‘एक राष्ट्र, एक भाषा’ भारत की बहुलता का निषेध है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी दूसरी भारतीय भाषाओं को पीछे छोड़कर, उनके अंचलों में लादी जाकर, आगे नहीं बढ़ सकती है. उसका हिंदुत्व की भाषा बन इतराना उसके स्वभाव और परंपरा का अपमान और अवमूल्यन होगा. वह अपनी बहुलता की दुश्मन बनेगी और भारतीय भाषाओं की भी. यह उसका विस्तार नहीं विनाश होगा.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

नए निज़ाम ने, भाजपा-नीत केंद्र ने अपने हिंदुत्व को बढ़ाने, व्यापक और सशक्त करने के अथक अभियान में अब हिंदी को भी अनिवार्य रूप से जोड़ दिया है. हिंदी की अपनी बहुलता और ग्रहणशीलता की परंपरा से उसे च्युत कर अब हिंदी को एकनिष्ठता और एकरूपता की वाहक बनाया जा रहा है. जिस बहुसंख्यकता के बल और तर्क से हिंदुत्व को वर्चस्व दिया जा रहा है, उसी तर्क और बल से हिंदी को भी फैलाने की कोशिश हो रही है.

इससे पहले, हिंदी को इसी राजनीति ने, गोदी मीडिया के माध्यम से, घृणा-झूठ-हिंसा-भेदभाव की लगभग राजभाषा बनाने में सफलता पाई है. इसका एक वांछित फल यह है कि हिंदी समाज को लगता है कि उसकी भाषा का विस्तार और प्रसार हो रहा है और उसे हिंदुत्व का समर्थन बढ़ता गया है.

अपने मूल में न हिंदी, न संस्कृत ही किसी धर्म की भाषाएं हैं: अपनी परंपरा में भी वे धार्मिक भाषाएं नहीं रही हैं, भले धर्म ने उसका उपयोग किया हो. इस पर लंबी बहस होती रही है कि संख्या और लोकप्रियता के आधार पर हिंदी को समूचे देश की एक राजभाषा होना चाहिए कि नहीं. ऐसी ज़रूरत समझने वाले लोग भारत के अपने भाषायी भूगोल और उसकी लंबी परंपरा की अनदेशी-अनसोची करते हैं. ‘एक राष्ट्र, एक धर्म, एक भाषा’ का आदर्श भारत की अपार-अदम्य-अकाट्य बहुलता, उसकी धार्मिक और भाषायी बहुलता को अतिक्रमित करके ही अपनाया जा सकता है.

इस समय ख़ासकर हिंदी की हिंदुत्व-प्रेरित बढ़त से प्रसन्न हिंदीभाषियों को थोड़ा ठिठककर विचार करना चाहिए. हिंदी दूसरी भारतीय भाषाओं को पीछे छोड़कर, उनके अंचलों में लादी जाकर, आगे नहीं बढ़ सकती है, न अब तक बढ़ पाई है. उसका हिंदुत्व की भाषा बन इतराना उसके स्वभाव और परंपरा का अपमान और अवमूल्यन होगा. अन्य-भाषी अंचलों में उसका घोर विरोध होगा और उस पर अनेक आरोप लगेंगे. उसकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता तेज़ी से घटेगी. वह अपनी बहुलता की दुश्मन बनेगी और भारतीय भाषाओं की भी. यह उसका विस्तार नहीं विनाश होगा.

अभी इस व्यापक विरोध ने तमिलनाडु, महाराष्ट्र में लोकप्रिय रूप लेना शुरू किया है और अगर एकनिष्ठता और एकरूपता के हिंदुत्व के एजेंडे पर आग्रह तेज़ हुआ और हिंदी को एकरूपता और एकात्मकता के लिए ज़रूरी जताया जाने लगा तो यह हिंदी के लिए बहुत घातक और ख़तरनाक होगा.

हम भारतीय सभ्यता के एक ख़तरनाक मुक़ाम पर हैं. उसे उसकी बहुलता, स्पंदित होती परस्पर निर्भरता, संवाद और भाषायी समानधर्मिता में बचाना ज़रूरी और नैतिक कर्तव्य है. हमें हिंदी को दूसरे अंचलों पर थोपने, उसके एकात्मकता और एकरूपता के अभियान में शामिल किए जाने से बचाने के लिए उसके भारत की राजभाषा बनाए जाने के आग्रह और प्रावधान से अपने को मुक्त कर लेना चाहिए.

हिंदी को राज की और धर्म की कोई ज़रूरत नहीं है और अब तक इन दोनों ने उसे विकृत-विरूप ही किया है. हमें यह स्पष्ट और निर्भय होकर कहना चाहिए कि हिंदी को किसी भी अंचल में, किसी भी व्यवस्था में जैसे शिक्षादि में थोपा न जाए; कि हिंदी सारी भारतीय भाषाओं को अपना मित्र-बांधवी-सहचर मानती है; कि वह भारत की सांस्कृतिक और भाषायी बहुलता को उसकी सभ्यता का अनिवार्य पक्ष मानती है और वह किसी तरह की सांस्कृतिक-धार्मिक-भाषायी एकरूपता और उसके लिए किए जा रहे प्रगट या अप्रगट अभियान का विरोध करती है.

भारतीय सभ्यता को कई तरह से विखंडित किया जा रहा है. कम से कम भाषा के मोर्चे पर हिंदी को इस विखंडन का मुखर और स्पष्ट विरोध करना चाहिए.

जनगढ़ निरंतर

दिल्ली में इस सप्ताह त्रिवेणी कला संगम में मध्य प्रदेश के पाटनगढ़ के गोंड प्रधान चित्रकारों की एक प्रदर्शनी ‘जनगढ़ कला: पाटनगढ़ में निरंतर’ नाम से समाप्त हुई. पाटनगढ़ की कीर्ति का एक आधार यह है कि कभी वहां प्रसिद्ध नृतत्वशास्त्री वेरियर एलविन रहे थे. पर पिछले लगभग चार दशकों से उसकी कीर्ति का आधार रहे हैं एक गोंड प्रधान चित्रकार जनगढ़ सिंह श्याम, जो व्यापक गोंड आदिवासी समाज के उस समूह के थे जो उनकी परंपरा के पैतृक गायक थे.

चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन को वे अचानक मिले थे जब उनका जीवनयापन उस समय सड़क पर गिट्टी तोड़ने से चल रहा था. उस समय तक गोंड कला नाम की कोई कला नहीं थी. जनगढ़ भारत भवन आए और यहां उन्होंने एक बेहद स्पंदित कला-परिवेश में नए रंगों और सामग्री से चित्र बनाना शुरू किया. स्वामी ने उन्हें प्रोत्साहित किया. जनगढ़ ने अपनी सांगीतिक स्मृतियों, छवियों, आख्यानों, जातीय अभिप्रायों आदि को अपने चित्रों में रूपांतरित करना शुरू किया. संगीत-कल्पना को चित्र-कल्पना में बदलने का यह बेहद बिरला उदाहरण है.

जनगढ़ ने बिना जाने, बिना किसी नाटकीयता के, सहज भाव से, बिना कोई ऐसा दावा किए, एक नई कला को जन्म दिया जिसे अब जनगढ़ कलम के नाम से जाना जाता है. उनके चित्र बहुत जल्दी आधुनिक कला-परिदृश्य का हिस्सा बन गए. उनकी प्रदर्शनियां पेरिस, जापान, दिल्ली आदि के प्रतिष्ठित संग्रहालयों में हुईं और आज उसकी प्रतिष्ठा एक मूर्धन्य आधुनिक भारतीय चित्रकार के रूप में है.

जनगढ़ का अपना गोंड प्रधान समुदाय बड़ी संख्या में इस कला की ओर आकर्षित हुआ और आज गोंड प्रधान चित्रकारों की संख्या लगभग सौ तक पहुंच गई है. वे ज़्यादातर भोपाल और पाटनगढ़ में रहकर काम कर रहे हैं. यह भी कमाल की बात है कि एक गायक-समूह चित्रकार-समूह में बदल गया है. पाटनगढ़ उसी वनांचल में है जिसमें मंडला है, जहां के सैयद हैदर रज़ा रहे हैं. यह प्रदर्शनी उन चित्रकारों की कृतियों पर एकाग्र है जो पाटनगढ़ में रहकर कला-साधना कर रहे हैं.

पाटनगढ़ में इस वर्ष से एक जनगढ़ उत्सव भी रज़ा फाउंडेशन ने शुरू किया है. वहां जनगढ़ के जीर्ण-शीर्ण हो गए घर के पुनरूद्धार पर भी काम शुरू हुआ है. प्रदर्शनी के सभी चित्र पहले ही बिक गए और उन्हें मिलाकर एक बड़ी प्रदर्शनी जल्दी ही दुबई में होने जा रही है.

ये सभी चित्र एक ऐसा संसार चित्रित करते हैं जिसमें मनुष्य केंद्र में नहीं है: वह प्रकृति का हिस्सा है और ये चित्र प्रकृति, उसकी सुषमा-सघनता-बहुलता-लालित्य पर इस क़दर एकाग्र है कि मानो वे मनुष्य को अनदेखा-सा करते हैं. वे मनुष्य के आक्रांत आधुनिक समाज के बरक़्स एक ऐसा संसार, वैकल्पिक संसार चित्रित और प्रस्तावित करते हैं जो सुंदर-समरस-सघन-विपुल है, मनुष्य के बिना भी. उसमें अनेक मनोभाव व्यक्त होते हैं पर हिंसा-अलगाव-घृणा नहीं जो कि आज मानवीय संसार की प्रमुख वृत्तियां हैं.

यह प्रश्न उठ सकता है कि ऐसे चित्रलोक का आज के संसार से क्या संबंध है. ज़ाहिर है कि यह संबंध प्रतिबिंबन का नहीं, प्रश्नांकन और विलोम का है. प्रतिलोम का है. यह भी नोट करने की बात हे कि इन चित्रों में से कई परिष्कृत कौशल का प्रमाण हैं: उनमें कच्चापन या अपरिपक्वता नहीं है बल्कि सूक्ष्मता, बारीकी और परिपक्वता है. वे जनगढ़ कलम को आगे बढ़ाते हुए, उसमें कुछ नया जोड़ते हुए चित्र हैं. उसमें निरंतरता और परिवर्तन में घनिष्ठ संवाद हो रहा है. परंपरा के पुनर्नवा होने का साक्ष्य है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)