लेखन मनुष्य की आदिम इच्छा है. लेकिन प्रश्न उठता है कि जब इतना सारा लेखन पहले ही किया जा चुका है तो हमें अब और कुछ नया क्यों लिखना है? क्या अब तक जो लिखा गया वह पर्याप्त नहीं है? या जो नया लेखन हम करना चाहते हैं उसमें कोई ऐसा तत्व है जो पूर्ववर्ती लेखन से एकदम जुदा है?
इन पंक्तियों का लेखक इन्हीं सवालों से जूझते हुए दो महत्वपूर्ण निबन्धों से टकराया. इन दोनों निबन्धों को लेखन की प्रक्रिया में आने वाली जटिलताओं के सन्दर्भ में फिर से पढ़ा जाना चाहिए. 1949 में जॉर्ज ऑरवेल का मशहूर उपन्यास 1984 छपा जिससे उन्हें दुनिया भर में प्रसिद्धि मिली. इस उपन्यास के प्रकाशन के तीन साल पहले 1946 में उन्होंने व्हाई आइ राइट शीर्षक से एक कालजयी निबन्ध लिखा था. इस निबन्ध में उन्होंने इस सवाल का विश्लेषण करने की कोशिश की है कि उन्होंने लिखना क्यों शुरू किया और वे क्यों लिखते हैं.
आत्मकथात्मक शैली में लिखे गए इस निबन्ध में उन्होंने अपने बचपन में खुद पर पड़े प्रभावों का जिक्र किया है: वे कहते हैं कि किसी लेखक की मंशा को समझने के लिए उसके आरम्भिक विकास को जानना बेहद जरूरी है. हर मनुष्य अपने छुटपन में ही कुछ ऐसी चीज़ें सीखता है, कुछ विशेष व्यवहारों को आत्मसात करता है, जो आजीवन उसके साथ रहते हैं. इनमें से कई बातें नैतिक रूप से ‘गलत’ होती हैं और हम उन्हें ‘अनलर्न’ करने की कोशिश करते हैं, लेकिन कई प्रभाव जल्दी हमारा साथ नहीं छोड़ते हैं और अक्सर लेखन जैसी मूलभूत रूप से एकान्तिक क्रिया में भी उनकी परछाइयां आ ही जाती हैं. ऑरवेल का मानना है कि हम इन प्रभावों से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकते हैं क्योंकि ऐसे में हम लेखन के लिए सबसे जरूरी चालक शक्ति- आवेग- को खो देंगे.
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि लिखते वक्त, हम लगातार, यह जानते हुए कि हम इस उद्यम में पूरी तरह सफल नहीं होंगे, अपने पूर्वग्रहों को चुनौती देने की कोशिश करते रहते हैं.
ऑरवेल का मानना है कि संजीदा गद्य लेखन के लिए मूलतः चार किस्म की प्रेरणा उत्तरदायी होती है: खांटी अहंमन्यता, सौन्दर्यात्मक ऊर्जा, ऐतिहासिक आवेग, और राजनीतिक आशय. ऑरवेल के अनुसार इनका अर्थ कुछ ऐसा है: चतुर दिखने की इच्छा, मृत्यु के बाद भी अमर होने की मंशा, धन का लालच न होकर खुद को केंद्र में रखकर सोचने की आदत; शब्दों से प्रेम होना और उनकी सुन्दरता को समझना और उसके जरिये खुद को व्यक्त करना; आने वाली पीढ़ियों के लिए आज की सच्चाइयों का लेखा-जोखा रखना; और दुनिया को बदलने के लिए पाठक को सोचने पर मजबूर करना.
भिन्न-भिन्न इंसानों में अलग-अलग स्तर पर यह प्रेरणाएं अलग-अलग हो सकती हैं. ऑरवेल का खुद के बारे में कहना है कि शुरू की तीन प्रेरणाएं चौथी प्रेरणा पर हमेशा भारी रही हैं; लेकिन यूरोप में हिटलर के आगमन, स्पेन में गृह युद्ध आदि घटनाओं के कारण उन्हें मजबूरी में अपने राजनीतिक विचारों को शामिल करके लेखन करना पड़ा. उसी दौरान की उनकी एक कविता का भी जिक्र इस निबन्ध में है जिसमें उनका यह अफ़सोस साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता है. आगे ऑरवेल कहते हैं कि अच्छा लेखन करने के लिए लेखक को अपने व्यक्तित्व के साथ लगातार मुठभेड़ करनी पड़ती है. वे लेखन को एक कष्टप्रद क्रिया मानते हैं. यदि हमारे जिस्म में एक किस्म की बेचैनी, पेट में आग नहीं होती तो इस कष्ट को कोई भी झेलना नहीं चाहता.
1946 से 2013 की दुनिया काफी बदल चुकी है और तमाम तरह के समाजिक बदलावों से गुजरने के बाद इक्कीसवीं सदी के लेखक के लिए लेखन का अर्थ जाहिर तौर पर ऑरवेल से काफी जुदा होगा. 2013 में अंग्रेज लेखिका डेबोरा लेवी ने नारीवादी नजरिये से ऑरवेल के निबन्ध का जवाब एक लम्बे आत्मकथात्मक शैली में लिखे निबन्ध से दिया. लेवी का निबन्ध कई मायनों में ऑरवेल से ठीक उलट होते हुए भी ‘अच्छा लेखन कैसे किया जाए’ के यक्ष प्रश्न का जवाब देने की कोशिश करता है, लेकिन बिल्कुल नयी सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक वास्तविकताओं के सन्दर्भ में. ऑरवेल के उलट उन्होंने बचपन में कभी नहीं सोचा कि वे लेखक बनना चाहती हैं या नहीं. उनका निबन्ध एक महिला के जीवन की उधेड़बुन में लेखक होने या न होने की उहापोह की ओर इशारा करता है जिसके दौरान वे कई चीज़ों पर गौर भी करती हैं और उन्हें नजरंदाज़ भी करती चलती हैं. शायद इसीलिए उन्होंने अपने आत्मकथात्मक निबन्ध को यह शीर्षक दिया होगा: थिंग्स आइ डोंट वांट टू नो. थियेटर की एक अदाकारा एवं निर्देशक ने लेवी से कहा था कि हमें भावनाओं की नक़ल करने से बचना चाहिए. एक नारीवादी लेखिका के लिए इसका क्या आशय हो सकता है यह ठीक-ठीक कहना मुश्किल है. अपने निबन्ध के राजनीतिक आशय वाले हिस्से में वे मातृत्व पर बात करती हैं और यह बिल्कुल भी अटपटा नहीं लगता क्योंकि नारीवाद ने हमें ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ की सीख बहुत पहले से दे रखी है. लेकिन यह बेहद दिलचस्प हो जाता है कि एक ओर ऑरवेल राजनीतिक चेतना एवं कार्रवाई की बात करते हैं, जबकि दूसरी ओर लेवी मातृत्व नामक संस्था के मर्दवादी आशयों की ओर हमारा ध्यान खींचती हैं. दोनों ही विषय महत्वपूर्ण हैं और दोनों में जो समानता है वह लेखन की प्रक्रिया के दौरान चलने वाले संघर्ष के ही बारे में है.
ऑरवेल के लिए यह संघर्ष अपने सौन्दर्य-प्रेमी लेखक को दबाकर राजनीतिक लेखन करने का है; लेवी के लिए यह संघर्ष पितृसत्तात्मक समाज में एक औरत होने के नाते झेली जाने वाली तमाम कठिनाइयों के बरक्स लेखन करने का है. यद्यपि लेवी का लेखन पितृसत्ता के खिलाफ लिखा गया कोई घोषणापत्र न होकर बेहद सामान्य भाषा में कही गयी एक औरत की कहानी है, यह महज एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें चीज़ों को जस का तस रख दिया गया है और जिम्मेदारी पाठक पर छोड़ दी गयी है कि वे लेखन के ऑरवेलियन नुस्खे को मान्यता दें अथवा लेवी के दैनंदिन जीवन एवं उसकी कठिनाइयों को समझते हुए समाज के बारे में अपनी समझ को गूढ़ बनाएं.
निबन्ध के अंत में निष्कर्ष के रूप में लेवी वर्जिनिया वुल्फ के जरिये बस इतना कहती हैं, ‘एक महिला लेखक अपने जीवन को पूरी तरह महसूस करने का खतरा नहीं उठा सकती है क्योंकि अगर वह ऐसा करेगी तो जब उसे शांतचित्त होकर लिखना होगा तब वह रोष से लबरेज़ होकर लिखेगी.’
इन दोनों निबन्धों को पढ़ने से ऐसा लगता है कि लेवी में हाशिये के समाज से आने वाले लोगों का गुस्सा और खीझ मौजूद है; जिसे उन्होंने लेखन के कायदों एवं अनुशासन के जरिये बेहद शालीनता से व्यक्त किया है. इन दोनों निबन्धों से गुजरते हुए हम पाते हैं कि सवाल अभी भी जस का तस है कि ‘अच्छा लेखन कैसे किया जाय’; और विभिन्न सन्दर्भों में लोग इसी गुत्थी को लेखन के जरिये सुलझाने में लगे हुए हैं. लेवी का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है और ऑरवेल की बातें भी खोखली नहीं हैं.
इस सन्दर्भ में मुझे अपने शिक्षक प्रोफेसर ज्योतिर्मय शर्मा द्वारा इंगित किया गया बोर्खेस का एक कथन याद आता है: एक इंसान अपने लेखन के द्वारा ही स्थापित या ख़ारिज होता है; जब आप किसी के पक्ष अथवा विरोध में लिखते हैं तो इससे उस व्यक्ति को बमुश्किल ही कोई लाभ या हानि होती है; तो अगर लोग आपको जीनियस बताते हैं या आप स्वयं खुद के बारे में खूब बोलते हैं तो आप निश्चिन्त रहें क्योंकि आपकी पोल आपका लेखन ही खोलेगा. बोर्खेस की इस बात के बाद और कुछ कहने को नहीं बच जाता.
जिनके मन में अपने लेखन से दुनिया को बदलने की सदिच्छा है, उनके लिए बोर्खेस से भी आगे फिदेल कास्त्रो का एक कथन (कुछ संशोधन के साथ) शायद कारगर हो: ‘आपका लेखन ही आपके साथ न्याय करेगा!’.
