चीन ने तिब्बत में दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण शुरू किया, भारत और बांग्लादेश में चिंता बढ़ी

चीन तिब्बती क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर बांध का निर्माण कर रहा है. इसे लेकर सिर्फ रणनीतिक ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आशंकाएं भी सामने आ रही हैं, जिसके चलते भारत, बांग्लादेश और ग़ैर-सरकारी संगठनों ने चिंता जताई है.

ल्हासा के उपनगर में यारलुंग त्सांगपो नदी. (फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स)

नई दिल्ली: चीन तिब्बती क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर बांध का निर्माण कर रहा है. चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि तिब्बती पठार के पूर्वी किनारे पर यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनने वाले दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत बांध का काम शुरू हो गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी मीडिया ने बताया कि राष्ट्रपति द्वारा शनिवार(19 जुलाई) को आयोजित एक समारोह में यह घोषणा की गई. हालांकि, इस प्रस्तावित बांध परियोजना ने भारत, बांग्लादेश और गैर-सरकारी संगठनों की चिंताएं बढ़ा दी हैं.

इसे लेकर सिर्फ रणनीतिक ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आशंकाएं भी सामने आ रही हैं.

चीन यह बांध क्यों बनाना चाहता है?

मालूम हो कि 2,900 किलोमीटर लंबी यारलुंग त्सांगपो नदी हिमालय से निकलती है और दुनिया की सबसे गहरी स्थलीय घाटी से होकर बहती है. एक हिस्से में नदी 50 किलोमीटर (31 मील) के भीतर 2,000 मीटर (6,561 फीट) की गहराई तक गिर जाती है.

चीन ने अनुमानित 170 अरब डॉलर (147.4 अरब यूरो) की इस परियोजना के पीछे नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, कार्बन उत्सर्जन में कमी और तिब्बत क्षेत्र में आर्थिक लक्ष्यों को कारण बताया है.

चीन की सरकारी मीडिया के अनुसार, ‘उत्पादित बिजली से मुख्य रूप से अन्य क्षेत्रों में खपत की आपूर्ति की जाएगी, साथ ही तिब्बत में स्थानीय बिजली की ज़रूरतों को भी पूरा किया जाएगा.’

इस बांध में कथित तौर पर पांच जलविद्युत स्टेशन होंगे, जिनकी क्षमता हर साल 300 अरब किलोवाट घंटे बिजली उत्पादन करने की होगी, जो पिछले साल ब्रिटेन द्वारा खपत की गई बिजली के बराबर है.

भारत और बांग्लादेश ने जताई चिंता

यारलुंग त्सांगपो नदी दक्षिण की ओर बहने पर भारत और बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र नदी बन जाती है. लाखों लोग जल स्रोत और कृषि के लिए इस नदी पर निर्भर हैं.

दोनों देशों ने बांध के कारण निचले इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की है. गैर-सरकारी संगठनों ने भी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पठार को अपरिवर्तनीय क्षति के जोखिम की चेतावनी दी है.

उल्लेखनीय है कि इस संबंध में जनवरी 2025 में भारत के विदेश मंत्रालय ने बताया था कि भारत ने चीन के साथ मेगा बांधों के असर को लेकर अपनी चिंता जताई है.

मंत्रालय ने ज़ोर देकर कहा था कि चीन से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है कि ब्रह्मपुत्र के निचले इलाकों के राज्यों के हितों को ऊपरी इलाकों में होने वाली गतिविधियों से नुकसान न पहुंचे.

ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट की 2020 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि ‘इन नदियों पर नियंत्रण चीन को भारतीय अर्थव्यवस्था पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में मदद करता है.’

चीन ने इन चिंताओं पर क्या प्रतिक्रिया दी है?

चीनी अधिकारियों ने यह नहीं बताया है कि यारलुंग परियोजना के निर्माण से कितने लोग विस्थापित होंगे.

इस मामले को लेकर बीते साल दिसंबर में चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि इस परियोजना का नदी के निचले इलाकों पर कोई ‘नकारात्मक प्रभाव’ नहीं पड़ेगा और बीजिंग नदी के ‘निचले इलाकों में स्थित देशों के साथ भी संपर्क बनाए रखेगा’.

गौरतलब है कि यारलुंग त्सांगपो बांध के 2030 के दशक में चालू होने की उम्मीद है. ऐसे में यह पहली बार नहीं है जब नदियों के अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करने को लेकर भू-राजनीतिक मुद्दे उठे हों.

हाल ही में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच भी सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया था. ये पहली बार था, जब भारत ने पानी को राजनीतिक हथिहार के तौर पर इस्तेमाल किया था. इस दौरान चीन द्वारा भी भारत के खिलाफ ब्रह्मपुत्र नदी के पानी को रोके जाने की तमाम बातें सामने आई थीं.

बता दें कि 1960 में सिंधु जल संधि पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मार्शल मोहम्मद अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे. इस संधि के प्रावधानों के तहत भारत को ‘पूर्वी नदियों’ – सतलुज, ब्यास और रावी के पानी तक अप्रतिबंधित पहुंच दी गई है. वहीं, पाकिस्तान का सिंधु, झेलम और चिनाब सहित ‘पश्चिमी नदियों’ के पानी पर अधिकार बरकरार रखा गया है.

ऐसे में संभावना है कि चीन इस पानी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है. चीन इस नदी का पानी रोक कर उसे उत्तरी इलाकों की ओर कर सकता है जहां आबादी ज़्यादा है. इस वजह से भारत में सूखे की समस्या पैदा हो सकती है. इसके अलावा अगर भारत में मानसून के मौसम में चीन इस बांध से ज़्यादा पानी छोड़ दे तो भारतीय इलाकों में बाढ़ भी आ सकती है.

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों का कहना है कि जिन तिब्बती घाटियों में जैव विविधता बेहद समृद्ध है, वे इस बांध परियोजना की वजह से पूरी तरह डूब सकती हैं. इसके साथ ही यह क्षेत्र भूकंप संभावित ज़ोन में आता है, जिससे यहां इतने बड़े बांध का निर्माण भविष्य में खतरनाक साबित हो सकता है.

चीनी सरकार और सरकारी मीडिया इन परियोजनाओं को ऐसे उपाय के तौर पर पेश करते हैं जो प्रदूषण कम करने, स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने और ग्रामीण तिब्बती आबादी को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने में सहायक हैं.

हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये बांध तिब्बतियों और उनकी ज़मीन के शोषण का नया उदाहरण हैं और अब तक हुए विरोध प्रदर्शनों को कुचल दिया गया है.

ज्ञात हो कि यह बांध अरुणाचल प्रदेश की सीमा के बेहद करीब स्थित न्यिंगची इलाके में बनाया जा रहा है, इसलिए भारत में कई नेताओं ने इसे लेकर खुलकर चिंता जताई है.

इसी महीने न्यूज़ एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस परियोजना को ‘वॉटर बम’ कहा था. उनका कहना था कि बांध बन जाने के बाद सियांग और ब्रह्मपुत्र नदियों का प्रवाह ‘काफ़ी हद तक सूख सकता है.’

उन्होंने यह भी कहा, ‘यह बांध हमारी जनजातियों और आजीविका के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर सकता है. मामला बेहद गंभीर है, क्योंकि चीन इसे ‘वॉटर बम’ की तरह भी इस्तेमाल कर सकता है.’

पेमा खांडू ने यह चेतावनी भी दी, ‘मान लीजिए कि बांध बनता है और अचानक पानी छोड़ा जाता है, तो सियांग क्षेत्र पूरी तरह तबाह हो जाएगा. ख़ासतौर पर आदि जनजाति और ऐसे दूसरे समुदायों की ज़मीन, संपत्ति और सबसे बढ़कर इंसानी जान, सब पर विनाशकारी असर पड़ेगा.’

यह बांध भारत के लिए खतरा बन सकता है: कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी ने भी एक्स पर पोस्ट कर यह कहा कि न्यिंगची में बन रहा यह बांध भारत के लिए खतरा बन सकता है. पार्टी ने आशंका जताई कि चीन इसके जरिए ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित कर सकता है.

वहीं, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस मुद्दे पर कहा है कि इस बांध से इतना ज़्यादा घबराने की ज़रूरत नहीं है.

उनके मुताबिक, ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव का केवल 30–35 प्रतिशत हिस्सा चीन में है, जबकि 65–70 प्रतिशत बहाव भारत में ही होता है.

उन्होंने अपनी एक्स पोस्ट में लिखा था, ‘जब यह नदी भारत में प्रवेश करती है, तो इसका दायरा और फैल जाता है.’