जम्मू-कश्मीर: शहीद दिवस मनाने पर एलजी अनिश्चित, सरकार व विपक्ष तैयार; मीरवाइज़ हिरासत में

नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी ने 13 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश बहाल करने की मांग की है, ताकि उन 22 कश्मीरियों को श्रद्धांजलि दी जा सके, जिन्हें 1931 में तब डोगरा सेना ने श्रीनगर में गोली मार दी थी, जब वे महाराजा हरि सिंह के शासन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. इस बीच हुर्रियत के उदारवादी नेता मीरवाइज़ उमर फारूक को नज़रबंद कर दिया गया है.

उमर अब्दुल्ला. (फोटो साभार: फेसबुक/@Omar Abdullah)

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में शहीद दिवस से ठीक कुछ दिन पहले शुक्रवार (11 जुलाई) को हुर्रियत के उदारवादी नेता मीरवाइज उमर फारूक को श्रीनगर की जामिया मस्जिद में अपना साप्ताहिक खुत्बा देने से रोक दिया गया और उन्हें अधिकारियों द्वारा नज़रबंद कर दिया गया.

इस संबंध में सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में मीरवाइज ने अपनी नज़रबंदी का कारण ख़ुत्बे में ’13 जुलाई 1931 के शहीदों का ज़िक्र’ होने की कथित आशंका बताया. उन्होंने कहा, ‘इन शहीदों और उनके बाद के सभी शहीदों का बलिदान कश्मीर की सामूहिक स्मृति में अंकित है और इसे प्रतिबंधों और बंदिशों से मिटाया नहीं जा सकता. कोई भी जीवित राष्ट्र अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध अपने शहीदों के सर्वोच्च बलिदान को नहीं भूल सकता.’

मीरवाइज़ ने अधिकारियों से प्रतिबंध हटाने और लोगों को शहीदों को श्रद्धांजलि देने की अनुमति देने की अपील की.

पोस्ट में कहा गया, ‘इंशाअल्लाह, अगर हमारी परंपरा के अनुसार अनुमति दी गई, तो हम 13 जुलाई को ज़ुहर की नमाज़ के बाद शहीदों की क़ब्रों पर जाएंगे और उन्हें श्रद्धांजलि देंगे.’

शहीद दिवस को लेकर सरकार और एलजी आमने-सामने

मालूम हो कि केंद्र शासित प्रदेश में 13 जुलाई को फिर से शहीद दिवस के रूप में मनाने को लेकर सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का प्रशासन आमने-सामने है.

आगामी शहीद दिवस, जिसे अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद जनवरी 2020 में सार्वजनिक अवकाश के रूप में रद्द कर दिया गया था, अक्टूबर 2024 में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पद की शपथ लेने के बाद पहला शहीद दिवस है.

एनसी, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (पीसी) और जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी ने 13 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश के रूप में बहाल करने की मांग की है, ताकि उन 22 कश्मीरियों को श्रद्धांजलि दी जा सके, जिन्हें 1931 में तब डोगरा सेना ने श्रीनगर में गोली मार दी थी, जब वे महाराजा हरि सिंह के शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता अली मोहम्मद सागर ने श्रीनगर के डिप्टी कमिश्नर को लिखे एक पत्र में कहा कि पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला रविवार सुबह 8 बजे श्रीनगर स्थित मज़ार-ए-शुहदा या शहीदों की मज़ार पर ‘शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित करने’ के लिए ‘वरिष्ठ पार्टी पदाधिकारियों’ के साथ आएंगे.

सागर ने पत्र में आगे कहा, ‘इसके लिए मज़ार-ए-शुहदा में आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था की जाए. साथ ही, अनुरोध है कि कृपया प्रस्तावित समय की पुष्टि करें या समय आवंटित करें ताकि इस संबंध में किसी भी प्रकार का भ्रम न रहे. पार्टी आवंटित समय का पालन करेगी.’

उल्लेखनीय है कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल के रूप में मनोज सिन्हा नौकरशाही के शीर्ष स्तरों को नियंत्रित करते हैं और पुलिस विभाग का भी प्रभार संभालते हैं. पिछले उदाहरणों को देखते हुए इस साल भी इस दिन कार्यक्रम की अनुमति दिए जाने की संभावना नहीं है.

भाजपा का विरोध

इस संबंध में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 13 जुलाई के शहादत दिवस का विरोध किया है.

ज्ञात हो कि पार्टी के वरिष्ठ नेता और जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने पिछले साल 1931 में डोगरा सेना द्वारा मारे गए लोगों को ‘देशद्रोही’ कहकर पूरे कश्मीर में आक्रोश पैदा कर दिया था.

बता दें कि जब जम्मू-कश्मीर एक राज्य था, तब कश्मीर की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां श्रीनगर के मज़हर-ए-शुहादा में डोगरा सेना के 22 शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए जाती थीं, जिनकी मृत्यु ने वर्षों से मुख्यधारा और अलगाववादी राजनीति, दोनों की रूपरेखा तय की है.

हालांकि, पिछले साल केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर को अपनी पहली निर्वाचित सरकार मिलने के बाद विपक्षी पीडीपी, पीसी और अन्य ने सत्तारूढ़ पार्टी पर 13 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश बहाल न करके अपने ही राजनीतिक घोषणापत्र के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया है.

ज्ञात हो कि पिछले साल 13 जुलाई को एक पोस्ट में एलजी प्रशासन द्वारा मज़हर-ए-शुहादा जाने से रोके जाने के बाद अपनी और महबूबा व अन्य की नज़रबंदी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अब्दुल्ला ने एक्स पर लिखा था, ‘यह आखिरी साल है जब वे ऐसा कर पाएंगे. अगले साल से हम 13 जुलाई को उस गंभीरता और सम्मान के साथ मनाएंगे, जिसका यह दिन हकदार है.’

एक स्थानीय समाचार संवाददाता ने गुरुवार (10 जुलाई) को बताया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने मनोज सिन्हा को पत्र लिखकर पार्टी के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की जयंती 13 जुलाई और 5 दिसंबर को सार्वजनिक अवकाश के रूप में बहाल करने का अनुरोध किया है.

दोनों तिथियों को पिछले साल जम्मू-कश्मीर के सामान्य प्रशासन विभाग, जो एलजी सिन्हा के नियंत्रण में है, द्वारा जारी सार्वजनिक अवकाशों की सूची से हटा दिया गया था.

सत्तारूढ़ पार्टी पर निशाना साधते हुए पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने गुरुवार को अब्दुल्ला सरकार के प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘अगर विधानसभा अध्यक्ष ने विधानसभा में पीडीपी के इसी प्रस्ताव का समर्थन किया होता तो यह प्रस्ताव प्रभावी होता.’

विधानसभा में पीडीपी ने 13 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश के रूप में बहाल करने की मांग 

मालूम हो कि इस साल की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र के दौरान पीडीपी नेता वहीद पारा ने 13 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश के रूप में बहाल करने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया था. हालांकि, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री, स्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने नियमों का हवाला देते हुए प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

जम्मू-कश्मीर विधानसभा के प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमों के नियम 368 के अनुसार, सदस्यों को विधेयकों, प्रस्तावों या प्रश्नों के नोटिस तब तक सार्वजनिक नहीं करने चाहिए जब तक कि उन्हें स्पीकर द्वारा स्वीकार न कर लिया जाए और सदस्यों के बीच प्रसारित न कर दिया जाए.

महबूबा ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘स्पीकर द्वारा प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज करना अप्रत्याशित और निराशाजनक था. आज की यह कवायद किसी गंभीर प्रयास से ज़्यादा दिखावटी लग रही है.’

इस संबंध में गुरुवार शाम एक बयान में महबूबा ने कहा कि इस फैसले ने ‘कश्मीर के इतिहास पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के दोहरे चरित्र को उजागर कर दिया है. उनकी चुप्पी प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि मिलीभगत साबित करती है. जब साझा विरासत की रक्षा करने का समय आया, तो उन्होंने चुप्पी साध ली.’

पार्टी ने कहा कि वह रविवार को श्रीनगर स्थित मज़ार-ए-शुहदा जाकर शहीदों को याद करेगी.

उधर, सज्जाद लोन की पार्टी और अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी ने भी कहा है कि उनके नेता मज़हर-ए-शुहादा का दौरा करेंगे और अब्दुल्ला सरकार से 13 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने और पूरे केंद्र शासित प्रदेश में इस दिन को मनाने का आह्वान भी किया है.

बुखारी ने कहा, ‘उनकी कुर्बानियों की बदौलत ही हम आज यहां हैं. लेकिन (अब्दुल्ला) सरकार आठ महीनों के कार्यकाल में अपने घोषणापत्र का एक प्रतिशत भी पूरा नहीं कर पाई है.’ पीसी के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘हमारे नेता 13 जुलाई को शहीदों की कब्रगाह पर दुआ करने भी जाएंगे.’

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