों में तो बहुत विविधता है क्योंकि वहां पूरी दुनिया से विभिन्न भाषाओं को बोलने वाले जाकर बसते हैं. जिन विद्यार्थियों को कॉलेज या विश्वविद्यालय जाना है, उनके लिए एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य है. यह वे चौथी या पांचवीं कक्षा में सीखना शुरू करते हैं.

देखा गया कि इन तीन भाषाओं में एक अंग्रेज़ी होगी, इस पर दक्षिण हो या उत्तर या पश्चिम या पूरब, एक राय थी. इसके कारण ऐतिहासिक हैं. उस पर विलाप करने से कोई लाभ नहीं और हम यह जानते हैं कि अंग्रेज़ी अब किसी दिमाग़ी ग़ुलामी की निशानी नहीं रही, जैसी वह उपनिवेशकाल में मानी जाती थी. लेकिन अंग्रेज़ी की पढ़ाई कैसे हो, इस पर एक राय न बन पाई.

जिन्होंने सरकारी स्कूलों में हमारे वक्त, यानी पिछली सदी के 70 के दशक तक पढ़ाई की है, उन्हें याद होगा कि अंगेज़ी उन्होंने छठी या कुछ जगह चौथी कक्षा से सीखना शुरू किया. मुझसे कोई 10 साल पहले इसी तरह बिहार से दूर मध्य प्रदेश में कृष्ण कुमार ने अंग्रेज़ी सीखी थी. वह उस वक्त दूसरी भाषा सीखने का सर्वमान्य स्तर था.

पहली कक्षा से अंग्रेज़ी पढ़ाना ‘पब्लिक स्कूलों’ में शुरू किया गया. चूंकि समाज के अभिजन के बच्चे इस तरह पढ़ रहे थे, पूरे समाज ने उसे ही आदर्श माना. उसी तरह शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा न होकर अंग्रेज़ी हो, इसे भी आदर्श बनाने के लिए ‘पब्लिक स्कूल’ ही जिम्मेदार हैं. बाद में इसकी नक़ल सरकारी स्कूलों ने की या उन्हें ऐसा करना पड़ा क्योंकि समाज अब इसकी मांग कर रहा था.

भाषा किसी भी स्तर से सीखना शुरू करें, असल बात है भाषा के अध्यापक की क़ाबिलियत. पहली भाषा हो या दूसरी, अगर अध्यापक कुशल नहीं है तो विद्यार्थी के लिए अच्छी तरह भाषा सीखना मुश्किल होगा. अंग्रेज़ी की बात हम छोड़ दें, उत्तर प्रदेश में ही हर साल कितने लाख विद्यार्थी हिंदी की आख़िरी परीक्षाओं में फेल कर जाते हैं. 2018, 2019 और 2020 में 11 लाख से लेकर 8 लाख विद्यार्थी हिंदी की बोर्ड परीक्षा में फेल कर गए. यह पहली भाषा के तौर पर हिंदी पढ़ने वालों का हाल है.

जिन्हें हिंदी क्षेत्र कहा जाता है, वहां हिंदी शिक्षण का यह हाल क्यों है? उसमें सुधार कैसे किया जाए? इस पर विचार करने की जगह हम इसे लेकर चिंतित हैं कि तमिलनाडु या तेलंगाना के लोग हिंदी क्यों नहीं सीख रहे.

2024 के कर्नाटक बोर्ड के इम्तिहान में तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्यतः हिंदी पढ़ने छात्रों में 90,000 हज़ार फेल कर गए. इसके बाद वहां के शिक्षाविदों ने सवाल किया है कि हिंदी को जबरन तीसरी भाषा के तौर पर क्यों पढ़ाया जा रहा है जबकि न तो व्यवसाय में, न उच्च शिक्षा में, न ज्ञान के मामले में ही हिंदी काम आती है. यह भी कहा गया है कि हिंदी की पढ़ाई के लिए पूरे संसाधन भी नहीं हैं. फिर मात्र औपचारिकता के लिए हिंदी क्यों पढ़ाई जा रही है?

उनकी मांग है कि कर्नाटक में कन्नड़ और अंग्रेज़ी की पढ़ाई ही क़ायदे से की जाए ताकि उन्हें अपनी आगे की ज़िंदगी में वे भाषाएं काम दे सकें.

मसला हिंदी का नहीं, तीसरी भाषा की शिक्षा की अनिवार्यता का है. त्रिभाषा सूत्र के प्रस्तावित किए 60 साल से ऊपर हो गए हैं. दुनिया भर में भाषा-शिक्षण को लेकर को शोध हुए हैं और जो पद्धतियां इस्तेमाल की जा रही हैं, उनकी रौशनी में इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है. भाषा शिक्षण के मामले में हर प्रदेश को अपनी क्षमता और ज़रूरत के मुताबिक़ फ़ैसला करने की आज़ादी मिलनी चाहिए.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)