हिरासत में यातना: सुप्रीम कोर्ट का आदेश जम्मू-कश्मीर पुलिस की लीपापोती और क्रूरता का बयान है

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हिरासत में यातना के एक मामले को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक कॉन्स्टेबल की पत्नी का लगभग 30 महीने चला क़ानूनी संघर्ष समाप्त हुआ. कॉन्स्टेबल को 2023 की सर्दियों में कुपवाड़ा के एक पूछताछ केंद्र में हिरासत में प्रताड़ित किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (21 जुलाई) को हिरासत में यातना मामले को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक कॉन्स्टेबल की पत्नी का लगभग 30 महीने चला कानूनी संघर्ष समाप्त हुआ. उक्त कॉन्स्टेबल को 2023 की सर्दियों में कुपवाड़ा के एक पूछताछ केंद्र में हिरासत में कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया था.

मालूम हो कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ सुनवाई कर रही थी, जिसने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को इस घटना की 90 दिनों की जांच का आदेश दिया और सीबीआई को एक महीने के भीतर आरोपी पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया है.

अदालत ने कहा कि कुपवाड़ा ज़िला पुलिस ने अपने अधिकार क्षेत्र में यातना के आरोपों की जांच को ‘व्यवस्थित ढंग से दबाने’ और ‘अधिकारों के दुरुपयोग’ का एक परेशान करने वाला पैटर्न पेश किया है.

पीठ ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को 50 लाख रुपये का मुआवज़ा पीड़ित को देने का आदेश दिया, जिसकी वसूली आरोपी अधिकारियों के वेतन से की जाएगी.

इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा, ‘हिरासत में क्रूर और अमानवीय यातना से जुड़े इस मामले की अभूतपूर्व गंभीरता, जिसमें अपीलकर्ता के जननांगों को पूरी तरह से विकृत कर दिया गया, पुलिसिया अत्याचार के सबसे बर्बर उदाहरणों में से एक है, जिसका बचाव करने और उसे छिपाने की कोशिश राज्य अपनी पूरी ताकत से कर रहा है.’

शीर्ष अदालत ने आगे कहा, ‘यह केवल जांच में त्रुटि या अतिक्रमण का मामला नहीं है; यह आरोप गढ़ने, कहानी को विकृत करने और हिरासत में यातना के असली अपराधियों को बचाने का एक सुनियोजित प्रयास है.

अदालत के अनुसार, ‘इस मामले में पीड़ित और अपराधी की भूमिकाओं को उलटने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल आपराधिक प्रक्रिया का गंभीर रूप से उल्लंघन है और न्याय की इस विफलता को रोकने के लिए इस अदालत के हस्तक्षेप को मजबूर करता है.’

पीड़ित को प्रताड़ित करने का मामला

ज्ञात हो कि यह मामला 20 फरवरी, 2023 का है, जब बारामूला ज़िला पुलिस लाइन में कॉन्स्टेबल के पद पर तैनात खुर्शीद अहमद चौहान, एक पुलिस उपाधीक्षक द्वारा बुलाए जाने पर मादक पदार्थों के एक मामले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (कुपवाड़ा) के कार्यालय में उपस्थित हुए थे.

चौहान के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि उन्हें कुपवाड़ा के संयुक्त पूछताछ केंद्र (जेआईसी) में रखा गया था और कथित तौर पर छह दिनों तक प्रताड़ित किया गया, जिसके कारण वह कोमा में चले गए और कुपवाड़ा पुलिस ने कथित अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय 26 फरवरी, 2023 को उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 309 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज कर लिया.

कुपवाड़ा पुलिस द्वारा उसी दिन दर्ज की गई एफआईआर में कहा गया था कि चौहान ने ‘ब्लेड से अपनी नस काटने की कोशिश’ कर खुद को घायल कर लिया था.

चौहान के परिवार द्वारा बार-बार अनुरोध करने के बावजूद अधिकारियों ने चौहान की मेडिकल जांच रिपोर्ट उनके परिवार के साथ साझा करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उनकी पत्नी रुबीना अख्तर ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगी. इस आरटीआई ने कानूनी लड़ाई का रुख बदल दिया.

मेडिकल रिपोर्ट ने मामले को बदल दिया

चौहान का इलाज श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एसकेआईएमएस) में हुआ था, जहां से उनकी पत्नी को आरटीआई के माध्यम से मेडिकल रिपोर्ट मिली, जिसमें उनकी चोटों की प्रकृति के बारे में महत्वपूर्ण विवरण सामने आए.

रिपोर्ट के अनुसार, ‘चौहान के अंडकोष पर घाव थे और दोनों अंडकोष शल्यक्रिया द्वारा निकाल दिए गए थे, नितंबों पर जांघों तक फैले चोट के निशान थे, हथेलियों और तलवों पर घाव थे, मलाशय में वनस्पति कणों की उपस्थिति और कई फ्रैक्चर थे’.

सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में खामियां निकालते हुए कहा कि ‘यह सुझाव देना मूर्खतापूर्ण है कि एक विवेकशील व्यक्ति नशीली दवाओं के मामले में पूछताछ से बचने के लिए अपने जननांगों को पूरी तरह से विकृत करवाएगा और शरीर के दुर्गम अंगों पर चोट पहुंचाएगा’.

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, ‘चिकित्सा साक्ष्य निर्णायक रूप से यह स्थापित करते हैं कि ऐसी चोटें स्वयं द्वारा पहुंचाई नहीं जा सकतीं. प्रतिवादी का आत्महत्या के प्रयास का सिद्धांत समयसीमा और चिकित्सा साक्ष्य के आधार पर जांच करने पर ध्वस्त हो जाता है.’

अदालत ने आगे कहा कि 26 फरवरी, 2023 को जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर द्वारा पीड़ित के साथ विच्छेदित जननांगों को एक प्लास्टिक बैग में एसकेआईएमएस लाया गया था. इस बात ने ‘हमारी अंतरात्मा को झकझोर दिया है.’

अदालत ने विभिन्न संविधान पीठों और अन्य सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा, ‘ये तथ्य, अकेले और निर्विवाद रूप से हिरासत में यातना के सबसे जघन्य रूप और हिरासत में हिंसा के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में स्थानीय पुलिस अधिकारियों की पूर्ण उदासीनता का प्रथम दृष्टया मामला स्थापित करते हैं.’

‘हिरासत में यातना के गंभीर आरोपों को इस तरह से खारिज करना संस्थागत पूर्वाग्रह’

पीठ को बताया गया कि कुपवाड़ा पुलिस ने अख्तर द्वारा 1 मार्च, 2023 को दी गई लिखित शिकायत और 2 मार्च को दिए गए कानूनी नोटिस पर कार्रवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 307, 330, 331, 326 और अन्य प्रावधानों के तहत दोषियों के खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग की गई थी.

अदालत ने कहा, ‘हिरासत में यातना के गंभीर आरोपों को इस तरह से खारिज करना संस्थागत पूर्वाग्रह और आरोपी पुलिस अधिकारियों को बचाने की पूर्वनिर्धारित मानसिकता को दर्शाता है.’

उल्लेखनीय है कि चौहान के परिवार ने बाद में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया थी, जिसमें दोषियों खिलाफ मामला दर्ज करने, सीबीआई जांच करवाने और चौहान के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी.

हालांकि, अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी और पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के बजाय इस मामले की प्रारंभिक जांच का निर्देश दिया गया, जिसके बाद चौहान ने पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.

चौहान के वकील ने अदालत को बताया कि चौहान की पत्नी को भी अपने पति की मेडिकल रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए आरटीआई दाखिल करनी पड़ी, क्योंकि अधिकारियों ने उन्हें बार-बार बुनियादी मेडिकल रिकॉर्ड भी देने तक से इनकार कर दिया… ताकि क्रूर हिरासत में यातना के सबूतों को दबाया जा सके.

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ‘संज्ञेय अपराधों के स्पष्ट खुलासे के बावजूद’ जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा मामला दर्ज न करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है.

अदालत ने कहा, ‘उच्च न्यायालय ने एक नागरिक के मौलिक अधिकारों, उनकी गरिमा और जीवन के अधिकार की रक्षा करने के अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करने में विफल रहकर भारी भूल की. अदालत किए गए अपराधों की गंभीरता के साथ-साथ पुलिस अधिकारी होने के नाते आरोपी व्यक्तियों द्वारा डाले जा सकने वाले प्रभाव पर भी विचार करने में विफल रहा.’

‘घोर असमानता’

अपने 58 पृष्ठों के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि चौहान की चिकित्सा जांच रिपोर्ट से पता चलता है कि उनकी ‘चोटें कुपवाड़ा पुलिस द्वारा गढ़ी गई इस स्पष्ट रूप से मनगढ़ंत कहानी में  बताई गई चोटों से कहीं अधिक गंभीर और व्यापक हैं.’

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘एफआईआर में ‘नस काटने’ का जिक्र, और पूर्ण नपुंसकीकरण और व्यवस्थित यातना की बर्बर वास्तविकता के बीच भारी असमानता, एफआईआर के पीछे की दुर्भावनापूर्ण मंशा को उजागर करती है.’

एसकेआईएमएस द्वारा जारी चौहान की डिस्चार्ज रिपोर्ट (2 मार्च 2023) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यह ‘स्पष्ट चिकित्सा साक्ष्य है कि अपीलकर्ता अपनी चोटों के इलाज के लिए एक व्यापक शल्य चिकित्सा प्रक्रिया से गुज़रा था.

लैटिन कहावत ‘नेमो जुडेक्स इन कॉसा सुआ’ (किसी को भी अपने मामले में न्यायाधीश नहीं होना चाहिए) का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस और उच्च न्यायालय द्वारा जांच का आदेश ‘प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है.’

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा, ‘यदि जांच किसी ऐसी एजेंसी द्वारा की जाती है जो कथित तौर पर उस विवाद से जुड़ी हुई है, तो जांच की विश्वसनीयता पर संदेह होगा और यह जनहित के साथ-साथ न्याय के हित के भी विपरीत होगा.’

अदालत ने चौहान के खिलाफ कुपवाड़ा जिला पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने का आदेश देते हुए कहा, ‘हिरासत में यातना के इस मामले की अभूतपूर्व गंभीरता, स्थानीय पुलिस तंत्र द्वारा की गई व्यवस्थित लीपापोती, शिकायत के निपटान में प्रदर्शित संस्थागत पूर्वाग्रह, और निष्पक्ष जांच करने में स्थानीय अधिकारियों की पूर्ण विफलता तथा प्रतिवादी राज्य द्वारा अपनाए गए अड़ियल रुख को देखते हुए, हम जांच को सीबीआई को स्थानांतरित करने के लिए बाध्य हैं.’

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